मलेरिया / विषम ज्वर [ Malaria ] क्या है, क्यो होता है, इसके लक्षण , परिणाम, एवमं उचित चिकित्सा विधि क्या है? What is Malaria / Heterogeneous Fever [Malaria], what happens, its symptoms, results, and what is the proper treatment method?

 मलेरिया / विषम ज्वर [ Malaria ] 

मलेरिया / विषम ज्वर [ Malaria ]

अन्य नाम ~ 

मौसमी बुखार , जुड़ी ताप , जाड़े का बुखार । 

परिचय ~ 

एनोफिलीज वंश के संक्रमित मादा मच्छर के काटने से संचारित प्लाज्मोडियम नामक एककोशिकीय परजीवियों की लाल रक्त कोशिकाओं में विद्यमानता से उत्पन्न होने वाला एक तीव्र अथवा जीर्ण संक्रामक रोग जिसमें समय - समय पर जाड़ा ( ठंड ) चढ़ता है और ज्वर ( बुखार ) हो जाता है । ( लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने के कारण ) तथा पसीना आता है । जीर्ण ( लंबे समय से ग्रसित ) रोगियों में अधिकतर रक्ताल्पता हो जाती है तथा प्लीहा ( एक अंग जो पेट मे स्थित होता है ) बढ़ जाती है । 

एक ज्वरयुक्त रोग जो एनॉफीलिज वंश के मच्छरों द्वारा प्लाज्मोडियम वंश के परजीवियों को रक्त में सम्प्रेषित ( भेजना ) कर देने के कारण होता है । ज्वर के दौरे प्लाज्मोडियम के प्रकार के अनुसार 48 से 72 घण्टे की अवधि के अंतर से आते हैं । मलेरिया का एक प्रारूपिक स्वरूप तीन अवस्थाओं से युक्त होता है- तीव्र कंपकंपी ( ठंड ) तेज ज्वर स्वेदन ( पसीना छूटना ) । 

नोट - एक दिन या दो दिन छोड़कर , प्रतिदिन या दिन में कई बार ठंड लगकर ज्वर आना इसकी एक विशेषता है । चिकित्साशास्त्र में यही एक ऐसा रोग है जिसमें एक या दो दिन का विराम ( Remittence ) होकर भी फिर निश्चित समय पर ज्वर आता है । यह विराम ही इसकी विशेषता है ।


रोग के कारण ~ 

प्लाज्मोडियम की 4 जातियाँ अर्थात् प्लाज्मोडियम बाइवैक्स , प्लाज्मो डियम फैल्सीपेरम , प्लाज्मोडियम मलेरी तथा प्लाज्मोडियम ओवेल मलेरिया रोग उत्पन्न करती हैं । 

- मलेरिया का जीवाणु मादा एनोफिलीज मच्छर द्वारा काटने पर मनुष्य के शरीर में पहुँचता है । 

- भारत में इस प्रोटोजोआ का मुख्य वाहक मादा एनोफिलीज स्टे फेसी नामक मच्छर है ।


- प्ला . वाईवेक्स और प्ला . ओवेल तृतीयक ( Tertial ज्वर ) , प्ला . मलेरी से चतुर्थक ( Quartan ) ज्वर होता है ।


रोग के लक्षण ( सामान्य ) ~ 

संक्रमित मच्छर के काटने एवं बुखार चढ़ने के बीच 7 से 10 दिन का अंतर रहता है।

- इस अवधि में रोगी को भूख नहीं लगती , सिर दर्द रहता है और थकावट बनी रहती है ।  

- ठंड की अवस्था अथवा शरीर की कंपकपाहट के कारण रोगी अत्यधिक ठिठुरने लगता है । इसके साथ ही उल्टियाँ होने लगती हैं । सिर दर्द बना रहता है इसके बाद बुखार चढ़ना शुरू होता है । 

- रोगी को जलन के साथ अत्यधिक गर्मी अनुभव होती है । सूखी एवं जलती त्वचा ।  

- बुखार 104 ° से 106 ° तक । 

- लगभग 1-2 घण्टे बाद पसीना आना प्रारम्भ होता है एवं बुखार कम होने लगता है । 

- बुखार एक निश्चित समयबद्धता के साथ ही परिलीक्षत ( दिखाई पड़ना ) होता है । यह समयबद्धता 12 , 24 , 48 , 72 घण्टे हो सकती है । एकतंरा बुखार 1 दिन छोड़कर आता है । तिजारी हर तीसरे दिन और चौथरी चौथे दिन और कभी कभी हर सप्ताह में एक दिन ।

