रोहिणी / डिफ्थीरिया [ Diphtheria ]
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| रोहिणी / डिफ्थीरिया [ Diphtheria ],by - User:Dileepunnikri |
पर्याय नाम -
कण्ठरोहिणी , गलरोहिणी , रोहिणी , खुनाक ।
परिचय -
कॉर्न बैक्टीरियम डिफ्थीरी नामक जीवाणु द्वारा बच्चों में होने वाला एक तीव्र संक्रामक रोग जो गले , स्वरयंत्र , अथवा नाक की श्लैष्मिक कलाओं( अंदर परत ) को प्रभावित करता है और इन स्थानों पर एक भूरी सफेद झिल्ली बन जाती है , ज्वर हो जाता है , दर्द होता है , निगलने में रुकावट पैदा हो जाती है ( बच्चा दूध , पानी आदि कुछ भी नहीं निगल पाता ) , आवाज बन्द हो जाती है तथा साँस लेने में बहुत कठिनाई होती है ।
रोग के प्रधान कारण -
रोग को उत्पन्न करने वाला एक जीवाणु है जो ' कोर्नी बैक्टीरियम डिफ्थीरिया कहलाता है । इससे अधिकतर ऊर्ध्व श्वसन तंत्र संक्रमित होता है ।
- यह टौन्सीलाइटिस ( तालुमूल प्रदाह ) , दाँतों में कीड़ा लगना , मसूड़ा फूलना , गले में प्रदाह होना , एवं गंदै स्थानों में रहना आदि कारणों से भी हो सकता है ।
- एक बार होने के बाद दुबारा नहीं होता है ।
रोग के प्रधान लक्षण -
यह रोग 2 से 5 वर्ष की आयु के बीच सर्वाधिक होता है । इसका इन्फेक्शन ट्रायलेट ढंग से होता है ।
- प्रारम्भ अकस्मात एवं मुँह से अधिक थूक निकलता है ।
- प्रारम्भिक अवस्था में चमकदार पतली झिल्ली गले में होती है जो बाद में मोटी एवं अपारदर्शक हो जाती है ।
- यह झिल्ली गले में चिपकी रहती है तथा जबरदस्ती हटाने पर खून निकलता है ।
- झिल्ली के किनारे स्पष्ट रेखांकित होते हैं तथा उन पर शोथ ( इन्फैक्शन ) दिखायी देता है ।
- मंद ज्वर , पाण्डुता( पीलिया ) एवं बेचैनी होती है ।
- साँस लेने में कठिनाई ।
- अगर ठीक इलाज न हो तो बच्चा मर सकता है ।
- तापक्रम सामान्यतः < 38'0 ° C ( < 101'0F )
रोग की पहिचान -
झिल्ली तथा रोहिणी के जीवाणु मिलने पर निश्चयात्मक निदान होता है । एतदर्थ रुई का फोहा इस निशान पर रगड़कर या इसका कहीं से टुकड़ा उखाड़ कर प्रयोगशालीय परीक्षण करना चाहिये ।
रोग का परिणाम -
हृदय और तंत्रिकातंत्र सम्बन्धी उपद्रवों( अन्य रोग ) के अतिरिक्त स्वरयंत्र के अवरोध से साँस लेने में कठिनाई होना सम्भव है । लोवर न्यूमोनिया और फुफ्फुसपात जैसे उपद्रव( रोग ) भी हो जाया करते हैं ।
- ' मायोकाडा टिस , पेरीफेरल न्यूराइटिस भी सम्भव ।
यदि कोई बच्चा 6 मास से अधिक का ज्वर तथा गले में दर्द के साथ आता है तो उसे डिफ्थीरिया रोग का सन्देह करना चाहिये ।
ज्वर पीड़ित प्रत्येक बच्चे के गले का निरीक्षण ' टंग डिप्रेशर ' ( Tonqul Depressur ) द्वारा टार्च की सहायता से अवश्य कर लें । क्योंकि डिफ्थीरिया रोग को प्रारम्भिक अवस्था में निदान न करने पर यह भयानक रूप धारण कर सकता है ।
चिकित्सा विधि -
बिस्तर पर पूर्ण विश्राम ।
- डेक्स्ट्रोजआई . वी .।
- 2 या 3 सप्ताह तक रोगी को दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों से अलग रखें ।
- टीका लगवायें ।
- कीटाणुनाशक औषधियों का प्रयोग करें ।
- पूर्ण विश्राम का रोग तथा रोगोत्तरकाल में भी ध्यान रखें ।
पथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
गरम पानी से स्नान एवं पीने को शीतल जल ।
- अनन्नास का रस पिलाने से आशातीत( unexpecded ) लाभ होता है ।
- प्यास में बर्फ के टुकड़े चूसने को दें ।
डिफ्थीरिया की औषधि चिकित्सा -
- पूर्ण विश्राम दें ।
- निदान होते ही तत्काल - डिफ्थीरिया एण्टिटॉक्सिन । 3000 से 8000 यूनिट अथवा अधिक ( 2 लाख यूनिट तक ) माँसपेशीगत अथवा शिरामार्ग से दें ।
- बेन्जिल पेनिसिलीन 5 लाख यूनिट्स प्रातः सायं दें ।
- उपद्रवों( अन्य रोग ) की चिकित्सा उसी के अनुसार करें ।
