कण्ठमूल ग्रन्थि शोथ टोसिलाइटिस [ Tonsillitis ] ~ नाम, रोग परिचय, रोग के प्रधान कारण, रोग के प्रधान लक्षण एवं सबसे उपयुक्त लाभकारी चिकित्सा विधी? Mumps gingivitis Tonsillitis [Tonsillitis] ~ Name, disease introduction, major causes of disease, major symptoms of disease and most suitable beneficial medical method?

कण्ठमूल ग्रन्थि शोथ टोसिलाइटिस [ Tonsillitis ]

कण्ठमूल ग्रन्थि शोथ टोसिलाइटिस [ Tonsillitis ] ~ नाम, रोग परिचय, रोग के प्रधान कारण, रोग के प्रधान लक्षण एवं सबसे उपयुक्त लाभकारी चिकित्सा विधी?  Mumps gingivitis Tonsillitis [Tonsillitis] ~ Name, disease introduction, major causes of disease, major symptoms of disease and most suitable beneficial medical method?
कण्ठमूल ग्रन्थि शोथ टोसिलाइटिस [ Tonsillitis ]

नाम

तालुमूल प्रदाह , तुण्डिका शोथ , गलगुटिका शोथ , गले के कद्दू सूज जाना , टौंसिल बढ़ना । 

रोग परिचय

Inflammation of a tonsil , especially the palatine tonsil . 

- तालुमूल ( नालु ) की दोनों या एक ओर की बादाम की तरह की ग्रन्थियों , टौन्सिल , लाल गर्म और शोथयुक्त( सूजन ) फूली रहने को तालुमूल प्रदाह कहते( टांसिल की बीमारी ) हैं ।

नोट - यह प्रायः 10 वर्ष से 30 वर्ष की आयु में अधिक होता है ।

रोग के प्रधान कारण

- सर्दी लगना इसका प्रधान कारण है । 

- ऋतु परिवर्तन । 

- रक्त की अधिकता । 

- अधिक खट्टे पदार्थों का नियमित सेवन । 

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- आतंक एक बाय का बुखार । 

- अशुद्ध दुग्ध पान । 

- अस्वास्थ्यकर वातावरण ( भीड़ भाड़ ) एवं वायु के आवागमन में कमी , पाठशाला आदि ।

- वाह्य पदार्थ का टॉन्सिल में प्रवेश । 

- विस्फोटक ज्वर ( मिजिल्स , माता आदि ) के प्रारम्भ में । 

- टॉन्सिल निकालने के बाद टॉन्सिल का कुछ भाग अंदर रह जाने से । 

- टॉन्सिल की रचना में गड़बड़ी । 

- टॉन्सिल का अधिक बढ़ा होना । 

- नाक के पास के साइनस की पीप का नाक के पीछे से टपकना ।
 

रोग के प्रधान लक्षण  -  

- आहार निगलने में कष्ट । 

- 105 डि . फा . ज्वर । 

- नाड़ी की गति 100 से 120 तक प्रति मिनट । एवं भारी व कूदती हुई । 

- थकावट एवं भूख में कमी । 

- कब्ज एवं प्यास की अधिकता । 

- आवाज भारी एवं दुर्बलता । 

- गर्दन की लस ग्रन्थियों में सूजन एवं दबाने पर कष्ट । 

- जिह्वा सफेद एवं मलयुक्त । 

- कण्ठ में पीड़ा । पीड़ा कान की ओर जाती हुई एवं निगलने से बढ़ती है । 

- अस्पष्ट वाणी । 

- आहार निगलने से वह नाक से निकलने लगता है । 

- टॉन्सिल में अधिक वृद्धि । 

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- स्राव गाढ़ा एवं चिपचिपा । 

- एक या दोनों टॉन्सिल थोड़े बढ़े हुए एवं लाल । 

- थूक निगलने में भी कष्ट ।

रोग के प्रधान एवं तात्कालिक कारण

- हीमोलिटिक स्ट्रेप्टोकोकस इसका प्रधान कारण है । 

- स्ट्रेप्टोकोकस , नीमोकोकस , स्टैफिलोकोकस एवं अन्य वैसिलस इसके अन्य कारण हैं ।

रोग प्रायः वर्षा और पतझड़ ऋतु में होता है ।

रोग की पहिचान

- शीशे द्वारा देखने पर तालुमूल के बगल में सुपारी के समान सूजन दिखायी देती है।

- परीक्षा करने पर श्वास से बदबू आती है । जीभ गर्दीली मिलती है । 

- मुँह में लार एवं थूक भरा होता है । गले में दोनों ओर टांसिलर ग्लण्डस बढ़ी होती हैं और छूने पर दर्द करती है।


