गलसुओं ( mumps ) की बीमारी क्यों होती है ?
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| mumps disease? |
गलसुओं का होना एक विषाणुजन्य रोग है । इसका चिकित्सकीय नाम इंफेक्शस पारोटिटिस ( infectious parotitis ) है । इस रोग में लार ग्रंथियों में संक्रमण से पीड़ा होती है और सूजन आ जाती है ।
यह रोग अक्सर महामारी के रूप में फैलता है और मुख्यतः युवकों पर असर डालता है । इसके मुख्य लक्षण चेहरे पर सूजन आना अथवा चेहरे की विकृति होते हैं । इस बीमारी में बोलने और चबाने में कठिनाई और पीड़ा होती है ।
गलसुओं की बीमारी का नाम ( मम्प्स ) दुखी व्यक्तियों द्वारा बोलने की कोशिश करते समय होने वाली बुदबुदाहट ( mumbling ) से लिया गया प्रतीत होता है ।
रोगी के बोलते , खांसते अथवा छींकते समय मुंह से निकलने वाली बूंदों में इस रोग के विषाणु होते हैं । सांस के साथ ये विषाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं । इसके बाद ये विषाणु अपनी वृद्धि तेजी से शुरू कर देते हैं ।
फिर वे लार की ग्रंथियों तक सीमित न रह कर पूरे शरीर में फैल जाते हैं । हो सकता है कि संक्रमण के 18 से 24 दिनों बाद तक भी बीमारी के लक्षण प्रकट न हों । यह उष्मायन ( incubation ) काल कहलाता है ।
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| Mumps Virus ( microscope image ) |
रोग का आक्रमण होते ही मरीज को तेज बुखार हो जाता है । उसे सिर के दर्द , गले की खारिश अथवा गर्दन की मांसपेशियों में दर्द की शिकायत भी हो सकती है । उसकी लार वाली ग्रंथियां नाजुक होकर सूज जाती हैं । चार दिन बाद तापमान गिरना शुरू होता है तथा सामान्य हो जाता है । एक सप्ताह अथवा दस दिन बाद ग्रंथियों की सुजन भी समाप्त हो जाती है । -
इस बीमारी में शरीर के अन्य अंग कभी - कभी ही प्रभावित होते हैं । पुरुषों में अंड ग्रंथि तथा महिलाओं में डींब ग्रंथि के प्रभावित होने की संभावना रहती है । सामान्यतः इन ग्रंथियों को कोई क्षति नहीं पहुंचती । हां कभी - कभी गलसुओं से मस्तिष्क की झिल्ली में जलन होने की सम्भावना रहती है ।
बच्चों में गलसुओं की बीमारी एक हल्की परंतु पीडादायक बीमारी है । गलसुओं के लिए किसी विशेष इलाज की जरूरत नहीं पड़ती । गामा ग्लोबुलिन ( gamma globulin ) का प्रयोग बीमारी को बिगड़ने से रोकता है । इस रोग के लिए बेक्सिन भी विकसित हो चुकी है जो इसके विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है ।
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