रोमान्तिका / खसरा / मीजल्स [ Measles ] क्या है ? इसके कारण, एवं उचित चिकित्सा विधि क्या है ?What is Romantika / Measles / Measles? Because of this, and what is the proper treatment method?

 रोमान्तिका / खसरा / मीजल्स [ Measles ] 

रोमान्तिका / खसरा / मीजल्स [ Measles ] 

नाम - 

खसड़ा , छोटी माता । रुबेओला ( Rubeola ) । 

परिचय - 

जाड़ों में एवं बसंत ऋतु में अधिकतर स्कूल जाने वाली आयु के बच्चों में ' रुबियोला ' विषाणु द्वारा उत्पन्न एक अत्यधिक सांसर्गिक रोग( हर जगह पाए जाने वाला रोग ) जिसमें नेत्रश्लेष्मलाशोथ हो जाता है , छीकें आती हैं , नासा रक्ताधिक्य( नाक से रक्त स्राव ) हो जाता है , घबराहट होती है , तेज ज्वर हो जाता है । मुख की श्लेष्मिक झिल्ली पर कोपीलक के घब्बे बन जाते हैं , खाँसी उठती है तथा माथे से शुरू होकर सम्पूर्ण शरीर पर फैलने वाले चित्ती - पिटिकीय( rashes ) दाने निकल आते हैं । यह छोटे बच्चे में विशेषकर होता है ( 14 साल की उम्र तक ) । 

हवा से फैलने वाले एक विषाणु द्वारा उत्पन्न बचपन में होने वाला एक तीव्र संक्रामक रोग , चौथे दिन लालपन दिखने के पूर्व जुकाम से शुरूआत होती है , पहले दिखायी देने वाले कॉपलिक स्पॉटस ।

रोग के कारण - 

रोग अधिकतर बच्चों में । 

रोग का कारण एक प्रकार का विषाणु ( वायरस- Virus ) है जो रोगी के नाक के तरल , दाने के खुरण्ट( पपड़ी जैसा ) और सांस , छींक , थूक द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रसारित होते हैं । 

- वैसे तो यह पूरी सर्दियों में कभी भी हो सकती है , लेकिन सर्दी खत्म होते समय फरवरी के अन्त तथा मार्च में , जब दिन में काफी गर्मी होती है , मगर रात में सर्दी होती तब यह अधिक होती है । 

- 6 माह से ऊपर के बच्चों में अधिक पर कभी - कभी वयस्कों में भी । ज्यादातर उन बच्चों में अधिक , जो कमजोर होते हैं तथा जिनको सर्दी - जुकाम जल्दी - जल्दी होता ।


रोग के लक्ष्ण - 

रोग का प्रारम्भ जुकाम , छीकें नाक बहने खाँसी तथा बुखार के साथ होता है । रोग में ज्वर पहला लक्षण होता है । 

- आँखें और चेहरा लाल एवं एक विशेष प्रकार की चमक होती है । 

- भूख बिल्कुल नहीं ।

- मरीज काफी दुर्बलता अनुभव करता है । 

- 102 ° तक तापक्रम एवं सूखी खाँसी । 

- अतिसार एक सामान्य बात है । 

- मुँह के अन्दर गाल की झिल्ली पर एक विशेष प्रकार के धब्बे ( कापिरक स्पॉट ) ।

- बुखार आने के करीब चौथे दिन शरीर पर दाने आने प्रारम्भ । सबसे पहले चह चेहरे में , कान के पास बालों के आस - पास , माथे में फिर चेहरे पर , गर्दन पर , फिर दो से तीन दिन के अंदर पूरे शरीर में , हाथ - पैरों में फैल जाते हैं । 

- दाने आने के बाद बुखार कम तथा ' कापरिक स्पॉट दाने आने के 2 दिन बाद गायब। 

- एक सप्ताह होते - होते दाने सूख जाते हैं और कुछ दिन बाद पपड़ी सूखकर गिर जाती हैं केवल हल्का सा कत्थई धब्बा शेष रह जाता है । जो कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है ।

- यदि रोग का भयंकर आक्रमण हो तो बालक का चेहरा सूज जाता है तथा कुरूप लगता है । 

- रक्तस्त्रावी ( Hemorrhagic ) रोमान्तिका में त्वचा में रक्तस्राव एवं शरीर के किसी मार्ग या सभी मार्गों से रुधिर( खून ) आने लगता है । 

