गृध्रसी , कटि स्नायु शूल [ सायेटिका- Sciatica ]
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| गृध्रसी , कटि स्नायु शूल [ सायेटिका- Sciatica ] |
नाम -
अर्कुलनसा , गृध्रसी - सम्बन्धी श्रोणी वेदना , कूल्हे और जाँघ का वात रोग , नितम्ब ( Sciatic ) तंत्रिका का दर्द । सामान्य बोलचाल में इसे ' कुलंग का दर्द भी कहते हैं । लंगड़ी का दर्द , वायु पीड़ा आदि नाम ।




परिचय -
पैर में सियाटिक तंत्रिका ( Sciatic Nerve ) की लम्बाई के साथ - साथ होने वाला दर्द जो जाँघ के पीछे महसूस होता है तथा पैर के भीतर की ओर नीचे को चला जाता है । यह सियाटिका नर्वस के शोथ ( सुजन ) , उस पर चोट पहुँचने अथवा उसके दब जाने के कारण गृध्रसी रोग होता है।

रोग के प्रधान कारण -
सायेटिक तंत्रिका से प्रदायित क्षेत्र में टांग के पृष्ठ में नीचे तक पीड़ा । प्रायः यह अंतर कशेरुक - डिस्क के वहिःक्षेपण ( बाहर की ओर ) के द्वारा तंत्रिका मूलों पर दबाव के कारण उत्पन्न होता है ।
- उपदंश , गठिया आदि रोग ।
- चोट लगना , कुर्सी , घोड़ा , बेंच आदि पर निरन्तर बैठे रहने के कारण तंत्रिका पर दबाव पड़ने से ।
- ठंड लगने , जाँघ को थकाने वाले कसरत या शारीरिक परिश्रम करने के कारण श्रोणी गुहा ( एक मुख्य शाररिक गुहा जिसमे यौन अंग, मूत्राशय, अवग्राहब मलाशय और मलाशय जैसे महत्वपूर्ण अंग होते है ) के अल्प रोग ।
- आवश्यकता से अधिक चलने से ।
- कशेरुका शोथ ( Spondylitis ) एवं स्नायु दुर्बलता ।
- स्थानीय हड्डी का यक्ष्मा रोग ।
- प्राथमिक अस्थि अर्बुद ( गांठ ) या द्वितीयक कार्सिनोमा ।
- नितम्ब ( कमर कुल्हा ) की व्याधियाँ , पौरुष ग्रन्थि या स्त्री प्रजनन मार्ग का संक्रमण , मलाशय , अर्बुद आदि कारण
- मधुमेह में भी रोग की उत्पत्ति ।
- नितम्ब पर लगे गलत सूचीवेध से तंत्रिका क्षतिग्रस्त हो सकती है ।
रोग के प्रधान लक्षण -
- कमर से लेकर पैर तक गृध्रसी नाड़ी में लगातार दर्द ।
- रोग के प्रारम्भ में नर्वस में सुनता एवं झुनझुनाहट ।
- रोगी को चलने - फिरने , उठने - बैठने और लेटने के समय अत्यन्त कष्ट ।

- दर्द में नितम्बों से लेकर घुटने के पिछले हिस्से तक और कभी - कभी एड़ी तक दर्द की एक लकीर - सी खिंची प्रतीत होती है।
- दर्द कभी हल्का तो कभी बहुत तेज । तेज दर्द के समय रोगी को खड़ा होना कठिन।
- दर्द कभी एकटाँग में तो कभी दोनों टाँगों में ।
- दर्द किसी समय टाँग में और घुटने के पिछली तरफ से होता हुआ टखने तक ।
- काँखने , आगे झुकने तथा छींकने से दर्द की वृद्धि ।
- तीव्र दर्द की स्थिति में रोगी बेसुध पड़ा रहता है ।
- रात के समय हिलने - डुलने पर तथा आँधी - तूफान - वर्षा आने से पहले प्रायः इसका दर्द बढ़ जाता है ।
यह बीमारी अधिकतर 40 और 50 वर्ष की आयु वालों को होती है ।
कुछ नवीन विचार -