नोट - प्ला . फैल्सीपेरम से कुछ अधिक समय तक रहने वाला ज्वर होता है । जो ' उप - तृतीयक ( Sub - tertian ) ज्वर कहलाता है । 

- सामान्यतः प्ला . वाईवेक्स जीवाणु सुदभ्य तृतीयक , प्ला . मुलेरी चतुर्थक , प्ला . फैलसी पेरम दुर्दम्य तृतीयक और प्ला . ओवेल सुदम्य तृतीयक ज्वर उत्पन्न करते हैं । 


Malaria Parasite Connecting to Human Red Blood Cell, by - NIAID 

• मलेरिया का जीवाणु अपना जीवन चक्र 3 स्थानों में पूरा करता है ~

मनुष्य में → अमैथुनी चक्र ( Asexual Cycles ) । 

मादा एनोफिलीज मच्छर में - मैथुनी चक्र ( Sexual Cycle ) । 

मनुष्य के यकृत में । 

- अमैथुनी चक्र को पूरा करने में जीवाणु अलग - अलग समय लेते हैं ~ 

- प्ला . वाईवेक्स एवं प्ला . ओवेल नामक जीवाणु- 48 घण्टे 

- प्ला . फेलसी पेरम- 36 से 48 घण्टे । 

- प्ला . मलेरी- 2 घण्टे का समय लेते हैं । 

यही कारण है कि तृतीयक ज्वर 1 दिन छोड़कर , चतुर्थक ज्वर 2 दिन छोड़कर और यह सततक ( एक दिन में दो बार ) प्रतिदिन आता है ।


मलेरिया रोग निम्न प्रकार का होता है ~ 


1. सेरीब्रल मलेरिया ( Cerebral Malaria ) - प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम मलेरिया परजीवियों के मस्तिष्क में जमा हो जाने से उत्पन्न मस्तिष्क का मलेरिया जिसमें ' बेहोशी हो जाती है तथा बहुत तेज बुखार हो जाता है ( तापमान 107 ° F ऊपर हो जाता है ) अथवा आक्षेप ( दौरे पड़ने ) आने लगते हैं या पक्षाघात हो जाता है । कभी - कभी मृत्यु भी हो जाती है ।

2. फैल्सीपेरम मलेरिया ( Falciparum Malaria ) - प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम द्वारा उत्पन्न मलेरिया जो सबसे अधिक गम्भीर होता है , इसमें तीव्र लक्षण होते हैं एवं इससे कभी - कभी मृत्यु भी हो जाती है । 

3. लेटेन्ट मलेरिया ( Latent Malaria ) - ऐसा मलेरिया रोग जिसमें परजीवी रक्त में विद्यमान रहते हैं परन्तु इससे कोई लक्षण उत्पन्न नहीं होता । इस प्रकार के मलेरिया का रोगी रोग का भण्डार होता है । 

4. ओवेल मलेरिया ( Ovale Malaria ) - मलेरिया - परजीवी प्लाज्मोडियम ओवेल द्वारा उत्पन्न एक मृदु ( हल्की ) प्रकार का मलेरिया रोग जिसमें बार - बार तृतीयक ज्वर का आक्रमण होता है तथा जो स्वयं ही रोगमुक्ति में समाप्त हो जाता है । 

5. क्वार्टन मलेरिया ( Quartan Malaria ) - प्लाज्मोडियम मलेरी द्वारा उत्पन्न मलेरिया रोग जिसमें ज्वर प्रत्येक 72 घण्टे में अथवा चौथे दिन आता है तथा लक्षण इतने तीव्र नहीं होते , चतुर्थक मलेरिया कहलाता है । 

6. क्योटोडियन मलेरिया ( Quotidian Malaria ) - प्लाज्मोडियम वाइवैक्स द्वारा उत्पन्न मलेरिया जिसमें प्रतिदिन ज्वर हो जाता है और तापमान एकदम से बढ़ जाता एवं नीचे गिर जाता है । इसे ' दैनिक मलेरिया ' भी कहते हैं । 