- प्रत्येक रोम के समीप पिंडकायें( पिम्पल्स ) होने से ही इसे रोमान्तिका कहते हैं ।  

-  रोगी बच्चा कुछ तंद्रा ( सुस्त या नींद जैसी अवस्था ) की अवस्था मे रहता है ।

सर्वप्रथम मुख पर । फिर सारे शरीर पर । 

- खसरा जीवन में एक ही बार हो सकता है जिससे जीवनपर्यन्त शरीर में प्रतिरक्षा के पदार्थ एण्टीबाडीज बन जाता है और इसके बाद खसरा के वायरस का प्रभाव नहीं होता है । 

- यदि बच्चे को प्रारम्भ में ही कोई ‘ एण्टीबायोटिक ब्राडस्पेक्ट्रम दिया गया है तो त्वचा पर दाने दिखायी देने में एक सप्ताह से अधिक का समय लग जाता है । 

5 माह से छोटे बच्चों में यह नहीं होता है ।

रोग की पहिचान - 

कोपलिक के स्पॉट एवं अन्य लक्षणों से निदान होता है परन्तु कोपलिक के बिन्दुओं के अभाव में सर्दी - जुकाम से इसका पहचान करना कठिन होता है । ऐसी अवस्था में उद्भेदों के निकलने के बाद ही निदान सम्भव है ।  

- पास - पड़ोस में रोग की उपस्थिति से । रोगी से सम्पर्क संदेह ।


रोग का परिणाम - 

बहुत छोटे बच्चों में विशेष घातक । 

- उपद्रवों( अन्य रोग ) के कारण गम्भीरता में वृद्धि । 

- गरीबी एवं अस्वास्थ्य कर रहन - सहन रोग वृद्धि एवं मृत्यु संख्या में वृद्धिकारक । 

- उपद्रव स्वरूप - न्यूमोनिया , स्वर यंत्रशोथ , डिफ्थीरिया , मध्य कर्ण शोथ , इन्सेफेलाइटिस , तीव्र आंत्रशोथ आदि प्रमुख । 

- न्यूमोनिया सर्वाधिक

नोट - रोग प्रायः इपीडेमिक रूप में फैलता है । 

- प्रायः सभी बच्चों को कभी न कभी एक बार अवश्य होता है । 

- दाना - फुंसी निकलने के पूर्व सर्वाधिक संक्रामक ।

- 1 सप्ताह में इसकी संक्रामकता समाप्त । 

- एक बार रोग होने पर पुनः नहीं ।

चिकित्सा विधि - 

हवादार , कम प्रकाशयुक्त स्थान में रोगी को रक्खें । 

- आँख , नाक , गले एवं मुख की सफाई । 

- रोगी बालक को यथासम्भव सबसे अलग एवं 14 दिन तक उसे स्कूल न भेजें । 

- गले में संक्रमण होने पर एण्टीबायोटिक्स । 

- खसरा की चिकित्सा के लिये यदि सन्देह हो कि बच्चे को खसरे का ज्वर है तो ब्रॉड स्पेक्ट्रम एण्टीवायोटिक रोगी को न दें , क्योंकि इसके प्रयोग से खसरा के दाने निकलने में अनावश्यक देरी हो सकती है । साथ ही रोग का समय बढ़ जाता है । ऐसे सम्भावित रोगी बालक में इन्जेक्शन भी न लगावें जब तक त्वचा पर दाने दिखायी न दें ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा - 

शैया पर पूर्ण विश्राम एवं तरल द्रव्यों का सेवन । 

- रोगी के हाथ - पैरों को सम्भव हो तो सारे शरीर को रोज गरम जल से स्पंज द्वारा साफ करते रहें । बच्चा खुजलाने न पावे । 

- आँखों की पूरी सावधानी रखनी चाहिये । प्रतिदिन वोरिक एसिड लोशन से आँखों को साफ करें । पलकों पर सूजन हो जायें तो ठंडे पानी की पट्टीरक्खें । 

- खोने - पीने के लिये दूध , मूंग की दाल , साबूदाना आदि पतली चीजें दें । अनार , केला , परवल दे सकते हैं । 

