आमाशय - आन्त्रशोथ ( गैस्ट्रो - ऐंटराइटिस ) [ Gastro - Enteritis ]
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| आमाशय - आन्त्रशोथ ( गैस्ट्रो - ऐंटराइटिस ) [ Gastro - Enteritis ],by - https://www.scientificanimations.com/ |
पर्याय -
■इसे आम बोलचाल में " उल्टी और दस्तों की बीमारी " से जाना जाता है ।
■यह रोग आहार विषाक्तता ( Food Poisoning ) के अन्तर्गत लिया जाता है ।
परिचय -
इस रोग में आमाशय और छोटी आंत की श्लेष्म कला में शोथ( सूजन ) हो जाता है । इसके रोगी मुख्य रूप से उल्टियाँ तथा पतले दस्तों की शिकायत करते हैं , जिससे कुछ ही घण्टों में , खासतौर से बच्चों में पानी और सोडियम जैसे खनिज लवणों की अत्यधिक कमी हो जाती है जो बहुत थोड़े समय में जान लेवा सिद्ध हो सकती है । इसीलिये हमारे देश में इस रोग से प्रति वर्ष कई रोगियों की मृत्यु तक जाती है ।
याद रखिये - अस्वच्छ जल या आहार के सेवन के कुछ ही घण्टों ( 4 घण्टे तक ) के बाद आरम्भ हो जाता है । इसमें प्रायः ज्वर होने से इसे ज्वरातिसार ' भी कहा जा सकता है ।
रोग के सामान्य कारण -
यह रोग अनेक कारणों से हो सकता है -●आहार विषाक्तता ( Food Poisoning ) ।
●जीवाणु विष ( Toxins ) ।
●संक्रमण ( Infection ) ।
●रासायनिक विष मिले खाद्य पदार्थ तथा विषैले फंगस युक्त पदार्थ खा लेने से ।
आहार जन्य विषाक्तता ( Food Poisoning ) → इस अवस्था में भोजन करने के कुछ ही समय बाद रोगी को दस्त तथा वमन( उल्टी ) प्रारम्भ हो जाते हैं । वमन तथा दस्त कालरा की तरह होते हैं । इस स्थिति में हैजे की आशंका उत्पन्न हो जाती है जबकि स्थिति कुछ और ही होती है ।
उपरोक्त स्थिति तभी उत्पन्न होती है जबकि -
●भोजन किसी न किसी प्रकार विषाक्त होता है ।
●कुछ भोजन स्वयं ही विषैले होते हैं ।
●अनेक बार विषैले फंगस आहार में मिल जाते हैं ।
रोग के सामान्य लक्षण -
रोग के लक्षण एवं उनकी तीव्रता खाये गये विषाक्त भोजन की मात्रा पर निर्भर करते हैं - इसके प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं -
■ हृल्लास ( Nausea ) ,
■ वमन( उल्टी ) ,
■ अतिसार एवं उदरशूल( पेट दर्द ) ,
■ मल पानी जैसा पतला ( Waterly ) एवं दुर्गन्ध युक्त । साथ में रक्त एवं श्लेष्मा की उपस्थिति ।
तीव्र संक्रमण की उपस्थिति में -
■ अवसादन ( Prostration ) के चिन्ह मिलते हैं ।
■ विषाक्तता का कारण रासायनिक या जीव विष हो तो - रोग का आरम्भ शीघ्र और तीव्र होता है और शीघ्र ही निपात की स्थिति में पहुँच जाता है । रोगी का तापक्रम सबनार्मल ( Subnormal ) हो जाता है ।
याद रखिये - संक्रमण प्रकार में लक्षण धीरे - धीरे प्रारम्भ होते हैं और ज्वर भी साथ में रहता है ।
★ कभी - कभी भोजन ठीक प्रकार से न रखने पर भी वह विषाक्त हो जाता है ।
★ कभी - कभी बैक्टीरिया भी सादे आहार में मिल जाते हैं , उनसे उत्पन्न टॉक्सिन विषाक्तता का कारण बन जाते हैं ।