7. टर्शियन मलेरिया ( Tertian Malaria ) - मलेरिया जिसमें ज्वर तीसरे दिन आता है तथा प्रवेग ( तीव्र ) ' जाड़ा , ' बुखार ' एवं ' पसीना आना इन अवस्थाओं में विभाजित रहता है । तृतीयक मलेरिया ( तिजारी ) कहलाता है । 

8. वाइवेक्स मलेरिया ( Vivax Malaria ) - प्लाज्मोडियम वाइवेक्स द्वारा उत्पन्न मलेरिया का सबसे अधिक मिलने वाला रूप जिसमें ज्वर तीसरे दिन आता है , जो अक्सर आता रहता है ।


रोग की पहिचान ~ 

- ठीक समय पर ज्वर आना और पसीना आकर उतर जाना , साथ में खून की कमी एवं प्लीहा वृद्धि भी हो तो रोग निर्णय आसानी से हो जाता है । विशिष्ट प्रकार का ज्वर , स्थान , ऋतु , रक्त एवं मूत्र परीक्षाओं तथा मलेरियानाशक औषधियों के प्रभाव से इसका निदान होता है । 

- रक्त परीक्षण में मलेरिया पैरासाइट्स मिलना इसका निश्चयात्मक निदान,


रोग का परिणाम ~ 

- मलेरिया में न्यूमोनिया , टाइफाइड , क्षय ( TB ) रोग , अरक्तता , यकृतशोथ , पित्ताश्मरी , वृक्कशोथ , प्लीहा विदार , कालमेह ज्वर , मानसिक विकार , नपुंसकता आदि रोग उपद्रव स्वरूप ( इसके साथ ही ) हो सकते हैं । 

- इस ज्वर में प्लीहा और यकृत बढ़ जाते हैं और चिकित्सा न करने पर पाण्डु रोग तथा पेचिश आदि हो जाती है।


चिकित्सा विधि ~ 

- शय्या पर पूर्ण विश्राम । 

- ताप को कम करने के लिये तापहर एस्प्रिन / पैरासिटामोल का उपयोग । 

- ठंड को दूर करने के लिये गरम पानी की बोतलें , कम्बल आदि का उपयोग । 

- द्रव ( तरल ) की कमी में ग्लूकोज / लवण जल ( Normal Saline ) कोशिका मार्ग से देना ।

- औषधि प्रयोग शीघ्र प्रारम्भ कर देना चाहिये । 

- रोगोत्तर काल ( रोग के समय ) में लौह युक्त टॉनिकों का सेवन करायें । 

- ज्वर के वेग का प्रथम अवस्था रोगी शीतकम्प ( कंपकपी ) ( Rigor ) अनुभव करता है । अतः उस समय कम्बल आदि की व्यवस्था करें । द्वितीय अवस्था में दाह ( गर्मी ) का अनुभव होता है एवं टेम्परेचर बढ़ता है अतः उस अवस्था में ' दाह शान्त ' का उपाय एवं ज्वर को शान्त करने के लिये ज्वरघ्न ( ज्वर नाशक ) औषधियों की व्यवस्था करें ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा ~ 

साधारण दशा में तुलसी की चाय अच्छी रहती है । पानी ताजा भी दिया जा सकता है । बेदाना , अंगूर , सेब , पपीता , परवल , साबूदाना , बार्ली , यवागू , नीबू , चौलाई का शाक , मेथी और गेहूँ की रोटी देनी चाहिये । 

- प्रतिदिन दस्त साफ होते रहने के लिये दूध - मुनक्का जैसी मधुर रेचक चीजें अवश्य दें ।

- ज्वर के आक्रमण के समय पसीना लाने वाली चीजें , गरम जल , सोंठ का चूर्ण आदि लाभप्रद हैं । मुह में बर्फ की डली रख दें और सिर पर बर्फ की पोटली रखें । 

- रोगी को अनिच्छापूर्वक उपवास नहीं करना चाहिये ।


मलेरिया में नैदानिक अनिवार्यतायें ~ 

- थकावट , भूख न लगना , सिर दर्दू एवं ठंड लगना । 

- शीतावस्था ( ठंड की स्थिति ) 1/2 घण्टे तक रहती है । रोगी को ठंड लगती है और वह कांपता है , कभी - कभी दाँत भी किट- किटाता है और अपने आप को कम्बल आदि से ढंक लेता है । 