अब तक यह समझा जाता था कि ' सियाटिका नर्वस ' के शोथ के कारण पीड़ा होती है , क्योंकि इसकी चिकित्सा में विटामिन बी , तथा शोथ निवारक ( Anti - inflammatory ) औषधियों के प्रयोग से लाभ होता था जबकि इन औषधियों का कार्य संदिग्ध है तथा कुछ रोगियों को बिना औषधियों के प्रयोग के भी स्वतः लाभ होते देखा गया है ।
अतः अब यह सिद्ध हो गया है कि यह रोग ' सियाटिका नर्वस ' का न होकर उसके मूल स्थान रीढ़ की हड्डी के बीच टिकिया के ह्रास ( Degenerative disc of vertebra ) के कारण होता है । इस रोग में हड्डी के पास उभार , द्रव इकट्ठा होना या हड्डी का बढ़ जाना या अन्य कारण से मेरुरज्जु ( Spinal Cord ) से निकलने वाली नर्वस ( सियाटिक नर्वस ) पर दबाव पड़ता है जिसके कारण उतने ही भाग में तीव्र पीड़ा का आभास होता है । जिसको यह नर्वस आपूर्ति करती है ।
रोग की पहिचान -
सभी रोगियों में मलाशय परीक्षण , शर्करा के लिये मूत्र परीक्षण और कटि प्रदेश का एक्स - रे कराना चाहिये । कटि का एक्स - रे लेने पर चक ( डिस्क ) का रिक्त स्थान कम हुआ मिलता है ।।

- मेरुमस्तिष्क तरल ( CSF ) में प्रोटीन की मात्रा बढ़ी हुई हो सकती है -
रोग का परिणाम -
- शैया पर पूर्ण विश्राम करने पर 4-6 सप्ताह में लाभ होता है , परन्तु इसमें पुनः होने की प्रवृत्ति पायी जाती है ।
- पाद पात ( Foot drop ) के पूरी तरह ठीक होने की सम्भावना बहुत कम होती है।
- यदि रोगी को पीठ के सहारे लिटा कर उसे टाँग को बिना मोड़े ऊपर को उठाने के लिये कहें तो वह पीड़ित मूल ( Effected Root ) के खिंचाव के कारण टाँग को पूरी तरह नहीं उठा सकता है ।- इसमें रोगी टाँग को ऊपर उठाते - उठाते रोक लेता है ।
चिकित्सा विधि -
इस रोग की वास्तविक चिकित्सा बिस्तर पर पूर्ण विश्राम ( Complete Bed Rest ) है । रोगी को बैठने या चलने - फिरने की किसी भी अवस्था में अनुभूति नहीं देनी चाहिये । रोगी का बिस्तर सीधा कठोर तख्त जैसा होना आवश्यक ।
- कब्ज निबारक औषधियाँ केवल इसलिये दी जावें कि बिस्तर पर हर समय पड़े रहने से रोगी को ' शौच आदि में कठिनाई न हो ।
- यदि उपरोक्त प्रबन्ध और नीचे लिखी नर्देशित औषधि चिकित्सा से लाभ न हो तो रीढ़ की हड्डी की टी . बी . या अन्य रोगों के लिये कुशल सर्जन से परामर्श करें तथा शल्य चिकित्सा का लाभ उठाया जाये जो कुछ रोगों में बहुत उत्तम है । जबकि अधिकांश रोगियों में शत्य चिकित्सा से होने वाला लाभ संदिग्ध है ।

- मधुमेह हो तो उसकी उचित चिकित्सा आवश्यक ।
सहायक उपचार एवं आनुषांगिक चिकित्सा -
कुछ व्यायाम रोगी कर सकता है जिससे कमर एवं टाँग की माँसपेशियाँ अपनी खोई हुई शक्ति पुनः प्राप्त कर सकें ।