★ यह बैक्टीरिया प्रायः ' सालमोनेला जाति के होते हैं ।
याद रखिये - आहार विषाक्तता का प्रमुख कारण रोगाणुओं से युक्त खाद्य पेय पदार्थ या रासायनिक ( Chemicals ) पदार्थ होते हैं । हानिकारक रासायनिक द्रव्यों से युक्त पात्रों में खाद्य पदार्थों के रखने से भी विषैले लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।
■शादी , विवाह , सहभोजनों एवं पार्टियों आदि में जहाँ बड़ी मात्रा में भोजन तैयार किया जाता है । विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में आहार विषाक्तता होने की सम्भावना अधिक होती है ।
■आषाढ़ से भादों तक दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन करने से गैस्ट्रो - ऐन्टेराइटिस की अधिक सम्भावना रहती है ।
■गंदे होटलों एवं रेस्टोरेन्ट में भोजन तथा जलपान रोग पैदा करने वाले होते हैं ।
■■■ई . कोलाई , शिगेला , सालमोनेला , स्टैफ , स्यूडोमोनास , प्रोटियस , केम्पाइलोवेक्टर जैसे जीवाणु गैस्ट्रो ऐटराइटिस के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं । लेकिन कुछ रोगी वायरस , प्रोटोजुआ और जीवाणुओं से निकले विषैले पदार्थों से भी प्रभावित हो जाते हैं । कॉलरा ( हैजा ) में भी रोगी पतले दस्तों तथा उल्टियों की शिकायत करते हैं । इन विषाणुओं से दूषित पानी , अन्य पेय पदार्थों एवं भोजन ग्रहण करने से स्वस्थ व्यक्ति को यह रोग हो सकता है । किसी व्यक्ति में खासतौर से बच्चों में कान , त्वचा , श्वसन तंत्र , मूत्र तंत्र में संक्रमण से भी गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस हो सकती है । कुछ रोगियों में ' फूड एलर्जी ' भी उल्टी दस्तों की बीमारी कर देती है ।
■■वातावरण में गंदगी और अज्ञानता -
आन्त्रशोथ का रोग फैलाने के लिये मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं- गर्मी का मौसम , भोजन बनाने में , रखने में तथा परोसने में असावधानी , बच्चों के दूध और पानी की बोतल की उचित सफाई न रखना , मां के स्तन का संक्रामक रोग इत्यादि इस रोग को बढ़ावा देते हैं । इधर - उधर टट्टी करना एवं फल और तरकारियों को बिना धोये खाना तथा खाने - पीने की वस्तुओं को मक्खियों , चूहे , धूल से न बचाना इस रोग को फैला देते हैं ।
लक्षणों के सम्बन्ध में -
दूषित पानी , अन्य पेय पदार्थो और भोजन के शरीर में पहुँचने के कुछ घण्टों बाद ही रोगी को उल्टी , पतले दस्त और पेट में दर्द शुरू हो जाता है । दस्तों की संख्या एक दिन में लगभग 5 से 50 तक होती है । कुछ रोगी टट्टी में खून आने , अधिक प्यास लगने , होंठ सूखने , बुखार चढ़ने , सिरदर्द तथा चक्कर आमे की भी शिकायत करते हैं ।
वैसे तो उल्टी और दस्तों के बहुत से कारण होते हैं , लेकिन आजकल के मौसम में यदि किसी व्यक्ति को ये दोनों लक्षण एक साथ हों तो डॉक्टर सर्व प्रथम आन्त्रशोथ ही निदान करते हैं ।
जटिलतायें -
