आन्त्रपुच्छ शोथ [ Appendicitis ] क्या है? क्यों और कैसे हो जाता है? इसकी उचित चिकित्सा विधि क्या है ? What is appendicitis? Why and how does it happen? What is its proper treatment method?

 आन्त्रपुच्छ शोथ [ Appendicitis ] 

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पर्याय - 

उपान्त्रशोथ , कृमि रूप उपान्त्र शोथ का प्रदाह , तीव्र उपान्त्र शोथ आन्त्र गुल्म । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ‘ ऐपेण्डीसाइटिस ' । 

परिचय - 

एपेन्डिक्स के शोथ ( Inflammation ) को ' एपेण्डीसाइटिस कहते हैं । इसमें दायीं ओर पेट में तीव्र शूल( दर्द) , मितली , एवं वमन( उल्टी ) होता है । रोगी को अफारा , कब्ज एवं ज्वर रहता है ।

वक्तव्य - 

बड़ी आँत एवं छोटी आंत की संधि के पास बड़ी आंत में पेन्सिल जैसी मोटी 3 - 4 इंच लम्बी नली सी लगी रहती है जिसे उपान्त्र , उण्डुक पुच्छ या एपेन्डिक्स ( Appendix ) कहते हैं । इसका दूसरा सिरा बंद रहता है । कुछ कारणों से ( जो अभी तक ज्ञात नहीं ) इस नली में सूजन आ जाती है जिसे ' एपेण्डीसाइटिस कहते हैं।

रोग के प्रमुख कारण -

■  रोग नवयुवकों में अधिक । 

कारण दो प्रकार के होते हैं -

1. पुच्छान्त्र के सुषिर भाग में अवरोध उत्पन्न होना जिससे इसमें सूजन हो जाती है - 

■ नाक , गला आदि में उपस्थित संक्रमण रक्त संचार द्वारा पुच्छान्त्र में पहुँचकर शोथ उत्पन्न कर देते हैं । 

■ जीर्ण प्रवाहिका( दस्त, अतिसार ) । 

■ पेट मे कीड़े , मल या अन्य किसी भी विजातीय पदार्थ से आन्त्रपुच्छ के एक सिरे वाले मार्ग में अवरोध हो जाने से सूजन उत्पन्न हो जाती है । 

■ मांसाहार के साथ - साथ उच्च स्तर का जीवन व्यतीत करने से । 

■ आहार में सेल्युलोज पदार्थों का अभाव । 

2. विशिष्ट कारण - 

पुयोत्पादक जीवाणु विशेषकर स्ट्रेप्टो कोकाई , पायोजेनीज एवं बैक्टीरियम कोलाई होते हैं । 

■ अन्य इन्टेस्टाइनल बैक्टीरिया । 

■■■ आधुनिक विज्ञान ने “ तीव्र उदर " ( Acute Abdomen ) संज्ञा में इसको सम्मिलित किया है , कि जिसमें रोगी को उदर में भीषड़ पीड़ा हो , जो गम्भीर अवस्था का निर्देश करता हो , तथा जिसमें व्यक्ति का जीवन संकट में पड़ सकता है।

प्रमुख लक्षण - तीव्र एपेण्डीसाइटिस के छः प्रमुख लक्षण होते हैं -


●वेदना( दर्द ) , 

●वमन( उल्टी ) , 

●स्पर्शासहिष्णुता( स्पर्श करने भर से तेज दर्द ) ,

●स्थानिक कठोरता( वहा का हिस्सा जहाँ तेज दर्द हो रहा है ) , 

●तेज नाड़ी एवं - 

●श्वेत कोशिका बहुलता ( Leucocytosis )

वेदना( दर्द ) - 

■ अकस्मात पेट में दर्द उत्पन्न होना , इस रोग का प्रधान लक्षण है । यह दर्द विशेष रूप से रात के अन्तिम भाग में और प्रातः काल प्रारम्भ होता है । 

■ वेदना चुभने जैसी होती है तथा नाभि के आसपास होती प्रतीत होती है ।24 घण्टों के अंदर यह पीड़ा ' राइट इलियक फोसा ' में स्थिर हो जाती है । 

