हैजा / कोलेरा [ Cholera ] क्या है? , इसके लक्षण, परिणाम, पहचान, कारण एवमं उचित चिकित्सा विधि क्या है? What is cholera / cholera [Cholera]? , Its symptoms, consequences, detection, causes and what is the appropriate medical procedure?

 हैजा / कोलेरा [ Cholera ]

हैजा / कोलेरा [ Cholera ] - 

नाम - 

विशूचिका , हैजा , दस्त , कै एक साथ लग जाना । कॉलरा ' 

परिचय - 

एक तीव्र संक्रामक रोग जो कॉलरी वाइब्रो नामक बैसिलस ( जीवाणु ) द्वारा उत्पन्न होता है जिसमें चावलों के पानी ( माण्ड ) जैसे बहुत तेज दस्त होते हैं , उल्टी होती है , खुश्की होती है , मूत्र त्याग बहुत कम होता है , पेशियों में ऐंठन होती है तथा कमजोरी बहुत होती है ।


रोग के कारण - 

हैजे का संक्रमण वाइब्रियो कालरी और एल्टोर वाइब्रियो नामक जीवाणु द्वारा होता है । 

- मुख्यतया यह रोग दूषित जल की वजह से होता है । 

- पानी के स्रोत का दूषित होना जैसे कि कुएँ जो भली भाँति ढंके नहीं होते , जिनमें गंदा पानी बह कर चला जाता है । संक्रमण के प्रमुख स्रोत बन जाते हैं । किसी वस्तु का गलत भण्डार भी हैजे की बीमारी को बढ़ाने में सहायक । जैसे - गंदे हाथों को पीने के पानी में डालना । 

- अजीर्ण भोजन का कच्चा अथवा अधपका खाना ।

- ऐसे तापमान पर भंडारित भोजन जिस पर जीवाणु शीघ्रता से वृद्धि करते हैं , का सेवन करना भी संक्रमण का स्रोत बन सकता है । 

- कभी - कभी कच्ची सब्जियाँ , दूषित जल से धोकर चटनी या रायता जैसे बिना पकाये खाद्य पदार्थ बना लिये जाते हैं, इससे सब्जियों पर लगे जीवाणु पेट में चले जाते हैं ।


रोग के लक्षण - 

एकाएक उग्र अतिसार ( तेज दस्त ) का प्रारम्भ । 

- मल भूरे रंग का , गंदला , इसमें मल की दुर्गंध , रक्त या मवाद नहीं होता । बल्कि दस्त चावल के धोवन ( मांड़ ) के समान होता है । 

- खून में तेजी से बढ़ती हुई पानी की कमी , एसीडोसिस , रक्त में पोटेशियम की कमी और रक्त का दबाव भी कम हो जाता है । 

- ज्वर नहीं , पर वमन ( उल्टी ) साथ ही साथ हो सकती है । 

- उदर ( पेट ) और शाखाओं ( भुजाओ ) की मांसपेशियों में तीव्र ऐंठन ( Cramps ) । 

- शीतावस्था में रोगी का शरीर छूने पर ठंडा प्रतीत होता है । त्वचा सिकुड़ी हुई , बॉडी दुर्बल दिखाई पड़ता है ।

- मूत्र अत्यल्प ( बहुत कम ) या बिल्कुल ही नहीं आते । 

- गुदा का ताप 105 ° तथा कक्षामें 90 ° F तक । 

- अतिसार रुक जाता है पर वमन और मांसपेशियों में ऐंठन बरकरार रहती है । 

- इस अवस्था में यदि तरल एवं इलेक्ट्रोलाइट्स के सन्तुलन को ठीक करने को तुरन्त प्रभावशाली व्यवस्था न की जाये तो हृत्पात ( heart fealure ) से 24 घण्टे में ही मृत्यु । 

- रोगी को अति तीव्र ज्वर हो सकता है ।


याद रखिये - 

यह रोग खाने - पीने की खराबियों के कारण जीर्ण ( लंबे समय से खराबी ) होने पर होता है । 