- उसको तेज सिर दर्द एवं वमन होने लगता है । बुखार बढ़ता जाता है । 

- उष्णावस्था ( गर्मी की स्थिति ) 1-6 घण्टे तक रहती है । 

- इस दौरान वह दहकता सा हो सकता है और प्रलाप ( अनाप - शनाप बकना ) कर सकता है । वमन( उल्टी ) जारी रहता है । उसका चेहरा फीका , त्वचा शुष्क एवं जलती हुई सी होती है । ज्वर 41 ° C तक बढ़ सकता है । 

- स्वेदावस्था - इस दशा में खूब पसीना आता है , बुखार कम हो जाता है , रोगी को चैन आ जाता है और वह सो जाता है । 

- सामान्यतः तिल्ली बढ़ी हुई होती है , लेकिन बच्चों में जिगर ( liver ) भी छूने से दर्द कर सकता है । 

- नियमित अन्तराल पर जीर्ण ज्वर के आक्रमण हुआ करते हैं । 


मलेरिया की औषधि चिकित्सा ~ 

- मलेरिया की चिकित्सा ' क्लोरोक्वीन ' अथवा ' कैमोक्वीन ' से की जानी चाहिये । ' क्लोरीक्वीन फॉस्फेट'250 मि . ग्रा . या क्लोरोक्वीन सल्फेट 10 टेबलेट निम्न प्रकार से दें ,

वयस्क को सबसे पहले पैरासिटामोल देकर टेम्परेचर कम कर लें । उसके बाद 4 टेबलेट आरम्भ में , तत्पश्चात् 2-2 टिकिया 6-6 घण्टे बाद लगातार 2 दिन तक दें । 

रिसोचिन , मैलुब्रीन ( रैनवक्सी ) , सिपलाक्वीन ( सिपला ) , साइटोक्वीन , निवाक्विन ( Nivaquine- रोन - पलेन्क ) अच्छी औषधियाँ हैं ।

- केमोक्वीन 7 टेबलेट का एक कोर्स होता है जिसे निम्न प्रकार दिया जाता है 3 टेबलेट प्रारम्भ में ( केवल 1 मात्रा में ) तत्पश्चात् 2 टेबलेट , रोजाना 2 दिन तक । 

नोट - इन सभी औषधियों से केवल मलेरिया के आक्रमण को रोका जा सकता है । 

- इसकी पूर्ण चिकित्सा प्राइमाक्वीन ( Primaquin ) द्वारा की जाती है । इसकी 7 1/2- मि . ग्रा . . की मात्रा प्रतिदिन 10 दिन तक दी जाती है । 

सावधान - यह औषधि रोगी के यकृत पर कुप्रभाव डालती है । अतः इसका प्रयोग मलेरिया के पाजीटिव ( + ) well diagnosed रोगियों में ही करना चाहिये ।

मलेरिया के अन्य भेदों के लिये - ' प्राइमाक्वीन ' 7.5 मि . ग्रा . दिन में 2 बार 14 दिन तक दें । 

उपद्रवयुक्त मलेरिया में - क्लोरोक्वीन 400 मि . ग्रा . या क्विनीन 600 मि . ग्रा . को 500 मि . ली . आइसोटोनिक लवण सैलाइन में मिलाकर शिरामार्ग से ड्रिप रूप में आधे घण्टे के अंदर दें । इसे 6 से 6 घण्टे पर पुनः दे सकते हैं । 


• सहयोगी उपचार ( Supportive Treatment ) के रूप में ~

सेरीब्रल मलेरिया में - स्टीरॉयड्स । 

तीव्र ताप होने पर - शीतल जल से स्पंज / पंखे की निरन्तर हवा आदि की व्यवस्था । 

वृक्कपात की स्थिति में - हीमोडायलिसिस ( Haemodialysis ) करना चाहिये । । 

स्तब्धता की स्थिति में - शिरामार्ग से ग्लूकोज , स्टीरॉयड्स , प्लाज्मा आदि दें । 

रोग निरोध के लिये - क्लोरोक्वीन 300 मि . ग्रा . सप्ताह में 1 बार । 

नोट-  मलेरिया का सही निदान ( Diagnose ) न होने , भय आदि में रिमोडर ( Rimodar ) अथवा ' मेटाकाल्फिन ( Metakallin ) की 2 टेबलेट केवल । मात्रा में देना श्रेयकर रहता है । 24 घण्टे बाद दोहराना अच्छा रहता है । यदि बुखार नीचे आ जाये तो ऐसी ही 2 टेबलेट की एक मात्रा 1 सप्ताह बाद दोहरायें ।