प्रकार के अनुसार पीड़ा में भिन्नता -

( i ) अवरोध जन्य प्रकार में  वेदना तीव्र तथा रुक - रुक कर होती है । 

( ii ) बिना अवरोध में → शूल( दर्द ) लगातार तथा कम तीव्रता वाला होता है ।

वमन एवं मितली - अवरोधजनित उत्पन्न शोथ में प्रायः यह लक्षण मिलते हैं । वमन के साथ या पूर्व कभी - कभी मितली का लक्षण अधिक रहता है । 

स्पर्शासहिष्णुता - लक्षण है । गहरी स्पर्शासहिष्णुता मैकवर्नी बिन्दु पर प्रतीत होती है ।

स्थानिक कठोरता - सूजन के कारण फोड़ा बनने पर अनुभव की जा सकती है।

तेज नाड़ी - नाड़ी की गति का तीव्र होना बड़ा महत्वपूर्ण है । यह ज्वर की अपेक्षा अधिक गतिमान हो जाती है । 

श्वेत कोशिका बहुलता - इसमें श्वेत कणों की वृद्धि 15-20 हजार तक हो जाती है । साथ ही विष संचार ( टॉक्सीमिया ) के लक्षण बढ़ जाते हैं ।

याद रखिये - कई बार ऐसी गर्भवती स्त्रियों में जिनकी डिम्ब वाहिनी में ही गर्भ ठहर गया है ( Ectopic Pregnancy ) , उनमें प्रायः तीसरे महीने में डिम्ब वाहिनी फट जाने से गर्भ उदर( पेट ) में आ जाता है । इस दशा के लक्षण भी एपेण्डीसाइटिस से मिलते हैं । 

नोट - रोगी के उदर( पेट ) में तीव्र पीड़ा नाभि के आस - पास उठती है जो 8-10 घण्टे बाद वहाँ से हट कर दाहिने ' इलियक फोसा के क्षेत्र में होने लगती है । रोगी का जी मिचलाता है अथवा वमन( उल्टी ) होता रहता है और हल्का - हल्का ज्वर भी रहता है ।

रोग की पहिचान / प्रयोगशालीय टेस्ट - 

■ ' मैकवर्नी पाइन्ट पर स्पर्श करने से स्पर्शाक्षमता का लक्षण मिलता है । स्पर्श करने पर रोगीअपने पेट को ऐसा तान लेता है कि गहरा स्पर्शन करना कठिन हो जाता है । 

■ नाड़ी - अति तीव्र गति वाली ( 80-90 बार ) प्रति मिनट । नाड़ी की गति जितनी अधिक तीव्र होती है रोग उतना ही बढ़ा हुआ समझना चाहिये । ज्यादा गम्भीर अवस्था में नाड़ी अस्त-व्यस्त तथा अल्प मिलती है । 

■ रक्त परीक्षा - टोटल ल्यूकोसाइट्स काउण्ट 12,000 - 20,000 के मध्य प्रति सी.एम.एम. होती है । 

■ सोआस टेस्ट - रोगी के नितम्ब( कमर का निचला भाग ) सन्धि को प्रसारित करने से नितम्बास्ति के ऊपरी भाग में शूल(दर्द) उत्पन्न होता है । 

■ आब्टुरेटर टेस्ट - रोगी की जानु सन्धि को मोड़कर , बाद में उस सन्धि को भी उदर की तरफ मोड़ने से रोगी शूल की अनुभूति करता है । 

उदर के बायें पार्श्व में दबाने पर , रोग - ग्रस्त दायें पार्श्व में पीड़ा होती है ।

रोग के परिणाम - 

■ ज्वर के कम होने पर मृत्यु की आशंका अथवा गेन्ग्रीन आरम्भ होना समझना चाहिये । 

■ यदि रोग का वेग पहला है तो वह 2-3 दिन में शान्त होकर 1 सप्ताह में ठीक हो जाता है । 

■ रोग में दोबारा होने की सम्भावना अधिक । 

■ मृत्यु व्यापक पेरीटोनाइटिस के परिणामस्वरूप ।


■ शल्य कर्म में मृत्यु संख्या 0.5% प्रतिशत ही रहती है । 

■ रोग का अन्त इन तीन अवस्थाओं में से किसी एक में होता है ।

■ लगभग 3 दिन में दर्द शान्त हो जाती है , सूजन बैठ जाती है और 10 दिन के अंदर रोगी ठीक हो जाता है । 

■ लक्षण बढ़ते जाते हैं और छाला या फोड़ा बन जाती है । छाला का फट जाना , व्यापक उदरावरण( वह झिल्ली जो अंदुरुनी पेट को चारो ओर से घेरे रहती है ) शोथ होना , पेट फूलना आदि लक्षण भयंकर रूप धारण कर लेते हैं ।

