बवासीर / पाइल्स [ Piles ]
![]() |
| बवासीर / पाइल्स [ Piles ] , by - https://www.myupchar.com/en |
पर्याय –
अर्श , मस्सा , कील , गुदजा , गुदकीलक , दुर्नाम , हीमोरॉइड ( Haemorrhoid ) ।
परिचय -
मलद्वार के भीतर अथवा बाहर सूजन और बकरी की घीसी जैसा एक तरह का मस्सा ( ट्यूमर ) पैदा हो जाने को अर्श या पाइल्स कहते हैं ।
शिरा का वेरीकोज अर्थात सूजन होकर फैल जाने से यह बीमारी होती है।
वक्तव्य -
■ अर्श । बवासीर रोग में मलद्वार के भीतर या बाहर छोटे - छोटे ट्यूमर या अर्बुद( गांठ ) जैसे दाने पैदा हो जाते हैं । इन्हें हिन्दी में बवासीर के मस्से और अंग्रेजी में पाइल्स कहते हैं । इन मस्सों के अंदर छोटी - छोटी धमनियाँ रहती हैं । इन धमनियों में कुछ दिन तक खून जमता रहता है जिससे वह प्रसारित होकर मोटी हो जाती है ।
■ बवासीर से जो खून गिरता है , वह आर्टीरियल होता है और म्यूकस मेम्ब्रेन की आर्टरी से आता है । एक बार में 4-5 औंस तक रक्त आता है ।
रोग के कारण -
● यकृत दोष के परिणामस्वरूप ।
● बहुत दिनों तक कब्ज की शिकायत ।
● लिवर सिरोसिस की बीमारी से ।
● हृदय की कुछ बीमारियाँ ।
● किसी रोग के कारण पाखाना करते समय अत्यधिक काँखना या जोर लगाना।
● मूत्रनली की किसी बीमारी में पेशाब करते समय अधिक काँखना या जोर लगाना।
● मलद्वार के भीतर स्ट्रिक्चर( चोट लगना या कट जाना ) ।
● डिस्पेप्सिया तथा किसी जुलाब की दवा का अधिक दिनों तक सेवन ।
● बवासीर सम्बन्धी नस ( हिमोरॉयडैल शिरा ) के अंदर ओवेरियन अथवा किसी ट्यूमर का दबाव । अथवा गर्भावस्था में जरायु( गर्भ की बाहरी झिल्ली ) का दबाव।
● मद्य , माँस , अण्डा , केकड़ा , प्याज , लहसुन , मिर्च , गर्म मसाले से बनी शाक सब्जी या कोई खाद्य - पदार्थ हद से ज्यादा खाने एवं रात्रि जागरण आदि से।
● सदैव बेकार बैठे रहना एवं जन्म से दोष ।
नोट - मलाशय कैंसर , श्रोणि प्रदेश( कमर के निचला भाग ) के अर्बुद , गर्भाशय भ्रंश आदि से भी अर्श होता है ।
रोग के प्रधान लक्षण -
अर्श रोग 3 प्रकार का होता है -
◆ एक्स्टरनल यानी बाहरी मस्से ( Blind Piles ) ।
◆ इण्टरनल यानी रक्तस्रावी ( रक्ताश ) पाइल्स - भीतरी मस्से ।
◆ मिक्स पाइल्स यानी भीतर - बाहर दोनों ओर मस्से ।
वाह्य ( एक्स्टरनल ) या ब्लाइन्ड पाइल्स -
■ जब मलद्वार की आकुंचक पेशी के बाहर अर्श होता है , तब वह चमड़े से ढका रहता है । इसमें मस्से बाहर होते हैं ।
लक्षण इस प्रकार हैं -
◆ मलद्वार में खुजली । एवं सुरसुरी ।
◆ कभी - कभी प्रदाह( इंफामशन ) एवं दर्द ।
◆ सूजन और जलन ।