रोग का परिणाम  -  

- उचित चिकित्सा के अभाव में सूजन के स्थान पर घाव हो जाता है । 

- उपद्रव( ऐसे रोग जिसके कारण टांसिल हुआ हो ) न होने पर रोग प्रायः ठीक हो जाता है । 

- यदि कोई कम्पलीकेशन न हो तो यह रोग 5 दिन में अपनी हद पर पहुंचकर धीरे - धीरे आठवें दिन तक ठीक हो जाता है ।

नोटघाव फटकर पीप निकलने पर बीमारी पुरानी होकर जीभ की जड़ वाली गाँठ इतनी बढ़ जाती है कि रोगी को आहार निगलने में अतिशय( हद से ज्यादा ) कष्ट होता है और तालुमूल( मुख सिरा ) एक तरफ को टेढ़ी हो जाती है ।


चिकित्सा विधि  -  

- रोगी को पूर्ण आराम दें । 

- जुहाँ तक सम्भव हो कीटाणुओं की जाँच करके सही एण्टीबायोटिक दें । 

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- यदि ऐसा सम्भव न हो तो पेनिसिलीन की सुई लगावें । यदि कोई रोगी इसके लिये सेन्सिटिव हो तो कोई ब्राड स्पेक्ट्रम एण्टीबायोटिक देनी चाहिये । 

- दर्द के लिये दर्द निवारक औषधि दें । 

- गले में ग्लान्डस के दर्द के लिये बाहर से सेंक लगाकर गर्म रुई लपेट देनी चाहिये ।

सहायक एवं आनुषांगिक चिकित्सा  -  

- रोगी को हल्का और सुपाच्य भोजन देना चाहिये । 

- बहुत ठंडी और दूध की चीजों से बचना चाहिये । 

- आरम्भ की कैटाहरल( कष्ट युक्त ) दशा में नमक के गर्म पानी से गरारे और आइरन ग्लेसरीन पेण्ट टॉन्सिल्स पर लगायें । 

- रोगी को गर्म पानी में पुटास डालकर कुल्ले करायें।दिन में कई बार स्ट्रिप्सिल्स चुसवायें ।

- क्योंकि यह एक संक्रामक रोग है इसलिये रोगी को अलग खुले हवादार कमरे में रखना चाहिये । यदि रोग संक्रामक रूप में फैल रहा हो तो भीड़ - भाड़ की जगह में नहीं जाना चाहिये ।

औषधी चिकित्सा ( Medical Treatment ) -  

- शैया पर विश्राम । 

- जीवाणुनाशक घोल ( लिस्टरिन Listern , सेवलान ) से गरारा या कुल्ला करें अथवा पिचकारी( छोटी सिरिंज ) से कण्ठ धोयें । 

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- उपयुक्त मात्रा में एण्टीबायोटिक ( एम्पीसिलीन ) तथा केमोथेरापी औषधि दें । 

- पीड़ा के लिये एस्प्रिन ( Asprin ) अथवा सोडासैलीसिलास का धारीप योग पीने को । 


• एण्टीबायोटिक तथा ' कीमोथेरापी ' ( सल्फा ) औषधि लम्बे समय तक दें और धीरे - धीरे बंद करना चाहिये ।

नोट- . टॉन्सिल्स शोथयुक्त होने के कारण तीव्र ज्वर एवं संक्रमण के अन्य लक्षण होने पर पेनिसिलीन 4 लाख यूनिट की टिकिया दें अर्थात् पेन्टिड -400 ( साराभाई ) की टेबलेट चूसना बहुत लाभप्रद है ।


• टॉसिल्स शोथ व्यवस्थापत्र  -  

Wrapping up of Neck with Warm Cloth . 

