आँतों के कृमि [ Intestinal Worms ] क्या है? इसे किस प्रकार पहचाना जा सकता है? इसके लक्षण, परिणाम एवम चिकित्सा की उचित विधि क्या है ? What is Intestinal Worms? How can it be identified? What are its symptoms, consequences and proper method of treatment??

 आँतों के कृमि [ Intestinal Worms ] 

by - SuSanA Secretariat( flicker )


पर्याय - 

कृमि रुग्णता , आंत्रि कृमि , पेट में कीड़े । आधुनिक चिकित्सा में इस व्याधि को ' हेलमिन्थएसिस ' ( Helmenthiasis ) के नाम से जाना जाता है । 

परिचय - 

परजीवी कृमियों ( Parasitic worms ) की मनुष्य की आँत में उपस्थिति को कृमि रुग्णता ( Helminthiasis ) कहते हैं । यहाँ कृमियों से अभिप्राय वर्म्स ( Worms ) से है । 

सामान्य कारण - 

मीठा पदार्थ , शाक शब्जी , अपच ( Indigestion ) , रसदार भोजन , असन्तुलित भोजन आदि कारणों से आँत के कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं । 


प्रधान रूप से निम्नलिखित 4 प्रकार के कृमि मनुष्य की आँतों में मिलते है - 

● गोल कृमि ( Round worm )  

● सूत्रि कृमि ( Thread worm ) 

● फीता कृमि ( Tape worm ) 

● अंकुश कृमि ( Hook worm )

◆◆ इनमें सबसे अधिक पाये जाने वाला कृमि ‘ एस्केरिस लुम्ब्रीकोइड्स ' है तथा पेट दर्द का कारण प्रधान रूप से यही कारण है । यदि जनरल प्रेक्टिश्नर के पास पेट दर्द का कोई रोगी आये तो उसका रोग निदान करते समय आँतों के कृमि की भी शंका की जानी चाहिये ।

आंत्रिक कृमियों की आकृति के अनुसार वर्गीकरण तथा उनसे उत्पन्न लक्षण एवं चिकित्सा का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है  -


गोल कृमि / केंचुआ ( Round worm ) 

परिचय - 

चिकित्सा के क्षेत्र में गोल कृमियों का नाम एस्केरिस लुम्ब्रीक्वाइडिस ( Ascaris Lumbricoides ) है । इन्हें एस्केरिएसिस ( Ascariasis ) एवं हिन्दी में ' गण्डूपद कृमि ' कहा गया है । यह गोल कृमि आँतों में पायी जाने वाली नीमोटाइड्स वर्ग की कृमियों में सबसे अधिक होती है । 



आकृति एवं बनावट - 

■  यह कृमि गोल आकृति का पारदर्शक , श्वेत भूरे रंग का दोनों सिरों पर नुकीला होता है । 

■  नर कृमि 6-7 इंच और मादा कृमि 8-10 इंच लम्बा होता है । औसत लम्बाई 4 से 12 इंच तक होती है । 

■  यह केंचुए जैसा लम्बा और पतला कीड़ा छोटी आँतों में रहता है । कभी - कभी पाक स्थली की मार्ग से चढ़ कर मुँह से निकल जाता है ।

रोग के कारण - 

◆  मीठा पदार्थ एवं हरी शाक - सब्जी का अधिक उपयोग । 

◆  अपच एवं रसदार भोजन । 

याद रखिये - मल मिश्रित खाने - पीने की चीजों के साथ इस कृमि का लार्वा मनुष्य की आँतों में पहुँच कर आँतों की दीवारों से होता हुआ रक्त में मिल कर रक्त भ्रमण करने लगता है और फुफ्फुस( फेफड़ों ) में पहुँच जाता है ।

लक्षण - 

● लार्वा के फेफड़े में पहुँचने से कृमि - जन्य फुफ्फुस शोथ ( Verminous Pneumonitis ) ज्वर तथा स्वर तंत्र सम्बन्धी लक्षण उत्पन्न हो जाते । 

●  अपच , पतले दस्त , बड़ी आँत की सूजन एवं जलन । 

●  पित्ती उछलना , शोथ , व श्वास - खांसी एवं एलर्जी जन्य लक्षण । 

●  भूख न लगना , पेट दर्द , दुर्बलता एवं पाण्डुता( पीलिया ) आदि के लक्षण ।  

●  रात को दाँत किटकिटाना , नींद न आना , चिड़चिड़ापन , ऐठन , किसी किसी में यकृत वृद्धि , रक्त थूकना , स्नोफीलिया आदि लक्षण हो सकते हैं ।

याद रखिये - आमाशय में जहाँ - तहाँ केंचुए के चलने से हलचल होकर वमन( उल्टी ) होती है और भोजन के साथ कृमि बाहर निकल आते हैं । 

कृमि से उत्पन्न संकटमय स्थितियाँ - 

■  यह कीड़े दुर्भाग्यवश श्वास नलिका में पहुँच कर उसकी क्रिया को बंद कर देते हैं जिससे रोगी के प्राण संकट में पड़ जाते हैं ।

■  अनेक बार यह एक साथ मिलकर गुच्छा बनाकर आँत में रुकावट पैदा कर देते हैं तो भयंकर कब्ज पैदा हो जाती है तथा पेट में दर्द होता है ।

■  देखने में आया है कि किसी - किसी रोगी के 200 कृमि तक गुच्छे के रूप में निकलते हैं ।

■कृमियो की संख्या अधिक होने पर आन्त्रावरोध ( Intestinal Obstruction ) के लक्षण पैदा हो जाते हैं । 

■  कृमियों की संख्या कम होने पर प्रायः आन्त्रशूल ( पेट दर्द ) के लक्षण मिलते हैं।

■  यकृत में पहुँचकर यकृत विद्रधि( छाला, फोड़ा इत्यादि ) ।

विशिष्ट लक्षण - कृमियों की आँतों में उपस्थिति के कारण - 

◆  कुपोषण ( Malnutrition ) । 

◆  आध्यमान ( Flatulance ) ।  

◆कुछ पदार्थों को अवशोषित करने में छोटी आँत की असमर्थता ( Malabsorption ) आदि लक्षण । 

