अग्न्याशय शोथ [ Pancreatitis ]
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परिचय -
अग्न्याशय के शोथ को पैन्क्रियाटाइटिस ( अग्न्याशय शोथ ) कहते हैं । इस रोग के 2 रूप मिलते हैं-
1. तीव्र आन्याशय शोथ ( Acute pancreatitis )
2. जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic pancreatitis )
तीव्र अग्न्याशय शोथ ( Acute Pancreatitis )
रोग के सामान्य कारण -
■ नवयुवकों तथा वृद्धों में ।
■ संक्रमण प्रमुख कारण ।
■ बाहरी आघात ।
■ गाल ब्लैडर तथा विलपरीडक्स की बीमारियों से इसका गहरा सम्बन्ध है ।
सामान्य लक्षण -
■ उदर( पेट ) के ऊपरी भाग में बड़ा कष्टदायक तीव्र शूल । यह शूल पीठ या कंधे की ओर जाता प्रतीत होता है । अथवा समस्त उदर में फैल जाता है ।■ उदर के ऊपरी भाग की पेशियाँ कठोर ।
■ मितली एवं उल्टी ।
■ अफारा( गैस ) ।
याद रखिये--
■ यद्यपि उदर( पेट ) पहले तो मुलायम होता है पर आगे चल कर कड़ा हो जाता है ।
■ कोष्ठबद्धता ( Constipation ) , आन्त्रघात ( Paralytic ileus ) आदि लक्षण ।
रोग की पहिचान -
■ रक्त परीक्षा में श्वेत कणों की वृद्धि ( Leucocytosis ) मिलती है ।
■ मूत्र परीक्षा में शर्करा की उपस्थिति ।
■ स्टेथिस्कोप परीक्षा में आन्त्र की ध्वनि सुनाई नहीं देती ।
■ यदि रोगी को मम्प की शिकायत रही है अथवा अधिक शराब पीने का आदी है , तो ऐसी अवस्था में रोग का संदेह करना चाहिये ।
रोग के परिणाम -
■ असाध्य रोग है ।
■ पेरीटोनियम पर प्रभाव पड़ने के कारण आमाशय के सामने अकस्मात पीड़ा ।
■ क्रानिक कोलीसिस्टाइटिस का इतिवृत्त ।
याद रहे - यह दर्द रोगी के आगे की ओर झुकने , पेट के बल लेटने तथा सामने की ओर किसी भी प्रकार से उस स्थान को दबाने से कम हो जाता है ।
याद रखिये -
◆ अग्न्याशय शोथ का संदेह होने पर रोगी को अस्पताल भेज देना चाहिये , क्योंकि अपेन्डिक्स शोथ एवं आन्त्र अवरोध ' के लक्षण भी इसी जैसे होते हैं । अक्सर बड़े सर्जन भी इन रोगों के निदान में धोखा खा जाते हैं । ऐसे केस देखने में आये हैं कि अपेन्डिक्स शोथ के लिये उदर( पेट ) को खोला गया , परन्तु पता चला कि रोगी अग्न्याशय रोग ग्रस्त है ।
◆ इसके विपरीत कई बार ऐसा भी देखा गया है कि रोग का आक्रमण अपने आप ही शान्त हो जाता है ।
चिकित्सा विधि -
● रोगी की चिकित्सा रोग की अवस्थानुसार की जानी चाहिये ।
● चिकित्सा आधुनिक औषधियों से ही सम्भव ।
● दर्द एवं शॉक की चिकित्सा प्राथमिकता के आधार पर करें ।
● संक्रमण की चिकित्सा को मुख्य आधार मानकर की जानी चाहिये ।
● तीव्र शूलनाशक( दर्दनाशक ) औषधियाँ देकर रोगी को अस्पताल भेज देना ही उचित ।
● औषधियों से लाभ न मिलने पर आपरेशन ।
● एसिड विरोधी औषधियों का प्रयोग ।
पथ्य चिकित्सा / सहायक चिकित्सा -
■ शैया पर पूर्ण विश्राम ।
■ मुख से आहार तथा जल न दें ।
