कोष्ठबद्धता ( कब्ज ) [ Constipation ]
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| कोष्ठबद्धता ( कब्ज ) [ Constipation ] |
पर्याय -
मलबद्धता , कब्ज , मलावरोध , कोष्ठबद्धता , कब्जियत , आदि से जाना जाता है ।
रोग परिचय -
मल विसर्जन 24 से 48 घण्टों में नियमित रूप से एक बार न हो तो उसे कोष्ठबद्धता ( मलबन्ध ) या कब्ज कहा जाता है । इसमें शौच साफ नहीं होता है , मल सूखा और कम निकलता है । कभी - कभी मल त्यागने के लिये घण्टों प्रतीक्षा करनी पड़ती है । कभी - कभी कई - कई दिन तक पाखाना ( toilet ) आता ही नहीं है ।
नोट - आधुनिक खान-पान के साथ कब्ज की शिकायत भी बढ़ती जा रही है ।
वक्तव्य ' -
■ कब्ज व अवस्था है जिसमें खाए गए आहार का अवशेष( Residue ) 48 घण्टों के समय में भी बाहर नहीं निकल पाता ।■ सामान्यतः 24 घण्टों में 150 ग्राम मल आता है । वैसे कुछ व्यक्ति जितनी बार भोजन करते हैं , उतनी ही बार मल त्याग के लिये जाते हैं , जबकि कई लोग दूसरे - तीसरे दिन मल त्याग करते हैं ।
प्रमुख कारण -
● भोजन में फाइबर रेशों की कमी ( Lack of Fibre )
● आंतों में भोजन का गांठ जैसा बन जाना , व्यायाम न करना ।
● औषधियां( Drugs ), दर्द निवारक ( Analgesics ), रोग को बढ़ाने वाले कारक को रोकने वाला द्रब्य( Anti - inflammatory agents ), अवसादक निरोधी ( Antidepressants ), मूत्रल ( वॉटर पील )( Diuretics ), आयरन एवं अन्य पोषक तत्वों की औषधि( Iron and many more ) का अधिक प्रयोग ।
● मनोविकार एवं तंत्रिका सम्बन्धी विकार ।
● मलाशय , मलद्वार एवं की कोई समस्या ।
● हाइपोथाइरोडिज्म ( Hypothyroidism )
● पित्त या आन्त्र स्रावों की कमी ।
याद रखिये - कम फाइबर वाले भोजन , ऐसा आहार जिसमें हरी सब्जियाँ एवं तरल पदार्थ न हों अथवा कम विटामिन, विटामिन ही ना हो तो ऐसे भोजन कब्ज करते हैं । परिश्रम न करना , बिस्तर पर अधिक समय तक पड़े रहना , गर्भावस्था , बेहोश करने वाली औषधियाँ , एन्टेसिड , लौह ( आयरन ) साल्ट्स , अफीम का अधिक सेवन । रात में अधिक देर तक जगना , विटामिन ' बी ' की न्यूनता , टॉयलेट जाने की इच्छा होने पर भी इच्छा को दबाना , पालिश किया हुआ भोजन , भारी जल का सेवन आदि तमाम कारणों से कब्ज की शिकायत रहती है ।
रोगों में - ' पित्ताशय ' , ' एपेन्डिक्स ' , ' गुदा रोग ' , ' गर्भाशय की बीमारी ' , ' बवासीर ' , ' शरीर में वसा का ज्यादा होना' ' रक्त में पित्त की मात्रा ज्यादा होना ' , अति तेज बुखार के पश्चात , क्षय ( एक प्रकार का संक्रामक रोग जो मुख्यतः फेफड़ों व शरीर के अंगों में छोटे-छोटे घाव के रूप में दिखाई देते हैं ) एवं मधुमेह ( डायबिटीज ) के कारण रोग की उत्पत्ति हो सकती है ।
