कर्ण मल , कान का मोम ( Ear Wax ) , सेरुमेन ( Ceruman ) , कर्ण गूथ का अंतर्घट्टन ( incident ) , कान में मैल जमा होना । कान की मैल या बँट । कान में मल इकट्ठा होना ‘ इम्पेक्टिड वैक्स कहलाता है ।
परिचय -
कान के अंदर के छेद में आधी तरल या कड़ी एक प्रकार की मैल जमती है , उसे कान की मैल या बँट कहते हैं । यह कभी सफेद पर्दे की तरह पतली , कभी मोटे पर्दे की तरह , कभी ठीक कीचड़ की भाँति नरम व भूरे रंग की होती है ।
••• कर्ण मल , एक मोम की सदृश्य पदार्थ है जो श्रवण नलिका की कर्णमूलक ग्रन्थियों द्वारा स्रवित होता है ।
प्रमुख कारण -
कर्ण गूथ के असामान्य अंतर्घट्टन के कई कारण हो सकते हैं -
• ग्रन्थियों द्वारा अत्यन्त ज्यादा स्राव जो स्थानीय त्वचा क्षोभ ( हलचल, उत्तेजन ) के कारण होता है । यह त्वचा क्षोभ कर्ण गूथ निकालने के लिये प्रयुक्त सलाई या तौलिये की मरोड़ी हुई किनारी से हो सकता है ।
• अत्यधिक कर्ण गूथ स्राव रोगी में सामान्यतः भी ।
• वाह्य श्रवण नाल का संकीर्ण ( पतला ) होना जो सामान्य कर्ण गूथ स्राव को रोकता है ।
• कर्ण गूथ के असामान्य गुण ।
• अत्यधिक कर्ण गूथ स्राव रोगी में सामान्यतः भी ।
• वाह्य श्रवण नाल का संकीर्ण ( पतला ) होना जो सामान्य कर्ण गूथ स्राव को रोकता है ।
• कर्ण गूथ के असामान्य गुण ।
प्रमुख लक्षण -
श्रवण नलिका का मार्ग पूर्ण रूप से बंद हो जाने पर सुनाई देने में कमी ( बहरापन ) ।
• कान के अदंर कड़ापन ।
• नहाते या तैरते समय अथवा सिर साफ करते समय कान में जल चले जाने से रोग के लक्षण अकस्मात प्रारम्भ होते हैं । ।
• कान में दर्द । जबड़ा हिलाने या कान हिलाने से पीड़ा में वृद्धि ।
• मैल पतला होकर बाहर बहने लगना ।
• कान के अंदर आवाज ।
• चक्कर आना ।
• कान में भारीपन एवं कुछ अड़े होने जैसी प्रतीति ।
• कान के अदंर कड़ापन ।
• नहाते या तैरते समय अथवा सिर साफ करते समय कान में जल चले जाने से रोग के लक्षण अकस्मात प्रारम्भ होते हैं । ।
• कान में दर्द । जबड़ा हिलाने या कान हिलाने से पीड़ा में वृद्धि ।
• मैल पतला होकर बाहर बहने लगना ।
• कान के अंदर आवाज ।
• चक्कर आना ।
• कान में भारीपन एवं कुछ अड़े होने जैसी प्रतीति ।
नोट - इसे प्रायः रोग नहीं कहा जा सकता , फिर भी इससे कभी - कभी कान में दर्द होता है , कान सुरसुराता है , खुजलाता है , सुनने की शक्ति घट जाती है , समय - समय पर नींद में बाधा पड़ती है ।
सूचना –
सभी के कान में थोड़ी बहुत मैल ( Wax ) बनती रहती है और नार्मली यह मुँह के चलाने पर , जबड़े के हिलाने से , थोड़ा - थोड़ा करके कान के बाहर अपने आप निकलती रहती है । कभी - कभी कुछ लोगों में कान के अंदर काफी मैल जमा हो जाती है । अक्सर इससे रोगी को कोई कष्ट नहीं होता मगर जब यह मैल कान को बिलकुल बंद कर देती है और बहरापन आ जाता है , या मैल फूल जाती है और कान दर्द करता है । ।