- आक्सीजन की आवश्यकता पड़ सकती है ।
- शक्ति कायम रखने के लिये ग्लूकोज का अन्तशिरा इन्जे . दें ।
- श्वासावरोध में स्वरयंत्र मार्ग से नली प्रवेश ( लैरिन्जियल इन्टयूबेशन ) करना पड़ता है ।
- पूर्ण विश्राम का रोग तथा रोगोत्तरकाल में भी ध्यान रखें ।
कुछ चिकित्सक डिपथीरिया की चिकित्सा इस प्रकार से करते हैं -
- बिस्तर पर पूर्ण विश्राम ।
- तरल भोजन ।
- डेक्स्ट्रोज सैलाइन आई . वी .।
- डिप्थीरिया एण्टीटोक्सिन आई . वी . ड्रिप के साथ या इण्ट्रामस्कुलर दें ।
- टान्सिलर एक तरफ की 20000 आई . यूनिट ।
- टन्सिलर दोनों तरफ की 40000 आई . यूनिट ।
- टन्सिलर फैरन्जियल 60000 आई यूनिट ।
- लेरन्जियल एवं नेजोफेरन्जियल 80000 आई यूनिट ।
- एण्टीबायोटिक्स - पेनिसिलीन 250000 ( ढाई लाख ) यूनिट्स मांसपेशीगत् × प्रति 6 घण्टे पर दें ।
- अरीथ्रोमाइसिन 250 मि . ग्रा . × प्रति 6 घण्टे पर 5 से 7 दिन तक ।
- आक्सीजन दें । तरल इनर्जी ड्रिप के द्वारा ।
उपद्रवों( अन्य रोगो ) के उपचार में निम्न व्यवस्था -
स्तब्धता( जड़ता ) की स्थिति में - शैय्या को पैरों की ओर से ऊँचा रखना चाहिये एवं ड्रिप विधि से नार - एड्रीनलीन या अन्य कोई रक्त दाब वर्धक औषधि दें ।
- हृत्पेशीशोध होने पर - शैया पर पूर्ण विश्राम करायें एवं तकिये का प्रयोग न करें ।
- हृत्पात होने पर - आक्सीजन और मूत्रल( मूत्र बढ़ाने वाली ) द्रव्यों का प्रयोग ।
• डिफ्थीरिया में प्रयुक्त अनुभूत व्यवस्थापत्र -
Rx
- बिस्तर पर पूर्ण विश्राम ( Absolute restin Bed ) गर्म सैलाइन अथवा 3 % ग्लूकोज से गले की दिन में 3-4 बार सफाई ( Irrigation ) ।
- दर्द के लिये एनाल्जेसिक जैसे - कोडोपायरीन , ए . पी . सी . ।
- झिल्ली और लैरेन्जियल ऑब्सट्रक्शन के स्राव को खींचना ।
- सायनोसिस की स्थिति में - ट्रेकियोस्टोमी / इन्टूबेशन ।
- डिफ्थीरिया एण्टीटोक्सिन 4,000 - 100,000 यूनिट आई . वी . अथवा मांसपेशीगत इन्जेक्शन रूप में ।
- एड्रीनलीन 0.5-1 मि . ली . ( 1 : 1000 ) मांसपेशीगत ।
- एण्टीहिस्टामीन - क्लोरफेनीरामाइन 10-20 मि . ग्रा . ( अधिकतम 24 घण्टे में 40 मि . ग्रा . ) × मांसपेशीगत अथवा आई . वी .।
- एण्टीबायोटिक्स पेनिसिलीन अथवा ' इरीथ्रोमाइसीन'7-10 दिन तक ।
- गम्भीर केस में - कोर्टीकोस्टेराइड्स ।
Treatment according to Harrison's Principles of Internal Medicines -
- Antitoxin after checking for hypersensitivity to horse serum ; 20,000 - 40,000 U if Pharynx or Larynx and 1 48 h ; 40,000 - 60,000 U for Nasopharyngeal infections ; 80,000 -100,000 U for severe disease or > 3 d .
- Immunization ( D.P.T. ) 2 , 4 , 6 , 12-18 months , 5-6 years and every 10 years with TD ( Tetanus toxoid and diptheria )
चिकित्सकों की राय -
डिफ्थीरिया में खाने और लगाने की औषधियों से कोई लाभ नहीं होता । एक मात्रा चिकित्सा ' डिफ्थीरिया एण्टीटोक्सिन ' को 5 से 30 हजार यूनिट अथवा उपरोक्त मात्रा में दिन में 2 बार माँस में लगाना ही है । इसको तब तक लगाया जाता है जब तक झिल्ली गायब नहीं हो जाती ।
- इस सीरप को देने के बाद पेनिसिलीन 1 लाख यूनिट नित्य 5-7 दिन तक माँस में देते हैं ।
- सीरम का इन्जेक्शन लगाने से पहले ' एड्रीनलीन की 4-5 बूंदें रोगी की जीभ पर डालें । इससे रोगी को कष्ट नहीं होता है ।
रोग निरोध - रोग को न होने देने के लिये ' रोधक टीका लगाना आवश्यक होता है । इसके लिये डी . पी . टी . ( D.P.T. ) अर्थात डिफ्थीरिया / टिटेनस / परटूसिस ( Triple Vaccine ) के 3 टीके एक मास के अंतर से , जन्म से तीसरे महीने के अंत में दें । फिर 5 वें वर्ष में बूस्टर डोज दें । तत्पश्चात 8-12 वर्ष में पुनः बूस्टर डोज ( अनुवर्धक मात्रा ) दें