◆ चलने - फिरने में तकलीफ । यह तकलीफ पाखाना करते समय अधिक होती है । कष्ट एक सप्ताह के अंदर घट जाता है , रोगी को कुछ आराम मालूम होने लगता है किन्तु कुछ समय बाद फिर वही हालत हो जाती है ।
◆ इस प्रकार के अर्श में न खून गिरता है , न पकता है और न घाव होता है । इसे सामान्य भाषा में बादी बवासीर ' कहते हैं।
आन्तरिक अर्श ( इण्टरनल ) रक्तार्श ( Bleeding Piles ) -
◆ मलद्वार के भीतर भारीपन एवं कुछ खुजली ।
◆ समय - समय पर रक्त गिरता है , कभी कभी , रक्त की टोंटी चलती है ।
◆ नये रोग में तीव्र दर्द एवं टट्टी फिरते समय जब मस्से बाहर निकल आते हैं , तब बड़ी भारी तकलीफ होती है । प्रायः मल त्याग के समय पीड़ा होती है ।
◆ रोगी मलावरोध से सदैव पीड़ित रहता है उसे दस्त सदैव कड़े आते हैं , दस्त के समय रक्त आता है ।
◆ पेट साफ न होने से रोगी को भूख नहीं लगती ।
◆ लगातार अधिक दिन तक खून गिरते रहने से रोगी रक्तहीन हो जाता है और अनीमिया के लक्षण प्रकट होने लगते हैं ।
◆ रोगी कुछ दिन अच्छा रहता है , खून गिरने की शिकायत नहीं रहती है , किन्तु फिर अकस्मात किसी दिन खून गिरना प्रारम्भ हो जाता है ।
◆ रोगी के जोड़ों में टूटने जैसा दर्द होता है , कभी - कभी जाँघों में भी पीड़ा होती है।
◆ रोग पुराना होने पर दर्द , प्रदाह आदि कुछ नहीं होता है , केवल रक्तस्राव ही होता है । कभी - कभी अज्ञात अवस्था में उकडू बैठने से रक्तस्राव होकर पेंट खराब हो जाती है ।
मिक्सड यानी मिश्रित पाइल्स - इसमें भीतर - बाहर दोनों ओर मस्से होते हैं । इसमें अर्श का कुछ भाग म्यूकस मेम्ब्रेन से और कुछ हिस्सा चमड़े से ढका रहता है
याद रखिये - अर्श रोग में मलद्वार के भीतर या बाहर छोटे - छोटे ट्यूमर या अर्बुद( गाँठ ) जैसे दाने पैदा हो जाते हैं ।
रक्त आने की विशेषतायें -
■ अर्श का रक्तस्राव साधारणतः मलत्याग के पहले या बाद में होता है , मल के साथ नहीं ।
■ खून कभी - कभी बूंद - बूंद अलग - अलग गिरता है । अथवा कभी कठोर मल के एक बगल एक रेखा सी बन कर निकलता है ।
■■ गुदद्वार में कोई चीज अड़ी है , ऐसा मालूम होता है ।
■ अर्श में रक्तस्राव होता ही है । आरम्भ में अर्श शुष्क रहते हैं किन्तु बाद में रक्तआने लगता है ।
नोट - सामान्यतः रक्तस्राव , वेदना( दर्द ) और अंकुरों में सूजन के आक्रमणों से रोगी को जो कष्ट होता है , उससे इस रोग की भयानकता को आँका जा सकता है।
रोग की पहिचान -
◆ रोग अधिक्तर 20 वर्ष की आयु में प्रारम्भ होता है । पुरुषों में अधिक।
◆ निदान में कोई कठिनाई नहीं । उपरोक्त लक्षणों के आधार पर निदान आसानी से हो जाता है ।
रोग के परिणाम -