याद रखिये -
■ भोजन और आदत से कब्ज उत्पन्न होती है । सत्य तो यह है कि आम लोगों के मन में कब्ज का जो भय है वह स्वार्थी विज्ञापनों के झूठे प्रचार के कारण उत्पत्र हुआ है ।
■ शाकाहारी व्यक्ति प्रायः इस रोग से मुक्त रहते हैं और जबकि मांसाहारी व्यक्ति इस रोग से जकड़े रहते हैं ।
सावधान - मनुष्य समाज में सभ्यता की वृद्धि के साथ - साथ टॉयलेट जाने की इच्छा रोकने की आदत बढ़ती जाती है , परिणाम यह होता है कि कब्ज का रोग बढ़ता ही जाता है ।
नोट - निरन्तर बैठे रहने , शारीरिक कम मानसिक कार्य ज्यादा करने वालों को कब्ज एक आम बीमारी है ।
■ शौच साफ न होना , मल सूखा एवं कम मात्रा में निकलना ।
■ भूख मारी जाती है ।
■ दीर्घकालिक रोग से - ' बवासीर ' एवं ' गृध्रसी ( कमर की नसों में सूजन है पैर में दर्द का अनुभव ) आदि रोगों की उत्पत्ति ।
■ मुँह का जायका खराब ।
■ रक्त पर दुष्प्रभाव होने से रक्तचाप ( ब्लड प्रेशर ) में वृद्धि ।
■ स्वप्न दोष की शिकायत ।
■ जीभ पर मैल जमना ।
रोग के परिणाम -

◆ निरन्तर कब्ज रहने से रोगी में सिर दर्द , शारीरिक सुस्ती , चिड़चिड़ापन आदि लक्षण हो जाते हैं । मानसिक चिड़चिड़ापन एवं क्रोध उसे सताते रहते हैं ।
◆ सुखी मल के रुकावट के कारण मलाशय फैल जाता है और रोगी की मल त्याग की इच्छा भी मारी जाती है ।
नोट - कब्ज के रोगी में स्वाभाविक स्फूर्ति ( natural spirit ) नहीं रहती है ।
पहिचान -
● बड़ी आत पर ध्यान पूर्वक स्पर्श द्वारा सुखी मल को टटोला जा सकता है ।
● X- ray द्वारा इस अवस्था के कारणों को जाना जा सकता है ।
चिकित्सा विधि -
■ पहले रोग के मूल कारण को हटायें तत्पश्चात कब्ज की चिकित्सा करें।■ रोग के शुरुआत में केवल आहार - विहार तथा स्वास्थ्य नियमों के पालन से ही रोग दूर हो जाता है । इसके विपरीत पुराने रोग में उचित आहार - विहार के साथ - साथ औषधि चिकित्सा भी करनी चाहिये।■ दोनों समय नियमित रूप से शौच के लिये जाना बेहद जरूरी ।■ ' शीर्षासन ' या ' सर्वांगासन ' विशेष उपयोगी होता है ।■ चिकित्सा में ऐसे औषधियां प्रयोग चाहिए जिससे आंतों में चिकनाहट बढ़ाया जा सके जो मुख्यता गुदा द्वार में लगाया जाता है,
पथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
● कम चिकनाई वाले आहार जैसे - गाय का दूध , पनीर , चोकर मिले आटे की रोटी , मौसम्मी फल , दाल के स्थान पर सब्जी , बथुआ , पालक का विशेष उपयोग ।
● उबली गाजर , पके अमरूद का सेवन सर्वोत्तम ।
● प्रायः रोजाना ठंडे पानी का पीना एवं स्नान ।