रसिस्टेन्ट मलेरिया केसिस में - क्विनीन सल्फेट 600 मि . ग्रा . कै . में दिन में 3 बार 10 दिन तक दें । 

अथवा- 

ऐसे केसिस में - क्रोडोक्सिन - एफ . एम . ( Croydoxin - F.M . ) नि . ' क्रोडोन कं 2 टे . सप्ताह में 1 बार केवल 1 मात्रा पर्याप्त । बच्चों को -9 से 14 साल पर 2 टे . , 4-8 साल पर 1 टे . , 4 साल की उम्र में 1/2 टे . केवल 1 मात्रा ।रोग निरोध में 1 टे . सप्ताह में 1 बार । 

अथवा- 

क्लोरोक्वीन रसिस्टेण्ट मलेरिया में - रिमोडर ( एफ . डी . ) 2 टे . 1 मात्रा में केवल । बच्चों को 1/2 टेबलेट ।


लक्षणों के अनुसार मलेरिया की चिकित्सा ~

1. अधिक शीत लगने पर - ' कोरामीन 2 मि . ली . माँस या नस में अथवा ' कैल्शियम ग्लूकोनेट ' ( 10 % ) 5-10 मि . ली . आई . वी . धीरे - धीरे लगायें ।

2. मलेरिया में खून की कमी होने पर - फीफोल कै . ( Fefol Cap . ) 1 कै . प्रातः सायं दें । लिवर एक्स्ट्रेक्ट विद विटा . सी एण्ड फोलिक एसिड दें ।

3. पुराने मलेरिया में - ' क्वीनारसोल ( सिपला ) 1 एम्युल की सुई माँस में नित्य 2-3 दिन लगावें । अथवा ' एटोक्सिल की सुईलगावें । 

4. पुराने मलेरिया के रोगी में रक्त की कमी होने पर - लिवर एक्स्ट्रेक्ट फोर्ट की सुई 2-5 मि . ली . की मात्रा में नित्य या 1 दिन छोड़कर माँस में लगावें ।

5. सभी प्रकार के मलेरिया में - क्लोरोक्वीन टे . अथवा इन्जेक्शन लाभकारी ।

6. मलेरिया में मूर्छित ( Senseless ) होने पर - लम्बर पंक्चर करके सी . एस . एफ . ( C.S.F. ) को ड्रेन करें एवं ड्रेक्स्ट्रोज ड्रिप दें ।

याद रखिये - इस रोग में धातुओं का ह्रास शीघ्र होता है अतः प्रारम्भ से ही समुचित पथ्य व्यवस्था आवश्यक है ।


• हरीशन्स प्रिंसिपल आफ इण्टरनल मेडीसिन्स के अनुसार ~

Rx 

- क्लोरोक्वीन 0.6 ग्राम ( 4 टेबलेट ) । तत्पश्चात 0.3 ग्राम प्रति 6 घण्टे पर । तत्पश्चात 0.3 ग्राम नित्य 2 दिन तक । 

- यदि वमन ( उल्टी ) उपस्थित हो तो , क्लोरोक्दीन हाइड्रोक्लोराइड 0.2-0.3 ग्राम x मांसपेशीगत् प्रति 6 घण्टे पर ।। ( अधिक से अधिक 900 मि . ग्रा . प्रति दिन ) 

- ड्रग्स रिसिस्टेण्ट तथा पी फेल्सीपेरम में- क्वनीन सल्फेट 0.6 ग्राम मुख द्वारा दिन में 3 बार 15 दिन तक । 

- यदि वमन उपस्थित हो तो , क्वनीन डिहाइड्रोक्लोराइड ग्लूकोज अथवा सैलाइन सोल्यूशन में घोल कर आई . वी . धीरे - धीरे दें । 

नोट - रोगी को शीघ्र से शीघ्र ओरली थेरापी पर लायें । 

रीनल फेल्योर की स्थिति में- क्विनीन की मात्रा 0.6 ग्राम प्रति दिन के हिसाब से दें । 

ड्रग रसिस्टेन्ट मलेरिया में- टेट्रासाइक्लीन 1.0 ग्राम प्रति दिन 10 दिन तक । अथवा ' क्लिण्डामाइसीन 450 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर 3 दिन तक + क्वनीन ।