◆  कभी - कभी यह कृमि आमाशय में होकर वमन के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।  

सारांश में - पेट में दर्द , नींद में चौंकना , नाक तथा गुदा में खुजली , पेट फूलना , बेहोशी , कभी - कभी भूख की कमी , अरुचि , कमजोरी , शरीर का जीर्ण होना , मुंह में पानी आना - इसके लक्षण हैं ।

रोग निदान - 

■ कृमि के मल के द्वारा अथवा वमन( उल्टी ) द्वारा बाहर आने से रोग का स्वतः निदान हो जाता है । 

■ रक्त परीक्षा में 10 % स्नोफीलिया मिलने पर इनका पर्याप्त निदान हो जाता है । यह इनकी शरीर में ' लार्वा स्टेज ' को सूचित करता है । 

■ बेरियम एक्स - रे - बेरियम भोजन देने के 6 घण्टे बाद एक्स - रे लेने से बुलबुले से कृमियों को देखकर रोग का निदान निश्चित हो सकता है । 

■ माइक्रोस्कोप परीक्षा में देखकर ( अण्डों को ) रोग निदान संभव ।

■■■ एस्केरिस के कारण रोगी को वमन( उल्टी ) एवं अतिसार हो सकते हैं । इनसे आँतों में रुकावट भी हो जाती है । जब यह अपने लार्वा स्टेज में होते हैं तो रोगी को रात के समय खाँसी होती है । जो विशेषकर बच्चों को एलर्जी खाँसी के रूप में होती है । 

गोल कृमियों / केंचुओं की औषधि चिकित्सा - 

Rx . 

★ टे . मेबेण्डाजोल ( Tab . Mebendazole ) व्या. नाम - टे . वर्मिन ( Tab.Wormin ) 1 टे . , दिन में , 2 बार , 3 दिन तक । 

बच्चों में - सेवेण्डाजोल सस्पेन्शन ( Cevendazol Suspension ) 1/2-1 चम्मच , दिन में 2 बार , 3 दिन तक । 

अथवा- 

★ जेण्टेल ( Zentel ) नि . इस्केएफ - 400 मि.ग्रा. टे. , 1 टेबलेट 1 मात्रा में 10 दिन बाद पुनः 1 टेबलेट । इस प्रकार 3 मात्राओं तक पर्याप्त ।

बच्चों में - इसका सस्पेन्शन 12 वर्ष तक के बच्चों को 200 मि.ग्रा . 1 मात्रा के रूप में , रात सोते समय । 

निषेध - गर्भावस्था में प्रयोग वर्जित । 

अथवा- 

★ लीवोमीसोल ( Levomisolc ) 120 मि.ग्रा . की 1 मात्रा । 

अथवा- 

★ थियाबेण्डाजोल ( Thiabendazole ) 500 मि.ग्रा . 2 टे . , दिन में 2 बार 2 दिन लगातार दोपहर तथा भोजन के बाद शाम को । 

नोट - टेबलेट को चबाकर निगल जाना चाहिये । बच्चों के लिये - मिण्टेजोल ( Mentezol ) नि.एम.एस.डी. 5 मि.ली. , दिन में 1 बार , 2 दिन तक । 

सावधान ~

आजकल मेबेण्डाजोल मेबेण्डाजोल ( इवेन , वर्मिन , किटकेट आदि ) तथा टेट्रामिजोल ( डेकासि एस्कारिस आदि ) आदि औषधियाँ प्रचलित हैं । किन्तु इनके विषैले प्रभाव पिपराजीन एवं वीफेनियम से कहीं अधिक है । अतः इनको केवल एस्केरिस के निराकरण ( Eradication ) हेतु नहीं देना चाहिये । बल्कि जहाँ अन्य आँत के कीड़ों की आशंका हो वहीं पर इन औषधियों का प्रयोग उचित है ।

याद रखिये - बहुत समय से प्रचलित इस कृमि को जड़ से समाप्त करने वाली औषधि ' पिपराजीन साइट्रेट ' है जो भिन्न - भिन्न नामों से मिलती है । इसकी वयस्क मात्रा 3 से 4 ग्राम है । बच्चों को केवल 2 ग्राम की केवल 1 मात्रा दें । इसके लिये ' हेल्मासिड विद सेना ' उपयुक्त औषधि है । इसका 1 पैकिट 1 मात्रा के लिये पर्याप्त । 

नोट - पिपराजीन साइट्रेट 5-15 मि.ली. प्रातः और रात को सोते समय दें । विशेष आवश्यकता पड़ने पर वयस्कों को 1/2 शीशी ( 30 मि.ली. ) रात को सोते समय पिलायें । बच्चों को दिन में केवल एक बार आयु के अनुसार ( अधिकतम 4.5 ग्राम ) । 

सावधान - निरन्तर प्रयोग वर्जित । 

केचुओं में दी जाने वाली ऐलो . पेटेण्ट टेबलेट -

■ एल्बाजोल ( Albazole ) नि . खण्डेलवाल 400 मि.ग्रा . टे . → वयस्क एवं 2 वर्ष के ऊपर के बच्चे -1 टे . की केवल 1 मात्रा पर्याप्त । 1 टे . के स्ट्रिप में उपलब्ध । 

बालकों को - टे . पीसकर दूध में , पानी अथवा फल रस के साथ दें । 

नोट - राउंडवर्स , हुकवर्स , टेपवर्स , थ्रेडवर्स एवं आँतों के मिश्रित वर्स इन्फेक्शन में।

■ कम्बईट्रिन( Combantrin ) नि . फाइजर 200 मि . ग्रा . टेबलेट → 

14 वर्ष से अधिक उम्र ( 40 से 80 किलो भार पर ) वालों को - 4 टे . रात को सोते समय दें । 

08-14 वर्ष ( 21 से 40 किलो भार पर ) 2 टे . रात को सोते समय । 

02 से 7 वर्ष ( 10 से 20 कि.भार पर ) 1 टे . । 

सावधान - गर्भावस्था में प्रयोग न करें । 

नोट - राउण्डवर्स , ऐडवर्स , हुकवर्स आदि मिश्रित इन्फेक्शन में ।

■ डी वर्मिस -150 ( De wormis 150 ) नि . विडल शायर → 1 टे . 1 बार । डी वर्मिस 50 भी आती है । बालक -1 टे . एक बार । 

