संग्रहणी [ Sprue ] की बीमारी क्या है? इसके पर्याय, परिचय, कारण, लक्षण एवं पहिचान, चिकित्सा विधि क्या है? What is the disease of Sprue? What are its synonyms, introduction, causes, symptoms and identification, medical method?

संग्रहणी [ Sprue ] 


संग्रहणी [ Sprue ] 



पर्याय

ग्रहणी , श्वेतातिसार , ग्रहणी रोग , ग्रहणी शोथ , चिरस्थायी आमातिसार , मेल एब्जोरब्शन सिण्ड्रोम , ट्रोपिकल स्पू ( Tropical Sprue ) | 

रोग परिचय

मन्दाग्नि के कारण भोजन न पचने पर अजीर्ण होकर दस्त लगने लगते हैं । जब दस्त पुराने पड़ जाते हैं तो यही दस्त संग्रहणी ' कहलाते हैं । साथ ही दूसरी ओर पुराने अतिसार( दस्त ) हो जाने पर ' मोनिलिया साइलोसिस नामक जीवाणु के संक्रमण द्वारा उत्प्पन जहरीले प्रभाव के कारण अग्नाशय ग्रंथि मे दोष उत्पन्न हो जाता है जिससे खाए के भोजन पर अग्नाशय रस का मिलाप सही से नहीं हो पाता हो जाते हैं जिससे संग्रहणी रोग हो जाता है ।
• इस रोग के कारण अन्न कभी पचकर , कभी बिना पचे , कभी पतला , कभी गाढ़ा कष्ट व दुर्गन्ध के साथ निकलता है , शरीर में दुर्बलता आ जाती है । 

वक्तव्य

जब छोटी आंत में ग्लूकोज तथा विटामिनों का शरीर में विलयन घट जाता है जिससे प्रातः एक दो मात्रा में बड़े , ढीले ' झागदार ' तथा ' बदबूदार दस्त आ जाते हैं । रोगी जितना खाना खाता है , मल प्रायः उससे काफी अधिक मात्रा में आता है । 

 ◆ गर्म प्रदेशों में पाया जाने वाला यह एक आम दस्त की बीमारी है । 

 ◆ अतिसार रोग मुक्त हो जाने पर भी यदि मन्दाग्नि वाला व्यक्ति असंतुलित भोजन का सेवन करता है तो जठराग्नि  खराब होकर संग्रहणी ' को जन्म देती है । अधिक नाइट्रोजन युक्त आहार खाने से भी यह रोग हो जाता है । 


 ◆ इस रोग का प्रमुख कारण विटामिन ' बी ' कम्पलेक्स , सी एवं कैल्शियम की कमी है । 


सामान्य कारण -


◆ कारणों के सम्बन्ध में कोई निश्चित कारण नहीं । 

आमाशयिक रसों की कमी से एवं ग्लूकोज , कैल्शियम और कुछ भोज्य पदार्थों में पाये जाने वाले घटकों का छोटी आंत द्वारा भली प्रकार से पाचन ना होने से । 

◆ ' फोलिक एसिड न्यूनता ( Folic Acid dificiency ) । 

◆ वाइरल संक्रमण ( उत्तरी भारत में इपीडेमिक रूप में ) ।


◆ कुछ लोग विटामिन ' बी , की न्यूनता मानते हैं । 

नोट- अमीबिक प्रवाहिका के बाद भी पैदा होते देखा गया है । 

- वसा तथा ग्लूकोज के आँत में ठीक विलयन का न होना इस रोग की विशेषता है । 
याद रखिये- अधिकतर मध्य आयु के व्यक्ति विशेषकर गर्भावस्था में स्त्रियाँ इस रोग से पीड़ित होते हैं । उष्ण एवं नमीदार वातावरण वाले समुद्र के किनारे ( बम्बई जैसे ) के स्थानों में रहने वालों में वर्षा ऋतु के पश्चात यह रोग अधिक होता है । वे लोग भी इससे अधिक ग्रसित होते हैं जिनमें पेचिश आदि रोगों के आक्रमण हो चुके हों ।