●रोगी की नाड़ी , तापक्रम , रक्त चाप आदि की जाँच नियमित अवधि से करते रहना चाहिये । 

●यदि रोग को प्रारम्भ हुए 2-3 दिन बीत चुके हैं तो एपेन्डिक्स सूजकर बहुत मोटा हो जाता है और टटोलने पर पिण्ड जैसा प्रतीत होता है ।

चिकित्सा विधि - 

●यह शल्य चिकित्सा प्रधान रोग है । 

यदि रोग शुरुआती चरण में हो , नाड़ी की गति प्रति मिनट बढ़ न रही हो , लक्षण भी क्रमशः शान्त हो रहे हों जब तक रोगी का तापक्रम तथा नाड़ी की गति सामान्य न हो जाय तब तक निम्न व्यवस्था करनी चाहिये -

1. रोगी को निराहार रखकर ' फाउलर पोजीशन ' में रखकर पूर्ण विश्राम दें।

2. गुदा अथवा शिरा मार्ग द्वारा जल देना चाहिये । 

3. दर्द के लिये - पेट पर गरम बोतल का प्रयोग अथवा ' एण्टी - फ्लोजिस्टीन प्लास्टर लगायें ।

सहायक चिकित्सा / पथ्यापथ्य -


●मलबन्ध होने पर ' ग्लिसरीन सपोजीटरी का प्रयोग करें । 

●वमन( उल्टी ) एवं मितली से यदि रोगी में डिहाइड्रेशन की स्थिति उत्पन्न हो गई हो तो ' ग्लूकोज सैलाइन ' शिरा मार्ग से उचित मात्रा में दे सकते हैं । 

●द्रव आहार उपयुक्त ।

●गैस तथा भारी भोजन का रात्रि में परित्याग । 

●दर्द खत्म होने के बाद साइकिल पर सवारी या भारवाहन या भारी कसरतें न करें 

●पूर्ण विश्राम आवश्यक ।

सावधान - ध्यान रहे कि कब्ज ( Constipation ) होने पर कभी भी रेचक ( Purgative ) औषधि न दें । इससे आँतों का ( आन्त्र - पुच्छ ) फट जाना प्रायः निश्चित सा रहता है । 

ध्यान दें - एपेण्डिसाइटिस का दर्द नाभि के पास वाले ( Umblical ) भाग में होता है तथा दाहिनी इलियक फोसा की ओर जाकर मैकवर्नी चिन्ह पर ठहर जाता है । तीव्र दर्द होता है । इसका आक्रमण बड़ी तीव्र गति से होता है जो कई घण्टे तक रह सकता है । रोगी के चलने फिरने एवं गति करने से दर्द में वृद्धि होती है । किसी भी उपाय से यह कम नहीं होता है । वमन तथा ज्वर हो जाता है । दाहिनी इलियक फोसा में हाथ लगाने एवं छूने पर दुखन ( Tenderness ) होता है जो इस प्रकार के दर्द का एक प्रमाणिक चिन्ह है । 

आवश्यक सुझाव - 

●तीव्र रूप में रोगी को उचित चिकित्सा के लिये अस्पताल में भर्ती करा देना चाहिये , जहाँ कि शल्य चिकित्सा के साथ अन्य इमरजेन्सी औषधियाँ उपलब्ध हो सकें ।  

 ●इस रोग में होने वाले शस्त्रकर्म ( Operation ) को ' एपेण्डीसेक्टामी कहते हैं । आवश्यक होने पर इस अंग को काट कर निकाला जा सकता है ।


नोट - लक्षणों के प्रारम्भ होने के 12 घण्टे के अंदर आपरेशन कर देना चाहिये । 

एपेण्डीसाइटिस की औषधि चिकित्सा -

★  चिकित्सा जितनी जल्दी हो सके , प्रारम्भ कर देनी चाहिये । 

Rx . 