● आम , अंगूर , किशमिस , मुनक्का , खजूर , संतरा , नासपाती , पपीता , कागजी नीबू का उपयोग करें ।
● एनीमा का प्रयोग लाभकारी नहीं । इसकी आदत न डालें । इसके स्थान पर ' डल्कोलेक्स ' का प्रयोग हितकारी है । ग्लिसरीन की सपोजीटरी प्रयोग में लायी जा सकती है ।
औषधि चिकित्सा ( Medicinal Treatment ) -
मलबन्ध की चिकित्सा स्थिति के अनुसार की जाती है -
■ मल का कम मात्रा में तथा नियमित न होना - आइसोजेल ( Isogel ) (निमार्ता - ग्लैक्सो) 1 बड़ा चम्मच दिन में 2 बार -250 मि . ली . दूध अथवा जल के साथ ।
अथवा- कारबिण्डोन ( Carbindon ) नि . इण्डोफार्मा 1-2 टेबलेट- रात सोते समय- गर्म जल से ।
■ मल का सख्त होना - क्रीमाफिन ह्वाइट ( Cremaffin White ) 1/2-1बड़ी चम्मच सोने से पूर्व , दूध के साथ ।
अथवा - डल्कोलेक्स ( Dulcolex ) 2 गोली , रात सोते समय ।
■ कठोर एवं बड़े मल पिण्ड के कारण कोष्ठबद्धता में - ग्लिसरीन सपोजीटरी 2 या 4 ग्राम वाली 1-2 सपोजीटरी - आयु के अनुसार , गुदामार्ग में ।
10 मिनट बाद मल त्याग के लिये प्रस्थान करें । अथवा- प्रैक्टो - क्लिस एनीमा ( Practo - Clyss Anema )
" प्रैक्टो - क्लिस एनीमा ' एक नवीनतम वैज्ञानिक विधि है । इसमें एक घोल भरा रहता है । एक नली और ट्यूब लगी रहती है । नली को लेटे हुए व्यक्ति की गुदा में प्रविष्ट कर ट्यूब को दबाकर गुदामार्ग से मलाशय में सम्पूर्ण घोल को प्रविष्ट कर दिया जाता है ।
याद रखिये - यह एनीमा चिकित्सकों के लिये अति सुविधाजनक है । इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है । घोल बनाने का झंझट नहीं ।
★ ज्वर आदि की अवस्थाओं की कब्ज - कैस्टर आयल ( Castor Oil ) 5-15 मि . ली . ( 1 से 3 चम्मच ) - आयु के अनुसार- गर्म दूध से- सोने से पूर्व ।नोट- ' गर्भवती ' एवं ' बालकों में सुरक्षित परगेटिव ।निषेध- M.C. तथा ' बवासीर ' से युक्त रोगी में प्रयोग वर्जित । अथवा डलकोलेक्स ( Dulcolex ) 2 टेबलेट - रात सोने से पूर्व ।
कुछ रोगियों का कहना होता है कि उनका पेट बहुत सख्त है इसीलिये उन्हें टट्टी सख्त उतरती है । उन्हें रात्रि में 1 बड़ा ग्लास गर्म दूध में 5 से 10 मि . ली . ' देशी शराब मिलाकर पी लेने से चमत्कारिक प्रभाव दिखायी देता है ।
सावधान - औषधियों का सेवन कभी - कभी ही करना चाहिये । क्योंकि इनके नियमित सेवन से रोगी इनका आदि हो जाता है , और कुछ दिनों के पश्चात इनसे कोई लाभ नहीं मिलता है।
Rx ( प्रेस्क्रिप्शन )
अथवा-● डूफालेक ( Duphalac ) डूफर- इन्टर फेरान 30 मि.ली. नास्ते के बाद ।अथवा -● पेट्रोलागर फोर्ट ( Petrolagar Forte ) 1-2 चम्मच - दिन में 3 बार● लिवोजिन कैप्सूल ( Livogin cap . ) एलनवरीज - 1 कै . दिन में 3 बार प्रा . दो . शा . ।● डल्कोलेक्स ( Dulcolex ) जर्मन रेमेडीज 2 टे . - सोने से 1 घण्टा पूर्व ।