- > अवस्थानुसार रोग लक्षण -


संग्रहणी ------>>>>>>

प्रथमावस्था में  बड़े अतिसार का होना ।  
द्वितीयावस्था में → भार के घटने । 
तृतीयावस्था में → पाण्डुता के लक्षण ।


प्रमुख लक्षण --->>>


■ रोग अज्ञात रूप में धीरे - धीरे प्रारम्भ होता है । 

■ दुर्बलता , अजीर्ण , शाररिक भार में कमी । 

■ प्रातःकालीन पतले दस्त / कई मास बाद झागदार एवं मात्रा में अधिक दस्त का आना । 

■ जीभ प्रायः लाल  दिखाई पड़ती है ।


■ जीभ तथा मुँह पर छाले । 

■ भोजन के बाद भारीपन एवं पेट फूलना । 

■ मुँह में छाला,  मुंह में अधिक लार आना एवं मुँह का स्वाद बिगड़ा हुआ । 

■ आँतों में गुड़गुड़ाहट । 


■ शरीर का भार गिरना एवं शरीर पर झुर्रियों का पड़ना । 

■ त्वचा एवं नाखून का सूखना । 

■ रोगी का स्वभाव बदल जाता है और वह चिड़चिड़ा हो जाता है । 


■ दुर्बल हुए शरीर पर संक्रामक रोगाणु के आक्रमण से बुखार का आना ।

■ रक्त की कमी होने पर सिर में दर्द एवं बेहोशी जैसा महसूस होना । 

हाथ - पैरों पर सूजन , पोषक पदार्थों के अभाव में । 


सम्पूर्ण लक्षण एक दृष्टि में


★ डायरिया ( Diarrhoea ) 

★ एब्डोमिनल डिस्टेन्शन ( Abdominal distension ) 

★ एनोरेक्सिया ( Anorexia ) 

★ फटीग् एण्ड वेट लास ( Fatigue and weight loss ) 

★ सेवर डायरिया एण्ड फीवर ( Severe Diarrhoea and Fever ) । 


जीर्ण होने पर -

■ मेगालोब्लास्टिक अनीमिया ( Megaloblastic Anaemia ) । 

■ आडिमा ( Oedema ) 

■ ग्लोसाइटिस एण्ड स्टोमेटाइटिस ( Glossitis and Stomatitis )
दस्तों की विशेषता - प्रायः दस्त बड़ा तथा साधारण से 3-4 गुना ढीला सा फीके रंग का झागदार , खट्टी सी बदबू वाला बहुत चिकना मलहम जैसा दिखाई पड़ता है । 
याद रखिये - रोगी जितना खाना खाता है , मल प्रायः उससे काफी अधिक मात्रा में आता है ।

नोट - शौच के समय झागयुक्त मैल जो श्वेत रंग का होता है । मांसपेशियाँ दुर्बल हो जाती हैं , मानसिक कमजोरी होती है । प्रायः मल बहुत चिकना होता है । मल त्याग के समय पेट में गुडगुडी सा महसूस होता है । शरीर और पैर में दर्द हो जाती है ।अधिक दिन हो जाने पर हड्डियों पर असर देखा जा सकता है एवं यह कमजोर होने लगती हैं । समय रहते चिकित्सा आवश्यक है ।

रोग की पहिचान - 



परीक्षा करने पर → 

◆ शारीरिक तापमान , नाड़ी तथा सांस सामान्य ( नार्मल ) । 

◆ जीभ सूखा एवं किनारे लाल मिलते हैं । 

◆ मुँह पकना - एक प्रधान लक्षण । 


रक्त परीक्षा में → 

◆ आर.बी.सी. कम । 

◆ अलब्यूमिन की मात्रा घटी हुई । 

◆ श्वेत कण घटे हुए ।

◆ लिम्फोसाइट्स की वृद्धि । 

X - Ray परीक्षा में छोटी आंत में रुई के ढेर की सी image दीखती है । 

वायोस्पी -->> जेजुनम म्यूकोजा पतली । 
नोट- संग्रहणी रोग में बुखार , मूत्र मार्ग के संक्रमण के कारण होना सम्भव है । अतः इस रोग में मूत्र की भली भाँति परीक्षा कर लेना चाहिये ।