एम्पीसिलीन ( Amipicillin ) 0.25 - 1 ग्रा . मुख द्वारा , प्रति 6 घण्टे पर । 

एवं 

मेट्रोनिडाजोल ( Metronidazole ) आई.वी.अथवा 1 ग्राम की सपोजीटरी के रूप में प्रति 8 घण्टे पर 3 मात्रा तक । आपरेशन से 1 घण्टे पूर्व । 

■■ यदि एवसिस काफी बड़ा हो गया हो , और बुखार निरन्तर रहता हो - 3 माह के शोथोपशमन ( Resolution ) के पश्चात ' एपेण्डीसेक्टोमी आवश्यकता होती है। 

पेट दर्द के सभी रोगियों का रक्त चाप ( B.P ) देखना आवश्यक है तथा वमन( उल्टी ) आदि की स्थिति में उन्हें तत्काल ग्लूकोज आई.वी.धीमी गति से देना पड़ता है जो 5 % डेक्स्ट्रोज के रूप में सम्पूर्ण सावधानियों के साथ लगाना चाहिये । इसी में पेट दर्द निवारक औषधि इन्जेक्शन के रूप में देनी चाहिये । 

■■ इन्जेक्शन ' बेरालगन  - ' 2-5 मि . ली . आई . वी . / इण्ट्रामस्कुलर । 

अथवा - 

इन्जे . एवाफोर्टान ( Avafortan - Khandelwal ) 3-5 मि.ली. का आई.वी. या इण्ट्रामस्कुलर धीमी गति से । 

अथवा - 

इन्जे . फोर्टविन ( Fortwin - Ranbaxy ) 30-60 मि.ग्रा . आई.वी. 

अथवा -

इण्ट्रामस्कुलर  3-4 घण्टे पर दोबारा आवश्यकता पड़ने पर लगाया जा सकता है ।

■■ यदि पेट दर्द के साथ वमन( उल्टी ) भी हो तो -

●इन्जे . सैडीन - ए फोर्ट ( Sedyn - AForte - M.M.Tabs . ) 1-2 मि.ली. मांसपेशीगत् ( I.M. ) । 

अथवा - 

इनमें से किसी को दे सकते हैं - 

●इन्जे . पैरीनार्म ( इपका ) , 

●इन्जे . ट्राईग्रान ( केडिला ) । 

●इन्जे . फोर्टविन के समान - 

●सोसिगान ( Inj . Sosegan ) ( विन मेडीकेअर )

●पेण्टाविन ( Inj . Pentawin ) नि . बायोकेम , 

●पेण्टावान ( Inj . Pentavon - Jagsonpal ) को दिया जा सकता है । 

सावधान - वमन की स्थिति में सावधानी के साथ प्रयोग करें । दर्द की न्यूनतम तथा इन्जेक्शन के बाद की दशा में रोगी को टेबलेट देनी चाहिये ।

■ रोग तीव्र हो एडेसन्स ( Adhesions ) हो गये हों तो तत्काल अथवा उपयुक्त चिकित्सा रोगी के रोग मुक्त हो जाने के 3 माह पश्चात् आपरेशन का निर्देश देना चाहिये । 

■ रोग के शुरुआती चरण साधारण चिकित्सा के पश्चात् प्रायः आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।

चिकित्सा एक दृष्टि में - 

◆पूर्ण विश्राम ( Complete rest ) 

पेरेन्टेरल फ्लूड्स ( Parenteral Fluids - I / V . Infusion ) 

ब्राड स्पेक्ट्रम एण्टीबायोटिक्स ( Broad Spectrum Antibiotics ) 

एण्टी - स्पाज्मोडिक्स ( Anti - spasmodics

◆रोगी को आपरेशन एवं एपेन्डेक्टामी के लिये शीघ्र तैयार करना । 

आपातकालीन चिकित्सा ( Emergency Treatment ) -

पेट दर्द के रोगी शीघ्रातिशीघ्र दर्द की ऐंठन से छुटकारा पाने की इच्छा होती है ।अतः ऐसे रोगी का सावधानी पूर्व निरीक्षण करके लक्षणों के अनुसार चिकित्सा की जाती है । यदि उचित निर्णय लेकर रोगी को आवश्यक हो तो बिना किसी देरी के ऐसे अस्पताल में भेज दिया जाये जहाँ आपातकालीन चिकित्सा के साथ शल्य चिकित्सा की अच्छी सेवायें उपलब्ध हों । चूँकि ऐसे बहुत से रोगियों के तुरन्त ऑपरेशन से रोगी की जान बचायी जा सकती है , अन्यथा रोगी को पेट दर्द से आराम दिलाने के प्रयत्नों में शॉक ( Shock ) के कारणं रोगी को अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ सकता है।




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