■शरीर में जल की कमी - उल्टी और दस्तों में शरीर में जल तथा खनिज लवणों की बहुत थोड़े समय में ही अत्यधिक कमी हो जाती है जिससे अनेक जटिलतायें उत्पन्न हो जाती हैं । रोगी की नाड़ी तथा श्वास की गति तेज और ब्लड प्रेशर तथा मूत्र की मात्रा कम हो जाती है । जीभ और होंठ सूखे नजर आते हैं । त्वचा का लचीलापन प्रायः कम हो जाता है । रोगी चिंतित तथा सुस्त मालूम होता है , उसे पसीना आने लगता है , आँखें अन्दर धंसी सी मालूम होती हैं , हाथ - पैर ठंडे मालूम होते हैं , लेकिन कुछ रोगियों में ये स्पर्श करने पर हल्के गरम से लगते हैं । कुछ रोगी बेहोश भी हो जाते हैं और अंट - संट बकने लगते हैं ।
■गुर्दे फेल हो जाना - शरीर में जल की कमी तथा रक्तचाप गिर जाने से गुर्दो की कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे मूत्र की मात्रा कम हो जाती है । जो कि एक बहुत खतरनाक लक्षण माना जाता है । ऐसे बहुत से रोगियों में तो मूत्र की मात्रा बढ़ाने वाली दवायें भी नाकाम रहती हैं और जान बचाने के लिये डायलसिस की तत्काल आवश्यकता पड़ती है।
■पेट का फूलना - इमरजेन्सी वार्ड में बहुत से रोगी कै , दस्तों के बाद पेट फूलने की शिकायत लेकर भर्ती होते हैं और इस दशा में उनको टट्टी भी नहीं होती । अज्ञानता के कारण वे कब्ज तोड़ने की दवायें लेना प्रारम्भ कर देते हैं लेकिन उनको विशेष लाभ नहीं होता । इस प्रकार पेट फूलने का वास्तविक कारण रक्त में पोटाशियम खनिज की कमी हो जाना है , जिससे उनकी आँतों की गति मंद पड़ जाती है और रोगी का पेट फूलने लगता है । शिरा द्वारा नमक के घोल ( सैलाइन ) की बोतल में थोड़ी मात्रा में सावधानी से पोटेशियम क्लोराइड का घोल मिलाकर देने से रोगी को राहत मिलती है । बशर्ते रोगी को मूत्र पर्याप्त मात्रा में हो रहा हो ।
रोग की पहिचान -
●प्रायः आहार विषाक्तता एक साथ अनेक व्यक्तियों में होती है । ऐसी परस्थिति में निर्णय भी आसान होता है ।
●इस रोग का सम्प्राप्ति काल ( Incubation Period ) कारण के अनुसार अलग अलग होता है । इससे विषाक्तता के कारणों को जानने में सहायता मिलती है।
●भोजन के आधा घण्टे बाद ही वमन( उल्टी ) होने लगे तो - रासायनिक विष की सम्भावना । लक्षणों के प्रारम्भ में 6 घण्टे का समय लगे तो - जीव विष ( Toxins ) कारण होना सम्भव ।
●12 से 48 घण्टों का समय लगे तो सालमोनेला संक्रमण की सम्भावना ।
●संदेह होने पर रोग के सही - सही निर्णय के लिये वान्त पदार्थ ( Vomit Material ) आदि मल की परीक्षा करें । इस प्रकार सालमोनेला श्रेणी के रोगाणुओं को पृथक किया जा सकता है ।
●वैसे इसका निदान बहुत असान है , रोग भोजन के कुछ ही घंटों बाद प्रारम्भ हो जाता - बहुत से व्यक्ति एक साथ ग्रस्त हो जाते हैं जिन्होंने एक सा ही बना भोजन किया है जो कि विषाक्त था ।
रोग के परिणाम -
●रोग की उग्रावस्था में वमन( उल्टी ) और दस्त इतनी तीव्रता के साथ आते हैं कि रोगी में हैजा जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