मलावरोध की मिश्रित औषधि चिकित्सा -
■ डेसीकोल कै . ( Desicol Cap . ) पी . डी . 2 कै . + लिवोजेन 1 कै . + वीप्लेक्स टे . 1 टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें । साथ ही रात सोते समय ' विड्लेक्स -5 ' ( Bidlax - 5 ) निमार्ता - ' विडलशायर ' 1 से 2 टेबलेट दें ।
याद रखिये -
◆ कभी - कभी सुख हुआ मल इस तरह फँस जाता है कि उसे हस्त कौशल द्वारा ही दूर किया जा सकता है ।◆ सभी उपाय असफल होने पर- कुछ व्यक्तियों में ' कटिअनुकम्पी तंत्रिकोच्छेदन '( Lumber Sympathectomy ) को उपयोगी पाया गया है ।
कोष्ठबद्धता निवारण के लिये कुछ आवश्यक सुझाव -
■ तरल द्रव्यों का पर्याप्त मात्रा में सेवन । भोजन में हरी एवं पत्तों वाली सब्जियों का होना तथा पके मीठे फलों का नियमित प्रयोग परम उपयोगी है ।
■ मल त्याग का समय निश्चित होना चाहिये । इच्छा न होने पर भी समय पर मल त्याग के लिये जाना चाहिये । बैठकर मल त्याग करने की भारतीय पद्धति( indian style ) स्वास्थ्यकर एवं सुविधाजनक है ।
■ मल त्याग के लिये अधिक बल प्रयोग न करें ।
■ यदि ' अवटुग्रन्थि की न्यूनता ( Hypothyroidism ) हो तो उसे दूर करना आवश्यक है ।
मलबन्ध को दूर करने के लिये जहाँ तक औषधि प्रयोग का प्रश्न है यह आम राय है कि अतः इनका प्रयोग कभी - कभार ही होना चाहिये ।
■ कब्ज में एनीमा लगाने से इसकी आदत पड़ जाती है । इसलिये एनीमा के स्थान पर ' ग्लिसरीन सपोजीटरी अथवा ' डल्कोलेक्स सपोजीटरों का गुदा मार्ग से प्रयोग कर सकते हैं जो risk free हैं ।
■ इस प्रकार के प्राकृतिक नियमों का पालन करने से कब्ज नहीं रहता है ।
वास्तव में कब्ज की सही चिकित्सा भोजन सुधार ही है । इसलिये यदि कब्ज से स्थायी रूप से छुटकारा पाना है तो पर्याप्त मात्रा में चोकर पड़े आटे की रोटी एवं छिलके युक्त दालें एवं खूब हर सब्जियाँ लें । किन्तु अत्र की मात्रा सुबह या शाम या दोपहर रात्रि के अलावा न लें । प्रातः एवं तीसरे पहर के जलपान में एक बार जूस या मट्ठा लें । दूसरी बार में अमरूद , गाजर , पालक , पपीता , आदि लें । बिना भूख के और कम भूख में न खायें । कम खायें और खूब चबा - चबाकर । सप्ताह में एक बार ( दिन ) , दिनभर , 4-5 बार नीबू शहद का शर्बत पियें और शाम को आधा पेट भोजन करें ।
प्रारम्भ में शीघ्र लाभ के लिये भोजन के बाद एक कच्ची छोटी हर्र को चूसें । टट्टी , पेशाब के वेग का जब भी अनुभव हो तुरन्त इन्हें निपटने से कभी पेट खराब नहीं होता है ।