- महाविष गर्भ तेल तथा महानारायण तेल बराबर , मिलाकर सुबह - शाम और रात में पीड़ित स्थान पर बायें हाथ से मालिश करके थोड़ा सेंक करें । अथवा मसलेक्स क्रीम ( Muslax Cream ) नि . वी . ई . की मालिश कर सेकें । मालिश इतनी हल्की हो कि रोगी को जरा भी कष्ट न हो । गर्म पानी की बोतल का सेंक लाभकारी है । लाभ न मिलने पर ' इन्फ्रा रेड का उपयोग करना चाहिये ।
- यदि दाँत की जड़ में पूय की उपस्थिति मिले तो उसकी उचित चिकित्सा करनी चाहिये ।
- आनुषांगिक चिकित्सा - रोगी को भारी जूते और गरम मोजे पहिनायें । दिन में कई बार गरम पानी में नीबू का रस डाल कर पिलायें ।
नोट - रोगी को किसी भी ओर करवट लेने की अनुमति दी जा सकती है किन्तु शरीर को सीधा रक्खा जाये ।- विश्राम की अवधि 3-6 सप्ताह तक हो सकती है ।- दर्द में कमी होना स्वास्थ्य लाभ का संकेत है ।- दर्द में लाभ होने के बाद अधिक समय तक झुककर कार्य करने , बोझा उठाने से एक डेढ़ माह तक रोका जाय ।
गृध्रसी रोग नाशक औषधि चिकित्सा व्यवस्था -
- शैया पर पूर्ण विश्राम । रोगी को चलने - फिरने की अनुमति नहीं देनी चाहिये । बैठने पर भी सख्त मनाही । बिस्तर कठोर सीधा तख्त जैसा होना आवश्यक ।
- कब्ज निवारक औषधियाँ ( Luxative ) इसलिये दी जायें कि बिस्तर पर पड़े रहने ( हमेशा ) से रोगी को शौच आदि में कठिनाई न हो ।
- गर्म सेंक ( Hot Fomentation ) ।
- दर्द निवारक ( Analgesics ) अथवा नॉन - स्टेरॉइड एण्टी - इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स ( Non - steroid anti - inflammatory drugs ) यथा ( नीचे लिखे अनुसार ) -
' एस्पाइरिन ( Apirin ) 600-900 मि . ग्रा . नित्य । इबुप्रोफेन ( Ibuprofen ) 1.2-1.8 ग्रा . रोजाना विभाजित मात्रा में मुख द्वारा ।
अथवा-
इण्डोमेथासिन ( Indomethacin ) 75-200 मि . ग्रा . नित्य मुख द्वारा ।
- पेशी शिथिलन ( Muscle relaxant ) - यथा
' डायजीपाम ' 6-30 मि . ग्रा . नित्य मुख द्वारा ।
अथवा -
ऑरफेनाड्रीन ( Orphenadrine ) 100 मि . ग्रा . नित्य मुख द्वारा ।
नोट - 1-2 सप्ताह तक प्रयोग करें ( उपरोक्त व्यवस्था से ) ।
अथवा-
० इन्जे . इस्जीपायरीन ( Inj . Esgipyrin- सिबा - गैगी ) 3 मि . ली . अथवा नोवाल्जिन - होचेस्ट 3 मि . ली . माँस ( I. M. ) में एक दिन छोड़ कर । साथ ही -
० इन्जे . अरिस्टोन्यूरोल ( Aristoneurol- एरिस्टो ) 1 मि . ली . बीथाडॉक्सीन -12 ( Bethadoxin - 12 ) 2 मि . ली . माँस में एक दिन छोड़ कर लगायें ।
- यदि इन्जे . चिकित्सा से लाभ हो तो यह औषधियाँ जो प्रति दिन एक - एक करके इन्जेक्शन के रूप में 2 सप्ताह तक दें । इसके बाद ' अरिस्टोन्यूरोल ' इन्जे . या बीथाडॉक्सिन -12 दो माह तक इसी प्रकार लगायें ।
आवश्यक सुझाव -
यदि रोगी को प्रथम सप्ताह में ही लाभ न हो या औषधि बन्द करते ही पीड़ा का अनुभव होने लगे तो रोगी को किसी कुशल हड्डी रोग विशेषज्ञ ( Orthopaedic ) के पास परीक्षण के लिये भेज देना चाहिए ।