● शुष्क अर्श ( बादी बवासीर ) अर्थात इक्स्टर्नल पाइल्स का आक्रमण बार - बार होने से रोगी की गुदा संकुचित हो जाती है । साथ ही उस पर व्रण( छाला ) बन जाता है । यह व्रण आगे चलकर कैंसर में बदल जाता है । यह एक गम्भीर अवस्था है ।
● खूनी बवासीर में रक्तस्राव होता है । अधिक रक्तस्राव होने से रोगी अत्यधिक दुर्बल हो जाता है ।
नोट - रक्तार्श ( खूनी बवासीर ) से पीड़ित रोगी कभी स्वस्थ नहीं रहता है ।
चिकित्सा विधि -
■ मूल कारण को दूर करें ।
■ औषधि का प्रयोग करके सदैव कोष्ठ साफ रखने का प्रयत्न करना चाहिये ।
■ हल्का व्यायाम आवश्यक ।
■ शोथावस्था में रोगी को पूर्ण विश्राम ।
■ लक्षणों की उपयुक्त चिकित्सा ।
■ खूनी बवासीर की चिकित्सा आपरेशन द्वारा सम्भव । सुखी बवासीर के लिये आपरेशन आवश्यक नहीं ।
■ रक्त की कमी को दूर करने के लिये आयरन तथा लिवर एक्स्ट्रेक्ट का प्रयोग ।
पथ्यापथ्य / सहायक चिकित्सा -
■ मक्खन , शर्करा अथवा मथा हुआ दही का सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक होती है ।
■ रोगी का खानपान और औषधि इस प्रकार की होनी चाहिये जो वायु को निकले आनुलोमन करें , अग्नि और बल को बढ़ायें ।
निषेध- माँस , अण्डे , तथा गर्म मसाले से बनी चीजों , लहसुन , प्याज , मादक द्रव्य , चाय , कॉफी , रात को जागरण ।सहायक चिकित्सा में - पाखाने के समय जब मस्सा बाहर निकल आवे तो जल सौंच कर फिटकरी के टुकड़े को मस्से पर 4-6 बार फेर दें । इससे खून गिरना बंद हो जाता है ।
● रोगी को चित लिटाकर दोनों पैर अलग - अलग पसार कर मलद्वार के अर्श पर आइस बैग या ठंडे पानी की पट्टी लगावें । अथवा मलद्वार के भीतर मार्फिया सपोजीटरी डाल दें ।
सावधान -
◆ कैंसर की सम्भावनाओं की ओर सदैव ध्यान रखें ।
◆ हाई ब्लड प्रेशर तथा मलाशय कैंसर से ग्रसित रोगी की चिकित्सा करें ।
औषधि चिकित्सा -
★ बादी बवासीर ( External Piles ) -
Rx .
■ एनोवेट ( Anovate ) एलनवरीज
अथवा -
अनुसॉल एच.सी. ( Anusol H.C. ) वार्नर एप्लीकेटर से दिन में 2 बार मस्सों पर मरहम लगावें ।
साथ ही -
■ नोवल्जिन ( हैक्स्ट ) 1-2 टे . सेवन करायें । अधिक पीड़ा की स्थिति में मार्फीन अथवा पेथीडीन टेबलेट या इन्जेक्शन ।
अथवा -
ऑप्टालिडॉन ( Optalidon ) ' सैण्डोज 1-3 टेबलेट / बच्चों को 1/2 टे . जल से दर्द के समय ।
■ सुगेनरिल ( Suganril ) ' सुहृद गैगी ' 1-2 टे . दिन में 2 बार ( सूजन कम करने के लिये ) ।
■ सेप्ट्रान ( Septran ) वरोजवेल्कम 2 टे . दिन में 2 बार , जल से ।
● बच्चों के लिये पेडियाट्रिक टेबलेट या सस्पेंशन ।
■ डल्कोलेक्स ( Dulcolex ) ' जर्मन रेमेडीज 1-2 टे . जल से रात सोते समय / अथवा इसकी गुद सपोजीटरी गुदामार्ग में ।
★ खूनी बवासीर ( Haemorrhoids Piles ) -
Rx .