रोग के परिणाम  -->>


परिसरीय ( Peripheral ) तंत्रिका की तकलीफ , एवं रज्जू ( Cord ) का विकार ग्रस्त होना देखा गया है । 

■ 02 % रोगियों में कैल्शियम की कमी ( Hypocalcimia ) के साथ टिटेनी एवं परनीसियस रक्त न्यूनता हो जाती है । एवं पैरों में सूजन तथा ' परप्यूरा भी इसके परिणाम हैं ।

■ ' बवासीर ' एवं ' गुदविदार ' ( Anal Fissure ) भी कभी - कभी पाये जाते हैं । 

■ घटने , बढ़ने एवं बहुत दिनों तक चलने वाला रोग है । भरपूर चिकित्सा से ठीक होने की आशा । वृद्धावस्था का रोग ठीक नहीं होता है ।


Laboratory Finding in Tropical Sprue . -->>


■ Steatorrhoea . 

■ Xylose malabsorption . 

■ Vitamin B12 malabsorption . 

■ Megaloblastic anaemia . 

■ Hypoalbuminaemia . 

■ Partial villous atrophy on Jejunal Biopsy .


चिकित्सा विधि -->>


◆ शय्या पर विश्राम ( Rest in Bed ) । 


◆ रक्तन्यूनता या अन्य कमियों ( Deficiencies ) को दूर करना इसके मुख्य चिकित्सकीय उद्देश्य हैं । 

◆ रक्तन्यूनता ' में ' आयरन का स्तर ' , ' लिवर इक्स्ट्रैक्ट एवं ' फोलिक एसिड आदि का उपयोग । 

◆ ' टिटेनी में कैल्शियम एवं विटामिन्स का उपयोग आवश्यक । 


◆ मूत्र मार्ग में ' बी ' कोलाई संक्रमण हो तो पेनिसिलीन एवं सल्फा ड्रग्स का उपयोग बेहद कारगर होता है ।


पथ्यापथ्य चिकित्सा -->>


● इस रोग में मट्ठा का सेवन अमृत के समान है । 


पुराने साठी चावल , मूंग का यूष , गाय का मक्खन निकला दही , बकरी का दूध , नई बेलगिरी , जामुन आदि का सेवन सही होता है । 

अधिक परिश्रम , उड़द , उड़द , मटर , खीरा , आम , बथुआ , कोफी , दूध , नारियल , पत्तों का शाक , खटाई , तली चीजें , भारी अन्न एवं नमकीन रसइन सभी की मनाही होती है ।

निषेध- इसमें दाल का पूर्ण से मनाही है । 

नोट- रोगी को ' मट्ठे ' के साथ - साथ ' सेव ' और ' केले ' एवं 1-2 औंस ग्लूकोज ' दें । कच्चे मांस का ' यूष ' या ' पनीर दे सकते हैं । 

औषधि चिकित्सा ( Medicinal Treatment ) -->>



■ इन्जेक्शन विटामिन ' बी ' , ( Vitmin B12 Inj . ) ---- 500 माइक्रोग्राम - मांसपेशीगत सूचीवध - रोजाना । 

■ फोलिक एसिड टेबलेट ( Folic acid tabs . ) ---- 5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट -दिन में 2 बार ।

अथवा- 

फोलिक एसिड 15 मि.ग्रा . × मांसपेशीगत् × प्रतिदिन - लक्षण शान्त होने तक । 

■ टेरामाइसीन ( फाइजर ) 250 मि.ग्रा . कै . ---- 1 कै . - दिन में 4 बार -4 से 6 सप्ताह तक । 

अथवा- 

लिनकोमाइसीन ( Lincomycin ) 500 मि . ग्रा . -दिन में 3 बार । 

■ प्रेडनीसोलोन ( Prednisolone ) ---- 50 मि.ग्रा . - रोजाना -7 दिन तक । तत्पश्चात 15 मि.ग्रा . - रोजाना । 

- विटामिन ' बी कम्पलेक्स - मुख अथवा इन्जे . रूप में । ----

अथवा- 

मल्टी - विटामिन योग - ' थायमिन 10 मि . ग्रा . , ' रिबोफ्लेवीन ' 5 मि.ग्रा . , ' निकोटिनामाइड 50 मि . ग्रा . । ऐसी 1 मात्रा - दिन में 2 बार । कोर्स - कुछ सप्ताहों तक निरन्तर । 