- विशूचिका / कॉलरा महास्त्रोत्स की तीव्र व्याधि ( शरीर और मन को अस्वस्थ करने वाली अवस्था ) है जो विब्रियो कॉलरा नामक रोगाणु की उपस्थिति से अस्वच्छ हुए आहार एवं पेय पदार्थों के सेवन से होती है । 

- कई बार व्यापारी तथा यात्री अनजाने में ही संक्रमण अपने साथ ले जाते हैं । 

- मेले आदि में बहुत अधिक लोगों के एकत्रित होने से भी संक्रमण अधिक फैलता है।

- हैजे की बीमारी शरणार्थी कैम्पों से भी फैलती है ।


रोग की पहिचान - 

मल में ' विशूचिका के रोगाणुओं ' की उपस्थिति रोग निर्णायक ( रोग की मौजूदगी ) होती है । ( मल का कल्चर पॉजीटिव्ह , विशिष्ट सीरा के साथ कॉलेरा जीवाणुओं का एग्लूटिनेशन ) 

- इसके तीव्र लक्षण अचानक प्रकट होने से निदान शीघ्र आसानी से । 

- चावलों के धोवन से पतले दस्त इसे तुरन्त पहचनवा देते हैं ।


रोग का परिणाम - 

बच्चे , बूढ़े , दुर्बल और शराब पीने वालों में मृत्यु संख्या अधिक 

नींद न आना एक घोर उपद्रव( लक्षण ) । 

- रोग इपीडेमिक होने पर घातक हो जाता है ,30-70 % रोगी मर जाते हैं । 

- यूरेमिक कॉमा , हाइपर पाइरेक्सिया और टायफाइड की अवस्था का आना मौत का कारण है ।


_ यह ग्रीष्म ऋतु के अंत में और वर्षा के प्रारम्भ में होता है । 

_ रोग एक बार होकर भी मनुष्य में कोई इम्युनिटी नहीं बनती अतः फिर हो सकता है। 

_ संक्रमण मक्खियों से पहुँचता है । इससे बचने के लिये स्वच्छता आवश्यक । 

_ यह टायफाइड के साथ दूषित जल और आहार के द्वारा रोगी के मल - मूत्र या वमन द्रव्य ( उल्टी ) के सम्पर्क से फैलता है । 

_ सभी स्टेज / आयु में हो सकता है । अधिकतर जन संम्पर्कजैसे मेलों आदि से फैलने का भय रहता है । 


हैजे की गम्भीर अवस्था - सावधान - 

इस अवस्था में जल्दी - जल्दी शौच तथा उल्टियाँ होने लगती हैं जिससे शरीर में पानी की बहुत कमी हो जाती है । शरीर में पानी की कमी को ' डिहाइड्रेशन कहते हैं । यह अवस्था बहुत ही खतरनाक होती है । इससे मृत्यु की आशंका रहती है । सबसे कष्टदायक बात यह है कि मृत्यु से जूझ रहे रोगी को बड़ी यातना ( कष्ट ) झेलनी पड़ती है । अतिसार व उल्टी से ग्रस्त रोगियों की संख्या जब बढ़ने लगे , विशेषकर उस समय , जब रोगी का मल चावल के पानी जैसा हो , तो हैजा फैलने का अंदेशा हो जाता है ।


चिकित्सा विधि - 

- बिस्तर पर पूर्ण विश्राम । 

- रोगी को उष्ण ( गर्म ) रखना चाहिये तथा तरल पदार्थ खाने को देना चाहिये । 

- एनीमल प्रोटीन कदापि नहीं । 

- अतिसार एवं वमन निरोधक औषधि व्यवस्था । 

- मुख द्वारा लवणोदक ( ऐसे पदार्थ जिसमे खनिज , लवण की मौजूदगी ) । 

- शूलनाशक ( दर्द निवारक ) उचित व्यवस्था । 

- शिरा द्वारा आइसोटोनिक सैलाइन । 

- प्यास के लिये बर्फ चूसने को । 

- कठिन हैजा के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को पास के अस्पताल में जल्दी भेज देना चाहिये जिससे समय पर उचित चिकित्सा हो सके ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक उपचार - 