- रोगी को धूप में न आने दें ।


• खसरा की औषधि चिकित्सा -

- रोगी को अलग रखकर शैया पर पूर्ण विश्राम दें । 

- एस्प्रिन 600-900 मि . ग्रा . दिन में 4 बार मुख द्वारा । 

- सेडेटिव कफ मिक्सचर । 

- सैलाइन आई स्पोन्जिज ( Saline Eye Sponges ) । 

- द्वितीयक बैक्टीरियल संक्रमण के लिये उचित एण्टीबायोटिक

नोट - वैसे तो खसरा अपने आप 7 से 10 दिन में ठीक हो जाता है , लेकिन अगर आपने थोड़ी - सी भी लापरवाही की , तो इसमें कम्पलीकेशन हो सकता है , जैसे - निमोनिया , कान का बहना , गर्दन के आस - पास गिल्टियाँ होना , दस्त होना या दिमाग में सूजन होना आदि । ब्रान्को - न्यूमोनिया इसका एक प्रमुख उपद्रव है । इसके लिये - सेडेटिव , एण्टीबायोटिक्स एवं एण्टीपायरेटिक्स दें । 

खसरे की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -

1. खसरे में तीव्र ज्वर होने पर → शीतल जल की पट्टी सिर पर रक्खें । एवं ' क्रोसिन ' या ' पैरासिटामोल ( Calpol ) की 1-1 टेबलेट हर 4 घण्टे पर दें । 

2. दानों को सुखाने के लिये → न्यो - स्पोरिन आयन्टमेण्ट को पीप वाले दाने पर लगाने से खसरे के दाने शीघ्र सूख जाते हैं अथवा ' सेप्ट्रान ' 1/2 - 1 टेबलेट दिन में 1 से 2 बार दें ।

3. सूखी खाँसी से नींद न आने में → सीरप कोडीनफोस अथवा टिक्सी - लिक्स लिंक्टस की 1/4 - 1/2 चम्मच दिन में 2-3 बार ।

4. कान में दर्द होने पर → टायोटायसिन ईयर ड्राप्स की 2-3 बूंदें प्रत्येक कान में डालें । एवं प्रोकेन पेनिसिलीन अथवा स्ट्रेपटोपेनिसिलीन की सुई दिन में एक बार माँस में लगावें । 

5. खसरे में निमोनिया हो जाने → एक्रोमाइसीन 1 कै . , सीलिन 500 मि . ग्रा . की 1/2 टेबलेट , कोरामीन ( सीबा कं ) 1/2 टेबलेट , सीरप जेफ्रोल या टिक्सीलिक्स 1/2 चम्मच , जल 30 मि . ली . । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 या 3 बार दें । अथवा टैरामाइसीन 250 मि . ग्रा . का 1 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें ।

  

खसरे में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट टेवलेट / कैप्सूल्स . -

शरीर पर दाने निकलने के बाद → 

1. डूरासाइक्लीन ( Duracyclin ) ' यूनिकेम 100 मि . ग्रा . कै . ' → 2 कै . देकर इसके बाद 1 कैप्सूल नित्य 5 दिन तक दें । बच्चों को 1/4 - 1/2 कै . नित्य 2 दिन तक । 

सावधान - गर्भावस्था एवं 3 साल से कम आयु के बच्चों में इसका प्रयोग न करें । 

2. बैक्ट्रिम ( Cactrim ) → बड़ों को 1-2 टे . नित्य 5 दिन तक । बच्चों को 1/2 गोली दिन में 2 या 3 बार दें ।

3. एम्पोक्सिन ( Ampoxin ) ' यूनीकेम ' → 250-500 मि . ग्रा . का 1-1 कै . दिन में 2 या 3 बार जल से दें ।  

4. टैरामाइसीन / एक्रोमाइसीन / ओरियोमाइसी -1 - कै . प्रति 4 घण्टे पर → 1 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें ।

5. बैक्सिन ( Baxin ) लायका 250-500 मि . ग्रा . कै . → 1 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें।

 

• खसरे में लगाने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन -


 
1. ऑक्सीस्टे क्लीन ( Oxystecline ) ' साराभाई   2 मि . ली . माँस में प्रति 8-12 घण्टे पर ।

2. क्रिस -4 ( Crys - 4 ) ' साराभाई  1/2 - 1 वायल ( 2 - 4 लाख यूनिट ) का माँस में प्रति 12 से 24 घण्टे में एक इन्जे . माँस में लगावें ।

3. एण्टी - टॉक्सीन ऑफ मिजिल्स ( Anti toxin of Measles ) → 400 यूनिट त्वचा में इन्जेक्शन लगाने से खसरा में श्वास के अवरोध दूर होते हैं ।

  

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