■ आमाशय में संचित पदार्थ एवं श्लेष्मा को ' रायल्स नलिका द्वारा निकालते रहना ।
■ आहार में चिकनाई की मात्रा कम एवं मद्यपान का पूर्ण निषेध ।
■ डेक्स्ट्रोज नार्मल सैलाइन आई . वी . द्वारा निरन्तर देते रहना ।
अग्न्याशय शोथ की मेडिकल चिकित्सा -
■ पैथीडीन ( Pethidine ) 100 मि . ग्रा . ~ 2 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोल कर माँसपेशीगत । आवश्यकता पड़ने पर 2-3 घण्टे बाद पुनः ।अथवा-
इन्जे . फोर्टविन ( Anaforten ) माँसपेशीगत ।
साथ ही-
■ नाइट्रोग्लेसरीन 0.5 मि . ग्रा. टे. , जीभ के नीचे । प्रति आधा घंटे पर ।
नोट - यह टेबलेट ' एन्जीसिड ' ( Angisid ) के नाम से उपलब्ध है ।
■ पीड़ा स्थल पर सेंक ।
■ टे . ' एन्टूिनिल ' अथवा टे . ' प्रोबेन्थीन ' प्रति 4 घण्टे पर ।
◆◆ शूल में पर्याप्त लाभ न मिलने पर - मार्फीन सल्फेट 15 मि. ग्रा. S/C + एट्रोपीन सल्फेट 0.6 मि . ग्रा . ।
मैगनेशियम ट्राईसिलिकेट 1 चम्मच प्रति 3 घण्टे पर ।
◆◆ अति गम्भीर अवस्था में - इन्जे . पेथीडीन 100 मि . ग्रा . + इन्जे . एट्रोपीन 0.6 मि. ग्रा. माँसपेशीगत प्रति 6 घण्टे पर ।
● नेजोगैस्ट्रिक सक्शन द्वारा आमाशय से संचित पदार्थ निकालें तथा आक्सीजन दें ।
● लासिक्स 2 मि . ली . मांसपेशीगत ।
◆◆ संक्रमण ( Infection ) कन्ट्रोल के लिए - एम्पीसिलीन ( Ampicillin ) अथवा स्पोरीडीन 500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर ।
एवं -
इन्जे . डेकाड्रान ( Inj . Decadran ) 1 मि . ली . प्रति 8 घण्टे पर ।
◆◆ डिहाइड्रेशन के लिये - 1 - 48 - 72 घण्टे तक → फ्लूड्स + इलेक्ट्रोलाइट्स I/V ड्राई प्लाज्मा 200 मि . ली . रिडिस्टिल्ड वाटर में मिलाकर ट्रान्सफ्यूजन द्वारा।
तत्पश्चात -
1 लीटर नार्मल सैलाइन + 10 मि . ली . कैल्शियम ग्लूकोनेट ।
प्रति लीटर नार्मल सैलाइन के पश्चात -
5 % ग्लूकोज 500 मि . ली . I/V दें । इसके बाद 1 लीटर ग्लूकोज नार्मल सैलाइन दें ।
साथ ही -
कैल्शियम ग्लूकोनेट 10 % -10 मि . ली . प्रति दिन ।
जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic Pancreatitis )
परिचय -
एक्यूट पैन्क्रियाटाइटिस की दीर्घकालिक अवस्था जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic Pancreatitis ) कहलाती है । इस प्रकार के शोथ में फाइब्रोसिस होने लगता है ।
नोट - यह एक असाध्य रोग है और कठिनता से ठीक होता है ।
रोग के कारण -
■ संक्रमण ,
■ पेप्टिक अल्सर ,
■ यकृत शोथ एवं अश्मरी ,
■ घातक कैंसर ,
■ कोलिन्जाइटिस ,
■ अग्न्याशय में विकृति ।
■ अनेक बार तीव्र आन्याशय शोथ से मुक्त रोगी में भी जीर्ण रोग की आशंका ,
■ 50 से 70 साल की उम्र वालों में जो मद्यपान के आदि हैं ,
रोग के लक्षण -
● उदर( पेट ) दबाने पर पीड़ा ।● आध्यमान ( Flatulence ) ।
● मूत्र में शर्करा की उपस्थिति ।
● मल में वसा की वृद्धि ।
● उदर के आसपास में बार - बार पीड़ा ।