नोट - राउण्डवर्स तथा हुकवर्स में उपयोगी । 

■ इबीन ( Eben ) नि . ' गूफिक ' → 1 टे . प्रातः सायं 3 दिन तक । इसका सस्पेन्शन भी आता है । 

नोट - राउण्डवर्स , टेपवर्स , थ्रेडवर्स , पिनवर्स एवं हुकवर्स आदि में एक साथ उपयोगी । 

■ जेटोमीसोल - पी . ( Jetomisol - P 60 tabs . ) नि . इथनार 60 मि . ग्रा . टे . → 1 टे . केवल 1 मात्रा ।

■ केट्रैक्स ( Ketrax ) नि . I.C.I 50 , 150 mg . टे . → 150 मि.ग्रा . की 1 टे . एवं बच्चों को 50 मि.ग्रा . की 1 टे . एक बार दें । आवश्यकता पड़ने पर 7 दिन बाद दुबारा दें ।

■ मीबाजोल ( Mebazole ) नि . ' टोरेण्ट ' 100 मि.ग्रा . → 1 टे . , दिन में 2 बार , 3 दिन तक । 

∆ गर्भावस्था में प्रयोग वर्जित । 

∆ मिश्रित वर्स इन्फेक्शन में उपयोगी ।

■ मेबेक्स ( Mebex ) नि . सिपला → 1 टे . दिन में 2 बार 3 दिन । 

नोट - राउडवर्स , हुकवर्स , पिनवर्स , फीताकृमि , ऐडवर्स आदि मिश्रित इन्फेक्शन में । सस्पेन्शन एवं ग्रेन्यूल्स में उपलब्ध ।

■ इमेन्थाल -200 ( Emanthol - 200 ) नि . एम.एम. लेब . → वयस्क एवं 2 साल के ऊपर के बालक - 2 टे . की केवल एक मात्रा । बालक 1 से 2 साल - 200 मि.ग्रा . की 1 टे . केवल एक बार । इसका सस्पेंशन भी आता है । सभी वर्म्स एक साथ उपयोगी ।

केंचुए ( राउण्डवर्स ) में प्रयुक्त पेटेण्ट ऐलो . पेय - 

◆ कम्बेण्टूिन ( Combantrin ) ' नि . फाइजर → बालकों में 1 शीशी की 1 मात्रा । बालक 2 साल से नीचे -4 मि . ली . ( 10 किलो पर ) ।

◆ इमेन्थाल सस्पेंशन ( Emanthol susp . ) नि . M.M. Labs . →  उपरोक्तअनुसार । सभी वर्स में एक साथ उपयोगी ।

◆ हेल्माजान ( Helmazan ) नि . ' नोल → 8 साल तक 10-30 मि.ली. । 8 से 12 साल 30-40 मि . ली . । नित्य दिन में 1 बार लगातार 2 दिनों तक ।

◆ मेबेक्स सस्पे . ( Mebex susp . ) नि .' सिपला → 100 मि.ग्रा . दिन में 2 बार 3 दिन तक । इसके ग्रेन्यूल्स भीआते हैं ।

◆ मेण्डाजोल सस्पे . ( Mendazole susp . ) नि.विडलशायर → 5 मि.ली. दिन में 2 बार 3 दिन तक ।

◆ नीमोसिड सस्पे . ( Nemocid susp . ) नि . ' मेक्सिन → 1 शीशी की 1 मात्रा । सभी वर्म्स में एक साथ उपयोगी ।

◆ नूमान्टेल ( Numantel ) नि. सर्ले → उपरोक्त अनुसार । इसके ग्रेन्यूल्स भी आते हैं ।

◆ वर्मीसोल ( Vermisol ) नि . खण्डेलवाल → सीरप की कुल एक मात्रा ( 10 मि.ली. ) । बालक 50 मि.ग्रा . की 1 मात्रा ।  1 माह का पुनः दोहरायें ।

◆ विजोल ( Vizole ) नि . ' एम.एम.लेब्स → केवल 1 मात्रा । इसका कैप्सूल भी आता है ।

◆ वर्मिन सीरप ( Wormin Syrup . ) नि . ' केडिला → 100 मि . ग्रा . दिन में 2 बार , 3 दिन तक ।

◆ जेन्टेल सस्पे . ( Zentel sus . ) नि . ' इस्केएफ → शीशी की कुल 1 मात्रा । 14 दिन बाद पुनः दोहरायें । कुल 3 मात्राओं तक । सभी वर्म्स में उपयोगी ।


सूत्र कृमि ( Thread worm ) 


परिचय - 

इन कृमियों का वैज्ञानिक नाम एण्टीरोबियास वर्मीकुलेरिस ( Enterobias vermicularis ) भी है , और इस संक्रमण को इण्टेरोबिआसिस कहते हैं । 

पर्याय - 

चुरने , सूता कृमि , गुद कृमि , औक्सीयूरिस वर्मीकुलेरिस , पिन वर्स , ओक्सी - यूरिएसिस ( Oxyuriasis ) आदि । इन धागे जैसे कृमियों को सामान्य बोल - चाल में चुनचुने भी कहते हैं । 

नोट - यह दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक रोगियों में देखे जाते हैं ।

कृमियों की विशेषता एवं कारण -

◆ बच्चों में अधिक और वयस्कों में कम मिलते हैं ।

◆ इन धागे जैसे कृमियों का निवास स्थान मलाशय और बड़ी आँत । 

◆ स्त्री जाति की सूत्र कृमि 8-13 मि.मी. और पुरुष कृमि 2-5 मि.मी. तक लम्बी होती है ।

◆ पाखाना में वयस्क कृमि एवं उनके अण्डे मिलते हैं । 

◆ यह कृमि मलद्वार के पास दल बना कर निवास करते हैं । कभी - कभी मूत्र नली और योनि के पास भी पहुँचकर खुजली तथा जलन पैदा करते हैं । 

