आन्त्र ज्वर , इन्टेरिक फीवर ( Enteric Fever ) , मियादी बुखार ।
परिचय -
साल्मोनेला टाइफि के द्वारा उत्पन्न एक तीव्र संक्रामक ज्वर जो रोगियों अथवा वाहकों द्वारा दूषित किये गये भोजन , दूध अथवा पानी के जरिये सम्प्रेषित( उत्प्पन ) किया जाता है । तेज ज्वर , लाल चकत्ते एवं सन्नीतिपात( एक प्रकार का ज्वर जिसमे कफ, पित और वात तीनो बिगड़ जाते है ) होता है तथा कभी - कभी आन्त्रीय रक्त स्राव होता है । आरोग्य लाभ( स्वास्थ्य में सुधार ) प्रायः रोग के चौथे हफ्ते के दौरान शुरू होता है ।
• साल्मोनेला टाइफाइ , एक ग्राम - ऋणात्मक , स्वतः गतिशील बेसीलस जीवाणु द्वारा उत्पन्न एक तीव्र संक्रामक रोग जिसमें निरन्तर ज्वर रहता है , जो संक्रमित जल , दूध , भोजन के द्वारा , बेसीलसों को साँस के साथ अंदर खींचने से , मक्खियों , रोगी अथवा वाहकों द्वारा संचारित होती है । बेसीलस छोटी आँत की पीयर चित्तियों( spots ) में स्थापित हो जाते हैं जिससे जख्म बन जाते हैं , जो भर जाते हैं अथवा उनसे रक्त स्राव होता है या उनमें छेद हो जाता है । रोग की अवधि 3 सप्ताह की होती है ।
• जीवाणु द्वारा संक्रमित खाना , दूध अथवा पानी पीने के कारण यह रोग होता है । यह रोग साल्मोनेला पेराटाइफी ' ए ' एवं ' बी ' एवं मुख्यतया ' साल्मोनेला टाइफी ' जीवाणु के कारण होता है ।
• साल्मोनेला टाइफाइ , एक ग्राम - ऋणात्मक , स्वतः गतिशील बेसीलस जीवाणु द्वारा उत्पन्न एक तीव्र संक्रामक रोग जिसमें निरन्तर ज्वर रहता है , जो संक्रमित जल , दूध , भोजन के द्वारा , बेसीलसों को साँस के साथ अंदर खींचने से , मक्खियों , रोगी अथवा वाहकों द्वारा संचारित होती है । बेसीलस छोटी आँत की पीयर चित्तियों( spots ) में स्थापित हो जाते हैं जिससे जख्म बन जाते हैं , जो भर जाते हैं अथवा उनसे रक्त स्राव होता है या उनमें छेद हो जाता है । रोग की अवधि 3 सप्ताह की होती है ।
• जीवाणु द्वारा संक्रमित खाना , दूध अथवा पानी पीने के कारण यह रोग होता है । यह रोग साल्मोनेला पेराटाइफी ' ए ' एवं ' बी ' एवं मुख्यतया ' साल्मोनेला टाइफी ' जीवाणु के कारण होता है ।
•• रोग के लक्षण एवं चिन्ह ••
प्रथम सप्ताह में प्रकट होने वाले लक्षण : →• रोग धीरे - धीरे बढ़ता है और बदन में दर्द रहता है ।
• सिर के आधे भाग में दर्द ।
• बुखार धीरे - धीरे बढ़ता है ।
• सार्वदैहिक( शरीर के सभी हिस्सों में ) दुर्बलता ।
• हाथ - पैरों में वेदना( दर्द ) ।
• भूख न लगना ।
• कब्ज एवं नींद न आना ।
• बुखार की शिकायत रहती है । तापक्रम धीरे - धीरे ( सीढ़ी के डंडों के समान ऊपर को चढ़ता चला जाता है और रोज सुबह को 1/2 - 1 डिग्री नीचे गिर जाता है तथा सप्ताह के अन्त तक 102 डि . फा . से 103 डि . फा . तक पहुँच जाता है । )
• नाड़ी की गति तापमान के बढ़ने की तुलना में धीमी एवं नाड़ी द्वि - स्पंदी होती है । यह अधिकतर 90 से 100 मिनट होती है ।