●शरीर में जलयांश के अधिक निकल जाने से रोगी में निर्जलीभवन ( डिहाइड्रेशन ) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और शुष्कता के लक्षण दिखायी देने लगते हैं । इस समय रोगी का जीवन संकट में पड़ जाता ।
●शरीर में ठंडा पसीना आने लगता है और नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है । रोगी अत्यन्त घबराया तथा संकटमय दिखायी देता है ।
●जीव विष तथा रासायनिक विष से उत्पन्न दशा में शरीर का तापक्रम बहुत घट जाता ।
●जब रोग सीधे जीवाणुओं के संक्रमण से होता है तब रोगी को रोगमुक्त होने में कई दिन लग जाते हैं ।
नोट - ऐसी घटनायें अधिकांश रूप से सामूहिक भोजन करने , मैरिज पार्टियों अथवा दावत के पश्चात होती रहती हैं , क्योंकि इनमें एकत्रित लोगों ने एक ही स्थान का बना हुआ भोजन किया है ।
चिकित्सा निर्देश -
●यह रोग स्वयं मर्यादित स्वरूप का होता है । चिकित्सा प्रायः लाक्षणिक होती है ।
●इसकी कोई विशिष्ट औषधि नहीं है क्योंकि यह कई प्रकार के कीटाणुओं के द्वारा होता है , फिर भी फिर भी सम्भावित जीवाणुओं को नष्ट करने के लिये ' एण्टीबायोटिक्स ' तथा ' सल्फा ड्रग्स का प्रयोग करना चाहिये ।
●उल्टी और दस्तों की बीमारी के कारण शरीर में पानी तथा खनिज लवणों की कमी , खासतौर से बच्चों में बहुत थोड़े समय में ही खतरनाक सिद्ध हो सकती है । इसलिये सबसे पहले आवश्यकतानुसार इनकी पूर्ति जरूरी होती है । कितना पानी दिया जाय , मुँह से दें अथवा शिरा द्वारा ( I / V ) , यह रोगी की दशा पर निर्भर करता है ।
सहायक चिकित्सा एवं पथ्यापथ्य -
■रोगी को शैया पर पूर्ण विश्राम ।
■रोगी के शरीर का तापक्रम बनाये रखना चाहिये । अतः उसके पेट पर गर्म पानी की बोतलें रखनी चाहिये । अथवा कम्बल उढ़ा देना चाहिये ।
■वमन( उल्टी ) की शान्ति के लिये रोगी को बर्फ के टुकड़े चुसवायें ।
■निर्जलीभवन को दूर करने के लिये रोगी को आई . वी . सैलाइन देना चाहिये ।
■रोगी को आरम्भ में भोजन न देकर केवल फल का रस और चाय ही दी जाय । सुधार हो जाने पर धीरे - धीरे अर्ध तरल फिर थोड़ी मात्रा में आहार दिया जाता है । 2-3 दिन बाद खिचड़ी ।
■प्रारम्भ में रोगी को केवल जल तथा कच्चे नारियल का पानी पिलाना चाहिये ।
याद रखिये - तीव्र आक्रमण होने पर निपात एवं जल की कमी को दूर करने की दृष्टि से रोगी को चिकित्सालय भेज देना उपयुक्त है ।
- रासायनिक द्रव्यों एवं जहरीले , कुकुरमुत्ता ( धोखे में बरसाती धरती के फूल ) जैसी चीजों के खाने से विषाक्तता हुई हो तो रोगी के आमाशय के शुद्धिकरण की व्यवस्था करनी चाहिये । साथ ही उपयुक्त प्रतिकारक ' एण्टीडोट्स भी दें ।
नोट- सभी अवस्थाओं में रोगी को खनिज लवण युक्त जल पीने को दें । अन्यथा जल की कमी को दूर करने के लिये ग्लूकोज सैलाइन शिरा मार्ग से दें ।
आन्त्रशोथ की औषधि चिकित्सा -
◆अधिकांश रोगी मृदु स्वरूप के होते हैं और लक्षण कुछ दिनों में स्वयं सबसाइड हो जाते हैं ।