■ वेनूस्मिन ( Venusmin ) ' मार्टिन हैरिस 2 टे . भोजन के साथ - दिन में 2 बार ।
तीव्रावस्था में - 4 टे . दिन में 4 बार 2-3 दिन तक ।
सावधान - गर्भावस्था के प्रथम तिमाही में प्रयोग न करें ।
■ एड्रीनलीन क्लोराइड ( M.B. ) 1 : 1000 के एम्पुल के 1 भाग को 4 भाग डिस्टिल्ड वाटर में घोल कर मस्सों के निकट इन्जेक्शन लगावें ।
■ लिवर एक्स्ट्रेक्ट ( T.C.F ) एवं रैलीज 2 मि.ली. माँस में नित्य या तीसरे दिन ।
■ शील्ड ( Shild ) S.K.E आइन्टमेण्ट अथवा अल्ट्राप्रोक्ट ( Altraproct ) ' जर्मन रेमेडीज मरहम - मस्सों पर दिन में 2-3 बार लगावें ।
अथवा -
■ एनोवेट ( एलनवरीज ) दिन में 2-3 बार मल त्याग के पूर्व और पश्चात दोनों बार लगावें । साथ ही स्थानिक शोथ के लिये एण्टीबायोटिक्स दें ।
■ डैफलीन ( वाल्टरवुशनेल ) 2 कै . नित्य दिन में 2 बार । अथवा दिन भर में कुल 8-10 कैप्सूल ।
अर्श की मिश्रित औषधि चिकित्सा ( Combination Therapy ) -
■ वेनूस्मिन 2 टे . , वुस्कोपान कम्पोजीटम ( जर्मन रैमेडीज ) 1 टे . , वार्डेज ( पी.डी. ) 1 टे . , लिवर 52 -1 टे . , स्ट्रप्टोविओन ( मर्क ) 2 टे . । ऐसी 1 मात्रा गाय के कच्चे दूध अथवा चावल के धोवन के साथ दिन में 2-3 बार दे।
कब्ज के लिये → आइसोजेल ( ग्लैक्सो ) प्रति दिन ।
■ डैफलॉन ( वाल्टर वुशनेल ) 1 कै . , क्रोसिन ( डूफर ) 2 टे . , सीलिन 500 मि.ग्रा . की 1/4 टे . , कैपलिन ( ग्लैक्सो ) 1 टे . । ऐसी एक टेबलेट , 4-5 से 7-8 बार तक नित्य दें ।
इसके साथ ही -
मेडिथेन मरहम केन्डला की सहायता से दिन में 2-3 बार गुदा के अंदर और बाहर लगावें ।
अथवा-
मेडिथेन मरहम 1 भाग + न्यूपरकेनॉल मरहम ( सिवागैगी ) 1 भाग मिलाकर उपरोक्त अनुसार लगावें ।
★ तीव्र सूजन , प्रदाह एवं मस्सों के दर्द के लिये -
● इवूब्रूफेन पी . 1 टे . , सुगेनिल 1 टे . , सेप्ट्रान 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा , दिन में 3 बार दें ।
इसके साथ-
● हेडेन्सा मरहम 1 भाग + न्यूजीन मरहम 1/2 भाग - मिलाकर गुदा में 2-3 बार लगावें । एवं कब्ज दूर करने के लिये - क्रीमाफिन विद फेनाल्फथेलीन एमल्शन 2-3 चम्मच रात सोते समय दें ।
बादी बवासीर के लिये -
Rx .
■ प्रातः सायं = सुगान्रिल ( Suganril ) ' सुहृद गेगी 1-2 टेबलेट दिन में 2 बार।
■ भोजन के बाद -2 बार = वेनास्मिन ( Venasmin ) ' मार्टन हैरिस 2-4 टे . भोजन के बाद दिन में 2 बार ।
■ भोजन के 1 घंटे बाद = सेप्ट्रान ( Septran ) ' वरोज वेल्कम 2-3 टे . दिन में 2-3 बार ।
■ मस्सों पर लगाने = शील्ड ( Shield ) मरहम S.K.E. दिन में 2 बार लगावें ।
■ रात सोते समय = क्रीमाफिन लिक्विड -2 चम्मच ।
रक्तार्श ( इण्टरनल पाइल्स ) के लिये व्यवस्थापन -
Rx. (प्रेस्क्रिप्शन) -
◆ प्रातः 10 बजे , दो . 2 बजे , सायं 6 बजे = कैडिस्पर सी ( Cadisper - C ) कैडिला ' 1 टे . दिन में 3 बार ।
◆ दिन में 1 बार = इन्जे . लिवर एक्स्ट्रेक्ट ( टी.सी.एफ ' , रैलीज ' 2 मि.ली. माँस में 1 दिन छोड़कर ।