• जिव्हा पर सफेद परत जम जाती है । जिसका सिरा तथा किनारे साफ होते हैं ।
• लगभग सातवें दिन धड़( बदन ) एवं उदर( पेट ) पर गुलाबी दाने प्रकट हो जाते हैं । जो दबाने पर फीके पड़ जाते हैं ।
• परिस्पर्शन( स्पर्श परीक्षा ) करने पर तिल्ली की अनुभूति ।
• रक्त में श्वेत रक्त कोशिकाओं की कभी । श्वेत रक्त कोशिकायें प्रत्येक घन मिमी . रक्त में 4000 से 5000 हो जाती हैं ।
• उदर के ऊपरी हिस्से से परेशानी महसूस ।
• जीभ सूखी एवं पपड़ीदार ।
• फेफड़ों के प्रकोष्ठों( अंदुरुनी हिस्सो ) की सूजन् ।
• हृदय एवं नाड़ी की गति धीमी ( बेडिकीर्डिया ) ।
• स्पलीन या तिल्ली( यह एक आंतरिक अंग है जो बाई ओर पसलियों के नीचे होता है ) बढ़ी हुई एवं दबाने पर दर्द ।
द्वितीय सप्ताह में : -
• बुखार लगातार बना रहता है । तापमान लगभग 101°F से 103°F के बीच स्थिर हो जाता है । यह अक्सर एकदम से बहुत तेज 104°F से 105°F तक हो जाता है ।
• पेट फूल जाता है और दस्त आने की प्रवृत्ति तेज हो जाती है ।
• रोगी के शरीर में विष का निर्माण । ।
• दिमाग कमजोर हो जाता है । सोचने - समझने की शक्ति धीमी पड़ जाती है ।
• पेट में तनाव बरकरार ।
• दस्त ( हल्के - पीले रंग के ) हो जाते हैं ।
तृतीय सप्ताह में : -
• जीव विषरक्तता( रक्त में जीवाणुओ की उपस्थित ) में वृद्धि एवं गहन मूर्च्छा( गंभीर मूर्च्छा । अन्त में मृत्यु ।
• परन्तु अधिकतर इस सप्ताह के अंत तक उसमें सुधार हो जाता है , यह तापमान गिरना शुरू हो जाता है । फिर भी छोटी आंत के जख्मों से रक्त स्राव होने अथवा उनके फटने का डर रहता है ।
• रोगी बहुत कमजोर हो जाता है ।
•• रोग की पहिचान ••
• खून की जाँच द्वारा जीवाणुओं का पता लगाया जा सकता है । इसके लिये कल्चर जाँच ( Culture test ) कराना आवश्यक है ।
• रोग के प्रथम सप्ताह में ही पाखाने की जाँच में भी जीवाणु प्रकट हो जाते हैं । ।
• विडाल जाँच - यह एक विशेष प्रकार की जाँच होती है , जो टायफाइड रोग की पहिचान के लिये की जाने वाली सबसे उपयुक्त जाँच है ।
•• रोग का परिणाम ••
• जब जीवाणु रक्त में अत्यधिक विष सीवत ( Toxin exereate ) करते हैं तो तीव्र . विषमयता कारण तापक्रम 105° से कम नहीं होता या इससे भी अधिक होने लगता है तथा अधिक काल तक बना रहता है तब रोगी की दशा अधिक चिन्तनीय होने लगती है । ।
• अत्यधिक व उग्र स्वरूप का अतिसार रक्तातिसरण( पेचिस जिसमे मल के साथ खून निकलता है ) तथा अत्यधिक बढ़ जाने पर रोगी चिकित्सा के योग्य नहीं रहता,
नोट - जब आन्त्र में छिद्रण ( Perforation ) होकर पेरीटोनाइटिस के लक्षण हो जाते हैं तब रोगी ऐसे स्टेज में पहुँच जाता है जिसमे रोग को साधना चुनोती पूर्ण हो जाता है ,
•• चिकित्सा विधि ••
• प्रारम्भ में उपवास ।
• ज्वर का वेग तीव्र होने पर सर्वप्रथम पित्त व वात का इलाज जरूरी ।