निर्देश- गम्भीर दस्तों कीअवस्था में - ' डिहाइड्रेशन तथा इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करें ।

अनुभूत चिकित्सा -->>


★ ' फोलिप्लेक्स ( Foliplex ) निमार्ता - कोप्रान -1 कै . , कैल्शियमलेक्टेट टेबलेट 120 मि.ग्रा . ' सीलिन 100 मि.ग्रा . 1 टेबलेट । 1 मात्रा । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार । साथ ही - न्यूराक्सान बी ,, की सुई 2 मि.ली. की मात्रा में दिन में 1 बार मांस में 10 से 15 इन्जे . पर्याप्त । 

त्वरित् लाभ के लिये - ' मेक्राफोलीन अथवा मक्राविन 2 मि.ली. मांस में रोजाना लगायें।

मिश्रित चिकत्सा ( Combination Theraphy ) -->>


★ विटामिन ' बी कम्पलेक्स 1 टे . , विटा . बी 12 - 1 टे . , ओस्टो - कैल्शियम 1 टे . विटनेलान 5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट , निसिनल ( सिपला ) 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा । पीस कर पुड़िया बना लें । ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें । 

साथ ही- 

★ ' हिपेफोलीन ' ( सिपला ) अथवा ' लिवोवेक्स ( Livovex ) नि. - सेनीटेक्स -2 मि.ली. मांस में रोजाना 10 दिन तक लगायें । 

★  थेराग्रान ( साराभाई ) 1 कैप्सूल , होस्टासाइक्लीन ( हैक्स्ट ) 1 कै . , इन्ट्रोस्ट्रेप 1 कै .। तीनों कैप्सूलों की दवा निकाल कर एक पुड़िया बनालें । ऐसी 1 पुड़िया दिन में 3-4 बार दें । 


★ न्यूरोवियोन ( मर्क ) 1 टेबलेट , सीलिन 100 मि.ग्रा . की -1 टेबलेट , मोलजाइम ( A.F.D. ) 1 टेबलेट , मेक्साफार्म ( सीबा ) 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार दें । सेंगोवियोन ( मर्क ) 1 कै . , रूब्राग्रान ( साराभाई ) 1 कै . , औट्रिन ( सायनेमिड ) 1 कै . । ऐसी 1 मात्रा प्रातः सायं जल से दें ।

Rx . ( प्रेस्क्रिप्शन ) -



■  लीडरफोल -11 ( Lederfol - 11 ) नि. - सायनेमिड 2 मि.ली. इन्जे.- मांस में - 1 दिन छोड़ कर ।

अथवा - 

इन्जे . मेकाल्विट ( Inj . Mecalvit ) 2 मि.ली. - मासंपेशीगत - 1 दिन छोड़ कर।

अथवा - 

इन्जे . बीप्लेक्स फोर्ट ( Beplex Forte ) एन्गलो - फ्रेंच 1 मि.ली. मांस में - रोजाना 10 से 15 दिन तक । 

■ स्ट्रेप्टोमेगमा ( Streptomegma ) ' बाइथ ' -  1-2 टेबलेट - दिन में 3 बार ।  

■ कोबाडेक्स फोर्ट ( Cobadex Forte ) ग्लैक्सो -  1 कै . दिन के 10 बजे । 

■ निसिनल ( Nicinal ) ' सिपला या बूट्स कं . -  2 टेबलेट दिन में 3 बार , नं . 2 औषधि के साथ । 

■ इली - बी ( Ele -B ) यू . एस . बी . एण्ड पी . -  1 कै . रात सोते समय ।
याद रखिये - गम्भीर अवस्था में- एम.वी.आई. ( M.VI. ) निमार्ता - एस.बी.एण्ड पी . 10 मि.ली. के एम्पुल को 500 मि.ली. ' ग्लूकोज सैलाइन में मिलाकर I/V द्वारा धीरे - धीरे दिन में 2 बार दें ।'