- रोगी को आराम के साथ बिस्तर पर लिटा दें । 

- दस्त और कै बन्द करने की जल्दी में कोई औषधि न दें , बल्कि पेट साफ करने के लिये थोड़ा कैस्टर आयल रोगी को पिला दें । 

- रोगी के मुह में बर्फ की डली रक्खें । 

- पोदीना का अर्क थोड़ा - थोड़ा करके पीने के लिये देते रहें । इलैक्ट्राल पाउडर बीच - बीच में पानी में घोल कर दें । पेशाब रुकने पर बेल के पत्ते 20 , कालीमिर्च 10 दोनों को अच्छी तरह पानी में पीसकर नली और पेड़ पर लगा दें । इससे पेशाब हो जाता है । हाथ - पैरों की ऐंठन में विषगर्भ तेल , नारायण तेल की मालिश करें / अथवा खाली राई मलें ।


याद रखिये - 

हैजे की एक अन्य किस्म जिसे वंद कॉलरा ( Dry Cholera ) कहते हैं- इसमें कै और दस्त नहीं होते , परन्तु हैजा के और सब लक्षण उपस्थित रहते हैं । पेट में भयानक दर्द , पेशाब न होना , प्यास , हाथ - पैर में ऐंठन , पेट फूलना आदि लक्षण होते हैं । यह भी एक भयानक स्थिति है । 

- इस प्रकार के हैजे में कै और दस्त लगने वाली दवा देनी चाहिये । 


हैजे की औषधि चिकित्सा -

- शिरा द्वारा ' आइसोटोनिक सेलाइन देना । पहली बोतल 5-10 मिनट में , दूसरी 20 मिनट में तुदुपरान्त ( उसके बाद ) प्रति 4 घण्टे में बूंद - बूंद कर एक बोतल । दूसरे दिन आवश्यकता हो तो नॉर्मल सैलाइन पुनः दें । 

सावधान - अत्यधिक मात्रा में इसका प्रयोग न करें । वमन और ' अतिसार द्वारा जितना जल निकले उसी के अनुसार यह देना चाहिये , अन्यथा हृदय पर अत्यधिक बोझ होने पर हानि हो सकती है । 

- प्यास के लिये बर्फ चूसने को दें । 

- हल्का केओलीन ( Light Kaoline ) पानी में घोलकर पर्याप्त मात्रा में दें ।  

- टेट्रासाइक्लीन एवं क्लोरोस्ट्रेप / इण्टरोस्ट्रेप दें । 2-2 कै . प्रति 6 घण्टे पर दें । 

- सल्फाग्वानेडीन 6-8 ग्राम प्रारम्भ में और फिर 3-4 ग्राम प्रति 44 घण्टे पर दें ।  

- निकेथामाइड ( कोरमीन ) चाय या कॉफी में डाल कर सिप करें । 

- पोटाशियम परमैं गेनेट 2gm . मुख द्वारा प्रति घंटे पर दें । 

- मुख द्वारा इलेक्ट्राल पाउडर गुनगुने पानी में घोलकर बार - बार पिलावें अथवा   ओ . आर . टी .।


- डिहाइड्रेशन से बचने के लिये अधिकतर मामलों में ओ . आर . टी . ( ओरल रिहाइड्रेशन गिरेपी ) तथा उचित जीवाणुनाशक दवा काफी होती है । 

ओ . आर . टी . घर पर भी आसानी से बनाया जा सकता है । इसे बनाने के लिये गिलास भर पानी में एक चुटकी नमक तथा 2 चम्मच चीनी मिलाई जाती है ।