यह उपाय भी सम्भव हो सकता है -
तीव्र वेदना की शान्ति के लिये - 2 % कोकेन या ' लिगनोकेन का गृध्रसी नाड़ी में या इपीडूरल ( Epidural ) स्थानों में या त्रिक - श्रेणि फलक ( Sacro - iliae ) प्रदेश की सर्वाधिक स्पर्शासहिष्णु जगह पर सूचीवेध करने से कई बार नाटकीय ढंग से आश्चर्यजनक लाभ होता है । ।
- अस्थायी लाभ के लिये अन्य वेदनाहर औषधि भी उपयोगी होती हैं ।
गृध्रसी की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -
1.दर्द की शान्ति के लिये → इन्जे . इस्जीपायरीन 3 मि . ली . कूल्हे के गहरे माँस में 1 दिन छोड़ कर लगायें । साथ ही ' मेक्राबेरीन 1 मि . ली . का इन्जे . नित्य 30 दिन तक लगावें । अथवा- ' जायलोकेन 4 % का 4 मि . ली . की मात्रा में सियाटिका नर्वस में लगायें । अथवा ब्रूफेन 600 मि . ग्रा . की 1 टे . दिन में 2 बार 2 सप्ताह तक दें ।
2.तेज दर्द में → इन्जे . ऑप्टीन्यूरॉन 3 मि . ली . I / M 1 दिन छोड़कर 10 दिन इन्जे . लगायें । साथ में
रिलेक्सिन आइण्टमेण्ट , दिन में 2 बार लगायें ।
3. गृध्रसी के पुराने रोग में → कमर एवं टांग पर ' विण्टर ग्रीन आयल की मालिश करायें । अथवा मसलेक्स ( Muslax cream ) की मालिश एवं सिकाई । इस्जीपायरीन 1 टे . + स्क्लेरोवियोन 1 टे . मिलाकर सुबह - शाम दें ।
नोट- इस रोग में कभी - कभी विटामिन बी , और बी ,, का प्रयोग लाभकर पाया जाता है अतः न्यूराक्सिन बी ,, अथवा मेक्राबीन या ऑप्टीन्यूरॉन का प्रयोग कर अवश्य देखना चाहिये । इसे 1 मि . ली . की मात्रा में नित्य 15 दिन से 1 माह तक माँस में लगावें । साथ ही गृध्रसी नाशक अन्य औषधियाँ भी देते रहें ।
1. इस्जीपायरीन 1 टे . , न्यूरोवियोन फोर्ट 1 टे . , रूब्राप्लेक्स इलिक्सिर 2 चम्मच । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार प्रातः सायं जल से दें ।
2. मेलीडेन्स ( Malidens ) निकोलस की 1 टे . , माइक्रोपायरीन 1 टे . , न्यूरोवियोन 1 टे .। ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार दें।
3.कोडोपायरीन 1 टे . , रिडॉक्सोन 500 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें । साधारण रोग में लाभकारी है ।
4. ए . पी . सी . 1 टे . , लिब्रियम 1 टे . , डेकाट्टान 1 टे . , सीलिन 100 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट । सब को पीस कर पुड़िया बनालें । ऐसी 1 पुड़िया दिन में 3 बार दें ।
5.मेक्राबेरिन ( ग्लैक्सो ) 2 टे . , सिबाल्जिन कम्पोजीटम ( सिबा - गैगी ) 2 टे . , विटाप्लेक्स सीरप ( ईस्ट इण्डिया ) 2 चम्मच । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार भोजन के बाद ।
मेडिकल व्यवस्था - पत्र -->>
Rx
- 3-4 सप्ताह तक पूर्ण विश्राम ।
- प्रा . दो . सा . → इस्जीपायरीन( S.G )2 टे .