◆ गुड़ या चीनी का अधिक खाना इस रोग का प्रधान कारण है ।

कृमियों से उत्पन्न सामान्य लक्षण - 

◆ इन कृमियों की गतियों से रात के समय तीव्र खुजली होती है । यह प्रायः गुदा और उसके आस - पास के क्षेत्र में ही सीमित रहती है । 

◆ नींद खराब हो जाती है जो विशेषकर बच्चों में होती है तथा कभी - कभी बच्चे दाँत किटकिटाते हैं ।

◆ भूख की कमी ( Loss of Appetite ) ।

◆ गुदा मार्ग की त्वचा में सुई चुभाने जैसा दर्द ।

◆ अनेक रोगियों को इसकी तेज खुजलाहट से रात में अनजाने में मूत्र त्याग या स्वप्नदोष सदृश्य वीर्य स्राव हो जाता है ।

◆ उदर कष्ट ( Abdominal discomfort ) ।

◆ लड़कियों में योनि शोथ वृद्धि की सम्भावना । 

◆ इओसिनोफीलिया के लक्षण । 

◆ अजीर्ण सम्बन्धी विकार ।

याद रखिये - जब बालक गुदा प्रदेश को खुजलाता है तो अण्डे उसकी अंगुलियों एवं नाखूनों में लग जाते हैं , और यह इस प्रकार से पुनः मुख में पहुँच जाते हैं । इस प्रकार बार - बार संक्रमण होता रहता है ।

सूत्र कृमि रोग निदान - 

◆ गुदा पर बिजली के बल्ब का प्रकाश डालने से ये कृमि खिंच कर बाहर आने लगते हैं । 

◆ वयस्क कृमि मल में उपस्थित मिलते हैं । जिन्हें आँखों से देखा जा सकता है । 

◆ मलद्वार के पास की त्वचा पर चिपकने वाला प्लास्टर लगा दिया जाता अण्डे इस पर चिपक जाते हैं और प्लास्टर को स्लाइड पर लगाकर सूक्ष्मदर्शक की सहायता से इन्हें देखा जा सकता है । ।


चिकित्सा विधि / पथ्यापथ्य - 

◆ यह कृमि अधिकतर बच्चों को कष्ट देते हैं । अतः उनको ही इन कृमियों से बचाना चाहिये । ज्यादा अधिक मीठा खाने से बच्चों के पेट में कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं । कीड़े होने पर उन्हें मीठा खाने के लिये एकदम बंद करा देना चाहिये । 

◆ रोग होने ही न पाये , अतएव स्वच्छता आवश्यक है । हाथों को साफ किये बिना उंगलियों को मुँह में न डालें । नाखून सदा कटे हुए होने चाहिये । रात को पायजामा पहन कर सोयें ।

■■ सूत्र - कृमि लक्षण एक दृष्टि में -

● नींद में सोते - सोते दाँत चबाना । 

● नाक के अग्र भाग एवं गुदा द्वार को बार - बार खुजलाना । 

● सांस के साथ दुर्गन्ध ।

● पतले दस्त ।

● हाज्मे की खराबी । 

● बुखार । 

● शरीर में रक्त की कमी । 

नोट - यह कृमि बड़ी उम्र वालों को भी होते हैं पर उनको कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकते । 

सूत्र कृमि नाशक औषधि चिकित्सा -

Rx . 

◆ मेबेण्डाजोल ( Mebendazole ) 100 मि.ग्रा . की एक मात्रा । 1 सप्ताह बाद पुनः दोहरायें । 

अथवा - 

◆ पिपराजीन साइट्रेट ( Piperazine citrate ) 65 मि.ग्रा . / किलो / नित्य- 7 दिन तक । 

नोट - आवश्यकतानुसार 2 सप्ताह बाद दुहरा सकते हैं । इसके बाद प्रति 2 माह पर । 

अथवा - 

◆ पायरेन्टल ( Pyrentel ) 10 मि.ग्रा . / किलो शरीर भार पर । अधिक से अधिक 500 मि.ग्रा . । 

स्थानिक चिकित्सा - ' जिंक आक्साइड आइण्टमेण्ट गुदा पर रात्रि के समय लगायें।

नोट - ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट्स , सीरप आदि गोल कृमि ( Roundworms ) में दी गयी हैं । 

याद रखिये - रोगियों को किसी भी एलर्जीनाशक औषधि का प्रयोग मुख द्वारा तथा क्रीम ( मरहम ) का स्थानीय प्रयोग अन्य परजीवी निवारक औषधियों के साथ ही करना चाहिये । 

- पिपराजीन को 50 मि.ग्रा . प्रति किलोग्राम वजन के अनुसार 10 दिन तक देने से पर्याप्त लाभ मिलता है ।

★★ इस समय पाइरीविनियम प्रामोऐट ( बैंक्वीन- Vanquin ) सर्वश्रेष्ठ औषधि मानी जा रही है । जिसकी मात्रा 5 मि.ग्रा . प्रति किलोग्राम वजन के अनुसार रात्रि भोजन से पूर्व दी जाती है ।


फीता कृमि ( टेपवर्म- Tapworm ) 


पर्याय - 

स्फीत कृमि , फीते जैसे कीड़े , कद्दू दाना । 

परिचय - 

यह सिस्टोड वर्ग की कृमि है और आकार में चपटी होती है । टेपवर्म बहुत कम रोगियों में देखे जाते हैं । यह कृमि विशेषकर उन रोगियों में पाया जाता है जो मांसाहारी हैं और गाय या सुअर का मांस प्रयोग करते हैं । इन दो पशुओं के शरीर में टेपवर्म के जीवन का एक मुख्य काल व्यतीत होता है और इनके मांस को खाने वाले लोगों में यह सरलता से स्थानान्तरित हो जाता है । इस कृमि की पूँछ की भाग से टूट कर टुकड़े मल द्वारा निकला करते हैं और इनको सूक्ष्म दर्शी यंत्र द्वारा ही देखा जा सकता हैं । 

■ यह कृमि रोगी की आँत में दीवार के अंदर अपना सिर गाड़े रखता है और रक्त चूसा करता । इस कृमि की चिकित्सा एवं इससे पीछा छुड़ाना बहुत ही कठिन कार्य होता है । यह 32 फीट तक लम्बा हो सकता है ।