रोग की पहिचान -
कर्ण गूथ का अंतर्घट्टन आसानी से ओटोस्कोपी के द्वारा पता लगाया जा सकता है जिससे लाल - भूरा या गहरा - भूरा कर्ण गूथ मार्ग को अवरुद्ध किये दीखता है । यह निश्चित करने के लिये कि कर्ण गूथ कड़ा है अथवा नर्म , प्रोब का प्रयोग करते है ।
रोग का परिणाम -
कर्ण गूथ के परिणामस्वरूप सुनाई न देना एवं बहरापन जैसी कठिन समस्यायें पैदा हो सकती हैं ।
• अधिक मल इकट्ठा होने से कान में फंगस का संक्रमण होकर कान के पर्दे में छेद हो जाता है । ।
•• कभी - कभी ‘ स्पेक्यूलम ' से कान के अंदर देखने से काले या भूरे रंग का पदार्थ दिखायी देता है । इस पदार्थ के कारण कान का पर्दा दिखायी नहीं पड़ता है ,
• अधिक मल इकट्ठा होने से कान में फंगस का संक्रमण होकर कान के पर्दे में छेद हो जाता है । ।
•• कभी - कभी ‘ स्पेक्यूलम ' से कान के अंदर देखने से काले या भूरे रंग का पदार्थ दिखायी देता है । इस पदार्थ के कारण कान का पर्दा दिखायी नहीं पड़ता है ,
आनुषंगिक चिकित्सा -
यदि कान में पूर्ण रूप से मैल भरा है और कान बंद है तो एक ओर से कान का थोड़ा सा किनारा उठा लें जो कान की सलाई से किया जा सकता है । इसके बाद पिचकारी से साधारण हल्के गर्म जल से धोकर साफ करें । पिचकारी के नोजिल का मुख कान की नाली की दीवार की ओर रखें , सामने पर्दे की ओर न रखें।
• यन्त्र ( Scoop ) या रिगं प्रोब ( Ring Probe ) से भी मैल निकाला जा सकता है । पर इसमें विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है ।
• यन्त्र ( Scoop ) या रिगं प्रोब ( Ring Probe ) से भी मैल निकाला जा सकता है । पर इसमें विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है ।
सरल एवं अनुभूत पेटेन्ट चिकित्सा -
हाइड्रोजन पर आक्साइड की 5 - 6 बूंदें । डाल कर 10 मिनट तक डला रहने दें । मैल फूलने पर कान साफ कर दें ।
• अथवा वैक्सोल्व ( Waxolve ) बेल फार्मा की 4 - 5 बूंदें कान में डालें । अथवा पहले कान को मुलायम कर लें । इसके लिये सोडा बाई कार्ब 7 . 5 ग्राम , शुद्ध जल 100 मि . ली . या ‘ लिक्विड पैराफिन ' या ' जैतून का तेल डालें । मैल मुलायम होने के बाद उसे सिरिन्ज से साफ कर दें । जल का ताप शरीर के ताप के बराबर हो ।
• अथवा वैक्सोल्व ( Waxolve ) बेल फार्मा की 4 - 5 बूंदें कान में डालें । अथवा पहले कान को मुलायम कर लें । इसके लिये सोडा बाई कार्ब 7 . 5 ग्राम , शुद्ध जल 100 मि . ली . या ‘ लिक्विड पैराफिन ' या ' जैतून का तेल डालें । मैल मुलायम होने के बाद उसे सिरिन्ज से साफ कर दें । जल का ताप शरीर के ताप के बराबर हो ।
इस प्रकार भी -