- ओ . आर . टी . निम्नलिखित मानक के अनुसार ही दिया जाना चाहिये -

- 4 माह से कम आयु के बच्चे- 200-400 मि . ली . ।

- 4 से 11 माह के बच्चे- 400600 मि . ली . ।

- 1 से 4 वर्ष की आयु के बच्चे- 600-1200 मि . ली . ।

- 5 से 14 वर्ष की आँयु के बच्चे- 1200-2200 मि . ली . ।

- 14 से ऊपर की आयुवाले → 2200-4000 मि . ली . । 

उपचार के पहले - चार घण्टों में दवा की यह मात्रा रोगी के पेट में चली जानी चाहिये । इसके बाद रोगी को प्रत्येक 3 घण्टे बाद कुछ खिलाते रहें । माताओं को अपने शिशुओं को अपना दूध पिलाना चाहिये । वयस्कों को दाल का पानी , चावलों का मांड़ एवं खाने - पीने के लिये प्रेरित करना चाहिये । 

@ रक्त की अम्लता , लो ब्लड प्रेशर और रक्त के गाढ़ेपन को दूर करने के लिये - ' सोडियम मोलर लैक्टेट ' का आई . वी . द्वारा तेजी से रक्त में पहुँचाना । इसकी गति 50 से 100 मि . ली . प्रति मिनट होनी चाहिये । इसके बाद मल के साथ हुई क्षति को पूरा करने के लिये धीमी गति से दें । 

@ मध्यम किस्म के रोगियों में केवल मुख द्वारा केवल पानी की कमी को दूर किया जा सकता है । यह इलेक्ट्रोलाइट्स ( इलेक्ट्राल ) के घोल द्वारा की जा सकती है । 

सावधान - बच्चों में पोटाशियम की कमी खतरनाक होती है अंतः इसकी सावधानी रखनी चाहिये ।


• कॉलरा में प्रयुक्त उत्तम व्यवस्था पत्र ~


Rx 

- मध्यम रोगी में - प्लूड और इलेक्ट्रोलाइट्स ( इलेक्ट्राल पानी में घोल बनाकर ) की मुख द्वारा पूर्ति तत्काल । 

- रिगर्स लेक्टेट सोल्यूशन अथवा घर्टमैन्स सोल्यूशन x आई . वी . इन्फ्यूजन ।  

- पोटाशियम क्लोराइड अथवा साइट्रेट 2-4 ग्राम x दिन में 3 बार । मुख द्वारा । 

- वमन में मुख द्वारा पर्याप्त जल ।  

- एण्टीबायोटिक्स - ' टेट्रासाइक्लीन ' अथवा ' सेफ्रीडीन ' ( Cephridine ) 250-500 मि.ग्रा . दिन में 4 बार मुख द्वारा । अथवा 0.5-1 ग्राम प्रति 12 घण्टे पर x आई.वी. इन्फ्यूजन द्वारा । - 

- तीव्र ज्वर की स्थिति में - कोर्टिकोस्टिराइड्स । 

- फ्यूराजोलिडीन 400 मि . ग्रा . x मुख द्वारा दिन में 1 बार 4 दिन तक । 

याद रखिये - कॉलरा से पीड़ित युवा रोगी में 20 लिटर तक आइसोटोनिक सैलाइन को शिरामार्ग से देने की आवश्यकता हो सकती है । ऐसे रोगियों में प्रारम्भ में 2 लिटर को 1 घण्टे के समय में दें । दूसरे घण्टे में 1 लिटर और तीसरे घण्टे में भी 1 लिटर दें । 

- वमन के रुक जाने पर मुख द्वारा अधिक से अधिक तरल देना चाहिये । तदर्थ 15 लिटर पानी में 88 ग्राम सेंधा नमक , 57 ग्राम सोडा बाई कार्ब , 28 ग्राम पोटेशियम क्लोराइड और 300 ग्राम ग्लूकोज मिलाकर दें । इसे 500 मि . ली . की मात्रा में प्रति घण्टा .46 घण्टे तक देना चाहिये । 

नोट - . ' टेट्रासाइक्लीन 100 मि . ग्रा . शिरामार्ग से प्रति 6 घण्टे बाद 24 घण्टे तक दें । बाद में 500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे बाद मुख द्वारा 4 दिन तक दें । ( सहायक औषधि के रूप में )