★ कृमि संक्रमण जन्य कारण -

● फीते जैसा लम्बा कीड़ा होता है । इसकी लम्बाई 31 से 62 मि.मी. तक की होती है। 

● आकार में चपटा , गाँठदार एवं रंग में सफेद होता है । 

● इसका संक्रमण सुअर , गाय , कुत्ता , मछली आदि से होता है । इसीलिये अधिक माँस , मछली खाने वाले विशेषकर गाय व सूअर खाने वाले माँसाहारी व्यक्तियों को यह अधिक होता है । 

फीताकृमि 2 प्रकार की होती है - 

■ टीनिया सोलियम - यह 3 मीटर या 9- 10 फुट लम्बी , चपटी कृमि होती है । जो सुअर का माँस ( भली प्रकार पका न हो- Half Boil ) खाने वालों को होती है । 

■ टीनिया सेजीनेटा - यह गो वंश ( Beef ) के जानवरों का माँस खाने से । इसकी लम्बाई 10 मीटर या 30 फुट तक होती है ।

★ कृमि संक्रमण से उत्पन्न लक्षण - 

टीनिया सेजीनेटा से उत्पन्न लक्षण - 

● शरीर भार में कमी । 

● भूख की अधिकता ।

● उदर पीड़ा । 

● पेट में गड़गड़ाहट ( Gurgling ) । 

यह इसका विशेष लक्षण है , जो सुनाई देता है । 

■ पेट का दर्द नाभि के आस - पास या बायें हाइपोक्रोन्ड्रियम में होता है । । 

■ इसके अतिरिक्त - अजीर्ण , श्वास कष्ट , पीलिया , जलोदर , शक्ति ह्रास , फुफ्फुस शोथ , प्लीहा वृद्धि , वृक्क शूल , मूत्र प्रणाली में दर्द , बार - बार थोड़ा - थोड़ा कष्ट के साथ मूत्र त्याग , उल्टी , ऐठन , शीतपित्त आदि लक्षण होते हैं । 

टीनिया सोलियम में उत्पन्न लक्षण -

शरीर भार में कमी , अधिक भूख लगना , उदर शूल( पेट दर्द ) , पेट में गुड़गुड़ाहट आदि की उपस्थिति ।


नोट - इन कृमियों का जीवन चक्र सुअर और मनुष्य शरीर में बराबर चलता है ।

★ रोग निदान - 

■ टीनिया सोलियम के द्वारा माँसपेशियों तथा त्वचा पर स्थानीय लक्षण लगभग 3-7 वर्षों बाद दिखायी पड़ते हैं । इस समय त्वचा पर हाथ फेरने से सिस्ट गाँठों की भाँति प्रतीत होते हैं । 

■ मस्तिष्क में मृत सिस्ट जमा होते रहते हैं । जिन्हें X - Ray द्वारा देखा जा सकता है । माँसपेशियों में मृत सिस्टों की गाँठे त्वचा के नीचे X - Ray चित्रण में दिखायी देती ।

चिकित्सा विधि - 

● अनेक कृमिहर औषधियों को एक साथ देना अधिक गुणकारी होता है ।  

● रोगी को गुड़ खिलाकर कुछ समय पश्चात कृमि नाशक औषधि देने से कोष्ठगत कृमियाँ बाहर निकल जाती हैं । 

● रक्त की कमी होने पर लौह( आयरन ) के योग आवश्यक । 

● संतुलित आहार ।

● अपस्मार के लक्षणों का उपचार ।

याद रखिये - यह कृमि जो थोड़ी देर निकलने के पश्चात भी हिलते रहते हैं , मल में देख कर इस कृमि का निश्चय हो जाता है ।

★ फीताकृमि नाशक औषधि चिकित्सा -

Rx . 

◆ निकलोसामाइड ( Niclosamide ) व्या.नाम - योमेसान ( Yomesan ) 2 ग्राम की एक ही मात्रा पर्याप्त । 

अथवा - 

◆ डाइक्लोरोफेन ( Dichlorophen ) 6 ग्राम की एक मात्रा - प्रातः काल ।

नोट - गोली चबाकर निगलें । 

■ 3 से 6 माह बाद मल ( Stool ) का टेस्ट करायें । अथवा सुगाण्डाजाल ( Sugandazol ) S.G. 1 टेबलेट , दिन में 2 बार करके निरन्तर 3 दिन दें । 

नोट- 

● बच्चों और वयस्कों की एक ही मात्रा ।

● 2 वर्ष की अवस्था से कम के बालकों में न दें । 

● गर्भावस्था के प्रथम 3 मास प्रयोग वर्जित । 

अथवा - 

■ टेट्राकैप ( Tetracap ) वी डब्लू 1-2 कै.- रात सोते समय । साथ ही प्रातः मैगसल्फ का हल्का जुलाब ।

■■ औषधि देने से पूर्व रोगी की विशेष तैयारी - 

पहले रोगी की आहारनाल जहाँ यह फीते के आकार का कृमि पड़ा रहता है , बिल्कुल खाली रहे तकि औषधि का पूर्ण प्रभाव इस कृमि के शरीर पर सीधा ही हो सके । इसके लिये रोगी को 2-3 दिन तक भूखा रखा जाये एवं केवल द्रव पदार्थ ही सेवन कराये जायें । जैसे - फलों का रस , ग्लूकोज पानी आदि । सोडाबाई कार्ब 30 ग्राम प्रति दिन 4 बार खाने को दें जिससे आँतों के अंदर की श्लेष्मा घुल जाये । इन 2-3 दिनों में प्रातः काल मैगसल्फ का दस्तावर( दस्त लाने वाली ) घोल रोगी लेता रहे । इसके पश्चात सुबह जब आमाशय खाली हो तो औषधि प्रयोग करायें । 

सावधान - रोगी को दूध या स्टार्च वाला कोई भी भोजन / पदार्थ न दें ।


अंकुश कृमि ( हुकवर्स- Hookworms ) 


पर्याय - 

अंकुश मुखकृमि । 

परिचय - 

इसको ' एनसिलोस्टोमा ड्यूडीनेल कहते हैं । इन कृमियों का रंग लाल होता है । इस कृमि से हुए उपसर्ग को एनसाइलोकोमोसिस ( Ancylostomoses ) कहते हैं ।  