- : कब्ज की लक्षणों के अनुसार अनुभूत चिकित्सा : -
1. साधारण रोग में → ' लिक्विड पैराफिन 8 मि.ली. से 24 मि.ली. ( 2 से 12 चम्मच सोने से पूर्व दें ) ।
2.आंत्र की गति मन्दता से उत्पन्न → उपरोक्त अनुसार । कब्ज रोग → ‘ कनोरमला बड़ा चम्मच प्रातः सायं दें । बच्चों को 1 छोटा चम्मच प्रातः सायं भोजन के बाद । सावधान -'आंत्रअवरोध में प्रयोग न करें ।
3.विशेष कब्ज की स्थिति में → सेल्यूब्रिल ( Cellubril )( निमार्ता - एस्ट्रा आई.डी.एल.) दो कै . दिन में 2 या 3 बार 16 वर्ष से ऊपर के बालकों को 1 कै . रात को सोते समय जल से ।
4. मानसिक दुर्बलता के कारण उत्पन्न कब्ज रोग में → डिस्पेप्टाल ( बी नोल ) 1 टेबलेट , स्पास्माइजोल 1 टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा सोते समय जल से दें
5. तीव्र कब्ज में → ' प्रोस्टिग्मिन ' ( Prostigmin ) नि .- ' रोश ' 1 से 5 मि.ली. अथवा 10 मि.ली. शिरा में ( I.V. ) एट्रोपीन 0.4 से 1.25 मि . ग्रा . के साथ धीरे धीरे लगावें ।
सावधान - आमाशय आन्त्र अवरोध एवं मूत्रारोध में इसका प्रयोग न करें ।
6. लम्बे समय तक विरेचेन कार्य के लिये → ' क्रीमाफिन बूट्स 1 से 4 छोटे चम्मच सोते समय / इसके साथ वेजीटेबल लैक्जेटिव ( बूट्स ) 1 टे . दें ।
7.सिर दर्द , ऐंठन युक्त कब्ज में → ' निओ - ओक्टीनम ( नोल ) 1 टेबलेट जल के साथ दें ।
8. स्नायुजन्य कब्ज में → प्रिस्कोफीन ( Prescophen ) (' सीवा ' कम्पनी) 1 टे . दिन में 2 बार दें ।
9. हृदय रक्तवाहिकाजन्य कब्ज , हर्निया , गुदा , मलाशय एवं औपरेशन के पश्चात का रोग → ' क्रीमाफिन 2 से 3 चम्मच सोते समय जल से । एवं प्रातः तथा आवश्यकतानुसार ।
10.निरन्तर रहने वाला कब्ज , शय्या पर अधिक पड़े रहने , गम्भीर रोग की अवस्था , ज्वर रोग , रक्त वाहक एवं पाचन सम्बन्धी तथा औपरेशन से पूर्व एवं बाद की स्थिति के रोग → ' डल्कोलेक्स -1 से 2 टेबलेट सायं सोने से पूर्व । अथवा ‘ डलकोलेक्स सपोजीटरी 1 सपो . गुदा में प्रविष्ट करें ।
11. चिकित्सा एवं कब्ज से बचे रहने के लिये → डूफालेक ( Duphalac ) डूफर - इंटरफेरान 15 से 45 मि . ली . नास्ते के बाद / बालक 5 से 10 मि . ली . ।
12. जीर्ण कब्ज , गर्भावस्था , शल्य चिकित्सा एवं X - Ray परीक्षण के लिये → जूलेक्स ( Julax ) रैलिस कं . ' - 1-2 टे . सोते समय ।
13. कब्ज तथा आँतों की स्वाभाविक क्रिया को सामान्य बनाने के लिये → ' सेनेडी ( Senade ) सिपला - 1 से 3 टेबलेट सोने से पूर्व दें ।