प्लाज्मोडियम वाइवे क्स , पी ओवेल तथा पी मलेरियायी पैरासाइट्स के इन्फेक्शन में- प्राइमाक्वीन [ Primaquine ) 15 मि . ग्रा . नित्य 15 दिन तक । 

नोट - यदि इसके बाद भी रोग का पुनरावर्तन हो तो पुनः 2 कोर्स और दें । आल्टरनेटिवली - प्राइमाक्वीन 45 मि . ग्रा . + क्लोरोक्वीन 300 मि . ग्रा . मिलाकर सप्ताह में 1 बार 8 सप्ताह तक दें ।

उपद्रवों की स्थिति में ( Treatment of Complications ) ~

- फ्लूड्स एवं इलेक्ट्रोलाइटस के बेलेन्स की ओर ध्यान रखना चाहिये । । 

- गम्भीर हीमोलाइसिस की स्थिति में - स्टेराइड्स की उच्चतम मात्रा । ट्रान्सफ्यूजन आवश्यक है । 

- सेरीब्रल मलेरिया में - डेक्स्ट्रान दें । 

- सेरीब्रल ओडीमा की स्थिति में - डेक्सामेथाजोन दें ।


• मलेरिया में सेवन कराने योग्य ऐलोपैथिक पेटेन्ट टेबलेट / कै . ~

1. केमोक्वीन ( Camoquin ) ( पी . डी . ) - मलेरिया के तीव्र आक्रमण में 3 टि . एक मात्रा । पहले दिन , तत्पश्चात 2 टे . की 1 मात्रा अगले 2 दिन ।

2. क्रोडोक्सिन - एफ . एम . ( Croydoxin P - F.M . ) ( विडल शायर ) - क्लोरोक्वीन - रसिस्टेंट मलेरिया में 2 टे . केवल 1 मात्रा । बालक 9-14 साल 2 टे . , 4-8 साल 1/2 टे . , 4 साल तक आयु वालों को 1/4 टे . दें । बचाव हेतु वयस्कों को 1 टे . , 9-14 साल को 3/4 टे . , 4-8 साल को 1/2 टे . एवं 4 साल उम्र के बीच वालों को 1/4 टे . दें 

3. इमक्वीन ( Emquin ) ' मर्क कं ' - बचाव हेतु 2 टे . सप्ताह में 1 बार । चिकित्सार्थ -4 टि . तत्पश्चात् 6 घण्टे बाद 2 टेबलेट । बाद को 2 टे . 2 दिन तक ।


4. मेलोसाइड ( Malocide ) टोरेण्ट - 2-3 टे . की केवल 1 मात्रा । बालक 20 मि . ग्रा . / किलो भार पर।बचाव हेतु केवल 2 टेबलेट की 1 मात्रा ।

5. मेलूब्रिन ( Melubrin ) रैनवेक्सी - पहले दिन 4 टे . तत्काल।तत्पश्चात 2 टे . 6 घण्टे पर । इसके बाद 2 टेबलेट नित्य 2 दिन तक । 

6. निवाक्विन ( Nivaquine- रोन - पुलेंक ) - 800 मि . ग्रा . ( 4 टेबलेट ) की 1 टे . की 1 मात्रा । मलेरिया से बचाव हेतु 400 मि . ग्रा . ( 2 टे . ) सप्ताह में 1 बार ।

नोट - इसका इन्जेक्शन भी आता है एवं बच्चे के लिये निवाक्विन सस्पेन्शन भी । 

7. ओनली - टू ( Onli - 2 ) कोप्रान - पुराना मलेरिया ज्वर एवं मलेरिया से बचाव तथा क्लोरोक्वीन रसिस्टेंट केसिस में -2 टेबलेट । बालक 4 साल की उम्र तक 1/2 टे . , 48 साल 1 टे . और 9 से 14 साल वालों को 2 टे . की केवल 1 मात्रा दें । कम से कम 1 सप्ताह बाद दोहरायें । बचाव हेतु 1 टे . की 1 मात्रा । बालकों को आयु के अनुसार ।

8. पायराल्फिन ( Pyralfin ) - लूपिन ( चिकित्सा एवं बचाव में ), क्विनरोस टे . ( Quinross tablets ) ' टाटा फार्मा - चिकित्सार्थ- 2-3 टेबलेट । बालक 1/2 -1 टे . , केवल 1 मात्रा ।सप्ताह में 1 बार । बचाव हेतु 1 टे . की केवल 1 मात्रा । बालक 1 / 4-1 / 2 टे . सप्ताह में केवल 1 बार दें । 

