टिटेनस / धनुस्तम्भ [ Tetanus ] रोग क्या है ? इसके पहिचान, लक्षण, कारण एवम चिकित्सा विधि के लिये अन्य महत्वपूर्ण जानकारी ? What is tetanus / tetanus disease? Other important information for its identification, symptoms, causes and medical procedure??

 टिटेनस / धनुस्तम्भ [ Tetanus ] 

Neurotransmitter vesicle before and after exposure to Tetanus Toxin by - Mkrop

नाम - 

धनुवती , लॉक जॉ ( Lock Jaw ) , धनुष्टंकार , हनुस्तम्भ , टंकार । 

परिचय - 

किसी जख्म से शरीर में प्रवेश करने वाले टिटेनस बेसीलस ' क्लॉस्ट्रीडियम टिटेनाई के तंत्रिका को उत्तेजित करने वाले जीव के विष द्वारा उत्पन्न एक तीव्र संक्रामक रोग जो अधिकतर प्राणघातक होता है । इसमें जबड़ों का आपस में भिंच जाना , सार्वदैहिक पेशीय ऐंठन , शरीर का पीछे की ओर मुड़ जाना , आक्षेप आना ( दौरे पड़ना ) , श्वसनीय ऐंठन या पक्षाघात( पायरलिसिस ) हो जाता है । 

• टेटेनस एक बहुप्रचलित ' संक्रामक रोग है , जिसमें शरीर की मांसपेशियों में मरोड़ और अकड़न आ जाती है । रोग के अधिक उग्र होने पर शरीर की  माँसपेशियाँ इतनी जकड़ जाती हैं कि शरीर धनुष की तरह टेढ़ा हो जाता है , इसलिये ही इसे ' धनुवीत ' कहते हैं । 

रोग के प्रमुख कारण - 

इसका प्रधान कारण क्लास्टूिडियम टिटैनी ( Clostridium tetani ) नामक जीवाणु है ।

- यह जीवाणु मनुष्यों में , घरेलू पशुओं की आँतों में और खेती की जमीन तथा अस्तबल आदि में घोड़े की लीद पाया जाता है । घाव होने पर यह जीवाणु बीमारी पैदा करते हैं जैसे - पूतिकर्ण , कृमिदन्त , त्वचा का छिल जाना , गर्भपात या स्राव , प्रसव , नवजात शिशु की नाभि को काटने पर हुआ पिन्नव्रण , जूते की कील से पैर का छिलना , काँटा चुभना आदि ।


रोग के प्रमुख लक्षण - 

रोग का संचय काल 2 से 14 दिन का । 

- सर्वप्रथम मुख की पेशियों में जकड़न । 

- मुख पूर्णतया नहीं खुल पाता है ।

- बोलना और निगलना कठिन । 

- गले के पिछले भाग , उदर( पेट ) , पीठ की पेशियों मे अकड़न । 

- दोनों जबड़े बंद एवं दाँत भी आपस में मिलकर बैठ जाते हैं । 

- इन लक्षणों से युक्त रोगी पृष्ठ की ओर धनुष के समान मुड़ जाता है । 

- पीठ कठोर हो जाती है । 

- माँसपेशियों के थोडे से भी हलचल से रोगी को हिलाने , छूने , बुलाने मात्र से नितान्त कष्टप्रद  पीड़ा होने लगती है । 

- श्वसन तन्त्र की पेशियों की ऐंठन से श्वासावरोध होकर रोगी की मृत्यु । 

- प्रायः मूत्रावरोध की स्थिति । 

- शरीर का तापक्रम सामान्य अथवा कुछ बुखार ।


अन्य लक्षण- 

मृत्यु के कुछ समय पूर्व तक तापक्रम होना सम्भव । 

- रोग का आक्रमण तेज होने पर पीड़ा दायक स्थिति कुछ सेकेंड से 3-4 मिनट तक रहता है । 

- जिससे रोगी को अधिक थकान हो जाती है । छाले जैसा दाना होने के उपरान्त रोग के लक्षण जितनी जल्दी आरम्भ होते हैं , रोगी के ठीक होने की सम्भावना उतनी ही कम होती है । 


