प्रतिवर्ती क्रिया ( Reflex Action ) क्यों होती है ?
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| Reflex Action!! BY - MartaAguayo |
प्रतिवर्ती क्रिया अपने आप होने वाली एक तंत्रिकीय क्रिया है जिसमें कोई उद्दीपक तीव्र अनुक्रिया पैदा करता है । उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति किसी गर्म स्टोव को छू ले तो वह बिना सोचे ही झटके से अपना हाथ अलग हटा लेता है । इस तरह गर्म स्टोव एक उद्दीपक है तथा हाथ का अलग हटाना अनुक्रिया है ।
पुतली की प्रतिवर्ती क्रिया ( pupil reflex ) एक आम क्रिया है । प्रकाश की चमकदार किरण जब किसी व्यक्ति की आंख से टकराती है तो उसकी आंख की पुतली अपने आप छोटी हो जाती है । और अगर वह प्रकाश हटा लिया जाय तथा आंखों पर छाया आ जाय तो पुतली अपने सामान्य आकार में स्वयं ही वापिस आ जाती है । यहां प्रकाश उद्दीपक है तथा पुतली की क्रिया एक अनुक्रिया है ।
प्रतिवर्ती क्रियायें दो प्रकार की होती हैं - अप्रतिबन्धित तथा प्रतिबन्धित । डाक्टरों द्वारा किये जाने वाले कुछ अप्रतिबन्धित प्रतिवर्ती परीक्षणों के उदाहरण इस प्रकार हैं । जब कोई डाक्टर किसी व्यक्ति की प्रतिवर्ती क्रियाओं का परीक्षण करता है तो वह यह जानने का प्रयास करता है कि उसके स्नायु तंत्र के विभिन्न अंग ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं ।
सामान्यतः घुटने के झटके की क्रिया का परीक्षण किया जाता है । इस परीक्षण में डाक्टर रबड़ के हथौड़े से घुटने के ठीक नीचे के हिस्से में हल्की चोट मारता है । इससे टांग का निचला हिस्सा ऊपर की ओर अचानक ही झटके से उठ जाता है । इस प्रकार की प्रतिवर्ती क्रियाओं को ' अप्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियायें ' कहते हैं । ये बिना किसी विशेष अनुभव अथवा ज्ञान के घटित होती हैं ।
प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियायें किसी विशेष आंतरिक अथवा बाहरी उद्दीपन के परिणामस्वरूप होती हैं । इन प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाओं को रूसी मनोवैज्ञानिक आई.पी. पावलोव तथा उनके सहयोगियों द्वारा प्रसिद्ध किया गया ।
पावलोव का विश्वास था कि जब भी किसी प्रकार के उद्दीपन के प्रति कोई अनुक्रिया होती है तो मस्तिष्क में एक किस्म का प्रतिवर्त अंकित हो जाता है । वैसे , आज अधिकांश मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सीखने की प्रक्रिया पावलोव की स्थापना की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल है।
अब प्रश्न उठता है कि प्रतिवर्ती क्रिया किस कारण से होती है ?
सरल शब्दों में समझने के लिये किसी प्रतिवर्ती क्रिया में सम्मिलित चार प्राथमिक क्रियाओं को समझना जरूरी है । ये चार क्रियायें हैं - ग्रहण करना , संचालन करना , प्रेषण करना तथा अनुक्रिया करना ।
सर्वप्रथम उद्दीपन को ( स्नायुओं के अंतिम सिरों ) द्वारा ग्रहण किया जाता है । उद्दीपन की ऊर्जा स्नायु आवेगों में परिवर्तित हो जाती है तथा रिसेप्टर से केंद्रीय स्नायुतंत्र तक जाती है । इसके बाद स्नायु आवेग मोटर ( motor ) स्नायुओं के पास पहुंचते हैं ।
मोटर स्नायु मांसपेशियों की क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप मांसपेशियों अथवा ग्रंथियों में क्रिया होती है । बहुत सी प्रतिवर्ती क्रियायें अधिक जटिल होती हैं तथा उनमें मस्तिष्क जैसे स्नायु तंत्र भी शामिल रहते हैं ।
90 प्रतिशत से अधिक मानवीय क्रियायें मनुष्य के स्नायु तंत्र और प्रतिवर्ती क्रियाओं द्वारा ही सम्पन्न होती हैं ।
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