9. ( टेबलेट / इन्जेक्शन एवं सीरप रूप में ) - चिकित्सा , बचाव एवं सभी प्रकार के मलेरिया में उपयोगी । पहले दिन 4 टे . तत्पश्चात् 2 टे . प्रति 6 घंटे पर । दूसरे और तीसरे दिन 2 टेबलेट । बचाव हेतु 2 टे. केवल सप्ताह में 1 बार दें । 

10. रिसोचिन ( Resochin ) - ' बेपर ' - सभी प्रकार के मलेरिया में पहले दिन 4 टेबलेट । तत्पश्चात 2 टे . 6 घण्टे पर । दूसरे - तीसरे दिन 2 टेबलेट । बचाव हेतु 2 टेबलेट सप्ताह में 1 बार । 

11. सल्फामाइन ( Sulfamine ) ला फार्म - चिकित्सा एवं बचाव में उपयोगी । चिकित्सार्थ - वयस्क -2 टे . । बालक 1 / 2 - टे . । सभी को केवल 1 मात्रा में । 

नोट - गर्भावस्था में इसका प्रयोग न करें । 

12. लैरिआगो ( Lariago ) इपका लेबोरेटरी ' - पहली मात्रा 4 टेबलेट की । फिर 6 घण्टे बाद 2 टेबलेट दें । दूसरे दिन 6-6 घण्टे बाद 2-2 टे . दिन में 2 बार दें ।

नोट - इसका इन्जेक्शन और सीरप भी आता है ।


• मलेरिया में सेवन कराने योग्य एलो . पेटेन्ट सीरप ~

1. लैरिआगो ( Lariago ) इपका लेबो . - 1 साल तक के शिशुओं को 2 चम्मच , 1 से 4 साल तक के बच्चों को 2-4 चम्मच , 5-8 साल तक के लड़कों को 4-6 चम्मच की मात्रा में दें । फिर 6-6 घण्टे बाद दिन । केवल 2 बार , इसकी आधी मात्रा । 

2. बेसोक्विन सस्पेन्शन ( Basoquin susp . ) नि . पी . डी . कं - मलेरिया के तीव्र आक्रमण में 10 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार पर केवल 1 मात्रा 2 दिन तक । 


3. इमक्विन सीरप ( Emquin Syrup ) - 10 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार पर । 8 घण्टे बाद 5 मि . ग्रा .। प्रति किलो शरीर भार पर 2 विभाजित मात्राओं में 2 दिन तक । 

4. निवाक्विन सस्पेन्शन ( Nivaquine Susp . ) - उपरोक्त अनुसार दें ।

5. क्विनरोस सीरप ( Quinross Syrup ) - आवश्यकतानुसार दें । 

6. मालाक्वीन ( Malaquin ) ' स्टेडमेड कं ' - लैरिआगो के समान ।

याद रखिये - चिकित्सकों की राय है कि मलेरिया में पहले रोगी का पेट साफ करें । इसके लिये कैस्टोफीन की 2 टेबलेट अथवा ट्रिफोलैक्सिन को 2-3 टेबलेट सोते समय जल से दें । 


मलेरिया में लगाने योग्य ऐलोपैथिक अपटूडेट रिसेन्ट इन्जेक्शन ~

1. निवाकविन इंजे. ( Nivaquine Inj . ) ( रोन पुलन्क ) - 2 मि . ली . माँस में ।

सावधान -5 साल से कम आयु के बच्चों में इसका प्रयोग न करें । 

2. क्विनरोस इन्जे . ( Quinross Inj . ) - 5 मि . ली . माँसपेशीगत । 6 घण्टे बाद पुनः दोहरायें , 3 दिन तक । 


3. लैरिआगो ( Lariago ) इपका लेबो . -  पहली सुई 10 मि . ली . की । 6 घण्टे बाद दूसरी सुई 5 मि . ली . की माँस में लगावें । दूसरे दिन 6-6 घण्टे बाद , दिन में 2 सुई माँस में लगावें ।

सावधान -5 साल से कम उम्र वाले बालकों को नहीं लगाना चाहिये । 

4 . रिसोचिन ( Resochin ) ( कै की स्थिति में ) - 5-7.5 मि . ली . माँस या नस में धीरे - धीरे लगावें ।

