सर्पदंश स्नेक बाइट- Snake Bite ]
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| सर्पदंश स्नेक बाइट- Snake Bite |
परिचय-
सर्प स्वभाव से डरपोक होते हैं और बहुत आलसी होते हैं । परन्तु वे पैर से दब जाते हैं या मारने पर क्रुद्ध( angry ) हो जाते हैं तब काट लेते हैं । वे सोते - जागते , चलते - फिरते , झाड़ी , जंगल , कूड़े - कतवार , खण्डहर , वृक्ष के कोटर , घास - फूस से निकलकर आक्रमण कर देते हैं । सर्प काटने को दुर्घटनायें ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक होती हैं ।
भारत में प्रायः 330 प्रकार के सर्प पाये जाते हैं । इनमें से 61 प्रकार के ही सर्प विषैले होते हैं । केवल 40 जातियाँ ही मनुष्य को काटती हैं । कोलूब्राइन और वाइपर कोलूब्राइन साँप काफी लम्बे और अत्यधिक जहरीले होते हैं । पानी में रहने वाले साँप भी जहरीले होते हैं ।
लक्षण एवं चिन्ह - लक्षण सर्प - जाति के अनुसार -
1.कोबरावंश के सर्प के काटने से -
- जहर स्नायुओं ( Nervous System ) को शीघ्र प्रभावित करता है ।
- काटे हुए स्थान पर दर्द , घबराहट , जी मिचलाना और कभी - कभी उल्टियाँ ।
- स्नायविक तंत्र के प्रभावित होने से शरीर की मांसपेशियाँ शिथिल होने लगती हैं । जिससे हाथ - पैरों में कमजोरी एवं सुन्नपन।
- मुँह से लार टपकना ।

- श्वास क्रिया मंद होना एवं नाड़ी की गति कमजोर ।
- आँखों की पुतलियाँ ( Pupils ) संकुचित ।
- त्वरित चिकित्सा न मिलने पर शीघ्र मृत्यु ।
2. वाइपर वंश के साँपों के काटने से -
- काटे हुए स्थान पर अत्यधिक मात्रा में रक्तस्राव ।
- काटा हुआ भाग काफी सूजा हुआ ।

- शरीर विष के शोषित होने से घबराहट , जी मिचलाना , उल्टियाँ होना , कमजोरी महसूस होना , नाड़ी की गति मंद होना ।
- आँख की पुतलियों का फैलना आदि ।
नागदंश की विषाक्तता के लक्षण - इस प्रकार से
- दंश अपने आप में पीड़ाजनक नहीं ।
- दंश के तत्काल बाद प्राणी पर नशा सा छाने लगता है ।
- चेतना लुप्त प्रायः ।
- पैरों का लड़खड़ाना ।
- विष संचरण तेजी से पैरों से सिर की ओर ।
- पलकें , गला और जिह्वा अपना काम बंद कर देते हैं ।
- सिर एक तरफ लुढ़क जाता है एवं बोली बंद हो जाती है ।
- मुँह से फेन एवं जी मिचलाना । उल्टी होती है ।
- साँस लेने में कठिनाई । साँस धीरे - धीरे कम होते - होते बंद हो जाती है । एवं रोगी की मृत्यु।
- हृदय पर कोई प्रभाव नहीं ।
- रोगी की मृत्यु दंश के बाद 1/2 घंटे से लेकर 30 घण्टे के अंदर ।
करैत सर्प दंश के लक्षण - इस प्रकार से -
- आमाशय और आँतों में रक्त स्राव होने के कारण भयंकर पेट मे पीड़ा ।
- नागदंश के कुछ और लक्षण भी कुछ मात्रा में प्रकट ।
- मृत्यु 6 से 10 दिनों के अंदर साँस रुक जाने से ।
सर्पदंश की पहिचान -
कोबरा तथा वाइपर साँपों के काटने के स्थान पर 1 ” इंच की दूरी पर दाँत के निशान ।

- तीव्र दर्द , सरसराहट एवं सूजन ।
- विष के प्रभाव कुछ मिनटों से कुछ घंटों तकआरम्भ ।
- कोबरा साँप के काटने पर - शरीर में दुर्बलता , पक्षाघात( पैरालिसिस ) के चिन्ह दिखायी देते हैं । एवं