◆ठोस पदार्थ लेने से सख्त मनाही । केवल पानी के लिये निर्देशित करें ।
◆तरल तथा इलेक्ट्रोलाइट्स मुख द्वारा ।
◆' कोडीन फास्फेट का प्रयोग सही माना जाता है । रोगी जो बीमार है अथवा उसमें जल की कमी हो गई है , उसे ऐसी स्थिति में तरल ( Fluid Therapy ) दें ।
■■खनिज लवणों का घोल प्रारम्भ से ही दें - यदि रोगी को लगातार उल्टियाँ न हो रही हों तो पानी , खनिज लवणों तथा ग्लूकोज का मिश्रण बहुत संतोषजनक रहता है । इसमें नमक , सोडा बाई कार्ब , पोटाशियम क्लोराइड तथा ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा रहती है , जिसे स्वच्छ पानी में मिलाकर घोल तैयार किया जाता है । इसे थोड़ी - थोड़ी देर के बाद आवश्यकतानुसार दिया जाता है । दूरदराज के गाँवों में यह उपलब्ध न हो तो 8 छोटा चम्मच चीनी और 1 चम्मच नमक एक लीटर स्वच्छ पीने के पानी में मिलाकर घोल तैयार करें , जिसमें थोड़ा सा नीबू का रस मिला सकते हैं । यदि पतले दस्तों के प्रारम्भ होते ही यह घोल रोगी को दिया जाय तो शरीर में पानी तथा खनिज लवणों की विशेष कमी नहीं होगी तथा शिरा द्वारा भी घोल देने से बचा जा सकेगा , क्योंकि शिरा द्वारा घोल देना महंगा पड़ता है । समय लगता है , शरीर में संक्रमण फैल सकता है । शिरा तथा आँत में सूजन हो सकती है और यह सुविधा प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध भी नहीं है ।
शिरा द्वारा खनिज लवणों का घोल -
लेकिन यदि रोगी को लगातार उल्टियाँ हो रही हों , वह मुँह से कुछ भी लेने में असमर्थ हो , पानी और खनिज लवणों की बहुत अधिक कमी हो गई हो , ब्लड प्रेशर बहुत कम हो गया हो , मूत्र पर्याप्त मात्रा में न हो रहा हो , रोगी की आँतों की गति शिथिल हो गई हो , पेट फूल रहा हो , रोगी बेहोश हो तो शिरा द्वारा खनिज लवणों का घोल देना आवश्यक और जीवन रक्षक हो जाता है ।
सावधान - लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिये कि कहीं आवश्यकता से अधिक घोल न दिया जाय , अन्यथा फेफड़े , हृदय और मस्तिष्क की कई जटिलतायें उत्पन्न हो सकती हैं ।
तीव्र स्वरूप के दस्त तथा वमन( उल्टी ) की स्थिति में -
■तीव्र विशिष्ट जीवन रक्षक औषधि का उपयोग सही नही माना जाता है । ( एण्टीबायोटिक औषधियाँ ) ।
■यदि सालमोनेला बैक्टीरिया की सम्भावना प्रतीत हो रही हो , अथवा इनका निश्चित प्रमाण मिल रहा हो- अथवा डायरिया गम्भीर या दीर्घ कालिक ( Prolonged ) हो तो - सिप्रोफ्लोक्सासिन ( Ciprofloxacin ) 500 मि.ग्रा . , दिन में 2 बार मुख द्वारा । ट्राइमेथोप्रिम ( Trimethoprim ) 200 मि . ग्रा . दिन में 2 बार ।
■साथ में मेनिन्जाइटिस की स्थिति हो तो - एम्पीसिलीन + जेण्टामाइसीन का संयुक्त प्रयोग ।
■साथ में यदि ' विषाक्तता ' केमिकल अथवा जहरीले खाद्य ( Poisonous Food ) से हो तो - रोगी के आमाशय को गर्म पानी से साफ करना आवश्यक होता है ।