• कोष्ठ शुद्धि के लिये मुनक्का गर्म दूध में औटाकर । वस्ति व सपोजिटरी का उपयोग कर सकते हैं । ' दस्तावर '( दस्त कराने वाली दवा ) भूल कर नहीं ।
• इस ज्वर की औषधि ' क्लोरमफेनिकाल है किन्तु इसका प्रयोग बहुत सावधानी के साथ करना चाहिये । सदैव विश्वसनीय कम्पनी की औषधि लें । जैसे — क्लोरोमाइसिटीन , रेक्लोर , एण्ट्रोमाइसेटिन ( डेज कं ) ।
• जहाँ तक सम्भव हो ज्वर शुरू होने के 5 दिन बाद क्लोरमफेनिकॉल आरम्भ करें ।
• जब टेम्परेचर नॉर्मल हो जाये तो क्लोरमफेनिकॉल की मात्रा धीरे - धीरे कम कर दें।
• प्रेडनीसोलोन जहाँ तक सम्भ्व हो न दें ।
• रोगवाहक पुराने रोगियों में एम्पीसिलीन या ट्रिमिथोप्रिम - सल्फामिथो क्साजोल ( सेप्ट्रान ) देना ठीक रहता है । क्लोरमफेनिकाल का देना अनुपयुक्त हैं,
•• पथ्यापथ्य एवं आनुषांगिक चिकित्सा ••
• रोगी को साफ हवादार कमरे में लिटाना । जब तक रोग अच्छी तरह आराम न हो जाये तब तक रोगी को एकदम लेटे रहना चाहिये । दस्त - पेशाब भी लेटे - लेटे करना चाहिये । जहाँ तक सम्भव हो रोगी को हिलने - डुलने भी न दें ।
• दूध , साबूदाना , बार्ली आदि बिल्कुल नरम पेय दें । दूध के साथ एक चुटकी खाने का सोडा या 1 चम्मच चूने का पानी मिलाकर दें । मीठा सन्तरा , मौसम्मी का रस , अनार , बेदाना आदि फलों का रस दें ।
• गुनगुने पानी से साफ तौलिये को भिगोकर सम्पूर्ण शरीर को अच्छी तरह रोज एक बार पोंछ देना चाहिये । तत्पश्चात् सूखे तौलिये से पोंछ डालना चाहिये ।
• पीने का पानी लौंग डालकर औटाया हुआ देना चाहिये ।
• तुलसी की चाय , मुनक्का , बाजरे का दलिया , परवल , मूग की दाल का पानी दे ,
• कठिन दशा में चिकित्सक की राय के अनुसार । ।
नोट - रक्त स्राव की अवस्था में शस्त्रकर्म करना अनिवार्य हो सकता है । आध्यमान , अतिसार , तीव्र ताप आदि की चिकित्सा भी विधि के अनुसार ध्यान पूर्वक करनी चाहिये ।
•• टायफाइड की औषधि चिकित्सा ••
• पूर्ण विश्राम दें ।
• क्लोरमफेनिकॉल 500 मि . ग्रा . प्रति 4 घण्टे बाद ( 300 मि . ग्रा . प्रतिदिन ) ताप के नार्मल होने तक दें । तत्पश्चात् प्रति 6 घण्टे बाद 15 दिन तक दें ।
नोट - रोगी को 3 सप्ताह तक चिकित्सक के सतत् निरीक्षण में रहना चाहिये ।
• यदि रोग की आवृत्ति ( Relapse ) हो जाये तो उपरोक्त उपचार ही पर्याप्त । ।
• रोगवाहक पुराने रोगियों में एम्पिसिलीन ' या ' ट्रिमिथोप्रिम सल्फामिथोक्साजोल ( सेप्ट्रान ) देना उचित । क्लोरमफेनिकॉल का देना अनुपयुक्त ।
• विषयमता अधिक होने पर प्रेडनिजोलोन ( Prednisolone ) का उपयोग ।
• प्रेड्निजोलोन का प्रयोग क्लोरेम्फेनिकॉल के 2 - 3 दिन प्रयोग करने के बाद ही करना चाहिये । "
• सुपाच्य , अधिक शक्ति वाला , पेट में गैस न उत्पन्न करने वाला भोजन ( Dite ) दें।
• अतिसार न होने पावे , इसका ध्यान रखें ।
• एम्पिसिलिन 1 ग्राम ( 4 कै . ) प्रति 6 घण्टे पर । क्लोरमफेनिकाल के समान लाभकारी ।
