रोहे ट्रैकोमा [ Trachoma ]
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| trachoma |
पर्याय नाम –
कुकरे , दाने । नेत्र का भयंकर रोग पोथकी ।
परिचय -
एक आम श्लेष्मकला शोथ ( Infective Conjunctivitis ) जिसमें झिल्ली पर कणिकाओं का निर्माण और पलकों का सिकुड़न एवं फलस्वरूप क्षतचिन्ह( injury mark ) निर्माण होता है । जो अक्सर अंधेपन का कारण होती है ।
• • ट्रेकोमा एक ऐसा रोग है जो कंजंक्टिवाइटिस से मिलता - जुलता है । इस बीमारी में पलकों की भीतरी सतह पर दाने निकल आते हैं और आँखें दुखने लगती हैं । यह भी एक छत की बीमारी है और अधिकतर शिराओं एवं छोटे बच्चों को यह बीमारी जल्दी लगती है । ।
रोहे -
भारत में ही नहीं वरन् पूरब एवं दक्षिण - पूरबी एशिया में विस्तृत रूप से पाये जाते हैं । यह रोग इस भाग के पिछड़े एवं विकासशील देशों में 50 - 60 % दृष्टिविहीनता का मुख्य कारण है । भारत में पंजाब , राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में रोहों का अत्यधिक प्रकोप है । निम्न वर्ग के लोग अज्ञान एवं लापरवाही वश इस रोग से प्रभावित होकर अपनी दृष्टि खो बैठते हैं । विश्व के डेढ़ करोड़ नेत्रहीनों में से 50 लाख नेत्रहीन भारत में हैं ।
रोग के कारण →

• यह क्लेमाइडिआ की एक प्रजाति अथवा ' वेडसोनिया नामक जीवाणु से उत्पन्न होता है ।
• छोटी उम्र के बालक अधिक प्रभावित । विशेषकर निर्धन वर्ग के ।
• सूखा एवं धूलयुक्त वातावरण में प्रकोप अधिक ।
• बच्चों में बचपन की आयु में पर्याप्त पौष्टिक व संतुलित आहार न मिलने से । कुपोषण के कारण रोग का आक्रमण ।
• लालटेन या दूर से आती रोशनी में अधिक पढ़ने - लिखने से प्रायः दृष्टि क्षीण होने पर नेत्रों में शोथ( सूजन ) होकर ।
• वर्षा ऋतु में गली मुहल्लों की विशेष गंदगी संक्रमण प्रसार में सहायक ।
रोग के लक्षण →

• रोग का प्रारम्भ आँखें दुखनी ( Conjunctivitis ) के साथ जाम ।
• आँखें लाल एवं उनसे पूय ( Pus ) का स्राव जारी ।
• साबूदाने के समान दाने ( Follicles ) या दानों के सूखने के बाद मोटी झिल्ली जमना तथा स्वच्छपटल( कार्निया ) के ऊपर रक्तवाहिनियों के छा जाने ( Pannus ) के रूप में दिखायी देते हैं ।
• प्रारम्भ में कोई पीड़ा नहीं ।
• रोग बढ़ने पर नेत्रों में कड़क होना " ( खुजली होना ) । पानी अथवा मवाद बहना , नेत्रों का चिपक जाना , धुप में उनको न खोल पाना , नेत्रों का लाल बने रहना , पलकों का भारी रहना तथा कभी - कभी उनमें पीड़ा रहना आदि लक्षणों से पीड़ित रहना आदि होते हैं ।
प्रायः ऐसा होता है -
• ' रोहे या ‘ कुकरे ( Trachoma ) अधिकतर पुराने होने पर हो । चिकित्सकों द्वारा देखा जाता है , क्योंकि लोग पहले इसका स्वतः उपचार करते हैं । साथ ही घर ले । औषधियों का उपयोग करते हैं । जब रोगी की आँखों की पलकों को उठाकर देखा जाता है तब पलकों के आंतरिक छोर पर दाने तथा लाल रंग की धारियाँ दिखायी देती हैं । इस समय रोगी की शिकायत होती है कि उसकी आँखों में खुजली , पानी निकलना , जलन तथा प्रकाश में चौंध सी होती है ।•• यह एक या दोनों आँखों में हो सकता है ।
रोग की पहिचान -