न्यूरोवियोन ( मर्क ) 2 टे .
डोल्टाकॉटिल(फाइजर) 1टे .
ए . पी . सी . 1 टे . ( सभी एक मात्रा में ) 1-1 मात्रा जल के साथ । भोजन के बाद ।
अथवा-
इक्वाजेसिक ( वीथ ) 1 टे .
बीटाफ्लेम ( विलको ) 1 टे .
नोवाल्जिन ( होचेस्ट ) 1 टे . ( 1 मात्रा । ) 1-1 मात्रा जल से 3 बार ।
-->> हर दूसरे दिन, दिन में 1 बार - इं . न्यूरोवियोन या ऑप्टीन्यूरॉन 3 मि . ली .. माँस में ।कूल्हे के माँस में गहराई पर दें ।
-->> हर तीसरे दिन - इन्जे . इस्जीपायरीन 5 मि . ली . माँस में ।
-->> दिन में 2 बार मसलेक्स क्रीम - दर्द के स्थान पर मालिश
-->> रात सोते समय - क्रीमाकिन लिक्विड -2 चम्मच ।
नोट - क्रीम की मालिश के बाद सेंकने से और अधिक लाभ मिलता है ।
अनुभव के मोती -
- इस्जीपायरीन 1 टे . , न्यूरोवियोन 1/2 टे . , प्रेस्टीजेसिक 1 टे .। ऐसी 1 मात्रा दिन में 2-3 बार दें ।
- पैथीडीन हाइड्रोक्लोराइड 1 मि . ली . की मात्रा माँस में तीव्र दर्द की स्थिति में लगावें । दर्द कम होने पर प्रेस्टीफेन फोर्ट ( Prestifen forte ) नि . ' सिन्थिकों की 1 टे . प्रति 4 घण्टे पर देते रहें ।
1. डिस्प्रिन ( Disprin ) ' रिकेट्स - 2 टे . प्रति 4 घण्टे3 . पर दें ।
2. फोर्टाजेसिक ( Fortagesic ) ' बिन मेडिकेयर - 1-2 टेबलेट दिन में 3-4 बार दें ।
3. बेसरोल ( Beserol ) ' बिन मेडिकेयर 50 mg . - 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार ।
4. प्रोफेनिड -50 ( Profenid - 50 ) ' रोन पुलेन्क - 1-2 कै . नित्य 2 बार ।
5. प्रोफेनिड -50 नि . ' रोन पुलेन्क 100 mg . - 1-2 कै . दिन में 2 बार ।
6. सुगाफेन सी . आर , ( Sugafen C. R. ) S.G. Pharma - 2 टेबलेट दिन में 3 बार । तत्पश्चात 1 टि . दिन में 3-4 बार ।
7. सुगाफेन फोर्ट ( Sugafen Forte ) - 1 टे . दिन में 3 बार । तत्पश्चात 1 टे. दिन में 1-2 बार ।
नोट - पेप्टिक अल्सर के रोगी में इसका प्रयोग न करें ।
8. वोवेरान एस आर ( Voveran SR ) ' सिबा गैगी - 1 टेबलेट रोजाना । इसका इन्जेक्शन भी आता है ।
9.डिक्लोमेक्स ( Diclomax ) टोरेण्ट - 2-2 टे . दिन में 3 बार + पेरासिटामोल 1-1 टे . दिन में 2-2 बार ।
10. डिक्लोजेसिक ( Diclogesic ) ' टोरेण्ट 10 टेबलेट - 1 टे . दिन में 3 बार भोजन के साथ तत्पश्चात -1 टे . दिन में 2 बार ।
सावधान - ' गैस्ट्रिक अल्सर एवं आमाशयिक रक्तस्राव की स्थिति में इसका प्रयोग न करें ।
11. डिक्लोमोल ( Diclomol ) ' बिन मेडि- केयर 10 टे . - 1 टे . दिन में 3 बार भोजन के साथ । मेन्टेनेन्स डोज -1 टे . दिन में 2 बार ।