◆ दिन में 2-3 बार लगाने के लिये = हेडेन्सा ( Hadensa ) या शील्ड मरहम पाखाना करने से पहले और बाद में 2-3 बार मस्सों पर लगावें ।
◆ भोजन के बाद 3 बार = वेनूस्मिन ( Venusmin ) मार्टन हैरिस 2-4 टे . दिन में 2-3 बार । गर्भावस्था के त्रिमास में वर्जित ।
◆ दिन में 3 बार पाइलेक्स टे . ( Pilex tab . ) ' हिमालया ' 2 टे . दिन में 3 बार ।
◆ रात सोते समय = क्रीमाफिन - 2 चम्मच रात सोते समय ।
अर्श रोग की आपरेशन चिकित्सा -
बवासीर की एक मात्र उपयुक्त चिकित्सा यही है । इसमें रोगी को उस स्थान पर संवेदना सुन्न कर लिगेचर एवं इक्सीजन विधि से अर्शों को एक - एक करके निकाल देते हैं । तत्पश्चात 1 ओंस ( 30 मि.ली. ) शुद्ध वैसलीन वहाँ भर कर रख दी जाती है । बाहरी सिरे पर एक सेफ्टी पिन लगा कर रुई रख कर पट्टी बाँध दी जाती है । तत्पश्चात -
■ 36 घण्टों में → ओम्नोपेन या पैथीडीन इन्जेक्शन ।
■ व्रण( छाला ) से सम्बन्धित → कपड़ों को बदल दें ।
■ भोजन में → फल रस एवं तरल ।
■ तीसरे - चौथे दिन → लि . वैसलीन 120 मि.ली. रबर नलिका से मलाशय में भर दे ।
■ चौथे दिन → विरेचन दें । मल त्याग के बाद मलाशय का प्रक्षालन( शुद्धिकरण ) करके थोड़ा लि . वैसलीन डाल दें ।
■ कई नर्म स्वभाव रोगियों का इस औपरेशन के बाद मूत्र भी बन्द हो जाता है । लैसिक्स ( Lasis ) हैक्स्ट का 2 मि . ली . का माँस में इन्जेक्शन लगा देने से मूत्र न आने का कष्ट दूर हो जाता है ।
बवासीर में देने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट कैप्सूल -
1. अल्ट्राजिन ( Ultragin ) ( ज्योफ्रेमैनर्स ) → 1-2 टे . दिन में 1 या 2 बार दर्द के समय ।
2. वेनुस्मिन ( Venusmin ) ( मार्टिन हैरिस ) → रक्तार्श में भोजन के साथ 2 टे . दिन में 2 बार । खूनी बवासीर की तीव्र दशा में 4 टेबलेट दिन में 3 बार 2-3 दिन तक । आवश्यकता पड़ने पर 4 सप्ताह तक ।
3. चिउसी ( Chewcee ) ' लेडलें → 500 मि.ग्रा . की आधी से एक टेबलेट दिन में 2-3 बार । रक्त को बंद कर घाव को भरती है ।
4. सुगैनरिल ( Suganril ) ( सुहृद गेगी ) → मस्सों में सूजन , घाव एवं दर्द में -1-2 टे . प्रति 4 घण्टे पर । बवासीर के बहुत दिन तक कष्ट झेलते झेलते उत्पन्न कमजोरी , दुर्बलता , सुस्ती 1 एवं उदासी में 1 कै . प्रतिदिन भोजन या नाश्ता के बाद जल से दें ।
सावधान - गर्भवती एवं कैंसर वाले रोगियों में इसका प्रयोग खूब सोच विचार करके सतर्कता के साथ करें ।
5. बीकाडेक्सामिन ( Becadexamin ) ( ग्लैक्सो ) → बवासीर के पुराने रोग से उत्पन्न अनीमिया , दुर्बलता , शक्तिक्षीणता , स्फूर्ति आदि की कमी में इसका 2 मि.ग्रा . वाला 1 कै . भोजन के साथ दिन में 2-3 बार दें । तीव्र और भयंकर कमजोरी में तथा खून की कमी में 1 मि.ली. ( 25 मि.ग्रा . ) वाले 1-2 एम्पुल का सप्ताह में 1 बार माँस में इन्जेक्शन लगायें । -
सावधान - निरन्तर काफी दिन तक औषधि प्रयोग न करें । बीच - बीच में बंद कर दें ।
- गर्भावस्था , यकृत विकार आदि में वर्जित ।
