अग्न्याशय शोथ [ Pancreatitis ] आखिर किस तरह की बीमारी है? क्यों हो जाता है? इसके पहचान , लक्षण एवमं चिकित्सा विधि क्या होती है? Pancreatitis What kind of disease is it? Why does it happen? What is its identification, symptoms and treatment method?

 अग्न्याशय शोथ [ Pancreatitis ]

Pancreatitis ,by - https://www.scientificanimations.com

परिचय - 

अग्न्याशय के शोथ को पैन्क्रियाटाइटिस ( अग्न्याशय शोथ ) कहते हैं । इस रोग के 2 रूप मिलते हैं- 

1. तीव्र आन्याशय शोथ ( Acute pancreatitis ) 

2. जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic pancreatitis ) 


तीव्र अग्न्याशय शोथ ( Acute Pancreatitis )

रोग के सामान्य कारण - 

■ नवयुवकों तथा वृद्धों में । 

■ संक्रमण प्रमुख कारण । 

■ बाहरी आघात ।

■ गाल ब्लैडर तथा विलपरीडक्स की बीमारियों से इसका गहरा सम्बन्ध है ।

सामान्य लक्षण -


■ उदर( पेट ) के ऊपरी भाग में बड़ा कष्टदायक तीव्र शूल । यह शूल पीठ या कंधे की ओर जाता प्रतीत होता है । अथवा समस्त उदर में फैल जाता है । 

■ उदर के ऊपरी भाग की पेशियाँ कठोर । 

■ मितली एवं उल्टी । 

■ अफारा( गैस ) ।

याद रखिये-- 

■ यद्यपि उदर( पेट ) पहले तो मुलायम होता है पर आगे चल कर कड़ा हो जाता है । 

कोष्ठबद्धता ( Constipation ) , आन्त्रघात ( Paralytic ileus ) आदि लक्षण । 

रोग की पहिचान - 

■ रक्त परीक्षा में श्वेत कणों की वृद्धि ( Leucocytosis ) मिलती है । 

■ मूत्र परीक्षा में शर्करा की उपस्थिति ।

■ स्टेथिस्कोप परीक्षा में आन्त्र की ध्वनि सुनाई नहीं देती । 

■ यदि रोगी को मम्प की शिकायत रही है अथवा अधिक शराब पीने का आदी है , तो ऐसी अवस्था में रोग का संदेह करना चाहिये ।

रोग के परिणाम - 

■ असाध्य रोग है । 

■ पेरीटोनियम पर प्रभाव पड़ने के कारण आमाशय के सामने अकस्मात पीड़ा ।

■ क्रानिक कोलीसिस्टाइटिस का इतिवृत्त ।

याद रहे - यह दर्द रोगी के आगे की ओर झुकने , पेट के बल लेटने तथा सामने की ओर किसी भी प्रकार से उस स्थान को दबाने से कम हो जाता है । 

याद रखिये - 

◆ अग्न्याशय शोथ का संदेह होने पर रोगी को अस्पताल भेज देना चाहिये , क्योंकि अपेन्डिक्स शोथ एवं आन्त्र अवरोध ' के लक्षण भी इसी जैसे होते हैं । अक्सर बड़े सर्जन भी इन रोगों के निदान में धोखा खा जाते हैं । ऐसे केस देखने में आये हैं कि अपेन्डिक्स शोथ के लिये उदर( पेट ) को खोला गया , परन्तु पता चला कि रोगी अग्न्याशय रोग ग्रस्त है । 

◆ इसके विपरीत कई बार ऐसा भी देखा गया है कि रोग का आक्रमण अपने आप ही शान्त हो जाता है ।