याद रखिये -
• क्लोरमफेनिकॉल ' विभिन्न व्यापारिक नामों से मिलती है । जैसे - पैराक्सिन् ( Caps Paraxin - वोहरिंगर - नोल ) 250 तथा 500 मि . ग्रा . की मात्रा वाले अलग - अलग कैप्सूल तथा 250 मि . ग्रा . की मात्रा वाली कठोर गोलियाँ ( ड्रेगी ) के रूप में । इसके अतिरिक्त शर्बत के रूप में बच्चों के लिये जिसका 1 चम्मच या 5 मि . ली . में औषधी 125 मि . ग्रा . तक होती है ।
• रेक्लोर ( Caps Reclor ) ‘ साराभाई 250 मि . ग्रा . तथा 500 मि . ग्रा . की मात्रा में तथा विटामाइसेटिन ( Caps Vitamycetin - मैनर्स कं ) 250 मि . ग्रा . और ' क्लोरोमाइसेटिन ( पी . डी ) 250 मि . ग्रा . एवं 500 मि . ग्रा . व ' एण्ट्रोमाइसेटिन ( Caps Enteromycetin - डेज ) 250 मि . ग्रा . की मात्रा में आते हैं । इसके इन्जे . भी आते हैं जिसके 2 मि . ली . में 250 मि . ग्रा . औषधि होती है ।
• 0nce the temperature touches normal , the dose of chloranphenicol should be gradually reduced by 500 mg every 2 - 3 days and should be continued for 10 days ( more but not less ) or 500 mg . Q . D . S . for another one weak and 250 mg . Q . D . S . for about 4 to 8 days after the temperature has remained normal .
•• आधुनिक आन्त्र ज्वर की चिकित्सा ( Treatment of Modern Typhoid ) ••
आजकल टायफाइड के अधिकांश रोगी ‘ क्लोरमफेनिकॉल के प्रति रसिस्टेन्ट होते हैं । इनमें ' सिप्रोफ्लोक्सासिन ( Ciprofloxacin ) ( 250 मि . ग्रा . दिन में 2 बार ) 10 दिन तक देना लाभकारी होता है ।
• परन्तु यदि 5वें दिन बुखार नार्मल न हो अथवा अत्यधिक रूप से जीवाणु रसिस्टेन्ट हों तो सेफ्ट्रीएक्सोन ( Ceftriaxone ) 1 ग्राम दिन में 2 बार आई . वी . ( I . v ) दें । यह एक अधिक महँगी औषधि है । अथवा आधुनिक एण्टीबायोटिक औषधियाँ मिलाकर ( Combination of modern antibiotics ) दें ।
• 10 - 12 दिन तक तापक्रम नार्मल होने तक विश्राम । ।
• प्रत्येक टायफाइड के रोगी का नित्य निरीक्षण करें । निम्न उपद्रव मिलने पर नीचे लिखे । अनुसार चिकित्सा करें । तापक्रम के . एकाएक नार्मल से भी नीचे आने पर
•• तापक्रम के . एकाएक नार्मल से भी नीचे आने पर ••
‘ क्लोरमफेनिकाल तथा ' प्रेडनीसोलोन ' को बहुत ऊँची मात्रा में देने पर रोगी का टेम्परेचर नार्मल से भी नीचे आ जाता है और हाथ - पैर ठंडे हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में स्ट्रॉग कॉफी अथवा ब्राण्डी के साथ अथवा ब्राण्डी को अकेले दें । पैरों की मालिश और कम्बल से ढक दें । तत्पश्चात् ' कॉरामीन अथवा ' विटामिन बी12 ' आदि के इन्जेक्शन दें ।
• डिलीरियम - ' पैरल्डिहाइड ' ( Paraldehyde ) 8 - 10 मि . ली . उपयुक्त चिकित्सा है । आजकल इन्जे . केलम्पोज ( Ini . Calmpose ) अधिक उपयुक्त माना जा रहा है ।