हैजे की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा ~

1. हैजे में कै दूर करने के लिये → सीक्विल ( Siquil ) की 1 से 3 मि . ग्रा . की सुई नस में या 5-10 मि . ग्रा . की सुई मांस में 44 घण्टे पर लगावें । अथवा इस्कैजीन की 1 टे . , लार्जेक्टिल 10 मि . ग्रा . की 1 टे . - दोनों मिलाकर दें ।

2. हैजे में हिचकी आने पर → लार्जेक्टिल ( रोन - पुलेंक ) 10 मि . ग्रा . या 25 मि . ग्रा . की सुई रोग के अनुसार लगावें ।

3. दस्तों में खून आना → कैल्शियम ग्लूकोनेट ( 5 % ) 10 मि . ली . की सुई नस में लगावें ।

4. हाथ - पैर ठंडे हो जाने पर →  ई. नार्मल सैलाइन 500 मि . ली . में 4-5 बूंद एड्रीनलीन क्लोराइड मिलाकर नस लगावें । 

5. हृदय के दुर्बल हो जाने । बेहोशी की स्थिति → कोरामीन ( सीवा कं ) 2 मि . ली . की सुई माँस में लगावें । एवं कोरामीन ड्राप्स 15-20 बूंद जल में मिलाकर पिलावें।

6. मूत्र बंद हो जाने , नाड़ी लोप होने , जीभ सूख जाना एवं श्वास कष्ट की स्थिति में → डेक्स्ट्रोज सैलाइन आई . वी . ।

7. तेज दस्तों की स्थिति में → स्ट्रेप्टो - पैराक्सिन ( नोल ) के 4 कै . पहले दें । इसके बाद 1-1 कै . 4-4 घण्टे बाद दें ।

8. हैजे की शुरूआत होते ही → पैराक्सिन ( Paraxin ) नोल ' के 4 कैप्सूल तत्काल । इसके 24 घण्टे बाद 1-2 कै . दें । 

9. शरीर में जल की कमी , रक्त में लवणों एवं तरलता की कमी , प्यास की अधिकता एवं पिंडलियों की ऐंठन तथा मूत्रावरोध में → इलेक्ट्राल पाउडर 1 पैकिट पाउडर 1 / 2-1 लिटर उबाले जल में घोलकर आवश्यकतानुसार 1 / 2-1 / 2 अथवा 1-2 घण्टे बाद 1-2 चम्मच पिलाते रहें । ( 1 घण्टे में 1/2 से 1 लिटर तक ) ।

10. हैजे के विषैले प्रभाव को दूर करने में → केओलीन ' 60 ग्राम को 250 मि . ली . पानी में घोलकर और हिलाकर 2-3 बड़े चम्मच हर 15 मिनट पर पिलाते रहें ।

जौ का पानी ( बार्लीवाटर ) , नारियल का जल , दही की लस्सी में नीबू का रस मिलाकर थोड़ा - थोड़ा देते रहें ।
 

हैजे में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलोपैथिक पेटेन्ट टेबलेट ~


1. इस्केजीन ( Eskazine ) ' S.K.F . ' → कै की स्थिति में 1 या 2 मि . ग्रा . की 1-1 टेबलेट प्रति 2 या 4 घण्टे पर दें ।

2. टेट्रासाइक्लीन हाइड्रोक्लोराइड → 500 मि.ग्रा . के 2 कै . तत्काल । तत्पश्चात 1-1 कै . हर 4 घण्टे पर सोडाबाई मिश्रित जल के साथ दें ।

3. क्लोरोस्ट्रेप ( Chlorostrep ) ' पी.डी. ' → 1-1 कै . प्रति 3-4 घण्टे पर दें ।

4. रिओफीन ( Reofin ) रैलीज कं ' → दस्तों की स्थिति में - प्रति 1/2 घण्टे पर 1 कै . दें । 2 घण्टे बाद 1-1 कै . प्रति 6 घेण्टे पर दें ।