- लार में वृद्धि , भाषण में कठिनाई , मितली एवं वमन( उल्टी ) । श्वसन का आघात होकर दौरे प्रारम्भ एवं कुछ ही घंटों में रोगी की मृत्यु।
- 24 घंटे जीवित रहने पर स्वास्थ्य लाभ कर सकता है ।
- वाइपर के काटने पर त्वचा में तीव्र प्रकार का रक्तस्त्राव ।
- तीव्र प्रकार का हीमोलाईसिस एवं कामला हो सकता है । इससे हीमोग्लोबिन की मात्रा न्यूनतम हो जाती है ।
दंश का पूर्वानुमान -
बालक , वृद्ध , भूख से पीड़ित , कुष्ठ रोगियों , निर्बल व्यक्तियों में एवं गर्भवती महिलाओं में सर्पविष असाध्य होता है ।
- जिसका मुख टेढ़ा हो जाये , सिर के बाल गिर जायें , नासा टेढ़ी हो जाये , स्वर भंग हो , मुख से मोटी वर्चा जैसे लार का स्राव हो , ऊपरी और निचले मार्गों से रक्तस्राव हो , जिसके दंशित स्थान पर 4 दाँतों के निशान हों ऐसा रोगी ठीक नहीं होता है । "
- जिसके अंदर अनेक अन्य रोग हों , ऐसा रोगी अवश्य मर जाता है ।
... सर्प काटने का भय कुछ गम्भीर समस्यायें उत्पन्न कर देता है । रोगी इससे भयभीत हो जाता है कि सर्प चाहे विषैला हो या न हो रोगी को बेहोशी हो जाती है । इस अवस्था में वास्तविकता देरी से मालूम होती है ।
• आपातकालीन चिकित्सा -
चिकित्सा 3 चरणों में -
- शंका विष का निवारण ।
- विष के प्रसार को रोकना ।
- प्रतिविष( एन्टी वेनम ) का प्रयोग । तथा ।
- लाक्षणिक चिकित्सा ।
1 . शंका विष का निवारण - सर्पदंश की अवस्था में विष से कम और शंकाविष से अधिक हानि होने की सम्भावना होती है । इसलिये सबसे पहले रोगी के अनावश्यक भय , चिंता एवं आशंका का निवारण करना चाहिये । उसको भलीभाँति समझा देना चाहिये कि साँप जहरीला नहीं था ।
2 . रोगी में विष के प्रसार को रोकना - निम्न त्वरित उपाय आवश्यक ~
- दंश स्थान का अचलीरकरण ( रोगी को हिलने - डुलने तक न दें ) ।
- दंश स्थान से 2 इंच ऊपर बंध बाँधे ( टूर्नकिट ) । यह काफी कसा हो ।
- विलम्ब होने पर हाथ - पैर जो भी हो उसको उठा दें । प्रत्येक आधा घण्टे बाद एक मिनट के लिये कुछ ढीला कर दें ।
..स्थानीय उपचार - मैगसल्फ कम्प्रेस करें । अथवा दंश स्थान को चीरकर रक्त निकाल दें और लाल दवा के घोल से खूब धोयें । हैथेरोनोइड मरहम लगावें ।
नोट - कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पोटाशियम परमैंग्नेट को सीधा घाव पर लगा देने से घाव भरने में जटिलता उत्पन्न हो जाती है ।
3. प्रतिविष का प्रयोग - प्रतिविष ( एण्टीवेनिन- Antivenin ) 2 प्रकार के होते हैं-
1.विशिष्ट ( Specific ) और -
2. बहुसंयोजी ( Polyvalent ) ।
1. विशिष्ट ( Specific ) प्रतिविष - भित्र - भिन्न प्रकार के सर्पविषों के लिये अलग - अलग । इनका उपयोग काटने वाले सर्प की पहिचान हो जाने पर ही किया जाता है ।
2. बहुसंयोजी प्रतिविष ( Polyvalent ) - इसका प्रयोग अन्य ( बिना पहिचान के ) सर्पों के काटने पर होता है ।