■ हुकवर्स छोटी आंत के प्रथम भाग ( Duodenum ) में रहते हैं तथा रोगी का रक्त चूस- चूस कर उसको पीला बना देते हैं ।

★ रोग के कारण -

● संक्रमण 60 % लोगों में । 

● कृमि नर प्रायः 1 से . मी . तथा मादा डेढ़ से . मी . लम्बी । मुख में दाँत होते हैं जिनसे यह आँतों में चिपके रहते हैं एवं मानव रक्त पीते रहते हैं । 

अन्य कारण - 

● निरन्तर रहने वाला कब्ज । 

● अधिक मीठा खाना । 

● कच्चे और सड़े फलों का सेवन । 

● दूषित माँस खाना । 

● अन्य रोगों के साथ । 

याद रखिये - मनुष्यों में इसका संक्रमण मल मिश्रित आहार के सेवन से होता है और वयस्क व्यक्तियों में अधिक । 

- यह आँतों की श्लेष्म कला से चिपकी रहती है और मानव रक्त पर पलती है । 

- त्वचा में प्रविष्ट होकर ये कृमियाँ मनुष्य रक्त में भ्रमण करती हुई फेफड़ों तक पहुँच जाती हैं ।

★ अंकुश कृमि से उत्पन्न सामान्य लक्षण - 

● शरीर पीला पड़ जाता है । 

● खून की कमी ।

● संक्रमण स्थल पर प्रायः पैर के तलवे में खुजली ( पाद कण्डू- Ground itch ) हो जाता है । पहले त्वचा में रक्तमा और बाद में छाला । 

● अत्यधिक संक्रमण में फेफड़ों में पहुँच कर खाँसी की उत्पत्ति एवं रक्त युक्त कफ आना सम्भव । 

कृमियों के छोटी आंत में पहुंचने पर - 

● वमन( उल्टी ) , इपीगैस्ट्रिक शूल एवं ड्यूडेनल अल्सर के समान लक्षण । 

●कभी - कभी संग्रहणी जैसे पतले - पतले दस्त । 

● अधिक तीव्र आक्रमण अथवा पर्याप्त भोजन के अभाव में - ज्यादा मात्रा में खून की कमी हो जाती ।

● रक्त न्यूनता के कारण विशेषकर बच्चों में चेहरे पर भुसभुसापन ( Puffness ) , सूजन , पेट का बढ़ना एवं जलोदर( पेट मे जल भरने जैसी स्तिथी ) भी सम्भव । 

● बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है । 

● दुर्बलता होने पर किसी भी भयानक रोग के आक्रमण की तीब्र सम्भावना ।

रोगी की मृत्यु - रोग संक्रमण की चिकित्सा करने , अपोषण एवं तीव्र संक्रमण के कारण हो सकती है । 

इन कृमियों की उपस्थिति से -

पाचन क्रिया बिगड़ जाती है , उदर( पेट ) भारी रहता है । रोगी को झूठी भूख लगती है । उसमें मिट्टी , ईंट , खपड़ा , चूल्हे की पकी मिट्टी आदि खाने की इच्छा रहती है । सुस्ती एवं निराशा उसके चेहरे पर छायी रहती है ।


रोग निदान -

● मल परीक्षा ( Stool test ) में अंकुश कृमि या उसके ' ओवा ' मिलते हैं । 

नोट - मल के 1 ग्राम में लगभग 5 हजार ओवा( सफेद बलगम जैसा ) मिलते हैं । 

● तीव्र पाण्डु( पीलिया ) के लक्षणों को देखकर रोग का निश्चय हो जाता है । 

● इन कृमियों का संक्रमण प्रायः गोल कृमियों के साथ हो जाता है ।

चिकित्सा विधि -

● अनेक कृमिहर औषधियों का एक साथ प्रयोग । 

● सन्तुलित आहार । 

● अरक्तता के लिये आयरन टेबलेट दें । 

● जिन क्षेत्रों में यह रोग हो , वहाँ नंगे पैर मल त्याग के लिये जाने से लोगों को बचाना चाहिये । इधर - उधर टट्टी न करें ।

■■ ' एन्थिलमेन्टिक्स / तत्पश्चात - आइरन एवं उच्च प्रोटीन भोजन की व्यवस्था।

याद रखिये - अंकुश कृमि वाले रोगी को मीठा दलिया खिलाकर प्रातः मामूली जुलाब देना चाहिये । कृमि रोगी का पेट खूब साफ रखा जाये । एनीमा से पेट साफ करना लाभकारी रहता है । क्योंकि आँतों में मल का जमा होना ही इस रोग की उत्पत्ति का मुख्य कारण है । 

★ अंकुश कृमि नाशक औषधि चिकित्सा - 

मल की जाँच द्वारा पता लगाकर उचित औषधि को प्रयोग करें । जैसे - एल्कोपार , डेकारिस , वर्मीसोल , किटकैट आदि । 

Rx . 

◆ डीवर्मिस ( Dewormis ) नि . ' विडलशायर ' 1 टेबलेट - प्रति 6 घण्टे पर दें । कुल 4 मात्रायें दें । 

बच्चों को - 50 मि . ग्रा . की 1 टे . प्रति 6 घंटे पर । कुल 4 मात्रायें दें । 

अथवा- 

◆ मेण्डाजोल ( Mendazole ) विडल शायर 1 टेबलेट ( 100 मि . ग्रा . ) दिन में 2 बार करके 3 दिन तक दें । 

अथवा- 

◆ सुगैण्डाजोल ( Sugandazol ) नि . एस . जी . 1 टे .- दिन में 2 बार करके 3 दिन तक दें । 

नोट- वर्मिटेल ( Vermitel ) नि . एस्ट्रा - आई . डी . एलो . ' , वर्मिन ( Wormin ) नि . ' कैडिला ' - यह सभी औषधियाँ पूर्वत ।

अथवा - 

◆ जेन्टिल ( Zentil ) नि.'एस्केएफ ~

वयस्क - 400 मि.ग्रा . की 1 टे . या 10 मि.ली. लिक्विड तथा 2 वर्ष से ऊपर । 1 से 2 वर्ष के बच्चों को - 200 मि . ग्रा . की 1/2 टे . या 5 मि . ली . सस्पेन्शन दिन में एक या दो बार 3 दिन तक । 