चिकित्सा विधि - 

● रोगी की चिकित्सा रोग की अवस्थानुसार की जानी चाहिये । 

● चिकित्सा आधुनिक औषधियों से ही सम्भव । 

● दर्द एवं शॉक की चिकित्सा प्राथमिकता के आधार पर करें । 

● संक्रमण की चिकित्सा को मुख्य आधार मानकर की जानी चाहिये । 

● तीव्र शूलनाशक( दर्दनाशक ) औषधियाँ देकर रोगी को अस्पताल भेज देना ही उचित । 

● औषधियों से लाभ न मिलने पर आपरेशन । 

● एसिड विरोधी औषधियों का प्रयोग ।

पथ्य चिकित्सा / सहायक चिकित्सा - 

■ शैया पर पूर्ण विश्राम । 

■ मुख से आहार तथा जल न दें । 

■ आमाशय में संचित पदार्थ एवं श्लेष्मा को ' रायल्स नलिका द्वारा निकालते रहना ।

■ आहार में चिकनाई की मात्रा कम एवं मद्यपान का पूर्ण निषेध । 

■ डेक्स्ट्रोज नार्मल सैलाइन आई . वी . द्वारा निरन्तर देते रहना ।

अग्न्याशय शोथ की मेडिकल चिकित्सा -


 
■ पैथीडीन ( Pethidine ) 100 मि . ग्रा . ~ 2 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोल कर माँसपेशीगत । आवश्यकता पड़ने पर 2-3 घण्टे बाद पुनः । 

अथवा- 

इन्जे . फोर्टविन ( Anaforten ) माँसपेशीगत । 

साथ ही- 

■ नाइट्रोग्लेसरीन 0.5 मि . ग्रा. टे. , जीभ के नीचे । प्रति आधा घंटे पर । 

नोट - यह टेबलेट ' एन्जीसिड ' ( Angisid ) के नाम से उपलब्ध है । 

■ पीड़ा स्थल पर सेंक ।

टे . ' एन्टूिनिल ' अथवा टे . ' प्रोबेन्थीन ' प्रति 4 घण्टे पर । 

◆◆ शूल में पर्याप्त लाभ न मिलने पर - मार्फीन सल्फेट 15 मि. ग्रा. S/C + एट्रोपीन सल्फेट 0.6 मि . ग्रा . । 

मैगनेशियम ट्राईसिलिकेट 1 चम्मच प्रति 3 घण्टे पर । 

◆◆ अति गम्भीर अवस्था में - इन्जे . पेथीडीन 100 मि . ग्रा . + इन्जे . एट्रोपीन 0.6 मि. ग्रा. माँसपेशीगत प्रति 6 घण्टे पर । 

नेजोगैस्ट्रिक सक्शन द्वारा आमाशय से संचित पदार्थ निकालें तथा आक्सीजन दें । 

लासिक्स 2 मि . ली . मांसपेशीगत । 

◆◆ संक्रमण ( Infection ) कन्ट्रोल के लिए - एम्पीसिलीन ( Ampicillin ) अथवा स्पोरीडीन 500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर । 

एवं -

इन्जे . डेकाड्रान ( Inj . Decadran ) 1 मि . ली . प्रति 8 घण्टे पर । 

◆◆ डिहाइड्रेशन के लिये -  1 - 48 - 72 घण्टे तक → फ्लूड्स + इलेक्ट्रोलाइट्स I/V ड्राई प्लाज्मा 200 मि . ली . रिडिस्टिल्ड वाटर में मिलाकर ट्रान्सफ्यूजन द्वारा। 

तत्पश्चात -

1 लीटर नार्मल सैलाइन + 10 मि . ली . कैल्शियम ग्लूकोनेट । 

प्रति लीटर नार्मल सैलाइन के पश्चात -

5 % ग्लूकोज 500 मि . ली . I/V दें । इसके बाद 1 लीटर ग्लूकोज नार्मल सैलाइन दें । 

साथ ही - 

कैल्शियम ग्लूकोनेट 10 % -10 मि . ली . प्रति दिन ।


जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic Pancreatitis ) 

परिचय - 

एक्यूट पैन्क्रियाटाइटिस की दीर्घकालिक अवस्था जीर्ण अग्न्याशय शोथ ( Chronic Pancreatitis ) कहलाती है । इस प्रकार के शोथ में फाइब्रोसिस होने लगता है । 