• आध्यमान - अंत में गैस आदि की स्थिति में ( Abdominal Distension ) - > निम्न व्यवस्था अपनायें -
1 . बटरभिल्क एवं मुलायम केला ( Soft Bananas ) ।
2 . चारकोल टेबलेट , 2 दिन में 4 बार दें ।
3 . फ्लेट्स ट्यूब प्रति 2 से 4 घण्टे पर ।
4 . इन्जे . कैल्शियम पेण्टोथिनेट 1 मि . ली . प्रति 6 घण्टे पर दें । माँस में ।
5 . टरपेन्टाइन इस्टूप्स ( Turpentine stupes ) - कुछ केसिस में । ।
अतिसार ( Diarrhoea ) -
1 . दूध बंद ( stop milk ) । ।
2 . बटरमिल्क डाइट देना प्रारम्भ कर दें ।
3 . बिस्मथ मिक्श्च र , टिं , ओपियम 10 बूंद मिलाकर प्रति 2 - 4 घण्टे पर अतिसार बंद होने तक दें । गम्भीर रोगी में रिटेन्सन एनीमा 4 – 6 घण्टे पर दें । इसे इस प्रकार तैयार करें -
टिंक्चर ओपियम ms . XXX
स्टार्च ZIV
जल - कुल ZVI
• इसे बूंद - बूंद कर ग्लूगोज ड्रिप की भाँति दिया जाता है । ।
• यदि अतिसार के कारण रोगी में डिहाइड्रेशन की स्थिति आ गई हो तो आई . वी . तरल दें । आजकल लोमोटिल ( Lomoti ) अथवा इमोडियम ( Imodium ) का उपयोग किया जाता है ।
• निम्न 3 उपद्रव ऐसे हैं जो अधिक खतरनाक हैं इनको एक प्रेक्टिश्नर को अपनी चिकित्सा में न लेकर अपने निकट के किसी जनरल । होस्पिटल में अति शीघ्र भर्ती करा देना चाहिये ।
• रक्त स्राव ( Haemorrhage ) - रेस्टलेसनेस ( Restlessness ) टेकीकार्डिया रक्त चाप का गिरना , रोगी की हिस्ट्री एवं काले पतले गाँठदार दस्तों ( Melena ) से पहचाना जा सकता है ।
• पेरीफेरल शॉक ( Peripheral Shock ) - अन्य शॉक से मिलता - जुलता एवं शीतल शरीर , टेकीकार्डिना की वृद्धि , रक्त चाप का गिरना , ओलीएरिया आदि से निदान किया जाता है ।
• छिद्रण ( Perforation ) - एकाएक उदरीय शूल ( Sudden pain in the abdomen ) , अफारा , उदर गैस , Loss of Liver dullness , टेकीकार्डियों , रक्त चाप का गिरना आदि से निदान ( Diagnosed ) होता है ।
•• टायफाइड की चिकित्सा इस प्रकार से भी ••
• पूर्ण विश्राम ( Complete Bed Rest ) ।
• कुछ दिन अर्धतरल भोजन । तत्पश्चात् रेशेदार ( Roughage ) । केला एक उपयुक्त आहार है । →
• बुखार तथा सिर दर्द के लिये पैरासिटामोल एवं स्पोंजिंग ।
• क्लोरमफेनिकॉल मुख द्वारा अथवा 500 मि . ग्रा . आई . वी . प्रति 6 घण्टे पर प्रथम सप्ताह । तत्पश्चात् 500 मि . ग्रा . प्रति 8 घण्टे पर 2 सप्ताह तक । । कोटीमोक्साजोल 2 टेबलेट दिन में 3 बार । एमोक्सीसिलिन ( Amoxycillin ) 1 ग्राम प्रति 6 घण्टे पर अथवा एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर ।
• आजकल ( Recently ) ' सिप्रोफ्लोक्सासिन 200 मि . ग्रा . आई . वी . 8 - 12 घण्टे पर ड्रिप के साथ दें । यदि रोगी को वमन( उल्टी ) न हो रहे हों तो इसे 500 मि . ग्रा . की मात्रा में प्रति 8 - 12 घण्टे पर मुख से दें । ।