● पीड़ा पीठ में भी इसी क्षेत्र में प्रतीत होती है ।
● कामला( पीलिया ) की उपस्थिति ( कभी - कभी ) ।
● अधिक मात्रा में चिकने दस्त । मल अनियमित , दुर्गन्धित , वसायुक्त एवं सफेद।
● मल में अपचित आहर के अवशेष ।
● कभी - कभी शीत लगना ।
● पीड़ा के आक्रमण प्रायः बार - बार होते हैं ।
● एनोरेक्सिया , मितली , वमन( उल्टी ) , कब्ज एवं अफारा( गैस) आदि - कामन लक्षण होते हैं ।
रोग की पहिचान -
◆ लेपरोटोमी ( Laparotomy ) निदान में विशेष सहायक ।
◆ एक्स - रे परीक्षा निदान में सहायक ।
◆ मल में चिकनाई की अधिकता केमिकल एनालिसिस से ।
रोग के परिणाम -
■ नॉर्कोटिक एडिक्सन प्रायः कामन ।
■ डायबिटिस मेलटिस पेन्क्रिएटिक एब्सिस , कामला , स्टेटोरिया , पेप्टिक अल्सर आदि अन्य रोगों की सम्भावना ।
चिकित्सा सिद्धान्त -
● कारणों एवं लक्षणों की समुचित व्यवस्था ।
● मधुमेह( डायबिटीज ) की चिकित्सा नितान्त आवश्यक ।
● एण्टी कोलिनेर्जिक्स तथा हल्की शामक औषधियों की उचित व्यवस्था ।
● रक्ताल्पता की स्थिति में लौह के योग ।
● विटा . ए . डी . तथा ईस्ट का भरपूर मात्रा में प्रयोग ।
● आन्त्र की स्वच्छता आवश्यक ।
पथ्य एवं आहार व्यवस्था -
■ कम चिकनाई वाला आहार उपयुक्त ।
■ मद्यपान पूर्ण वर्जित ।
■ कार्बोहाइड्रेट्स तथा कैल्शियम प्रधान आहार ।
औषधि चिकित्सा -
Rx -
● टेबलेट बुस्कोपान ( Tab . Buscopan ) 1 टेबलेट , दिन में 3 बार । औषधि भोजन के बाद लें । -
● लिवर एक्स्ट्रेक्ट -2 मि.ली.- माँसपेशीगत् , सप्ताह में 3 बार ।
● फैरस सल्फेट 180 मि . ग्रा . दिन में 3 बार , भोजन के बाद ।
● कैल्शियम ग्लूकोनेट 10% -5-10 मि . ली . सप्ताह में 2 बार आई . वी . दें । अथवा 600 मि . ग्रा . दिन में 3 बार मुख द्वारा ।
● एल्वीजाइम ( Alvizyme ) एलेम्बिक 1-2 टेबलेट - दिन में 2 बार ।
■■ आन्त्र को स्वच्छ रखने के लिये - HCI 15-60 बूंद दिन में 3 बार - भोजन के बाद + ' सोरबिटॉल मोनोओलिएट दें ।
नोट - इस रोग की कोई उपयुक्त औषधि चिकित्सा नहीं है । अतः ऐसे रोगियों को शल्य चिकित्सक ( सर्जन ) से परामर्श करने की सलाह दे देनी चाहिये ।
सदैव ध्यान रहे -
यदि कोई रोगी उदरशूल ( इपीगैस्ट्रिक पेन ) से पीड़ित आता है जिसको किसी भी प्रकार की औषधि से लाभ नहीं होता है और दर्द कमर व पीठ की ओर जाता है तथा अधिक मितली एवं वमन( उल्टी ) हो रहे हों तो ऐसे रोगी को तुरन्त अस्पताल भेज दें , जिससे अन्य सम्बन्धित रोगों के संदेह को दूर करके अग्न्याशय दर्द स्वतः भी ठीक हो जाता है ।
ऐसा प्रायः नये रोग ( Acute pancreatitis ) में होता है । जबकि पुराना होने पर ( Chronic Pancreatitis ) दर्द बार - बार उसी स्थान पर होता है । ऐसा रोगी प्रायः पुराना शराबी हो सकता है ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -































