- सिरोसिस आफ दी लिवर एवं संक्रामक गुर्दे की बीमारी में भी लाभकारी है।

-->> संग्रहणी की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा <<--



1.कैल्शियम न्यूनता में कैल्शियम लैक्टेट 900 से 1800 मि.ग्रा . दिन में 3 बार दें । ओस्टो - कैल्शियम अथवा कैल्शी ओस्टेलिन भी दिया जा सकता है। )

2. गम्भीर अनीमिया की अवस्था में → ' ब्लड ट्रान्सफ्यूजन

3. अपावशोषण ( Malabsorption ) → ' पन्जाइनोम ( Panzynorm ) अथवा ' मरके न्जाइम ( Merkenzyme ) - 2 टेबलेट भोजन के साथ ।

4. जीभ की तकलीफ में →  ' निकोटिनिक एसिड 50 मि.ग्रा . , दिन में 3 बार । ( विटामिन ' बी ' कम्पलेक्स भी साथ में दें )

5. भूख न लगना   बीट्रिआन ( Beetrion ) नि. - ' फ्रेन्को इण्डियन  - वयस्कों को -1 टेबलेट नित्य दें ।


6. शक्तिहीनता एवं खून की कमी में  कोबाडेक्स फोर्ट ( Cobadex Forte ) ' ग्लैक्सो - वयस्कों को 1 कै . रोजाना दें । संग्रहणी को दूर करने के साथ - साथ शक्ति , नव - स्फूर्ति एवं रक्त को बढ़ाता है )

अथवा 

' बीप्लेक्स फोर्ट 1 टेबलेट नित्य दे।

■  गम्भीर एवं तीव्र स्थिति में - इसका 1 मि.ली. इन्जेक्शन मांस में नित्य या आवश्यकतानुसार लगायें । 

नोट - इससे संग्रहणी दूर होकर शक्ति प्राप्त होती है ।

7. नई एवं पुरानी संग्रहणी में → ' क्लास्साक ( Klassak ) नि. - प्लेथिको 1 कै . दिन में 4 बार ।

निषेध- गर्भावस्था में प्रयोग न करें ।

8. संग्रहणी के पुनः आने से को रोकने के लिये  ' संग्रहणी अच्छी होने के बाद दुबारा न हो , इसके लिये - ' लिवर ऐक्स्ट्रेक्ट आवश्यकतानुसार देते रहें ।

9. संग्रहणी से रोगी को जल्दी ठीक करने के लिये → ' फोलिक एसिड की उचित मात्रा के साथ - साथ ' लिवर ऐक्स्ट्रेक्ट का उपयोग करें ।
     

-->> संग्रहणी में उपयोगी एलोपैथिक पेटेन्ट टेबलेट्स / कैप्सूल्स <<--


1. एसीडोल पेप्सिन ( Acidol Pepsin ) नि.'बेयर  1-3 गोली - भोजन के बाद दिन में 3 बार दें ।

2. मोक्लोक्स ( Moclox ) नि . कोप्रान  1 कै . दिन में 2 बार । इसका ड्राई सीरप भी आता है ।

3. फोलीप्लेक्स ( Foliplex ) नि . कोप्रान  1 कै . दिन में 2 बार । इसका सीरप भीआता है ।

4. इली - बी ( Ele - B ) नि . ' यू . एस . वी . एण्ड बी . '  1 कै . रोजाना आवश्यकतानुसार । 

नोट- ‘ सीरप एवं इन्जेक्शन रूप में भी आता है ।

5. कोबाडेक्स फोर्ट नि . ग्लैक्सों  1 कै . रोजाना ।


6. बीप्लेक्स फोर्ट ( Beplex Forte ) नि . ' एन्गलो फ्रेंच  1 टेबलेट नित्य या आवश्यकतानुसार ।

7. फेरमफोल ( Ferrum Fol ) खण्डेलवाल  1 टेबलेट नित्य ।

8. हीमेट्रीन ( Hematrine ) नि . सैण्डोज  1 कै . दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार ।

9. हैप फोर्ट ( Hepp Forte ) ( लूपिन )  15 मि.ली. दिन में 2 बार ।

10. प्लास्टूल्स फोलिक ( Plastules Folic ) नि . ' वीथ  1 कै . दिन में 3 बार भोजन के बाद ।