7. सीलिन ( Celin ) ( ग्लैक्सो ) → 500 मि.ग्रा . की 1/2 + कैपलिन 10 मि.ग्रा . की 1 टे . प्रतिदिन 1 या 2 बार दें । मस्सों से अत्यधिक रक्त बहना तुरन्त रुक जाता है ।
8. निओ - आक्टिनम ( Neo - Octinum ) ( बी - नाल ) → दर्द के समय 1-2 ड्रेगी दिन में 3-4 बार दें । तीव्र एवं गम्भीर दर्द में इसके 1 मि.ली. वाले 1 से 2 एम्पुल का गहरे माँस में दिन में 3-4 बार इन्जे . लगायें ।
प्रयोग आने वाले सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन -
1. एड्रेनलीन ( Adrenaline ) ' मेरिण्ड → 1 एम्पुल काटकर 1 भाग औषधि 4 गुना डिस्टिल्ड वाटर में मिलाकर मस्सों के समीप शुरू में 2 मस्सों में इन्जेक्शन लगायें । खूनी बवासीर में लाभकारी ।
2. कैल्शियम सैण्डोज या कैल्शियम सैण्डोज विद विटा . सी . → खूनी बवासीर में अधिक रक्तस्राव होने पर 5 , 10 या 25 मि.ली. का शिरा में धीरे धीरे बूंद - बूंद करके इन्जे . लगायें । रक्तस्राव रुक जाता है । प्यास मिटती एवं रोगी को शक्ति तथा स्फूर्ति मिलती है ।
3. रूब्रामिन - एच ( साराभाई ) ( Rubramin - H ) → 1-2 मि . ली . गहरे माँस में हर तीसरे दिन इन्जे. । यह बवासीर की रक्ताल्पता में लाभकारी है ।
4. बुस्कोपान ( Buscopan ) ( जर्मन रेमेडीज ) → मस्सों में तीव्र पीड़ा होने पर 5 मि . ली . के एम्पुल का गहरे माँस में इन्जेक्शन लगायें । साधारण पीड़ा में 1 से 2 ड्रेगी यही औषधि दिन में 1 या 2 बार दर्द के समय दें ।
बवासीर में देने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट पेय / सीरप -
1.आइसो - जेल ( I - So - Gel ) ( ग्लैक्सो ) → बादी एवं खूनी बवासीर की पुरानी कब्ज को दूर करने के लिये -2 से 4 छोटे चम्मच औषधि प्रातः सायं 1 गिलास दूध , फलों के रस या जल में मिलाकर दें ।
2. रूब्राटान ( Rubraton ) ( साराभाई ) → मस्सों से अधिक रक्तस्राव से उत्पन्न रक्ताल्पता में 1 से 2 चम्मच भोजन के बाद 2 बार दें ।
3. हीम - अप ( Haem - up ) ( कैडिला ) → 15-30 मि . ली . ( 3 से 6 चम्मच ) प्रतिदिन भोजन से पहले या ' डेक्सोरेन्ज प्लस ' अथवा ' हेप्टाग्लोबिन 15 मि . ली . भोजन के बाद दिन में 2-3 बार दें । -
नोट - यह अधिक रक्तस्राव से उत्पन्न रक्ताल्पता , भूख की कमी में लाभकारी है ।
मस्सों पर लगाने की सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट औषधियाँ -
1. प्रिपरेशन - एच मरहम ( Preparation H ) ( ज्योफ्रे - मैनर्स ) → गुदा के अंदर या बाहर तथा मस्से में दर्द एवं रक्तस्राव हो रहा हो तो प्रतिदिन 2-3 बार लगावें ।
2. मेडिथेन मरहम ( Medithane oint . ) ( ज्योफ्रे मैनर्स ) → मस्सों की सूजन व प्रदाह में 2-3 बार लगावें ।
3. लेडरमाइसीन मरहम ( Ledermycin oint . ) ( लेडलें ) → मस्से के आपरेशन के बाद पीड़ित स्थान पर प्रतिदन 2-3 बार लगायें ।
4. थ्रोम्बोफोव क्रीम ( Thrombophob Cream ) ( जर्मन रेमेडीज ) → मस्सों पर लगाते ही दर्द , जलन , सूजन एवं कष्ट दूर हो जाते हैं ।