सावधान - पेप्टिक अल्सर , अस्थमा , अलर्जी , आमाशयान्त्र रक्त स्राव की स्थिति में इसका प्रयोग न करें ।
12. इबूक्लिन ( Ibuclin ) स्टेनगेन - 1 टे . दिन में 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार ।
13. इबूफ्लेमर- एम . एक्स ( Ibuflamar- M.X. ) नि . ' इण्डोको - 1 टे . दिन में 3 बार ।
सावधान - पेप्टिक अल्सर की स्थिति में निषेध ।
14. लोबेक ( Lobak ) ' जेनों कं - 1-2 टे . दिन में 3 बार ।
15. क्रोसिन - इबू ( Crocin - Ibu ) ' डूफर इंटरफ्रान - 1 टे . दिन में 3 बार देत।
सावधान - पेप्टिक अल्सर के रोगी में प्रयोग न करें ।
16. डिक्लोरान - ए ( Dicloran - A ) यूनी- क्यू - 1 टे . दिन में 2-3 बार ।
17.सुबडू ( Subdu ) USV & P - 1 कै . दिन में 3 बार । तीव्र रोग में -2 कै . दिन में 3 बार ।
18. केनाल्जेसिक ( Kenalgesic ) ' सारा- भाई - 2-3 गोली दिन में 4 बार दे।
19. ब्यूटापायरीन ( Butapyrin ) इनगा - 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार 4-4 घंटे बाद ।
20. बीटीओन कैप्सूल ( फ्रेंको - इण्डियन ) - 1-1 कै . दिन में 3 बार 4-4 घण्टे बाद ।
21. बेन्यूरोन फोर्ट ( Beneuron forte ) - 1-1 कै . दिन में 3 बार दें ।
22. माइक्रोपाइरीन ( Micropyrin ) - 2-2 टे . दिन में 4 बार दें।
1.डिक्लोनेक ( Diclonac ) लूपिन - 3 मि . ली . का एम्पुल चूतड़ के गहरे माँस में दिन में 1 या 2 बार दें ।
सावधान - बालकों में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
2.डिक्लोरान ( Dicloran ) ' यूनीक्यू - 1 एम्पुल ( 1 मि . ली . ) नित्य चूतड़ के ऊपरी भाग में गहराई तक दें । अधिक तीव्र दर्द में 2 एम्पुल ( 6 मि . ली . ) प्रत्येक चूतड़ के माँस में लगायें ।
सावधान -2 दिन से अधिक इन्जेक्शन न दें । इसके बाद इन्जे . के स्थान पर टेबलेट का प्रयोग करें ।
3. इस्जीपायरीन ( Esgipyrin ) ' गायगी - 5 मि . ली . नित्य कूल्हे में धीरे - धीरे गहरा इन्जे . लगावें ।
4. ब्यूटारिन ( Butarin ) थेराप्यूटिक - 5 मि . ली . गहरे माँस में लगावें ।
5.ओप्टीन्यूरॉन ( Optineuron ) ' लूपिन - 3 मि . ली . माँस में नित्य लगावें ।
6. न्यूरोबियोन ( Neurobion ) मर्क - 2-3 मि . ली . कूल्हे के गहरे माँस में ।
7.पैथीडीन ( Pethidine ) हाइड्रोक्लोराइड - तेज दर्द में 100 मि . ग्रा . की एक सुई माँस में लगावें ।
8. एल्जेसिन ( Algesin ) एलेम्बिक - 3 मि . ली . का इन्जे . कूल्हे के माँस में । गृध्रसी में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट पेय / सीरप .