दिन में 3 बार   -  पैरासिटामोल ( Paracetamol ) 500 मि . ग्रा . 1-1 टे . दिन में 3 बार जल से । 

दिन में -3 बार  -  सीलिन 500 मि . ग्रा . ( ग्लैक्सो ) 1 टेबलेट दिन में 3 बार । 

दिन के 10 बजे  एवं  दिन में 2 बार   -  एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा .  कै . / बालक 250 मि.ग्रा . का 1 कै .। 

सायं 4 बजे- दिन में 2-3 बार   -  बोरोग्लिसरीन ( Boroglycerine ) रुई की फुरेरी( stick ) से गले में लगावें । 

गले पर   -   केओलीन की पुल्टिस गर्म - गर्म गले पर बाँधे ।


अनुभव के मोती - एक झलक  -  


टे . ' डिस्प्रिन की 1 टे . दिन में 3 बार दें । यदि लाभ न मिले और गले में फोलीकुलर टॉन्सिलाइटिस के लक्षण दिखायी दे रहे हों तब - ' प्रोकेन पेनिसिलीन , 4 लाख का इन्जे . मांस में लगावें ' अथवा ' एम्पीसिलीन का 250 मि . ग्रा . वाला कै . दिन में 3 बार दें । अथवा इरीथ्रोमाइसिन 250 मि . ग्रा . का 1 कै . दिन में 4 बार 6 दिन तक दें । साथ ही टे डोक्सीसाइक्लीन 100 मि . ग्रा . दिन में 2 बार दें । तत्पश्चात् अगले दिन से 1 कै . नित्य 8 दिन तक दें । 


टॉन्सिल शोथ में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट कै . / टेब . ~


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1. टॉन्सिल शोथ में सेवन कराने योग्य एम्पिपेन ( Ampipen ) बाइथं 250 , 500 मि.ग्रा . कै .  -  1-2 कै . दिन में 2 बार प्रति 6 घंटे पर बच्चों को ड्राई सीरप को तरल करके । चम्मच की मात्रा में प्रति 6 घंटे पर दें । 

2. डूरासाइक्लिन ( Duracyclin ) यूनिकेम ' -  पहले दिन 2 कै . और इसके बाद 1 नित्य 5 दिन तक ।

3. लोनोट्रिम ( Lonotrim ) निकोलस  -   1 टेबलेट दिन में 2 बार बच्चों को 1/2 टे .।

4. पल्मोक्सील ( Pulmoxyl ) ' ब्राउन एण्ड बुर्क  -  500 मि . ग्रा . का 1 कै . दिन में 3 बार दें । 

5. टैरामाइसीन ( Terramycin ) ' फाइजर '  -   1 कै . प्रति 6 घंटे पर दें ।

6. रिथोब्रोम ( Rithobrom ) FDC , -  1-2 टेबलेट दिन में 4 बार दें ।

7. रोसलिन ( Roscillin ) रैनवैक्सी ( 250 , 500 मि . ग्राम कै . )  -  1 कै. दिन में 2 या 3 बार । 

- इसका बच्चों को ड्राप और सीरप आता है । 

8. स्पोरीडेक्स -250 ( स्टेनकेअर )  -  1 कै . प्रति 6 घंटे पर दें ।

9. सुप्रीमोक्स ( Suprimox ) गूफिक  -  1-2 कै . दिन में 3 बार दें । 

10. फ्लेमीपेन ( Flamipen ) मेज्डा   -  250 मि.ग्रा . का 1 1 कै . दिन में 2 या 3 बार ।

नोट - इसका ड्राई सीरप और ड्राप्स भी आता है । उत्तम औषधि है । 

11. टेट्राडोक्स ( Tetradox ) स्टेनकेअर '  -  पहले दिन 2 कै . , तत्पश्चात . 1 कै . नित्य ।

12. नूफेक्स ( Nufex ) ' सलें ( 250 , 500 मि . ग्रा . कै . )  -  1 कै . प्रति 6 घण्टे पर दें ।

13 . रोक्सीटेम ( Roxitem ) कोप्रान   -   1 कै . दिन में 2 बार भोजन से 15 मिनट पूर्व दें । 

14. सेपेक्सिन ( Sepexin ) लाइका   -   1 कै . दिन में 4 बार । इसका ड्राई सीरप भी आता है । 

15. नोवाक्लोक्स ( Novaclox ) ' सिपला  -  1 कै . दिन में 3 बार ।


• टॉन्सिल शोथ में लगाने योग्य सुप्रसिद्ध इन्जेक्शन ~


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1. ई . स्ट्रेप्टोपेनिसिलीन  -  1 ग्राम वाले वायल में 2 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर मांस में प्रतिदिन लगावें ।