रोग की पहिचान - 

बारीकी से लिये गये रोग - मुयायना से रोग निर्णय में आसानी होती है । 

- घाव लगने , सुई लगने , ऑपरेशन , दुर्घटना आदि के कुछ समय बाद चबाने मैं कठिनाई , जबड़े का न खुलना , निगलने में कठिनाई तथा बाद में आक्षेपों( दौरे जैसी स्थिति ) का होना - रोग निर्णायक प्रधान लक्षण हैं ।


रोग का परिणाम - 

अधिकांश मृत्यु । 

- बच्चों एवं बूढ़ों में मृत्यु का प्रतिशत अधिक । 

- जवानों में रोग प्रारम्भ होते ही चिकित्सा आरम्भ हो जाने पर जीने की आशा पर्याप्त । सिर के निकट घाव होने पर मृत्यु अधिक । 

- दुर्बल रोगी एवं पौष्टिक आधार न मिलने पर प्रायः मृत्यु ।

नोट-  तीव्र रोग असाध्यता( जिसे आसानी से साधा न जा सके ) का लक्षण है । 

- जी हृदय और श्वास संस्थान की पेशियों का कार्य - प्रणाली होने लगता है तो यह मृत्यु का कारण बनता है । प्रबल रोग में रोगी 2-3 दिन में मर जाता है और कोई 5-7 दिन तक चलता है । 

धनुवती की सामान्य चिकित्सा -

- रोगी की सर्वोत्तम चिकित्सा अस्पताल में ।

- यदि घाव पका हुआ हो तो उसकी सफाई एवं एण्टीसेप्टिक ड्रेसिंग । 

- टिटेनस एण्टिटॉक्सिन ( A.T.S. ) 5 हजार यूनिट का स्थानीय इन्जेक्शन दें । साथ ही 1 लाख यूनिट ( 100000 U ) आई . वी . दें । फिर प्रति सप्ताह 2500 से 5000 यूनिट मांसपेशीगत दें । 

- अकड़न के लिये – ' क्लोरप्रोमेजीन ( Chlorpromazine ) , स्पैरीन , पैरल्डिहाइड आदि का उपयोग । 

- अन्य संक्रमणों से रक्षा हेतु पेनिसिलीन एल.ए. ( Penidure - L.A . ) का प्रयोग । 

- रॉयल की नलिका द्वारा तरल भोजन प्रति दिन दें । 

नोट-  बेंजिल पेनिसिलीन 12 लाख यूनिट शिरामार्ग से देते हैं । 

- व्रण( छाले ) को साफकर एण्टीसेप्टिक ड्रेसिंग । 

- रिफलेक्स स्पाज्म को नियंत्रित करने के लिये तीव्र आक्रमण में - क्लोरप्रोमेजीन 100 मि . ग्रा . प्रति 6 घंटे बाद , डायजीपाम 20 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे बाद और पैरल्डिहाइड 10 मि . ली . प्रति 6 घण्टे बाद ( प्रत्येक को बारी - बारी से प्रति 2 घण्टे बाद ) दें । 

- रोगी को शान्त और अँधेरे कमरे में रखें । एवं उत्तम देखभाल । 

- तीव्रावस्था में कार्टि - कोस्टेरायड्स आवश्यकतानुसार । 

- रायल्स ट्यूब द्वारा प्रोटीनयुक्त आहार । 

- शरीर में तरल की कमी होने पर डेक्स्ट्रोज सैलाइन आई . वी .। 

- ट्रेकियोस्टोमी ( Tracheostomy ) । 

- रोग न होने देने के लिये घाव बनते ही टिटेनस एण्टिटॉक्सिन का टीका ।


टिटेनस विशिष्ट चिकित्सा - एक दृष्टि में -

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- संक्रमित घाव की सफाई ( Drainage of infected wound ) । 

- शान्तिपूर्ण कमरे में । प्रीवेन्ट रेसपाइरेशन । कण्ट्रेक्चर्स ( Contractures ) । 

- एन्टी - सीरम ( Humen titanus immune globulin ) ।

- 3000-6000 यूनिट माँसपेशीगत । यदि घोड़े का सीरम उपलब्ध हो तो 10,000 यूनिट हाइपर सेन्सीटिविटी टेस्ट के बाद दें । 

