कर्णमूलिक ज्वर / गलसुआ / मम्प्स [ Mumps ]
| कर्णमूलिक ज्वर / गलसुआ / मम्प्स [ Mumps ] ,by - Afrodriguezg |
पर्याय नाम -
पाषाण गर्दभ , गलसुआ , कनफेड , मम्प्स , पेरोटाइटिस , कनफडे , इपीडेमिक पेरोटाइटिस । इसे ' कर्णपूर्वग्रन्थिशोथ ' भी कहते हैं ।
परिचय -
यह एक वायरस से होने वाली बीमारी है , जिसमें कान के पीछे व आस - पास सूजन आ जाती है । पाषाण( पत्थर ) की तरह कठोर होने से इसे पाषाण गर्दभ कहा गया है । यह भयंकर संक्रामक होता है । बालकों और युवकों को विशेषकर होता है ।
रोग के प्रमुख कारण -
इसका कारण एक विषाणु ( Virus ) होता ये जीवाणु सूक्ष्मदर्शक से नहीं दिखायी देते हैं । इसका वायरस फिलटरेबुल होता है जो ड्रापलेट इन्फेक्शन द्वारा रोग फैलाता है ।
- यह रोग 5-15 वर्ष की अवधि में अधिक पाया जाता है ।
- यह छुआछूत से फैलने वाली बीमारी है ।
- यह रोग विशेषकर माघ , फाल्गुन , चैत्र , बैशाख में फैलता है ।
रोग के प्रमुख लक्षण -
लक्षण दिखने में 16-21 दिन तक का समय है ।
- प्रारम्भ में बाईं तरफ कर्ण शोथ , पीड़ा , ज्वर 102 ° F तुक , कभी - कभी 104 ° F तक पहुँच जाता है । यह बुखार 2-3 दिन बाद कम हो जाता है ।
- 3-4 दिन बाद दूसरे कान के नीचे भी शोथ( सूजन ) हो जाता है ।
- शिरःशूल( सिरदर्द ) , कर्णशूल( कानदर्द ) , स्वरभेद( बोलने में कठिनाई ) , मुख खोलने में पीड़ा आदि लक्षण ।
- पुरुषों में 15 % से 30 % अण्डशोथ भी देखा गया है ।
- लगभग 3 दिन तक सूजन बढ़ती चली जाती है और चौथे दिन एक जैसी रहकर पाँचवें दिन कम होना शुरू हो जाती है ।
- सूजन को दबाने पर दर्द एवं खाने में तकलीफ ।
नोट- इस रोग में रोगी का मुँह सूखा रहता है , जीभ रोयेंदार हो जाती है और साँस में दुर्गन्ध आती है ।
- शोथ( सूजन ) के कारण मुँह को हिलाना , डुलाना , खाना - पीना कठिन हो जाता है । ये शोथयुक्त ग्रन्थियाँ कभी - कभी पक भी जाती हैं ।
रोग की पहिचान -
लक्षणों के आधार पर निदान में कोई कठिनाई नहीं ।
- ब्लड कल्चर , लिम्फोसिटोसिस , ' सीरोलोजी टेस्ट रोग निदान में विशेष सहायक ।
रोग का परिणाम -
वृषण शोथ , स्त्रियों में डिम्बग्रन्थि शोथ , स्टेरीलिटी , वीर्य में शुक्र कीटों का अभाव या कमी , मस्तिष्क शोथ , आमाशय शोथ , मध्यकर्ण शोथ , स्वरयंत्र शोथ एवं सन्धि शोथ आदि जैसे अन्य रोगों की आशंका ।
कभी - कभी किडनी और हृदय की माँसपेशियों में सूजन तथा बहरापन भी लक्षण रूप में मिल सकता है ।
चिकित्सा सिद्धान्त -
विश्राम कराना ताकि अण्डकोषों पर शोथ न होने पावें ।
- ज्वर का निराकरण आवश्यक ।
- कोष्ठबद्धता( कॉन्स्टिपेशन ) दूर करें । वेदना( दर्द ) अधिक होने पर एस्प्रिन ।
पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
कम एवं तरल आहार ।
- दूध में मुनक्का डालकर औटाया दूध पिलावें ।
- फलों का रस , दलिया आदि की व्यवस्था ।
- पोटली को तवे पर गर्म करके सेकें ।
- मुख को शुद्ध रक्खें । पुटाश परमैग्नेट से कुल्ले करावें ।