14. जीर्ण कब्ज , जननेन्द्रिय ( स्त्री ) सम्बन्धी रोगों , बालकों का कब्ज , गर्भावस्था , उच्च दाब , आँत उतरना , औपरेशन के बाद , बवासीर आदि अवस्था के रोगी के कब्ज में → लेक्सीकोन ( Laxicon ) स्टेडमेड 1 से 6 चम्मच तक विभक्त मात्रा में । इसकी गोली तथा बालकों के लिये ड्राप्स भी आता है।
15. आँतों की रुकावट से → ' परसेनिड - इन ( Pursennid -IN ) विद डी.ओ.एस.नि. ' सैण्डोज 2 से 4 टे . सोते समय । अधिक से अधिक 6 गोली नित्य । बालक -6 वर्ष से ऊपर -1 से 2 टेबलेट ।
सावधान - ‘ इन्टेस्टाइनलऔब्स्ट्रक्शन में प्रयोग न करें । ।
16. पुरानी कब्ज के साथ थकावट एवं नाड़ी दुर्बलता से → बेनरवा ( Benerva ) नि . रोश - 1-2 मि.ली. नित्य मांस में लगावें ।
-: मलबंध में दी जाने वाली सुप्रसिद्ध एलो . रिसेन्ट पेटेन्ट टेबलेट :-
1. विड्लेक्स -5 ( Bidlax - 5 ) नि . ' बिड्लशायर → 1-2 टेबलेट , रात सोते समय / नये एवं पुराने कब्ज में उपयोगी ।2. डलकोलेक्स ( Dulcolax ) नि . ' जर्मन रेमेडीज → 1-2 टेबलेट सोने से पूर्व / लम्बी बीमारी आदि के बाद दीर्घकालिक कब्ज में ।3. ग्लैक्सीना ( Glaxenna ) नि . ' एलन बरीज → 2 टेबलेट , सोते समय / नये एवं पुराने रोग में ।4. जूलेक्स ( Julax ) नि . ' रैलिस → 1-2 टे . रात सोते समय ।6. पुरसेनिड - इन ( विद डी . ओ . एस . ) ( Pursennid - in ( with D.O.S. ) ' सैण्डोज → 2-4 टे . सोते समय / अधिकतम् 6 गोली रोज ।7. सेनेडी ( Senade ) नि . ' सिपला→ 1-3 गोली , रात सोते समय / यह आँतों की क्रियाशीलता को सामान्य करती है ।
सावधान - ' दुग्धावस्था एवं ' इन्टेस्टा इनल ओब्स्ट्रक्शन की स्थिति में इसका प्रयोग न करें ।
-: मलबन्ध में प्रयोग आने वाले लेटेस्ट पेटेन्ट कैप्सूल्स :-
1. सेलूब्रिल ( Cellubril ) ' आस्ट्रा . आई डियल → 1 कै.दिन में 2-3 बार / बालक 6 साल और उससे ऊपर -1 कै . रात सोने से पूर्व ।
2. लिवोजिन कै . ( Livogin cap . ) नि . ' एलनवरीज → 1-2 कै . दिन में 2-3 बार / यकृत एवं विटामिन्स की कमी से उत्पन्न मलबन्ध में उपयोगी ।
3. डेसीकोल कैप्सूल्स ( Desicol cap . ) नि.पी.डी.कं. → 2-2 कै . दिन में 3 बार भोजन के बाद ।
-: कब्ज में सेवन कराने योग्य अपटूडेट एलो . लेटेस्ट पेटेन्ट पेय ( syrup ) :-
1. पेट्रोलागर ( Petrolagar ) नि . वाईथ → नये कब्ज में - 1-2 चम्मच दिन में 3 बार ।2. पेट्रोलागर फोर्ट ( Petrolagar Forte ) → पुरानी कब्ज में -1-2 चम्मच दिन में 3 बार ।3. एगारोल नि , वार्नर → 7.5 से 15 मि.ली. ( 1-2-3 चम्मच / बालक 6 से 12 वर्ष की आयु में 5-10 मि . ली . ) 5 से 6 वर्ष 5 मि.ली. , प्रत्येक को सोने से पूर्व ।4. क्रीमाफिन ( Cremaffin ) नि . बूट्स → वयस्क एवं 12 साल से ऊपर के बालक 7.5 से 15 मि.ली. / 2-5 साल के - 2.5-5 मि.