प्रतिविष का प्रयोग करने से पूर्व रोगी की उसके प्रति संवेदनशीलता की परीक्षा ( Sensitivity test ) कर लेनी चाहिये ।- यदि रोगी में एलर्जी का पूर्व इतिहास हो अथवा प्रतिविष पहले भी दिया जा चुका है तो बेटनेसोल ( Betnesal ) 4 एम . जी . का माँसपेशी में इन्जेक्शन दे देना चाहिये । एवं -
चिकित्सा-
पूर्व औषधि के रुप में ' एड्रीनलीन ( 1 : 1000 ) का 0.25 मि . ली . का सबकुटेनियस ( S / C ) का एक इन्जेक्शन तथा एविल 2 मि . ली . का माँसपेशी में एक इन्जेक्शन लगा देना चाहिये । इसके बाद प्रतिविष का उपयोग करें ।
प्रतिविष की सामान्य मात्रा -
साथ में विवरण पत्र के अनुसार । वैसे एक पौढ़ व्यक्ति को पोलीवेलेन्ट एण्टीवेनिन की पहली मात्रा 60 एम . एल . को दी जाती है । 20 मि . ली . स्थानीय रूप से दंश स्थान पर त्वचा में , 20 मि . ली . माँसपेशी में शेष 20 मि . ली . अन्तःशिरा ( आई . वी . ) द्वारा । पात ( कोलेट्स ) की अवस्था में आई . वी . मात्रा को पुनः दी जा सकती है । अन्यथा उसे 3 घण्टे पर , जब तक कि लक्षण पूर्ण रूप से शान्त न हो जायें , देते रहना चाहिये । प्रतिकूल प्रतिक्रिया दिखाई देने पर तत्काल बंद कर दें ।
सावधान- प्रतिविष का प्रयोग तभी करना चाहिये जब देश की विषाक्तता के स्पष्ट लक्षण व्यक्त हो रहे हों , और पूर्ण रूप से स्थापित हो जायें अन्यथा उससे लाभ के स्थान पर हानि पहुँचने की सम्भावना रहती है ।
• यदि सर्पदंश निर्विष हुआ तो प्रतिविष स्वयं विषाक्तता का कारण बन जाता है ।
- इस बात का ध्यान रहे कि प्रतिविष केवल रक्तसंचार में विद्यमान विष का ही उदासीनीकरण ( Neutrilized ) करता है । ऊतकों में स्थित हो गये सर्प विष पर कोई प्रभाव नहीं ।
- ऐसी स्थिति में ' एलपिण्डों के दंश में ' नीओस्टिग्मीन - एट्रोपीन चिकित्सा ( Neostigmine Atropine Therapy ) का और वाइपरों के देश में सहायक फाइब्रिनोजेन आधान ( Fibrinogen Transfusion ) के साथ हिपेरिन ( Heparin ) का उपयोग करना चाहिये ।
सर्प दंश की लाक्षणिक चिकित्सा -
1. सामान्य चिकित्सा हर अवस्था में - त्वरित ~ ' टिटेनस - टॉक्साइड ' 1 एम . एल . और ' नोवाल्जिन ' 2 एम . एम . के इन्जेक्शन तत्काल । तत्पश्चात - एविल की 1-1 टे . दिन में 3 बार , डायजीपाम 5 मि . ग्रा . की 1-1 टे . दिन में 3 बार और एम्पीसिलीन 250 एम . जी . का 1-1 कैप्सूल दिन में 4 बार दें ।
सावधान - सर्पदंश में मार्फीन का उपयोग कदापि नहीं ।
2. स्थानीय शोथ( सूजन ) , जलन एवं स्पर्श असहनशीलता की स्थिति में ~ मैग सल्फ का संपीडन करें । बपारिन ( Baparin ) थ्रोम्बोफोब् ( Thrombophob ) अथवा हीरुड्वायड ( Hirudoid ) मरहम लगावें । ' सुगानरिल ( Suganril ) की 1-1 टे . दिन में 3 बार दें ।
3. पक्षाघात की अवस्था में ~ एड्रीनलीन का उपयोग ।
4. गम्भीर स्तब्धता ( Shock ) एवं प्रतिविष के प्रति सामान्य एलर्जी तथा संवेदनशीलता की अवस्था में ~ एफकोरलिन ( Efcorlin ) 100 एम . जी . अथवा वाइमेसोन ( Wymesone ) 4 एम . जी . का एक इन्जेक्शन तत्काल आई . वी . द्वारा दें । उसके बाद 6-6 घण्टे बाद पुनः दें ।

5. वृक्कपात की स्थिति में ~ मैनीटोल ( Mannitol ) 20 % का 350 एम . एल . का इन्जेक्शन डिप विधि से दें । साथ