नोट - यह एक असाध्य रोग है और कठिनता से ठीक होता है ।

रोग के कारण - 

■ संक्रमण , 

■ पेप्टिक अल्सर ,

■ यकृत शोथ एवं अश्मरी ,

■ घातक कैंसर ,

■ कोलिन्जाइटिस ,

■ अग्न्याशय में विकृति ।

■ अनेक बार तीव्र आन्याशय शोथ से मुक्त रोगी में भी जीर्ण रोग की आशंका ,

■ 50 से 70 साल की उम्र वालों में जो मद्यपान के आदि हैं ,

रोग के लक्षण -


● उदर( पेट ) दबाने पर पीड़ा । 

● आध्यमान ( Flatulence ) । 

● मूत्र में शर्करा की उपस्थिति । 

● मल में वसा की वृद्धि ।

● उदर के आसपास में बार - बार पीड़ा । 

● पीड़ा पीठ में भी इसी क्षेत्र में प्रतीत होती है ।

● कामला( पीलिया ) की उपस्थिति ( कभी - कभी ) । 

● अधिक मात्रा में चिकने दस्त । मल अनियमित , दुर्गन्धित , वसायुक्त एवं सफेद। 

● मल में अपचित आहर के अवशेष । 

● कभी - कभी शीत लगना ।

● पीड़ा के आक्रमण प्रायः बार - बार होते हैं । 

● एनोरेक्सिया , मितली , वमन( उल्टी ) , कब्ज एवं अफारा( गैस) आदि - कामन लक्षण होते हैं । 

रोग की पहिचान -

◆ लेपरोटोमी ( Laparotomy ) निदान में विशेष सहायक । 

◆ एक्स - रे परीक्षा निदान में सहायक । 

◆ मल में चिकनाई की अधिकता केमिकल एनालिसिस से ।

रोग के परिणाम -

■ नॉर्कोटिक एडिक्सन प्रायः कामन । 

डायबिटिस मेलटिस पेन्क्रिएटिक एब्सिस , कामला , स्टेटोरिया , पेप्टिक अल्सर आदि अन्य रोगों की सम्भावना ।

चिकित्सा सिद्धान्त - 

● कारणों एवं लक्षणों की समुचित व्यवस्था । 

● मधुमेह( डायबिटीज ) की चिकित्सा नितान्त आवश्यक । 

● एण्टी कोलिनेर्जिक्स तथा हल्की शामक औषधियों की उचित व्यवस्था । 

● रक्ताल्पता की स्थिति में लौह के योग । 

● विटा . ए . डी . तथा ईस्ट का भरपूर मात्रा में प्रयोग । 

● आन्त्र की स्वच्छता आवश्यक ।

पथ्य एवं आहार व्यवस्था -

■ कम चिकनाई वाला आहार उपयुक्त । 

■ मद्यपान पूर्ण वर्जित । 

■ कार्बोहाइड्रेट्स तथा कैल्शियम प्रधान आहार ।

औषधि चिकित्सा -

Rx - 

● टेबलेट बुस्कोपान ( Tab . Buscopan ) 1 टेबलेट , दिन में 3 बार । औषधि भोजन के बाद लें । - 

● लिवर एक्स्ट्रेक्ट -2 मि.ली.- माँसपेशीगत् , सप्ताह में 3 बार । 

● फैरस सल्फेट 180 मि . ग्रा . दिन में 3 बार , भोजन के बाद । 

● कैल्शियम ग्लूकोनेट 10% -5-10 मि . ली . सप्ताह में 2 बार आई . वी . दें । अथवा 600 मि . ग्रा . दिन में 3 बार मुख द्वारा । 

● एल्वीजाइम ( Alvizyme ) एलेम्बिक 1-2 टेबलेट - दिन में 2 बार । 

■■ आन्त्र को स्वच्छ रखने के लिये  - HCI 15-60 बूंद दिन में 3 बार - भोजन के बाद + ' सोरबिटॉल मोनोओलिएट दें ।

नोट - इस रोग की कोई उपयुक्त औषधि चिकित्सा नहीं है । अतः ऐसे रोगियों को शल्य चिकित्सक ( सर्जन ) से परामर्श करने की सलाह दे देनी चाहिये । 

सदैव ध्यान रहे - 

यदि कोई रोगी उदरशूल ( इपीगैस्ट्रिक पेन ) से पीड़ित आता है जिसको किसी भी प्रकार की औषधि से लाभ नहीं होता है और दर्द कमर व पीठ की ओर जाता है तथा अधिक मितली एवं वमन( उल्टी ) हो रहे हों तो ऐसे रोगी को तुरन्त अस्पताल भेज दें , जिससे अन्य सम्बन्धित रोगों के संदेह को दूर करके अग्न्याशय दर्द स्वतः भी ठीक हो जाता है । 

ऐसा प्रायः नये रोग ( Acute pancreatitis ) में होता है । जबकि पुराना होने पर ( Chronic Pancreatitis ) दर्द बार - बार उसी स्थान पर होता है । ऐसा रोगी प्रायः पुराना शराबी हो सकता है ।



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