यदि दोनों ओर की कर्ण की ग्रन्थियाँ अधिक सूजी हुई होने से मुख न खुलता हो तो एक नलकी द्वारा जल मुख में पहुँचाकर उसकी शुद्धि करनी चाहिये । इसी से भोजन के तरल द्रव्य भी दिये जा सकते हैं ।
• कर्णमूल शोथ की औषधि चिकित्सा -
- लक्षणों के अनुसार कोई भी दवा दें । अगर लाभ न दिखायी दे तो समय नष्ट न करें तुरन्त अपने चिकित्सक से मिलें ।
- शोथ( सूजन ) के ऊपर केओलीन पुल्टिस ' अथवा ' बेलाडोना प्लास्टर लगावें ।
- पूर्ण विश्राम लेने पर उपद्रवों( अन्य रोगों ) की सम्भावना नहीं रहती है , परन्तु हो जाने पर उनकी चिकित्सा करें ।
- आर्काइटिस ( Orchitis ) की स्थिति में ' प्रेडनीसोलोन ' 60 मि . ग्रा . दिन में 4 बार मात्रा घटाते हुए 7-10 दिन तुक दें ।
- दर्द निवारक औषधियाँ ( Analgesic ) दें ।
- नमक को गरम पानी में घोलकर गरारे करावें ।
- अण्डकोषों की शोथ में दर्द निवारक औषधियाँ तथा ठण्डे जल या बर्फ से दबायें तथा लंगोट बाँधने का रोगी को परामर्श दें ।
- रोगी को खट्टी वस्तुएँखाने को न दें ।
• रोगनाशक उपयुक्त चिकित्सा व्यवस्थापत्र : -
Rx
प्रति 6 घण्टे पर - टेट्रासाइक्लीन हाइड्रोक्लोराइड 250 मि . ग्रा . 1-1 कै . जल के साथ दें ।
दिन में 2 या 3 बार - ब्रूफेन 200 या 400 मि . ग्रा . की 1-1 टे . दिन में 2 या 3 बार जल से । अथवा ए . पी . सी . दें ।
दिन में कई बार - प्रभावित स्थान पर गरम सेंक । एक्थियोल ग्लिसरीन का लेप लाभकारी ।
मितली एवं वमन( उल्टी ) की स्थिति में - ग्लूकोज सैलाइन आई . वी . 2-3 दिन तक।
नोट- ' आर्काइटिस की स्थिति में प्रोकेन पेनिसलीन 4 लाख यूनिट की सुई माँस में ।
• मम्प्स चिकित्सा लक्षणों के आधार पर -
1. साधारण प्रकार के रोग में - ' ओरियोमाइसीन 250 मि . ग्रा . का 1-1 कै . प्रति 6 घण्टे पर दें । अथवा एक्रोमाइसीन के 1-2 कैप्सूल प्रति 6 घण्टे पर दें ।
2. दर्द के कारण तीव्र बेचैनी - इस्जीपायरीन 1-2 टेबलेट दिन में 2-3 बार दें । अथवा ब्रूफेन 200 या 400 की 1/2 - 1 टे . दिन में 2 या 3 बार दें ।
3. शोथ की स्थिति में - बेलाडोना प्लास्टर लगावें । ऊपर से गर्म पोटली से सेंक करें । साथ ही ‘ इबूबूफेन की 1-1 टे . दिन में 2 या 3 बार दें ।
अनुभव के मोती - एक झलक -
- स्ट्रेप्टो - पेनिसिलीन की सुई नित्य लगावें । साथ में - बैक्ट्रिम 1/2 से 1 टे . , सीलिन 100 मि . ग्रा . की 1 टे . ए . पी . सी . अथवा ब्रूफेन 200-400 मि . ग्रा . की 1 टे .। ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार जल से दें ।
- टेरामाइसीन अथवा एक्रोमाइसीन ( Achromycin ) 1 कै . , ' सीलिन 500 मि . ग्रा . की टे . , कोरामिन की 1 टे .। ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें ।
रोग से बचाव -
बच्चों को 1 साल से डेढ़ साल की उम्र में एम . एम . आर . का टीका लगवा देना चाहिये । इससे बच्चा खसरा , मम्प्स तथा जर्मन मीजल्स से बचा रह सकता है । इसके लिये सर्वोत्तम ' लिव एटीनूएटिड वैक्सीन ' ( Live attenuated vaccine ) 0.5 मि . ली . मांसपेशीगत रहती है ।
सावधान - हाइपर सेन्सीटीविटी रिएक्शन , बुखार वाली बीमारी , मैलिगनेन्सी तथा गर्भावस्था में इसका प्रयोग न करें ।