अनावश्यक दवायें न लें - अधिकांश पेट रोग चिकित्सकों का मत है कि ' डाइफीनोक्सीलेट ' एवं ' लोपरामाइड जैसी आँत की गति कम करने वाली औषधियों से जहाँ तक सम्भव हो बचना चाहिये , खासतौर से बहुत छोटे गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस के रोगी बच्चों को क्योंकि इनमें बैक्टीरिया और भी अधिक उपज सकते हैं । साथ ही पेट बहुत अधिक फूलने की आशंका रहती है और आँत में रुकावट के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं । इन दवाओं में यदि क्लोरमफेनिकॉल दवा का मिश्रण हो तो भी इनसे बचना चाहिये । गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस के रोगी को शराब( अल्कोहल ) मिले टॉनिकों से भी बचना चाहिये ।
गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस से कैसे बचें ? -
●गरमी के मौसम में खासतौर से जब यह रोग व्यापक रूप से फैला हो तो पानी छानकर और उबाल कर पियें तो अधिक उत्तम रहेगा ।
●अन्य पेय पदार्थों ( शरबत , लस्सी , मठा , ठंडाई , दूध ) तथा भोजन को मक्खियों , कॉकरोच , चूहे एवं धूल से बचाना चाहिये और इनको ताजा ही ग्रहण करें ।
●बाजार के कटे , खुले फल न खायें ।
●मिठाई पर मक्खियाँ लगी हो तो उसे कदापि ग्रहण न करें ।
●भोजन बनाने , परोसने और ग्रहण करने से पहले साबुन से हाथ भली प्रकार धो लें।●बच्चों के दूध तथा पानी की बोतल , चम्मच , कटोरी इत्यादि बर्तनों को हर समय उबॉल कर साफ करके ढक कर रक्खें । उनके शरीर में कहीं भी अन्य संक्रामक रोग हों तो उसका त्वरित उपचार करें । बच्चों को गंदे स्थान में न खेलने दें । उनके मुँह में दूध पिलाते वक्त अपनी उंगली न डालें । उनको कच्चा दूध न पिलावें ।
●गंदे ढंग से बनाई गई आइसक्रीम , कुल्फी , बर्फ न खायें ।
●पानी की बर्फधोकर ही सेवन करें , वैसे इसका सेवन जितना कम किया जाय उतना ही अच्छा है । खासतौर से यदि यह गंदे टाट में रक्खी गई हो तो ।
●बासी भोजन कदापि ग्रहण न करें।
आन्त्रशोथ की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -
■ उदर पीड़ा( पेट दर्द ) → पेट की गर्म पानी से ' सिकाई । । एट्रोपीन सल्फेट 0.6 मि . ग्रा . S/C इन्जे . रूप में ।
■ वमन( उल्टी ) होने के बाद भी उदर पीड़ा जारी रहे → प्रोबेन्थीन ' 15 मि . ग्रा . , प्रति 6 घण्टे पर ।
■ यदि तीव्र दस्त बराबर आ रहे हों → स्ट्रेप्टोमेग्मा - वयस्क- 1 टे . प्रति 6 घण्टे पर । बालक -10 मि . ली . प्रति 6 घण्टे पर ।
■ वमन → स्वीक्वल 5 मी . ग्रा . का एम्पुल मांस में लगावें । तत्पश्चात 10 मि.ग्रा . की 1 टे . प्रति 8-12 घण्टे पर मुख से दें ।
■ निर्जलीभवन ( Dehydration ) → ' इलेक्ट्रोल ' पाउडर ( Electrol P ) मिलाकर जल बार - बार पिलावें । अथवा 5 % डेक्स्ट्रोज 500 मि . ली . I/V ड्रिप से दें । उसके बाद 500 मि . ली . नार्मल सैलाइन दें ।
नोट - रोग की गम्भीर स्थिति में ' कालरा के समान चिकित्सा करें ।
गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस में प्रयोग आने वाली ऐलो . पेटेन्ट टे . / कैप्सूल -
◆एल्साइक्लीन ( Alcycline ) नि . ' एलेम्बिक 25mg कै . → 1 कै . प्रति 6 घण्टे पर ।
◆एमोक्सिल ( Amoxil ) नि . ' जर्मन रेमेडीज → 1 कै . प्रति 4-6 घंटे पर । बालक 50 से 100 मि . ग्रा . / किलो भार पर 3-4 मात्राओं में विभक्त कर दें ।
◆मेथोक्साप्रिम ( Methoxaprime ) नि . ' आई . डी . पी . एलो . → 2 टे . दिन में 2 बार ।
◆एमोक्सीवॉन ( Amoxivan ) नि . ' खण्डेलवाल 250 , 500 mg कै . → 250-500 मि . ग्रा . दिन में 3 बार । इसका सीरप भी आता है ।
◆एम्पीपेन ( Ampipen ) नि . बीथ 250 mg कै . → 250-500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर ।
◆बायोसिलिन ( Biocilin ) नि.'बायोकेम 250,500 mg कै . → 250-500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर । सीरप तथा इन्जे . भी आता है ।
◆केम्पीसिलिन ( Campicillin ) नि . ' कैडिला 250,500 mg → 1-2 कै . प्रति 8 घण्टे पर । ड्राप तथा सीरप भी आता है ।
◆डायासिलिन ( Diacillin ) नि . ' डी . फार्मा 250,500 mg → 1-2 कै . प्रति 6 घण्टे पर । डायासिलिन प्लस भी आता है । सीरप तथा ड्राप्स भी ।
◆इडीमोक्स ( Idimox ) नि . ' आई . डी . पी . एलो.'250,500 mg ' → 1-2 कै.दिन में 3 बार । इसका सीरप भी आता है ।
◆मोक्सीलियम ( Moxilium ) नि . ' बायोकेम 250,500 mg → 1 कै . प्रति 8 घण्टे पर ।
◆रोसलिन ( Roscillin ) नि . रैनवैक्सी ' → 1 कै . प्रति 6 घण्टे पर ।
◆सिफ्रान ( Cifran ) नि . ' रैनवैक्सी 250 , 500 mg → 1 कै . प्रति 12 घण्टे पर ।
◆टैरामाइसीन ( Terramycin ) नि . ' फाइजर 500 mg → 1 कै . दिन में 2 बार 3 से 5 दिन तक पर्याप्त ।
गेस्ट्रो - ऐन्टराइटिस में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट पेय -
■ मोक्सीलियम ड्राई सीरप नि . ' बायोकेम → 2-4 चम्मच प्रति 8 घण्टे पर ।
■ रोसलिन पे . ड्राप्स → 50-200 मि . ग्रा . / कि . शरीर भार पर 4 विभाजित मात्राओं में ।
■ मेथोक्साप्रिम सस्पेन्शन नि . ' आई . डी . पी . एल . → 6 सप्ताह से 5 माह तक - 2-5 मि . ली . 6 माह से 5 साल तक -5 मि . ली . दिन में 2 बार ।
■ सेप्ट्रान पेडियाट्रिक सस्पेन्शन नि . ' वेल्कम → बालक 6 सप्ताह से 5 माह तक 2-5 मि . ली . 16 माह से 5 साल तक -5 मि . ली . 6 से 12 साल -10 मि . ली . दिन में 2 बार ।
इन्जेक्शन -
■केनसिन ( Kancin ) नि . एलेम्विक 500 mg , 1 gm → 0.5 - 1000 ग्राम , नित्य ।
■रोसलिन इन्जे . नि . ' रैनवैक्सी ( 250 , 500 mg ) → 1 इन्जे . नित्य मांस में।
■ओरीप्रिम इन्जेक्शन नि . ' कैडिला → 1 इन्जे . , नित्य मांस में 2 बार ।
■जेनोसिन इन्फ्यूजन ( Zanocin Infusion ) नि . ' स्टेन केयर → 100 मि . ली . इन्फ्यूजन रूप में I / V दें ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -
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