- प्रारम्भिक टीकाकरण ( Primary immunization ) । 

- मीसल्स रिलेक्सेशन - डायजीपाम 40-120 मि . ग्रा . दिन में 4 बार । 

- लैरेन्जियो स्पाज्म की स्थिति में - ट्रेकियोस्टोमी । 

- यदि घाव की चिकित्सा आवश्यक हो तो पेनिसिलीन जी । 


रोग निरोधक ( Prophylaxis ) - 

चोट लगने के तुरन्त बाद 1500 यूनिट ए . टी . एस . मांसपेशीगत दें । 

- सक्रिय क्षमतार ( Active immunity ) के लिये - ' टिटेनस टाक्साइड 1 मि . ली . की मात्रा 4-6 सप्ताह के अन्तर से माँसपेशीगत 3 बार दें । रोग की चिकित्सा के समय भी इसे दें । 

अथवा - 

बच्चों में रोग निरोध के लिये - डी . पी . टी ( D.P.T. ) 2 , 4 , 6 , 10 माह पर । वयस्क 3 मात्रा ( 4-8 सप्ताह पर । तत्पश्चात् 6 माह से 1 साल पर । बूस्टर डोज प्रति 10 साल पर ।

- घाव के Prophylaxis के लिये - टोक्साइड ( Toxoid ) और एण्टीटोक्सिन ( Antitoxin ) को अलग - अलग सिरिन्ज से अलग - अलग साइट पर दें । 


धनुवती में उपयोगी सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेण्ट टेबलेट्स -

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1. बिटनेलान ( Betnelan ) ग्लैक्सों - 1-2 टेबलेट दिन में 3-4 बार दें ।

2. पेसीटेन ( Pacitane ) ' लीडले - 1-4 मि . ग्रा . नित्य ।

3. ल्यूमिनाल ( Luminal ) बेयर ' - 1-1 टेबलेट प्रति 44 घण्टे पर दें ।

  

धनुवति में लगाने योग्य सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट इन्जे . -

1. मैग सल्फ ( Mag . Sulph ) 25 % की 2 मि . ली . -  ऐंठन 2 मि . ली . माँस में दिन में 1 या 2 बार दें ।

2. ल्यूमीनाल सोडियम ( बेयर ) -    दर्द की स्थिति में - 1-2 मि . ली . माँस में प्रति 4 या 6 घंटे पर ।

3. फ्लेक्साडिल ( Flexadil ) रोन - पुलेंक - 20 मि . ली . की सुई नस में लगावें ।

4. प्रोकेन पेनिसिलीन - 4 लाख यूनिट रोजाना माँस में लगावें ।

5. पैरल्डिहाइड ( I.N.D.C. ) - 5 मि . ली . की सुई माँस में ।

6. टिटेनस एण्टीटॉक्सिन ( बंगाल इम्युनिटी ) - 20-40 हजार यूनिट माँस या नस में प्रति 4 घण्टे पर 4 इन्जेक्शन तक दें । 

7. ट्यूबारिन ( वरोज वेल्कम ) - पहले दिन 7.5 मि . ग्रा . माँस में प्रति घंटे पर । दूसरे दिन 5 मि . ग्रा . माँस में दिन में 2 बार दें ।

8. कैम्पिसिलीन ( कैडिला ) - 500 मि . ग्रा . का 1 इन्जे . गहरे माँस में लगावें ।

9. कोरामीन ( Coramine ) सीवा कं. - दिल की कमजोरी में 1 एम्पुल की सुई माँस में लगावें ।

10. यूनीपाम्बा ( Unipamba ) यूनीकेम - 2-5 मि . ली . की सुई नस में धीरे - धीरे लगावें । 

11. एमीकार ( Amicar ) ' सायनोमिड - बढ़े हुये रोग में 20 मि . ली . की सुई नस में धीरे - धीरे लगावें ।

टिटनेस एन्टीटॉक्नि सीरप 40 हजार यूनिट का 1 एम्पुल , एड्रीनलीन हाइड्रोक्लोराइड सोल्यूशन 0.3 मिः ली . ( 1 : 1000 ) और ग्लूकोज सोल्यूशन जपङझ 200 मि . ली . लेकर इन तीनों को मिलाकर नस में लगावें । इसके बाद हर घंटे बाद मांस में 20 हजार यूनिट की सुई पेशियों की ऐंठन दूर होने तक लगावें ।


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