5. रिनोकैब ( Renokab ) ज्योफरी मैनर्स कं → 2-2 टेबलेट दिन में 4 बार दें ।

6. स्ट्रेप्टोट्रायड Streptotriad ) ) ' रोन - पुलेंक ' → पहले 4 टेबलेट । तत्पश्चात् 2-2 टेबलेट 2-3 बार तक दें । 

7. कोरामीन ( सीवा कं ) → हृदय दुर्बलता की स्थिति में 15 बूंद जल में मिलाकर दिन में 5-6 बार ( प्रति 2 घण्टे पर ) दें । अथवा 1-2 टे . आवश्यकतानुसार दें ।


हैजे में लगाने योग्य अपटूडेट ऐलोपैथिक पेटेन्ट इन्जेक्शन ~


1. नार्मल सैलान ( Normal Saline ) ( अनेक कम्पनियाँ बनाती है ) → 540 मि . ली . की बोतल आई . वी . डूप से आवश्यकतानुसार दें ।

2. ओक्सीस्टेक्लिन ( Oxysteclin ) ( साराभाई कं ) → 1-2 मि . ली . माँस में प्रति 4 से 6 घण्टे पर दें ।

3. एट्रोपीन सल्फेट ( Atropine Sulphate ) ( कई कम्पनियाँ बनाती हैं ) → 1 मि . ली . माँस में लगावें ।

4. स्ट्रेप्टोमाइसिन ( Strptomycin ) → 1 / 2-1 ग्राम 2 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोलकर माँस में लगावें ।

   

• हैजे में सेवन कराने योग्य अपटूडेट एलोपैथिक पेटेन्ट सीरप . ~


1. कोमाइसीन सीरप ( Comycin Syrup ) ' ग्लैक्सो → 1-2 चम्मच दिन में 4-5 बार दें ।

2. पैक्टोकैब एम . एफ . ( Pectokab M.F. ) → 2-3 चम्मच हर 1 से 2 घण्टे बाद दें ।

3. स्ट्रेप्टोमैगमा ( Streptomegma ) ' वाईथ कं ' → 2-6 छोटे चम्मच दिन में 4 बार दें । साथ में ग्रेवाल ( कार्टर वालेस ) की 1-1 टे . प्रति 4 घण्टे पर दें ।

4. पेसुलिन या पेसुलिन ओ ( कैडिला ) → 7.5 से 15 मि . ली . तक 2 से 6 बार तक दें । बच्चों को 5 मि . ली . और शिशुओं को 5-10 बूंद आ . नु . दें ।

   

हैजे की वैक्सीन चिकित्सा ~

विशूचिका को न होने देने के लिये ( रोग निरोध- Prophylaxis ) के लिये वैक्सीन ( Suspension of 8000 Organism per ml . ) की 1/2 मि . ली . की सुई और 7-10 दिन बाद । मि . ली . की सुई लेने से ( S / C ) 6-12 मास तक रोग क्षमता बनी रहती है । 

नोट- आमतौर पर आजकल वैक्सीन लेने की सलाह नहीं दी जाती , क्योंकि वैक्सीन का प्रभाव कुछ समय तक ही रहता है ।


हैजे की रोकथाम ~

- मल - मूत्र त्याग के लिये सुरक्षित तथा उपयुक्त सुविधा प्रदान करें । 

- संदूषित जल के स्थान पर स्वच्छ जल का वितरण । 

- गंदें स्रोतों से पानी भरने एवं गंदे स्थानों पर नहाने से रोकना । 

- समय - समय पर सार्वजनिक टंकियों की क्लोरीन अथवा पोटैशियम परमैंगनेट से सफाई । 

- दावतों अथवा शव - दाह संस्कारों के समय भीड़ जमा होने देना । 

- आपातकालीन उपचार की व्यवस्था । पीने तथा नहाने के लिये साफ पानी की व्यवस्था ।


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