1. मेक्राबिन ( Macrabin ) - ' ग्लैक्सों 2-3 चम्मच दिन में 3-4 बार ।
2.टोटेलिन ( Totalin ) ' सिपला ' - 1-2 चम्मच दिन में 2 या 3 बार दें ।
3.एनाफ्लेम ( Anaflam ) एल्बर्ट डेविड - 1-3 चम्मच दिन में 3 बार दें । बालकों को आयु के अनुसार 1 / 2-1 चम्मच दिन में 3 बार ।
4. ब्रूपाल ( Brupal ) जेनों - 1 / 2-2 चम्मच दिन में 3 बार दें ।
5. इम्फ्लेम सस्पे . ( Emflam Susp ) मर्क ' - 1 / 2-2 चम्मच दिन में 2 या 3 बार ।
Rx ( प्रेस्क्रिप्शन नोट्स )
- शैया पर पूर्ण विश्राम ( Complete rest in bed )
- एक दिन छोड़कर → इन्जे . अरिस्टोन्यूरोल ( एरिस्टो ) 1 मि.ली. माँस में ।
- प्रा.दो.शा. → सूबडू ( Subdu ) यू.एस.वी. एण्ड पी . ( U.S.V. & P ) 2-2 कै . जल से ।
- भोजनोपरान्त → डिक्लोजेसिक ( Diclogesic ) टोरेण्ट 1-1 टे . दिन में 3 बार जल से ।
- प्रा . 10 बजे , 6 बजे शा . → डायजीपाम 1 टे . दिन में 2 बार ।
- रात सोते समय → प्रोफेनिड सी.आर. ( Profenid C.R. ) 1 कै . रोज ।
- स्थानिक → मेडीक्रीम ( Medi cream ) रैलीज ' दर्द के स्थान पर मलें और सिकाई ।
- यदि 6 सप्ताह तक दर्द ( औषधि चिकित्सा से ) दूर नहीं होता है तो इसकी आपरेशन ही प्रधान चिकित्सा है । प्रायः शस्त्र चिकित्सा से 3 सप्ताह में ही रोगी चलने - फिरने के योग्य हो जाता है । आमतौर से शल्य चिकित्सा से रोगी पूर्णतया आरोग्य हो जाता है पर कभी - कभी दर्द लौट आता है ।- उग्र गृध्रसी शूल में - गृध्रसी नाड़ी में 5 % प्रोकेन का स्थानीय सूचीवेध किया जाता है।- स्थानिक गर्म सेंक एवं मालिश से पर्याप्त लाभ ।- ' इपीड्यूरल ( Epidural ) का 10 मि.ली. 2 % नोवोकेन , 80 -100 मि.ली. नार्मल सैलाइन के साथ सप्ताह में एक बार इन्जेक्शन दिया जाता है ।- स्थानिक रूप से कुछ कार्य एवं कसरत । जिससे वह शिथिल न होने पाये । ।- साथ में ' उपसर्ग की चिकित्सा भी । - ' न्यूरोवियोन का इन्जेक्शन साथ में भी अति आवश्यक ।
याद रखिये - साधारणतया दर्द आदि में - ऐस्प्रिन , वेगानिन , आदि दवायें तथा मोर्फीन वा पेथीडीन का इन्जे . लगाया जाता है।
गृध्रसी की विशिष्ट अनुभूत चिकित्सा - चिकित्सकों की राय में -
- साधारण प्रकार के सियाटिक पेन में - ' कोडोपाइरीन 1 टेबलेट ' सीलिन 500 मि.ग्रा . की 1 टे . , वोवेरान एस.आर 1 टे. । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार ।
- सियाटिक पेन को दबाने का पेटेन्ट योग - क्रोसिन 1/2 टे . , लिबरीयम ( रोश ) , बिटनेलान ( ग्लैक्सो ) की 1 टे . मिलाकर ऐसी 1-1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार दें ।