5. हीमोसाइटिन विद आयरन ( सिपला ) ( 10 इन्जेक्शनों का एक कोर्स ) , - 5 मि . ली . रोजाना या एक दिन छोड़कर माँस में लगावें । 

6. सिपलाक्वीन ( Siplaquin ) ' सिपला कं ' - ज्वर उतर जाने पर 0.2 मि . ली . प्रति किलो शरीर भार के अनुसार ( 10 मि . ली . तक की सुई ) कूल्हे के गहरे माँस में लगावें ।

सावधान - गर्भावस्था , तीव्र आमाशय शोथ , आँत की गड़बड़ियों या रक्त के विकारों में न दें । -

7. क्लोरोक्वीन फास्फेट ( Chloroquin Phosphate ) कई कम्पनियों का आता है । - 2-5 मि . ली . तक ज्वर उतर जाने पर दिन में 1 बार कूल्हे के गहरे माँस में नित्य 2-3 दिन तक लगावें ।

नोट -  • कैमोक्वीन की 3 टेबलेट , सीलिन 500 मि . ग्रा . की 1/2 टेबलेट , सीरप औरेन्शयाई 2 चम्मच । ऐसी 1 मात्रा प्रातः 4-5 बजे देने से मलेरिया का बुखार रुक जाता है । 

• क्रोयडोक्सिन एफ . एम . ( Croydoxin F.M.- विडल शायर ) को 2-3 टे . प्रातः देने से मलेरिया का बुखार रुक जाता है । मलेरिया होने पर भी एक ही बार में इसकी 2 मात्रायें देने से क्लोरोक्वीन रसिस्टेंट मलेरिया भी ठीक हो जाता है ।


मलेरियानाशक उचित व्यवस्थापत्र ~

Rx

- क्लोरोक्वीन 600 मि . ग्रा . मुख द्वारा ।तत्पश्चात 300 मि . ग्रा . 6 घण्टे पर । इसके बाद 300 मि.ग्रा . नित्य 2 दिन तक । 

- पुनराक्रमण से बचाव हेतु - क्लोरोक्वीन के साथ अन्य औषधि यथा ( निम्न क्रम से )  - प्रोगूनिल ( Proguanil ) 100 मि . ग्रा . नित्य मुख द्वारा 10 दिन तक । 

क्वनीन सल्फेट 600 मि . ग्रा . x दिन में 3 बार x 3 बार x 7 बार प्राइमाक्वीन 15 मि . ग्रा . x नित्य मुख द्वारा x 14 दिन तक ।  

- क्वनीन सल्फेट 600 मि . ग्रा . x दिन में 3 बार 7-14 दिन तक । साथ ही - प्राइमेथामीन 25 मि . ग्रा . x दिन में 2 बार मुख द्वारा x 3 दिन एवं सल्फाडायाजीन 500 मि . ग्रा . x दिन में 4 बार मुख द्वारा 5 दिन तक । अथवा - टेट्रासाइक्लीन 250 मि . ग्रा . x दिन में 4 बार 7 दिन तक, 

नोट - फेल्सीपेरम इन्फेक्शन में ( क्लोरोक्वीन रसिस्टेन्ट केसिस ) लाभकारी । 

- गम्भीर केसिस में - ' क्वनीन हाइड्रोक्लोराइड 20 मि . ग्रा . साल्ट । प्रति किलो शरीर भार पर x आई . वी . इन्फ्यूजन में ( 4 घन्टे में ) । तत्पश्चात् 10 मि . ग्रा . प्रति किलो शरीर भार पर 4 घण्टे में प्रति 8 घण्टे पर । अथवा 600 मि . ग्रा . 500 मि . ली . नार्मल सैलाइन में इन्फ्यूजन रूप द्वारा । एवं 6-8 घण्टे पर दोहरायें , जब तक मुख द्वारा औषधि देना सम्भव न हो जाये । 

- अनीमिया की व्यवस्था । 

- फोलिक एसिड 5 मि . ग्रा . नित्य मुख द्वारा ( फोलिक एसिड की कमी में ) । 

- द्रव ( Fluid ) का उचित संतुलन बनाये रखें ।  

- एनाल्जेसिक - यथा - एस्प्रिन 600-900 मि . ग्रा . x प्रति 4-6 घण्टे पर मुख द्वारा । अथवा पैरासिटामोल 500-1000 मि . ग्रा . x दिन में 3-4 बार मुख द्वारा सिर दर्द में ।


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