आर एच तत्त्व ( Rh Factor ) क्या है ?
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| What is the Rh Factor? |
आर एच तत्त्व ' शब्द का अर्थ होता है रेसस तत्त्व ( Rhesus Factor ) 1940 में रक्त के ग्रुपों के सम्बंध में रेसस बंदरों पर अनुसंधान करते समय लेण्डस्टीनर ( Landsteiner ) ने रेसस प्रणाली की खोज की थी ।
रेसस बंदर के रक्त में जो प्रतिक्रिया होती है , वही मानवीय रक्त में आर एच ( रेसस शब्द से ली गई अभिव्यक्ति ) तत्त्व के होने से होती है ।
वास्तव में यह लाल रक्त कोशिकाओं में कुछ पदार्थों की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति बताता है । रेसस तत्त्व लगभग आधा दर्जन होते हैं लेकिन ' डी ' फैक्टर इस सम्बंध में विशेषकर महत्त्वपूर्ण है ।
अधिकांश लोगों में यह तत्त्व मौजूद रहता है तथा उसे रेसस धनात्मक अथवा आर एच + कहते हैं । लेकिन मानवीय जनसंख्या का 15 प्रतिशत हिस्सा आनुवंशिक रूप से रेसस फैक्टर की कमी वाला रक्त प्राप्त करता है । इन लोगों के रक्त में आर एच फैक्टर को प्रभावहीन अर्थात आर एच - बताया जाता है ।
आर एच विरोधी प्रतिरक्षी प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता । लेकिन यदि गलती से आर एच + का रक्त आर एच - वाले व्यक्ति के रक्त में संचारित हो जाय तो बाहरी ' डी ' फैक्टर के खिलाफ प्रतिरक्षी के उत्पादन को यह प्रेरित कर सकता है और यह प्रतिरक्षी अंततः मिली हुई कोशिकाओं को नष्ट कर सकता है । पहले रक्त संचरण से यह प्रतिक्रिया बहुत धीमी होती है लेकिन दूसरे और आगे के संचरणों में ये प्रतिक्रियायें भयानक हो जाती हैं ।
आर एच तत्त्व की गर्भाधान काल में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । यदि मां का तत्त्व आर एच - है और पिता का तत्त्व आर एच + है तो कुछ बच्चे अपने पिता का आर एच तत्त्व आनुवंशिक रूप से ग्रहण कर लेते हैं ।
जब आर एच - वाली मां आर एच + वाली संतान का गर्भधारण करती है और जन्म होते समय संतान और मां के रक्त की आपूर्ति आपस में मिल जाती है तथा इसके परिणामस्वरूप संतान का कुछ रक्त मां के रक्त से मिश्रित हो जाता है तो माँ का रक्त रेसस तत्त्व के खिलाफ प्रतिरक्षियों की रचना कर सकता है -
हालांकि ये प्रतिरक्षी कुछ माह बाद विलुप्त हो जाते हैं फिर भी मां उसके प्रति प्रतिसंवेदित हो जाती है । इसके बाद के गर्भाधानों के दौरान उस माँ के शरीर में आर एच विरोधी प्रतिरक्षी उत्पन्न होने की आशंका रहती है जो संतान की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करते हैं ।
परिणामस्वरूप बच्चा पैदा होने से पहले अथवा पैदा होते समय हृदय गति रूकने से मर सकता है अथवा क्षतिग्रस्त मस्तिष्क या पीलिया से पीड़ित हो सकता है ।
इस समस्या का समाधान बच्चे को बार - बार खून देकर किया जा सकता है । इसमें शिशु का एक बार में कुछ मिलीलीटर रक्त निकाल कर उसे आर एच नेगेटिव रक्त से स्थानांतरित कर दिया जाता है । इस प्रकार से 95 प्रतिशत प्रभावित शिशुओं को बचाया जा सकता है ।
आर एच की असंगतता से बच्चे को जो बीमारी होती है उसे होमोलाइटिक , बीमारी कहते हैं । इस बीमारी के प्रकोप से कुछ सीमा तक छुटकारा पाने के आर एच रोधक ग्लोबुलिन के टीके का विकास कर लिया गया है ।
अगर आर एच + शिशु के जन्म के 24 घंटे के अंदर - अंदर मां के शरीर में यह टीका लगा दिया जाय तो उसके शरीर में आयी अवांछित आर एच + कोशिकायें समाप्त हो जायेंगी । यह टीका मां को प्रतिसंवेदी होने से रोक देता है ।
आजकल यह टीका आर एच - माताओं को निरोधात्मक रूप में दिया जाता है और उसे हर गर्भाधान के समय देना पड़ता है । इन्हीं सावधानियों के कारण हीमोलाइटिक रोग से मरने वाले बच्चों की संख्या में काफी कमी आ रही है ।
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