2. टेरामाइसीन I.M. ( फाइजर )  -  1-2 मि . ली . मांस में नित्य लगावें ।

3. इण्टेरोमाइसेटिन ( Enteromycetin ) डेज कम्पनी   -  1-2 मि . ली . गहरे मांस में मोटी नीडल से | नित्य या एक दिन छोड़कर लगावें ।

4. एक्रोमाइसिन ( Acromycin )  -  250 मि . ग्रा . का इन्जेक्शन मांस में नित्य 5 दिन तक लगावें ।

5. क्रिस -4 ( Crys - 4 ) ' साराभाई   -  एक इन्जे . मांस में हर 12 घण्टे बाद मांस में लगावें । साथ में साराभाई कं . का ' मिस्टिक्लीन बी सीरप की 1-2 चम्मच दिन में 1-2 बार दें । 

6. एम्पीसिन ( Ampisyn ) ' सिपला   -  1-2 ग्राम मांस में प्रति 6 घण्टे पर । 

7. एरिस्टोसिलिन ( Aristocillin ) ' एरिस्टो बेक्सिन न्यूनेटाल ( Baxin Neonatal )  -  500-1000 मि . ग्रा . दिन में 4 बार ।

8. ' लाइका   -  1 वायल प्रति 8 घण्टे पर ।

9. क्लोमेण्टिन ( Clomentin ) ' इल्डर  -  1-2 वायल दिन में 3 बार ।

नोट- . टैरामाइसीन का 1-1 कैप्सूल दिन में 3 बार सेवन करायें । साथ में ग्लिसरीन + रैक्टीफाइड स्प्रिट दोनों को मिलाकर लगावें ।

- तीव्र रोग में   -  लीडरमाइसीन या एक्रोमाइसीन का 1-1 कै . , बूफेन 400 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट , पैरासिटामोल की 1 टे.। ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार दें । बालकों को 1 / 4-1 / 2 मात्रा । 

- पुराने रोग में पेनिसिलीन 4 लाख की सुई नित्य 10 दिन तक मांस में लगावें । 


सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेण्ट सीरप / पेय  ~


कण्ठमूल ग्रन्थि शोथ टोसिलाइटिस [ Tonsillitis ] ~ नाम, रोग परिचय, रोग के प्रधान कारण, रोग के प्रधान लक्षण एवं सबसे उपयुक्त लाभकारी चिकित्सा विधी?  Mumps gingivitis Tonsillitis [Tonsillitis] ~ Name, disease introduction, major causes of disease, major symptoms of disease and most suitable beneficial medical method?
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1. एम्पीपेन ( Ampipen ) वाइथ सीरप  -  1 चम्मच प्रति 6 घण्ले पर दें ।

2. डेटिगॉन लिंक्टस ( Detigon linctus ) वेपर कं   -  1-2 चम्मच दिन में 3-4 बार । 

- बच्चों को आधी मात्रा में दें ।

3. ' रोसिलन ड्राई सीरप ( रैनवेक्सी )  -  तरल बनाकर 1-2 चम्मच दिन में 2-3 बार । छोटे बालकों को 1/2 चम्मच दिन में 2-3 बार दें । 

4. ब्रोडीसिलिन ( Broadicillin ) एल्केम  -   1 / 2-1 चम्मच दिन में 2-3 बार । 

5. फ्लेमीपेन ड्राई सीरप ( मेण्डा )   -    1 / 2-1 चम्मच दिन में 2-3 बार । 

6. ई . माइसिन ड्राई सीरप ( थेमिस फार्मा ) ( E. Mycin dry Syrup )   -  1 / 2-1 चम्मच दिन में 2-3 बार ।

7. सिडोमेक्स 500 ( Ccidomex 500 ) ( सिल ) -ड्राईसीरप  -  20-40 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार पर नित्य 3 विभाजित मात्राओं में ।


टॉन्सिल शोथ में लगाने योग्यस्थानीय पेटेन्ट योग्य - पेन्ट्स ~


1. सल्फासिटोल लोशन ( बंगाल केमिकल ) -  बराबर जल मिलाकर फुरेरी से टॉनिसलों पर लगावें । 

2. डिक्वाडीन ( Dequadin ) पेण्ट   -  फुरेरी या ब्रुश से 3-3 घण्टे बाद गले में 

3. मैण्डल्ज पेण्ट ( Mandle's Paint )   -   गले में एक या दो बार लगावें । 

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