दुष्क्रियाजन्य गर्भाशय रक्तस्राव[ Dysfunctional Uterine Bleeding] के कारण, लक्षण एवं इसकी चिकित्सा विधि क्या है? Dysfunctional Uterine Bleeding Causes, symptoms and its treatment method?

दुष्क्रियाजन्य गर्भाशय रक्तस्राव[ Dysfunctional Uterine Bleeding] 

Effect of  - दुष्क्रियाजन्य गर्भाशय रक्तस्राव[ Dysfunctional Uterine Bleeding]


परिचय - अत्यार्तव की वह स्थिति जिसमें रोग का कोई सार्वदैहिक( कॉमन ) अथवा स्थानिक कारण नहीं मिलता , दृष्क्रियाजन्य गर्भाशय रक्तस्राव ( D.U.B. ) की स्थिति कहलाती है । इसमें रक्त स्राव का स्वरूप कई प्रकार का मिलता है जैसे वह अत्यार्तव , रक्तप्रदर , बहुअर्तव ( Polymenorrhoea ) प्रकार का हो सकता है । कभी - कभी ऐसा भी होता है कि पहले अनार्तव की स्थिति रहती है और फिर एकाएक अत्यार्तव की निरन्तर रहने वाली स्थिति ।

रोग के कारण - डिम्ब ग्रन्थि दुष्क्रियता ( Ovarian dysfunetion ) नामक अवस्था कारण । ( हार्मोन का असंतुलन ) 
- यह गर्भाशय की क्रिया में हुए विकार से उत्पन्न रक्तस्राव रोग है ।
रोग के लक्षण - शरीर के किसी भी भाग में वाह्य विकृति कोई नहीं । 

- मासिक स्राव ठीक 4 सप्ताह बाद । पर आर्तव की मात्रा बहुत अधिक । 

- ऐसा रक्तस्राव यौवनारम्भ एवं रजोनिवृत्ति के समय अधिक । 

- अत्यार्तव की भाँति स्राव की मात्रा बहुत , पर किसी भी प्रकार की कोई क्कृिति नहीं । जबकि अत्यार्तव में शरीर में कहीं न कहीं कोई विकृति अवश्य मिलती है । 

- मानसिक एवं भावात्मक अस्तव्यस्तता का होना ।

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- हमारे देश में इस रोग के रोगियों की संख्या पाश्चात्य( western ) देशों की अपेक्षा अधिक ।

- कुछ विद्वानों का मत है कि गर्भाशय से होने वाले रक्तस्राव के जितने रोगी भारतीय अस्पतालों में होते हैं उनमें 20 से 25 % महिलाएं इसी रोग से पीड़ित होती हैं । 

- 75 % रोगी ऐसे होते हैं जिनकी आयु , रजोनिवृत्त काल की आयु के समान होती है । 
नोट - ऐसे गर्भाशय से जिस न कोई शोथ( सूजन ) हो और न ही ट्यूमर आदि हो , रक्त का स्राव होना । 

- औषधि चिकित्सा

चिकित्सा दो रूप में - ( दोनों हीआवश्यक )

1. सार्वदेहिक चिकित्सा ,
2. हार्मोन चिकित्सा ,

1. सार्वदैहिक चिकित्सा  - विश्राम , आश्वासन एवं शामक औषधि व्यवस्था । 

- अरक्तता के लिये - हीमोग्लोबिन , लौह , विटामिन बी -12 और फोलिक एसिड के योग( कॉम्बिनेशन ) । 

- जिन्हें मुख द्वारा आयरन असहयनीय हो उन्हें - इन्जे . यूनीफेरोन एफ -12 ( Inj . Uniferon F - 12 ) 2 मि . ली . प्रतिदिन या 1 दिन छोड़कर माँस में । इंजेक्शन कूल्हे की माँसपेशी में गहराई तक । 

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" 5 इन्जे . लगाने के बाद रक्त का परीक्षण करायें । यदि आवश्यकता हो तो 4-5 इन्जेक्शन और लगाये जा सकते हैं । "
2. हार्मोन चिकित्सा - इस प्रकार से - 

- टैब . नोरलैसटूिन ( Tab . Norlestain ) पी . डी . 2-2 टेबलेट प्रतिदिन 5 दिन तक अथवा रक्त रुकने तक । तत्पश्चात् M.C. के 5 वें दिन से नित्य 1 टे . 20 दिन तक । 

अथवा -

टैब . आव्यूलैन ( Tab . Ovulen ) सलें कं 1 टे . दिन में 2 बार 10 दिन तक । तत्पश्चात् M.C. के 5 वें दिन से 21 वें दिन तक प्रतिदिन 1 टेबलेट । पुनः इसी प्रकार से 4/5 मासिक चक्रों तक ।
" आर्गेलूटिन ( Orgalutin ) भी एक ऐसी ही पेटेन्ट औषधि है जो टिकिया के रूप में प्राप्त है । मात्रा एवं प्रयोग विधि उपरोक्त अनुसार ही । "

कुछ चिकित्सक इस रोग की चिकित्सा इस प्रकार से करते हैं  ( Rx ) -

- लड़कियों को मनोविकार एवं यौन शिक्षण । 

- आयरन इन्जेक्शन । मुख द्वारा बी -12 एवं फौलिक एसिड । 

- एथिनिल ईस्ट्रेडियॉल 0.05 मि . ग्रा . ( 1 टे . ) प्रति 2-3 घण्टे के अंतर से रक्त बंद होने तक । इसके बाद साइक्लिक हार्मोन थेरापी । 

याद रहे - इस रोग की ऐसी स्त्रियाँ जो बच्चे पैदा करने लायक हैं उनमें डी एण्ड सी ( D & C ) ओपरेशन की सलाह दी जाती है । निदान के लिये भी और चिकित्सा के लिये भी । 
नोट - कुछ लोग इसकी चिकित्सा में हीमोस्टेस्टिक औषधियाँ विटामिन ' सी ' एवं विटामिन के तथा कैल्शियम के योग( कॉम्बिनेशन ) देते हैं । साथ ही हार्मोन योग कई माह तक । इनमें टैब . ओरगामेटूिल ( orgametril- ' इन्फार ' 2 टे . प्रतिदिन 10 दिन तक । अथवा फेटूगार्ड ( Fetugard - B.S . ) की 3 टेबलेट प्रतिदिन 10 दिन तक दें ।

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