• स्टेरॉइड्स - ‘ हाइपर पाइरेक्सिया ' , सेप्टीसीमिया , गम्भीर विषमयता को स्थति में एण्टीबायोटिक के साथ प्रेडनीसोलोन 30 - 60 मि . ग्रा . नित्य विभाजित मात्रा में दें । ।
• जीर्ण वाहक रोगियों में ( In Chronic Carrier ) – एम्पीसिलीन 1 ग्राम प्रति 8 घण्टे पर 6 - 12 सप्ताह तक ।
•• एक अन्य विशिष्ट चिकित्सा - व्यवस्था ••
• चारपाई पर विश्राम । ।
• पोषण को उचित व्यवस्था । ।
• एम्पीसिलीन 1 ग्राम प्रति 6 घण्टे पर ओरली अथवा 100 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार पर 4 बराबर मात्राओं में विभाजित कर आई . वी . इन्जे . द्वारा 14 दिन तक । अथवा क्लोरमफेनिकॉल 250 मि . ग्रा . प्रति 4 घण्टे पर मुख द्वारा । अथवा आई . वी . इन्जे. तापक्रम सामान्य होने तक । तत्पश्चात् 0 . 5 ग्राम दिन में 4 बार मुख द्वारा 2 सप्ताह तक दें ।
• एमोक्सीसिलिन् 500 मि . ग्रा . प्रति 8 घण्टे पर मुख द्वारा / अथवा आई . वी . इन्जे . द्वारा । ।
• कोटी - मोक्साजोल 1 टेबलेट दिन में 2 बार मुखं द्वारा / अथवा एम्पीसिलीन पैराटायफाइड फीवर के लिये ।
• जेण्टामाइसीन 5 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार पर नित्य 4 मात्राओं में विभाजित कर मासपेशीगत अथवा आई . वी . इन्जे . रूप में छिद्रण की स्थिति में । ।
• रक्त स्राव / रिलेप्स केसिस आदि उपद्रवों की उचित व्यवस्था ।
•• मियादी बुखार की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा ••
1 . विषमयता ( Toxaenia ) की स्थिति में - इन्जे . ' वेटनीसोल ' 1 एम्पुल की सुई माँस या नस में लगावें । डेल्टाकार्टिल ( ग्लैक्सो ) 1 - 1 टेबलेट दिन में 2 या 3 बार दें ।
2 . बेचैनी एवं रोग की भयानक अवस्था - ग्लिसरीन सपोजीटरी गुदा में । चारकोल की 1 - 1 टेबलेट दिन में 3 - 4 बार दें ।
3 . टायफाइड में अफारा होने पर - बेलाडोना प्लास्टर लगावें और सिकाई करें । एनाल्जेसिक एवं ओरियोमाइसीन कै . प्रति 4 घंटे पर ।
4 . टायफाइड में कर्णमूल शोथ होने पर - आई . वी . डेक्स्ट्रोज अथवा 125 प्रतिशत ग्लूकोनेट 500
5 . मूत्र की मात्रा घट जाने पर - मि . ली . सीलिन 500 मि . ग्रा . और सोडा बाई को ल्यूशन 200 मि . ली . मिलाकर डिप रूप में दें ।
6 . रोग के बाद की दुर्बलता - फोस्फोमिन लिक्विड अथवा बीकाडेक्स दें । अथवा विटा ‘ बी कम्पलेक्स फोर्ट की 1 - 1 टे . दिन में 3 4 बार दें ।
•• पाराक्सीन ( नोल ) 250 या 500 मि . ग्रा . का 1 कै . बीकोसूल्स 1 कै . डेल्टाकाटिल 1 टे . , सीलिन 500 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट — ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार दें । साथ में एल्कासाइट्रोन ( ग्लूकोनेट ) अथवा ' साईट्राल्का सीरप 2 - 2 चम्मच 4 गुना जल में मिलाकर दिन में 2 - 3 बार पिलावें । ।
बचाव -
• बुखार उतरने तक बिस्तर पर आराम । ।
• दूध एवं पानी उबालकर पीना । ।
• रोग की अवधि में दतिया , खिचड़ी आदि खाने को ।