यदि मैल सख्त है तो पिचकारी लगाने से पूर्व 2 - 3 दिन तक दिन में 2 - 3 बार सोडा ग्लिसरीन या गुनगुना सरसों का तेल डालें , ताकि मैल फूल जाये । मैल फूल जाने पर उसे चिमटी या फुरेरी से निकाल दें ।
• कुछ लोगों की राय है कि जब कान में पूर्ण रूप से मैल भरी हो तब ‘ हाइड्रोजन पर आक्साइड का प्रयोग न करे , क्योंकि इससे मैल फूल कर कान की नाली में फँस जाती है तथा कान का दर्द आरम्भ कर देती है ।
• ऐसा प्रयत्न करें कि एक ही बार में कानों की मैल साफ कर ली जाये अन्यथा कानों में शेष रह गई मैल जल का शोषण करके फूल जाती है तथा कानों में दर्द का कारण बनती है । यदि इस प्रकार मैल कठिनाई से निकले तो कुछ देर इसे नरम होने के लिये करें ।
•• चेतावनी – कान से कर्ण गूथ को उष्ण ( गर्म ) पानी से सिरिंजिंग करके निकालते हैं । लेकिन इसके पहले पूय - निस्राव ( मवाद, पिब ) की उपस्थिति जानने के लिये कान की जाँच करते हैं क्योंकि इस मामले में कर्णपट्ट ( पर्दा ) में सूखा छिद्र रहने की सम्भावना होती है । अगर ऐसा हो तो सिरिंजिंग से प्रतिक्रिया तेज हो जावेगी और पूय निःस्राव फिर होगा । इस हालत में कर्णगूथ को वलय क्यूरेट या ‘ कर्णगूथअंकुश ( प्रोब ) से हटाना बेहतररहता है ।
•• कर्ण गूथ की सफाई में आवश्यक निर्देश / सुझाव ••
• कुछ लोगों की राय है कि जब कान में पूर्ण रूप से मैल भरी हो तब ‘ हाइड्रोजन पर आक्साइड का प्रयोग न करे , क्योंकि इससे मैल फूल कर कान की नाली में फँस जाती है तथा कान का दर्द आरम्भ कर देती है ।
• ऐसा प्रयत्न करें कि एक ही बार में कानों की मैल साफ कर ली जाये अन्यथा कानों में शेष रह गई मैल जल का शोषण करके फूल जाती है तथा कानों में दर्द का कारण बनती है । यदि इस प्रकार मैल कठिनाई से निकले तो कुछ देर इसे नरम होने के लिये करें ।
कान को साफ करने के बाद सदैव शुष्क रुई के साथ अंदर से शुष्क कर लेना चाहिये । यदि किसी कारणवश कान से रक्त आ जाये या घाव बन जाये तो प्रतिजीवी ( एण्टीबायोटिक्स ) का प्रयोग करें जिससे जीवाणुओं का प्रकोप न हो । इसके लिये --
• लाइकासिटीन ( Lykacetin ) ओप्टिक ड्रॉप्स नि . ' लाइका 3 - 4 बूंदें नित्य दिन में 3 बार डालें ।
अथवा - जैनसिल ( Gencyl ) नि . आइ . डी . पी . एल .
अथवा - जैनटिसीन ( Genticyn ) नि . निकोलस
अथवा - टायोटोसिन ईअर ड्रॉप्स ( Tyotocin ear drop ) मेरिण्ड ।
• इनमें से किसी एक की 3 - 4 बूंदें प्रत्येक कान में दिन में 3 - 4 बार डालें ।
•• यदि कान में अन्य कोई जटिलता हो तो रोगी को ' कान , नाक , गला रोग विशेषज्ञ ( E . N . T . Specialist ) के पास भेज दें ।
• लाइकासिटीन ( Lykacetin ) ओप्टिक ड्रॉप्स नि . ' लाइका 3 - 4 बूंदें नित्य दिन में 3 बार डालें ।
अथवा - जैनसिल ( Gencyl ) नि . आइ . डी . पी . एल .