ली. / सोते समय जल के साथ ।5. क्रीमाफिन पिंक ( Cremaffin Fink ) नि . ' बूट्स → वयस्क एवं बालक 7.5 से 15 मि.ली. / छोटे बालक -2.5 से 5 मि.ली. सोते समय जल के साथ ।6. डूफालेक ( Dufalac ) नि . ' डूफर इंटरफ्रान → 15 से 45 मि.ली. 3 दिन तक नास्ते के बाद ।7. लेक्सीकोन ( Laxicon ) नि.स्टेडमेड → 5 से 50 मि.ली. विभाजित मात्रा में रोजाना ।नोट - निरन्तर रहने वाला कब्ज , बालक , गर्भावस्था , मायोकार्डियल इन्फ्राक्शन , उच्च रक्त दाब , हर्निया , बवासीर के रोगी , औपरेशन के पश्चात आदि सभी अवस्थाओं के कब्ज में उपयोगी ।विशेष- ड्राप्स एवं टेबलेट ' रूप में भी उपलब्ध ।
-: कब्ज में सेवन कराने योग्य अपटूडेट एलो . लेटेस्ट पाउडर :-
■ इगोल ( Igol ) नि.रेप्टाकोस → 1 चम्मच दिन में 1 या 2 बार पर्याप्त जल के साथ / पूर्ण लाभ के लिये 3 दिन तक ।
-: कब्ज में सेवन कराने योग्य अपटूडेट एलो . पेटेन्ट एवं लेटेस्ट ग्रेनूल्स :-
1. इवाकुओल ( Evacuol ) नि . ' फेन्को → 1 चम्मच ग्रेनूल्स सोते समय से प्रारम्भ इण्डियन करें । 2 चम्मच तक बढ़ायें । बालक को आधी मात्रा में ।
2. कानोरमल ( Kanormal ) जर्मन रेमेडीज → 1 चम्मच सुबह और रात को ।
-: कब्ज में सेवन कराने योग्य अपटूडेट एलो . पेटेन्ट एवं लेटेस्ट बत्ती ( सपोजीटरी ) :-
1. डल्कोलेक्स सपोजीटरीज ( Dulcolax Suppositories ) नि . ' जर्मनरेमेडीज → 1 सपोजीटरी गुदा में प्रविष्ट करें ।2. ग्लिसरीन सपोजीटरी ( Glycerine Suppo . ) नि . ' एलनवरीज या हिन्द→ बड़ों को बड़े साइज की एवं बालकों को छोटे साइज की बत्ती गुदा में प्रविष्ट करें । 15 मि . बाद पाखाना( toilet ) आ जाता है ।
-: कब्ज में लगाने योग्य एलोपैथिक विशिष्ट इन्जेक्शनों की एक झलक :-
1.बेरिन ( Berin ) नि . ग्लैक्सों → 25 से 100 मि.ग्रा . का 1 इन्जेक्शन अर्थात पहले दिन 1-2 एम्पुल , तत्पश्चात प्रति तीसरे दिन 2 एम्पुल मांस में लगावें ।
2.बिनर्वा ( Benerva ) नि . रोशे → उपरोक्त अनुसार ।
3.प्रोस्टिग्मिन ( Prostigmin ) नि . ' रोशे → तीव्रकब्ज में 1 से 5 मि.ली. या 10 मि.ली. शिरा में एट्रोपीन 0.4 से 1.25 मि.ग्रा . के साथ धीरे - धीरे लगायें । चेतावनी - आमाशय आन्त्र अवरोध एवं मूत्रावरोध में प्रयोग न करें ।
-: बच्चों में जब तीब्र दस्तावर की आवश्यकता हो :-
■ ग्लिसरीन 30 मि.ली. , गर्म जल 30 मि.ली. - दोनों को मिलाकर सिरिन्ज द्वारा रेक्टम में इन्जेक्ट करें ।
सावधान - बच्चों में एनीमा का प्रयोग न करें ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -






















































