• शरीर में पानी एवं लवणों की कमी नहीं होने देना चाहिये । दूध , फलों का रस एवं पानी पिलाना चाहिये । ।
• जो लोग सफर अधिक करते हैं उन्हें ' टायफाइड वैक्सीन लगवा लेना चाहिये । वैक्सीन के 3 सूची वेध , पहिला 0 . 5 मि . ली . का , दूसरा 1 सप्ताह बाद 1 मि . ली , का और तीसरा भी 1 सप्ताह बाद 1 मि . ली . का उपत्वचा में । इससे रोगी में 1 वर्ष तक रोगक्षमता बनी रहती है ।
•• मियादी बुखार में सेवन कराने योग्य अपडेट ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल ••
1 . इडीमोक्स ( Idimox ) ( आई . डी . पी . एल . ) 250 , 500 मि . ग्रा . कै. - 1 - 2 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें ।
2 . लेमोक्सी ( Lamoxy ) ‘ लाइका 250 , 500 मि . ग्रा . कै . - 250 - 500 मि . ग्रा . प्रति 8 घण्टे पर दें । बालक 20 मि . ग्रा . प्रति कि , शरीर भार पर विभाजित मात्रा में । ।
नोट - इसका इन्जेक्शन और बच्चों के लिये ड्राई सीरप भी आता है ।
3 . मोक्स ( Mox ) ' गूफिक 250 , 500 मि . ग्रा . कै . - 250 - 500 मि . ग्रा . दिन में 3 बार । बच्चों के लिये सीरप आता है ।
4 . पाराक्सिन ( Paraxin ) वोहरिंगर - एम 250 - 500 मि . ग्रा . । - 250 - 500 मि . ग्रा . गम्भीर अवस्था में प्रति 6 घण्टे पर दें ।
नोट - ड्रेगी , ड्राई सीरप ( बच्चों के लिये )
5 . रेक्लोर ( Reclor ) ' साराभाई । 250 , 500 मि . ग्रा . कै . - 1 . 5 - 3 ग्राम नित्य विभाजित मात्रा में ।
6 . विटामाइसेटिन ( Vitamycetin ) मेनसे 250 मि . ग्रा . कै . - 50 - 75 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार पर नित्य विभाजित मात्रा में ।
नोट - इसका सीरप भी आता है । क्लोरम्फेनकॉल ससेप्टिबिल में उपयोगी । ।
7 . एल्कोरिम - एफ ( Alcorim - F ) ' एलबर्ट डेविड के - 1 टेबलेट दिन में 2 बार दें । बच्चों के लिये सस्पेन्शन आता है ।
8 . सीडल ( Cidal ) ' डीफार्मा - 1 टे . दिन में 2 बार गम्भीर अवस्था में 2 टे . दिन में 2 बार । ।
नोट - इसकी फोर्ट टेबलेट तथा सस्पेन्शन भी आता है ।
9 . कोलीजोल ( Colizole ) ईस्ट इंडिया नोट - कोलीजोल डी . एस . और सस्पेन्शन - 2 टे . दिन में 2 बार । गम्भीर अवस्था में । 3 टे . दिन में 3 बार । लम्बे समय तक की चिकित्सार्थ 1 टे . दिन में 2 बार दें ।
नोट - बच्चों के लिये ‘ पीडियाट्रिक टेबलेट एवं ‘ पीडियाट्रिक सस्पेन्शन आता ,
11 . सर्वोप्रिम ( Servoprim ) ' होचेस्ट - 2 टेबलेट दिन में 2 बार । गम्भीर अवस्था । में 3 टे . , लम्बी चिकित्सा में 1 टे . दिन में 2 बार । डी . एस . और पीडियाट्रिक टेबलेट भी आती है ।
12 . सुप्रीस्टोल ( Supristol ) ' जर्मन - रेमेडीज - 2 टे . दिन में 2 बार ।
•• मियादी बुखार में लगाने योग्य सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन ••
1 . मोनोसेफ ( Monocef ) ' एरिस्टों । 250 मि . ग्रा . / 1 ग्रा . इन्जे .