11. सन्गोबिन ( Sangobin ) नि . ' मर्क → 1 कै . रोजाना ।

12. आउटिन ( Autrin ) नि . ' लीडर्ले  1 कै . रोजाना भोजन के बाद ।

13.रूब्राग्रान - एच ( Rubragran- H.P. ) नि . ' साराभाई  1 कै . दिन में 2 बार ।


-->> ग्रहणी में उपयोगी कुछ सुप्रसिद्ध एलोपैथिक पेटेन्ट पेय <<--

1. बीकोजाइम ( Becozyme ) नि . ' रोशे  2 से 4 चम्मच दिन में 2-3 बार ।

2. टोटालीन बी . सीरप ( Totalene B Syrup ) नि . ' सिपला → 2-3 चम्मच हर भोजन के बाद ।

3. क्रूलीवेक्स ( Crulivex ) नि . ' फेयरडील  1-2 चम्मच हर खाने के बाद । पुरानी संग्रहणी में विशेष लाभदायक है  )

4. सिलफर - 12 - एफ ओरल ( Cilfer- 12 - EOral ) । ' डूफर इंटरफेरान  1 चम्मच दिन में 2 बार भोजन के बाद ।

5. हेमफर ( Hemfer ) नि . ' एल्केम → आवश्यकतानुसार । 

6. इबीरोल -500 लिक्विड ( Iberol - 500 liquid ) नि . एव्वोट → 2 चम्मच , दिन में 2 बार भोजन के बाद । 


7. विटोनेक्स ( Vitonex ) नि . ' जगत  2 चम्मच तथा बच्चों कोको 1/4 चम्मच से 1/2 चम्मच दिन में दो बार।

8. मैकालविट ( Mecalvit ) नि.'सैण्डोज  5-10 मि.ली. ( 1-2 चम्मच ) दिन में 3 बार । बालक 2.5-5 मि.ली. दिन में 3 बार ।

9. बीटोनिन ( Betonin ) नि . बूट्स  15 मि.ली. दिन में 2 बार ।

10. सोलूपान ( Solupan ) नि . ' सिपला ' कं .  1-3 चम्मच दिन में 3 बार ।

11. ' विक्टोफोल सीरप विद आयरन एफ . डी.सी.  3 चम्मच दिन में 3 बार भोजन के बाद ।


 -->> संग्रहणी में लगाने योग्य कुछ एलोपैथिक लेटेस्ट इन्जेक्शन <<--


1. मेक्राफोलीन ( Macrafolin ) नि . ' ग्लैक्सों  1 इन्जे . रोजाना मांस में 10 दिन तक । 1-2 मि.ली. मांस में रोजाना लगायें ।

2. हिपाफोलीन पेरेन्टेरल ( Hepafolin Parenteral ) नि . ' सिपला  1 इन्जे . रोजाना मांस में 10 दिन तक ।

3. मैकालविट इन्जे . ( Macalvit Inj . ) नि . ' सैण्डोज  1-2 मि.ली. मांस में रोजाना या एक दिन छोड़कर ।

4. बीप्लेक्स फोर्ट ( Beplex Forte ) नि . ' एंग्लो - फ्रेंच  1मि.ली. मांस में रोजाना इन्जे . रूप में । 


5. इम्फेरॉन एफ -12 ( Imferon F - 12 ) नि . रैलिस  1 मि.ली. का एम्पुल मांसपेशीगत् इन्जे . रूप में ।

6. जेक्टोफर प्लस ( Jectofer Plus ) नि.सी.एफ.एल. मी  1 एम्पुल , मांसपेशीगत।

7. लेडरफोल -11 ( Lederfol - 11 ) नि . ' सायनेमिड 1-2 मि.ली. मांस में 1 दिन छोड़ कर ।
##  ' मल्टीबियोटा ' ( मर्क ) एक एम्पुल को 250 -500 मि.ली. डेक्स्ट्रोज वाटर में मिलाकर शिरामार्ग से इन्फ्यूजन विधि से दें । अथवा ' बोकोजाइम - सी फोर्ट ( रोश ) 2.5 मि . ली की मात्रा में शिरा मार्ग से रोजाना लगावें
  
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -














Post a Comment

Previous Post Next Post