सावधान - गर्भावस्था में प्रयोग न करें । 

' हरीसन्स प्रिंसिपल आफ इन्टरनल मेडिसिन्स ' के अनुसार -

■ पाइरेन्टेल ( Pyrentel ) 11 मि . ग्रा . । प्रति किलो ( अधिकतम् 1-0 ग्रा . ) दिन में 1 बार 3 दिन तक । 

अथवा- 

■ मेबेण्डाजोल 100 मि . ग्रा.- दिन में 2 बार 3 दिन तक ओरली । 

नोट - यदि साथ में एस्केरिस की भी उपस्थिति मिले तो - 

प्रथम- ' पिपराजीन साइट्रेट दें । तत्पश्चात- ' एल्कोपार ( Alcopar ) 5 ग्राम प्रातः खाली पेट जल के साथ दें । 2 घण्टे तक कोई आहार न दें । बालकों को यही मात्रा में दें । 

अथवा - 

थायबेण्डाजोल ( Thiabendazole ), मिण्टेजोल ( Mintezole ) 25 मि . ग्रा . / किलो भार पर । दिन में 2 बार 3 दिन तक । अर्थात 500 मि.ग्रा . की 2 टे . दिन में 2 बार दें । औषधि चबा कर निगलें । 

नोट - यह एक ' ब्राडस्पेक्ट्रम औषधि ' है ।

■ अनीमिया के लिये आयरन दें । गम्भीर स्वरूप की अनीमिया में औषधि देने से पूर्व ब्लड ट्रान्सफ्यूजन तथा उच्च प्रोटीन आहार दें । 

■ ब्लड की मात्रा इतनी दें कि ' हिमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ कर 10 ग्राम प्रति 100 मि . ली . हो जाये । 

अन्य साधारण प्रकार के आंत्र कृमि - 

जब कोई ऐसा रोगी आपके पास आता है जिसके दीर्घकाल से पेट दर्द अथवा ' अतिसार आ रहे हों तो मल परीक्षा के लिये किसी योग्य भरोसे की लेबोरेटरी में भेज दें । बहुत से कृमि बिना कोई समस्या उत्पन्न किये भोजन नली में पड़े रहते हैं । इनके कारण - कभी - कभी रोगी को तीव्र पेट दर्द , वमन( उल्टी ) एवं जीर्ण अतिसार हो सकते हैं , जिनका उपरोक्त परीक्षण से पता चल जाता है । ऐसे रोगियों को कृमिनाशक औषधियों से कोई लाभ न हो तो इन रोगों के अन्य कारणों के विषय में विचार करना चाहिये । 

ऐसे सभी कृमियों की चिकित्सा निम्न प्रकार से करनी चाहिये - 

आजकल इन कृमियों की चिकित्सा के लिये मिण्टीजोल ( Tab . Mintezole ) तथा डेकारिस ( Tab . Decaris ) एवं जेट मिसोल ( Tab . Jetmisol - P ) या P ( Child ) का प्रयोग किया जाता है ।

मिन्टीजोल या डेकारिस  -  25 मि . ग्रा . प्रति कि . शरीर भार के अनुसार दिन में 2 बार करके 3 दिन तक चबाकर निगलें । 1 टेबलेट एक बार एक मात्रा के रूप में । बच्चों को 50 मि . ग्रा . के हिसाब से । 

■ आवश्यकता पड़ने पर 12 घण्टे बाद पुनः । 

■■ यह दोनों औषधियाँ अन्य कृमियों के अतिरिक्त ' एस्केरिस ' तथा कुछ हुकवर्स ( Hookworms ) पर भी अपना प्रभाव डालती हैं । 

नोट - इन औषधियों के प्रयोग काल में रोगी को मितली , चक्कर आदि दुष्प्रभाव हो सकते हैं । इसके लिये घबराने की आवश्यकता नहीं ।

■ ट्राइक्यूरिया ट्राइक्यूरिस ( Trichuria Trichuris ) या ह्विपवर्स ( Whip worms ) जो कि बारीक सफेद धागों के समान छोटे - छोटे बहुत सी मात्रा में हो जाते हैं । इनमें उपरोक्त दोनों औषधियों लाभकारी होती हैं । 

■ ट्राइकिनेला स्पाइरालिस ( Trichinella Spralis ) जो कि सुअर का माँस प्रयोग करने वाले लोगों को प्रभावित करता है । प्रारम्भिक संक्रमण की अवस्था में ' मिण्टेजोल द्वारा 7 दिन तक प्रातः - सायं प्रयोग करके नष्ट किया जा सकता है । 

जियार्डिया लैम्बलिया ( Giardia Lamblia ) - यह बहुत ही सूक्ष्म कृमि होते हैं जो भोजन नली में रहकर जीर्ण अतिसार ' या ' विशूचिका उत्पन्न करते हैं । इनसे उत्पन्न रोग जियार्डियासिस कहलाता है , जिसका विस्तृत वर्णन आगे के पोस्ट्स में देखने को मिलेगा । इनकी चिकित्सा - क्लोरोक्वीन , कैमोक्वीन एवं मैट्रोनिडाजोल औषधियों से की जा सकती है ।