अथवा - जैनटिसीन ( Genticyn ) नि . निकोलस
अथवा - टायोटोसिन ईअर ड्रॉप्स ( Tyotocin ear drop ) मेरिण्ड ।
• इनमें से किसी एक की 3 - 4 बूंदें प्रत्येक कान में दिन में 3 - 4 बार डालें ।
•• यदि कान में अन्य कोई जटिलता हो तो रोगी को ' कान , नाक , गला रोग विशेषज्ञ ( E . N . T . Specialist ) के पास भेज दें ।
अनुभूत चिकित्सा - एक झलक -
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• टायोटोसिन ईअर ड्रॉप्स की 3 - 4 बूंदें दिन में 3 - 4 बार डालें । अगले दिन कान को ‘ एब्जोरबेण्ट काटन ' या बोरिक रुई से धीरे - धीरे ( फुरेरी रूप में ) फूला हुआ मैल निकाल लें । तत्पश्चात इसी ड्रॉप्स की 3 - 4 बूंदे कान में डाल दें । अन्त में 2 - 3 दिन नियमित रूप से इसी ड्रॉप्स की बूंदें डालते रहें ।
नोट - इस क्रम से कान में मैल , ‘ कान में खुजली , सरसराहट , सुनाई न देना आदि सभी विकार दूर हो जाते हैं । कान के फंगस तथा पर्द में छेद आदि की भी विशिष्ट चिकित्सा है ।
रोग निरोध -
कान में कर्ण गूथ - अन्तर्घट्टन को रोकने के लिये रोगी को ' हेयर पिन एवं तौलिये के दोलित सिरे ( नुकीला सिरा ) , तीली आदि से कर्ण गूथ निकालने के विरुद्ध चेतावनी देनी चाहिये , क्योंकि इससे कर्ण गूथ श्रवण नाल में और भी भीतर चला जाता है । इसके अलावा नुकीली वस्तुओं की मदद से कर्ण गूथ पकड़ने पर ' कर्णपाली एवं कान के आंतरिक भाग पर्दे आदि पर चोट लग सकती है ।
रोगी को चेतावनी देनी चाहिए कि बिन्दुपातन ( ईअर ड्रॉप्स के डालने के बाद ) के पश्चात कर्ण गूथ के फूलने की वजह से बन्द कान की तरह की अनुभूति तीव्र हो सकती है । ।
•• जनरल प्रैक्टिस में सबसे अधिक रोगी कान की शिकायत लेकर आते हैं । यह कष्ट उनको केवल कान के मैल ( Wax ) के कारण होता है । अतः इस प्रकार के रोगियों के कानों का निरीक्षण करते समय या मैल साफ करते समय सावधानी आवश्यक है ।
→ सख्त मैल को अधिक शक्ति से निकालने का प्रयत्न न करें बल्कि सर्वप्रथम कान में वैक्सोल्व ( Waxolve ) ईअर ड्राप्स नि . ' वैल ' अथवा टायोटोसिन ईअर ड्राप्स की 5 बूंदे 1 - 2 बार तक डालें जो मैल को नरम ( Soft ) बनाती है ।
•• ईअर ड्रॉप्स के कान में डालने के पश्चात की जानकारी - एक चेतावनी -
रोगी को चेतावनी देनी चाहिए कि बिन्दुपातन ( ईअर ड्रॉप्स के डालने के बाद ) के पश्चात कर्ण गूथ के फूलने की वजह से बन्द कान की तरह की अनुभूति तीव्र हो सकती है । ।
•• जनरल प्रैक्टिस में सबसे अधिक रोगी कान की शिकायत लेकर आते हैं । यह कष्ट उनको केवल कान के मैल ( Wax ) के कारण होता है । अतः इस प्रकार के रोगियों के कानों का निरीक्षण करते समय या मैल साफ करते समय सावधानी आवश्यक है ।
→ सख्त मैल को अधिक शक्ति से निकालने का प्रयत्न न करें बल्कि सर्वप्रथम कान में वैक्सोल्व ( Waxolve ) ईअर ड्राप्स नि . ' वैल ' अथवा टायोटोसिन ईअर ड्राप्स की 5 बूंदे 1 - 2 बार तक डालें जो मैल को नरम ( Soft ) बनाती है ।