गम्भीर अवस्था में 3 टे . दिन में 3 बार । - 4 ग्राम नित्य 2 दिन तक । तत्पश्चात् 2 ग्राम नित्य 2 दिन तक । ।
2 . ओफ्रामेक्स ( Oframax ) स्टेनकेअर - 4 ग्राम नित्य 2 दिन तक । तत्पश्चात 2 ग्राम नित्य 2 दिन तक । जालक 75 मि . ग्रा , किलो ग्राम पर नित्य 7 दिन तक ।
3 . सिन्थोसिलिन ( Synthocilin ) Pel 100 मि . ग्रा . / 250 मि . ग्रा . / 500 मि . ग्रा . / 1 ग्राम वायल - 1 इन्जे , नित्य मास में 5 दिन तक ।
4 . बेक्ट्रिम इण्ट्रामस्कुलर ( BactrimILM . ) - 3 - 4 - 5 मि . ली . दिन में 2 बार / अथवा 3 मि . ली . दिन में 2 बार दें ।
नोट - इसका आई . वी . इन्जेक्शन आता है ।
5 . क्लोरमफेनिकॉल सक्सीनेट - 250 मि . ग्रा . या 1 ग्राम वायल की सुई 6 - 6 घण्टे पर माँस में लगावें । ।
6 . रोसील्लीन ( Rosicillin ) रैनबैक्सी । 250 मि . ग्रा . / 500 मि . ग्रा . शक्ति का वायल - 250 - 500 मि . ग्रा . वायल की सुई माँस में आवश्यकतानुसार लगावें ।
7 . विटामिन सी 100 से 500 मि . ग्रा . के एम्पुल और डेक्स्ट्रोज 25 % - 25 मि ली . से 50 मि . ली . में घोलकर धीरे - धीरे नस में नित्य या 1 दिन छोड़कर लगावें । ।
8 . , कोरामीन ( Coramine ) सीवा - गायगी - हृदय बहुत कमजोर हो जाने पर 1 मि . ली . की सुई माँस या नस में लगावें । ।
9 . कोरामीन + ग्लूकोज 25 % - दोनों को मिलाकर नस में धीरे - धीरे लगावें ।
नोट - ० शरीर के अधिक दुर्बल होने पर प्रशस्त ।
10 . क्लौडेन ( Clauden - निओफार्मा ) - दोनों को मिलाकर नस में धीरे - धीरे लगावें ।
•• केसीलान बी12 ,1 कौम्पलान ( Complan ) , ग्लैक्सोज - डी फेरेक्स ( ग्लैक्सो ) आदि में से किसी को भी पोषक खाद्य के रूप में भी सेवन करा सकते हैं । ।
याद रखिये - अधिक पसीना आने से कभी - कभी रोगी के अनिष्ट होने की सम्भावना रहती है । ऐसी स्थिति में अबीर ( गुलाल ) सम्पूर्ण शरीर पर मालिश करें । चूल्हे की जली हुई मिट्टी के चूर्ण की मालिश करने से पसीना आना बंद हो जाता है । ।
• रोगी के बुखार पर सबसे ज्यादा ध्यान रखें । 103°F से ऊपर बुखार होते ही बरफ के टुकड़ों को रबड़ की थैली में डालकर दिमाग पर बराबर रखें ।
• मियादी बुखार के रोगी को अन्न विष के समान है ।
• कब्ज होने पर लिक्विड पैराफिन 16 से 32 मि . ली . तक रात को सोते समय दें । रोगी को फलों का रस ( मौसमी ) देते रहें । ग्लिसरीन संपोजिटरी की बत्ती गुदा में प्रविष्ट करे ।
•• मियादी बुखार में बच्चों को सेवन कराने योग्य पेटेन्ट सीरप / ड्राई सीरप ••
1 . पाराक्सिन ड्राई सीरप ( वी . नॉल ) - तरल रूप में विधिवत् तैयार कर पिलावें । मात्रा 25 - 50 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार के हिसाब से प्रतिदिन की मात्रा को कई भागों में बाँटकर प्रति घण्टे बाद दें ।
2 . रैनॉक्सील ( Ranoxyl ) ' रैनवक्सी डाई सीरप - ड्राई सीरप को तरल रूप में निर्माण कर 20 - 40 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार के अनुसार प्रतिदिन की मात्रा को 3 बराबर भागों में बाँट कर दें ।
3 . एण्टेरोमाइसेटिन ( Enteromycetin - डेज कं ) सस्पेन्शन - 1 / 4 - 1 / 2 चाय चम्मच माँ के दूध या फलों के रस के साथ हर 6 घण्टे बाद दें ।
4 . विटामाइसेटिन ( Vitamyectin - मैनर्स कं ) पामिटेट सस्पेन्शन - 1 / 2 - 1 चम्मच , दूध पीते बच्चों को 1 / 4 से 1 / 2 चाय चम्मच माँ के दूध या फल के रस में मिलाकर 6 - 6 घण्टे बाद पिलावें । 3 - 4 दिन में ज्वर उतर जाता है । इसके बाद कुछ दिनों तक दो बार प्रतिदिन दें ।
5 . क्लोरोमाइसेटिन ( Chloromycetin ) ( पामिटेट सस्पेन्शन ) ‘ पी . डी . कं - आयु के अनुसार 0 . 15 से 0 . 50 ग्राम तक । 5 दिन तक दवा देने के बाद बंद कर दें । आराम से बच्चे को लिटायें और काफी दिन तक तरल भोजन दें ।
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