सम्पूर्ण वर्स रोग अति संक्षेप में ~

★ वर्म्स लक्षण एक दृष्टि में -

■ गोल कृमि संक्रमण ( Round worms Infastation ) - 

◆ अपच , 

◆ पतले दस्त , 

◆ शीत पित्त , 

◆ श्वास कास( खाँसी ) , 

◆ एलर्जिक लक्षण , 

◆ उदर पीड़ा( पेट दर्द ) , 

◆ क्षुधानाश( भूख न लगना ) , 

◆ पाण्डुता( पीलिया ) , 

◆ रात को दाँत किटकिटाना , 

◆ वमन( उल्टी ) ,

◆ कब्ज एवं कृमियों की अधिकता में आन्त्रावरोध । 


■ सूत्र कृमि संक्रमण ( Thread worms Infastation ) -

◆ शरीर भार में कमी । 

◆ गुदा मार्ग में तीव्र खुजली एवं सुई चुभने वाला दर्द बार - बार ।

◆ कई बार तीव्र खुजलाहट से रात में अनजाने में पेशाब एवं स्वप्नदोष ।

◆ अनिद्रा । 


■ फीता कृमि संक्रमण ( Tap worms Infastation ) -

◆ मांस , मछली खाने वालों को अधिक ।  

◆ शरीर भार में कमी ।

◆ भूख की अधिकता । 

◆ श्वास कष्ट । 

◆ उदरशूल( पेट दर्द ) ।

◆ कामला( पीलिया ) एवं जलोदर( पेट मे जल भरने जैसी स्तिथि । 

◆ पेट में गुड़गुड़ाहट । 

◆ बार - बार कष्ट के साथ थोड़ा मूत्र । 

◆ अपच । 

◆ रक्त परीक्षा में इओसिनोफीलिया । 

◆ मृत्यु तक सम्भव ।


■ अंकुश कृमि संक्रमण ( Hook worms Infastation ) -

◆ पाचन क्रिया में गड़बड़ी । 

◆ खून की कमी । 

◆ पेट में भारीपन । 

◆ श्वास कष्ट । 

◆ बार - बार झूठी भूख । 

◆ दुर्बलता । 

◆ कब्ज , अफारा( गैस ) अथवा पतले दस्त । 

◆ आँतों में जलन ।

◆ त्वचा का पीला पड़ना । 

◆ हल्का ज्वर । 

◆ शीत पित्त एवं सुस्ती । 


■ प्रतोद कृमि संक्रमण ( Whip worms Infastation ) - 

◆ घोड़े के चाबुक जैसे ।  

◆ रक्त की कमी । 

◆ कभी - कभी आँत में सूजन एवं जलन । 

◆ गैस की अधिकता एवं अपच ।

सम्पूर्ण वर्स चिकित्सा एक दृष्टि में ~

Rx 

● गोल कृमि , केंचुआ ( Round worm ) ~ जेन्टिल ( Zentil ) - वयस्क एवं 2 वर्ष के ऊपर के बालक -1 टे . केवल एक मात्रा । 14 दिन बाद दुहराया जा सकता है । ऐसे 3 चक्रों तक । 

अथवा-

' थाइबेण्डाजोल 25 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार पर दिन में 2 बार करके 3 दिन तक । इडिबेण्ड ( Idibend ) ' IDPL'- 1 टे . दिन में 2-3 बार 3 दिन । आवश्यकता पड़ने पर 2 सप्ताह बाद ।

● सूत्र कृमि ( Thread worm ) ~ ' जेन्टिल ऊपर दिए गए  अनुसार ।

अथवा-

वर्मिन ( Wormin ) कैडला - 1 टे . दिन में 2 बार करके 3 दिन तक । 

निषेध - प्रथम 3 माह की गर्भावस्था एवं 2 वर्ष से कम के बच्चों में वर्जित । 

● फीता कृमि ( Tapworm ) ~ ' जेन्टिल उपरोक्त अनुसार । 

अथवा- 

सुगाण्डाजोल एस . जी . - 1 टे . रात सोते समय एवं दिन में भोजन के बाद । ऐसा 2 - 3 दिन तक करें ।

अथवा- 

वर्मिन - ऊपर के अनुसार ।

● अंकुश कृमि ( Hookworm ) ~  ' जेन्टिल ' या ' वर्मिन उपरोक्त अनुसार । 

अथवा- 

मेण्डाजोल विडलशायर - 1 टे . दिन में 2 बार 3 दिन तक ।

● प्रतोद कृमि ( Whipworm ) ~ ' जेन्टिल उपरोक्त अनुसार । 

अथवा-

सुगैण्डा जोल । 

अथवा- 

वोमिबान ( Womeban ) ' ब्लू क्रास ' 1 टे . केवल एक मात्रा । आवश्यकता पड़ने 3-4 सप्ताह बाद पुनः ।

वर्म्स - बाल चिकित्सा एक दृष्टि में ~

◆ गोल कृमि , केंचुआ ~ कम्बैण्ट्रीन ( Combantrin ) ' फाईजर ' 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों में - 1/2 टे . या 4 मि . ली . सस्पे . ।

∆ 2 से 7 वर्ष वालों को - 1 टे . या 8 मि . ली . सस्पे . । 

∆ 8 से 14 वर्ष वालों को - 2 टेबलेट ।

◆ सूत्र कृमि ~  कम्बैण्ट्रीन- ऊपर के अनुसार । 

अथवा- 

जेन्टिल सस्पेन्शन - 1 से 2 वर्ष के बच्चों को 200 मि . ग्रा . एक मात्रा में । 2 वर्ष से अधिक के बच्चों में 400 मि.ग्रा . की । मात्रा , प्रति 14 घण्टे बाद ।

◆ फीता कृमि ~ वर्मिसोल ( Vermisol ) ' खण्डेलवाल 50 मि.ग्रा . वाली 1 टे . 1 बार । 

अथवा-

इसी का सीरप 5 मि . ली . रात को सोते समय । अथवा जेन्टिल सस्पेन्शन ।

◆ अंकुश कृमि ~ ' कम्बैण्ट्रीन ' उपरोक्त अनुसार । 

अथवा- 

' जेन्टिल -1 से 2 वर्ष के बच्चों को 200 मि . ग्रा . 1/2 टेबलेट या 5 मि . ली . सस्पेन्शन दिन में एक बार करके 3 दिन तक ।

◆ प्रतोद कृमि ~ जेन्टिल ' पूर्व के अनुसार ही। 

अथवा- 

कैम्बैण्ट्रीन पूर्ववत । 

अथवा- 

डी वर्मिस ( D.Wormis ) विडलशायर 50 मि.ग्रा . टे . प्रति 6 घण्टे पर । 4 मात्रा तक ।


 

पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -






































और भी जाने : -
























image creador - Ascaris Lumbricoides,by - SuSanA Secretariat,, by - International Institute of Tropical Agriculture,, by - Mogana Das Murtey and Patchamuthu Ramasamy,, hook worms egg, by - Joel Mills (Joelmills at English Wikipedia)

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