निम्नलिखित में से किन्हीं दो । चिन्हों की उपस्थिति रोग निदान में सहायक →
• दाने ( Follicles ) ।
• इपीथेलियल केराटाइटिस ।
• रक्तवाहिनियों के छा जाने ( Pannus ) ।
• कंजंक्टाइवा में स्केरिंग ( Scarring of Conjunctiva ) ।
रोग का परिणाम -
• 10 - 15 प्रतिशत रोगी बिना किसी उपचार के रोग मुक्त ।
• शेष रोगियों में उपचार के अभाव में या तो पलकों में स्वच्छपटल ( Cornea ) में विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ।
• पलकों का मोटा होना या भारी होना , बरौनियों का नेत्रों के अंदर की ओर मुड़ना ( Trichiasis ) अथवा पलकों के किनारों का अंदर की ओर मुड़ जाना तथा कार्निया पर घाव बना देता है ।
नोट - कभी - कभी रक्तवाहिनियों का सारे स्वच्छपटल( कॉर्निया ) पर छा जाना और उसकी पारदर्शकता को नष्ट कर देना आदि विकृतियाँ होकर अन्धापन उत्पन्न हो जाता है ।
• रोहें की उपयुक्त चिकित्सा -
•• यदि आँखों की लाली किसी रोगी के नेत्रों में हो जाये तो उसकी पलकों को थोड़ा पलटकर अवश्य निरीक्षण कर लें , कहीं रोहें तो नहीं हैं - यदि हैं तो तत्काल निम्न क्रमानुसार व्यवस्था करें, ---
• स्वच्छता की ओर विशेष हिदायत । वह अपना रूमाल / तौलिया अलग रखें ।
• पौष्टिक आहार की व्यवस्था ।
• जेनसील आई ड्रॉप्स ( Gencyl Eye drops - I . D . P . L . )
• अलसाइक्लीन मरहम ( Alcycline Oint - एलेम्बिक )
• एल्बूसिड आई ड्रॉप्स ( Albucid eye drops ) नि . निकोलस दिन में 2 बार नियमित रूप से 2 - 3 माह तक ।
• टे . बैक्ट्रिम डी . एस . - 1 - 1 टे . प्रातः सायं 1 सप्ताह तक ।
• ट्राकोमा की चिकित्सा ऐसे भी -
Rx
• टेट्रासाइक्लीन आई आयन्टमेण्ट – रात सोते समय 3 माह तक ।
• सल्फासिटामाइड 20 % ड्रॉप्स दिन में 6 बार3 माह तक । ।
• सामान्य स्वास्थ्य की उन्नति आवश्यक ।
• टेट्रासाइक्लीन अथवा इरीथ्रोमाइसिन 1 ग्राम नित्य 4 मात्राओं में विभाजित कर 3 सप्ताह तक ।
• डोक्सी - साइक्लीन ( Doxy - Cycline ) 5 मि . ग्रा . । किलो भार पर प्रति माह 1 बार ( once per month ) लाभकर । ।
नोट -• यदि कार्निया में घाव हो गये हो तो – एट्रोपीन आयन्टमेण्ट 1 % दिन में बार लगावें।• टेट्रासाइक्लीन , इरीथ्रोमाइसीन , रिफाम्पिसिन , सल्फोनामाइड्स प्रभावकारी हैं । जब इनको मुख द्वारा सेवन कराया जाता है तब गम्भीर प्रकार के साइड इफेक्टस होते हैं ।• दुबारा संक्रमण हो सकता है इसलिये फालोअप ( Follow up ) आवश्यक है ।• 10 - 12 सप्ताह तक लाभ न मिले तो रोगी को बता देना चाहिये कि रोग और उसके उपद्रवों( अन्य और रोग ) की चिकित्सा 1 वर्ष तक सम्भव है ।• यदि फोलिकल्स आकार में बहुत बड़े हो गये हों तो ‘ फोरनिक्स ' का सर्जिकल इक्सीजन ( Excision ) आवश्यक है ।
याद रहे -• रोहेंजन्य विकृतियों( रोहें के वजह से उत्प्पन रोग ) के उपचार में शीघ्रता की आवश्यकता होती है , अन्यथा कॉर्निया ( स्वच्छपटल ) सदैव के लिये धुंधली हो जाता है । यदि पलकों की बरौनियाँ पलक के किनारों सहित अंदर की ओर मुड़गई हों तो पलकबन्दी ( Entropion Correction ) द्वारा उनका उपचार होना चाहिये ।• कार्नियल अल्सर का उपचार नेत्र विशेषज्ञ से ही करवाना चाहिये ।
नोट - इस बीमारी की रोकथाम एवं बचाव भी उसी तरह सम्भव हैं , जिस प्रकार आँखों का दुखना ( कंजंक्टिवाइटिस ) में उपाय बताये गये हैं ।
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