ही बेटनीसोल 4 एम . जी . आई . वी . द्वारा प्रति 6 घण्टे पर दें । -
- आवश्यक होने पर हीमोडायलिसिस ' ( Hemodialysis ) अथवा ' पेरीटोनियल डायलिसिस का उपयोग करें ।
6. रक्तस्त्राव की अवस्था में ~ समग्र रक्त अथवा विम्बाणुओं ( Platelets ) का आधान एवं फाइब्रिनोजेन 300-600 ग्राम आई . वी . द्वारा दें ।
7. रेसपाइरेटरी पेरालिसिस की अवस्था में ~ शरीर के तापक्रम को सामान्य बनाये रखने के लिये प्रयास ।
याद रखिये - ' नागविष की 15 एम . जी . की तथा ' वाइपर विष ' की 40 एम . जी . की मात्रा घातक मानी जाती है । -
- कृत्रिम श्वसन ।
- सही एव उचित विधि का पूरा ध्यान ।
- समुद्री साँप का विष घातक नहीं ।
घातक अवधि -
नागदंश में कुछ ही घण्टों में और वाइपर देश में कुछ दिनों में मृत्यु हो सकती है ।
- यदि रोगी सर्प काटने के तुरन्त बाद ही चिकित्सक के पास आता है तो शीघ्र निरीक्षण करके चिकित्सा आरम्भ कर देनी चाहिये और जहाँ तक हो सके उसे किसी सुविधाजनक अस्पताल में रखा जाये ।
नोट- एण्टी - स्नेक वेनम सीरम ' जो विभिन्न कम्पनियों द्वारा बनाया जाता है जो ' कोबरा ' तथा ' वाइपर दोनों प्रकार के साँपों के विष के लिये लाभकारी है ।- एण्टी - स्नेक वेनम ( हाफकिन कं ) व्यापारिक नाम ' पोलीवेलेन्ट इन्जेक्शन के रूप में मिलते हैं और डिस्टिल्ड वाटर द्वारा भी इसका घोल तैयार किया जाता है।
सामान्य देखभाल -
यदि रोगी बेहोश है तो मुँह द्वारा कोई द्रव पदार्थ न दें । और उसे नींद आ रही हो तो उसे बराबर जगाते हुए रखें । ( बाजे / थालियों आदि को जोर - जोर बजाना पुरानी रीति ) का यही उद्देश्य है ।
- यदि रोगी होश में है तो उसे पानी , चाय या कॉफी पीने के लिये दे सकते हैं ।
- बालकों में साँप का काटना अधिक गम्भीर स्थिति पैदा कर देता है क्योंकि छोटे शरीर के हिसाब से विष की मात्रा अधिक हो जाती है । इसलिये बालकों को बिना समय व्यर्थ गँवायें तुरन्त अस्पताल भेजें ।
स्थानीय देखभाल -
घाव की स्थानीय देखभाल के रूप में घाव को पानी एवं साबुन से धोकर एवं एण्टीबायोटिक मरहम लगाकर विसंक्रमित गॉज रखकर पट्टी बाँध दें ।
• र्सप दंश चिकित्सा सारांश ~
चिकित्सा - दंश स्थान से 2 इंच ऊपर बंध बांधे ( टूर्नकिट ) काफी कसा हुआ ।
विलम्ब होने पर - अंग हाथ पैर जो भी हों उसको उठा दें ।
- मैगसल्फ कम्प्रेस ।
- हैपिरोनोइड मरहम लगायें ।
- कोई एण्टीवायोटिक दें ।
- फ्रीज ड्राइड एण्टी स्नेक वेनम को डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर बनायें । त्वचा में लगाकर जाँच करने के बाद 20 मि . ली . आई . वी . धीरे - धीरे 15 मिनट में दें ।
- यह दो घण्टे बाद पुनः दे सकते हैं ।
सामान्य चिकित्सा - इस प्रकार से टिटेनस टॉक्साइड 1 एम . एल . माँसपेशी में । - एण्टीहिस्टैमिनिक एवं दर्द निवारक औषधि दे सकते हैं । गम्भीर शॉक या एलर्जिक रिएक्शन होने पर कोर्टि कोस्टेराइड एक्यूट रीनल फेल्योर में मैनीटोल डाइयूरेसिस करें । श्वास - प्रश्वास के फेल होने पर ऑक्सीजन ।