5. प्रोक्टोसेडिल मरहम ( Proctosedyl oint . ) ( रॉशेल ) → मस्सों पर दिन में 2-3 बार लगावें । बादी बवासीर के दर्द , खुजली व जलन को दूर करती है।
6. शील्ड मरहम ( Shield oint . ) ( S.K.F. ) → बादी , खूनी बवासीर की जलन , दर्द , खुजली एवं शोथ के साथ रक्तस्राव में लाभकारी । इसे उचित मात्रा में नलकी से अंदर तथा बाहर के हिस्सों पर ( मस्सों ) पर दिन में 2-3 बार लगावें ।
7. अल्टाप्रोक्ट ( Ultraproct ) ( जर्मन रेमेडीज ) → उचित मात्रा में नलकी से गुदा के अन्दर तथा बाहर के मस्सों पर दिन में 4 बार पहले दिन और उसके बाद दिन में 2 बार लगायें । इसे एक सप्ताह तक प्रयोग करें ।
8. जेसीफेन 2 % जेली नि . ' सुहृद गेगी ' → यह खूनी बवासीर , गुदा के भगन्दर , गुदा विदार , गुदा मार्ग में सूजन एवं जलन दूर होती है । -
सावधान - प्रथम 3 मास की गर्भावस्था में प्रयोग न करें । खूनी व बादी बवासीर के मस्सों में दर्द , सूजन एवं जलन होने पर हल्के - हल्के हाथों से लगायें और मलें ।
9. सूजन , दर्द एवं संक्रमण जनित मस्सों में - निओस्पोरिन - एच मरहम , हिरुडवायड क्रीम , फुरासिन , सोफ्रामाइसिन स्किन क्रीम , बॉकाडीन मरहम ( वेटाडीन ) पाखाना से निवृत्त होने के बाद मस्सों को धोकर और स्वच्छ रुई से पोंछ कर 2 दिन में 2 बार किसी एक को लगायें ।
बवासीर के रोगी का भोजन -
बवासीर का रोगी जब तक उचित भोजन नहीं खायेगा तो अच्छी से अच्छी औषधि खाने और इन्जेक्शन लगाने पर भी लाभ नहीं होगा । अण्डा , मछली , पतला माँस , दूध , उबले आलू , फलों का रस , गाजरों का रस , सब्जियों का पका बिना मसाला छना रस , केले , बार्ली वाटर रोगी के लिये उचित भोजन है ।
बवासीर का रोगी कोई ऐसा न खाये जिससे उसको अधिक मल आये ।नोट - शाक - सब्जियाँ , माँस और दूसरे भोजन जिनमें तन्तु ( रेशे- Fibres ) अधिक हों तो न खायें । ऐसे भोजन बहुत मल आने के कारण मलाशय भर जाने से मस्से फूल जाते हैं और घाव हो जाते हैं ।
■■ बवासीर से सुरक्षित रहने के लिये फल और सब्जियाँ , दही , छाछ का प्रयोग अधिक करें । इन खाद्यों से कब्ज नहीं रहती है । प्रतिदिन सूर्योदय से पहले कई मील खुली हवा में सैर करने , दिन में कई गिलास पानी , दूध , फलों का रस और पेय पीते रहने से न तो कब्ज होती है और न ही बवासीर का डर रहता है ।
कब्ज की स्थिति में -
◆ लिक्विड पैराफिन रात को सोते समय दूध में मिलाकर पीने से बिना कठिनाई नर्म पाखाना आ जाता है । -
◆ कैस्टर ऑयल गुदा में पिचकारी( सिरिंच ) द्वारा प्रवेश कर देने से भी पाखाना आ जाता है ।
◆ 90 से 120 मि.ली. गर्म ऑलिव ऑयल ( जैतून का तेल ) ,ग्लिसरीन सिरिन्ज द्वारा पाखाना जाने से कुछ समय पहले प्रवेश कर लेने और लेटे रहने से मलाशय में जमा शुष्क मल नर्म , मुलायम और चिकना होकर आसानी से निकल जाता है ।
नोट - कब्ज को दूर करने की सबसे हानिरहित औषधि है ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -







































































