गर्दन तोड़ बुखार / सेरीब्रो - स्पाइनल फीवर [ Cerebro - Spinal Fever ] रोग क्या है, इसका कारण और सही पहचान एवमं उचित चिकित्सा विधि क्या है ?Neck Break Fever / Cerebro - Spinal Fever [Cerebro - Spinal Fever] What is the disease, its cause and correct identification and proper medical procedure?

 गर्दन तोड़ बुखार / सेरीब्रो - स्पाइनल फीवर [ Cerebro - Spinal Fever ]

गर्दन तोड़ बुखार / सेरीब्रो - स्पाइनल फीवर [ Cerebro - Spinal Fever ] ,by - https://wellcomecollection.org

 नाम - 

ग्रीवाभंजक ज्वर , गर्दन तोड़ बुखार , सेरिब्रो - स्पाइनल फीवर , सेरिब्रो - स्पाइनल मेनिन्जायटिस । मस्तिष्क - सुषुम्नाज्वर ( मैनिन्जायटिस ) । 

परिचय - 

मस्तिष्क और सुषुम्ना के आवरण में शोथ( सूजन ) और शरीर की पेशियों का जकड़ जाना तथा उनमें पीड़ा - ये लक्षण होते हैं । साथ ही त्वचा पर विस्फोट एवं ज्वर आदि भी उत्पन्न होते हैं । 

मस्तिष्क एवं सुषुम्ना रज्जु मस्तिष्कावरणों के शोथ के कारण उत्पन्न ज्वर ।

रोग के कारण -

मुख्य कारण → मेनिंगोकोकस नामक सेम के बीज की आकृति वाला अथवा वृक्क( गुर्दे ) की तरह का जीवाणु । इसे ' निसेरिया इंट्रासेल्यूलेरियास कहते हैं । 

सहायक कारण → बसन्त और ग्रीष्म ऋतु में प्रायः । 

- नासिका के रोग । 

- सर्दी - जुकाम तथा गले के रोग । 

- बड़े - बड़े शहरों में घनी बस्ती , स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक । 

- प्रायः गरीब जनता में अधिक । 

- अधिक परिश्रम , भय , क्रोध एवं मानसिक रोग , धातुक्षीणता आदि रोग में सहायक।


रोग के लक्षण - 

रोग का सहसा आक्रमण ।  

- चित्त घबड़ाना , भूख नही लगना , पाखाना साफ नहीं एवं कब्ज की शिकायत प्रारम्भ । 

- कभी - कभी रोग के प्रारम्भ में दोनों हाथ - पैरों में विशेषकर जाँघों की पेशियों में कम्पन अधिक । 

- प्रारम्भ में ही सिर में भयंकर पीड़ा एवं दुर्बलता । 

- पहले अधिकतर ठंड एवं निद्रा भंग । 

- कभी - कभी आरम्भ में तीव्र वमन( उल्टी ) एवं शिर : शूल ( अत्यन्त पीड़ा ) । कभी-कभी साथ में पीठ में दर्द । 

- मस्तिष्क पीछे की ओर को झुक जाता है एवं रोगी बकने लगता है । अत्यन्त दुर्बलता उपस्थित । 

- नाड़ी कभी तेज कभी मंद । 

- शरीर का ताप अनियमितता एवं अल्प स्थायी । अन्त में काफी दिनों तक सामान्य से भी कम रहता है । 

- मुख मलीन । 

- रोगी बिस्तर पर इधर - उधर छटपटाता और सिर की पीड़ा से पूरी तरह पस्त हो जाता है । 

- गर्दन में जकड़ाहट । 

- पीठ में पीड़ा धीरे धीरे बढ़ती है ।


अन्य लक्षण - इस प्रकार हैं -

- हाथ - पैरों में तीव्र वेदना( दर्द ) / संधियों में भी अलग ही प्रकार का वेदना( दर्द ) । 

- हाथ - पैर और संधियाँ फूल जाती हैं एवं स्पर्श में वेदना( दर्द ) । 

- मस्तक पीछे की ओर को । कभी - कभी पीछे की ओर झुकने जैसा लक्षण प्रकट । 

- रात्रि के समय ज्यादा तकलीफ । 

- कभी - कभी रोग की प्रारम्भिक अवस्था में ही अचैतन्यता( unconsciousness ) उपस्थित एवं मृत्यु काल तक स्थायी । 

- कभी - कभी शरीर पर पिडिकायें( पिम्पल्स ) । 

- सिर दर्द के कारण रोगी बालक रह - रहकर चीख उठता है और सिर हिलाता रहता है । 

- बेहोशी एवमं ऐंठन होकर पक्षाघात( पायरलिसीस ) भी सम्भव ।


रोग की पहिचान - 

रोगी की पीठ की माँसपेशियों में ऐंठन होने से पीठ या तो तख्ते के समान सीधी हो जाती है या कमान की तरह पीछे को झुक जाती है । रोगी के हाथ और टाँग मुड़े रहते हैं । 

- इसमें श्वेत कोशिका बहुलता ( Leucocytosis ) 20 हजार से 30 हजार प्रति CMM होती है । 

- मस्तिष्क मेरुतरल आविल , सपूय , दबाव बढ़ा हुआ , बड़ी संख्या में ' यूय कोशिकाओं ' की उपस्थिति एवं परीक्षण करने पर मेनिंजोकोकाई भी पाये जाते हैं जो रोग निर्णायक होते हैं ।


रोग का परिणाम - 

नासामार्ग से फैलने वाले संक्रमण से मध्यकर्णशोथ , नेत्रश्लेष्मला शोथ आदि हो सकते हैं । 

- जलशीर्ष ( हाइड्रोसेफेलस ) , मनोविभ्रम , सीन्धशोथ होना भी सम्भव । 

- रोग की अवधि कई घण्टों से लेकर कई माह तक । घातक अवस्था में 10-15 दिन में मृत्यु । 

- जीर्णावस्था में जो रोगी बच जाते हैं उनमें ' बहरापन एवं बुद्धिहीनता के लक्षण हो जाते हैं ।

- आधुनिक एण्टीबायोटिक औषधियों से रोग अब आसान हो गया है ।


• गर्दन तोड़ बुखार की चिकित्सा - 

- लेबोरेटरी परीक्षण की रिपोर्ट बिना प्राप्त किये ही चिकित्सा प्रारम्भ कर देनी चाहिये। 

- रोगी को एकान्त , हवादार एवं रोशनी वाले कमरे में रखना चाहिये । 

- रोगी को दस्तावरं एवं ज्वरनाशक योग दें । 

- रोगी को जल या तरल पदार्थ पर्याप्त मात्रा में दें । इसके लिये 2-3 लिटर ग्लूकोज मिला जल दिनभर में पिलाना चाहिये । 

नोट - यदि पीना सम्भव न हो तो ग्लूकोज सैलाइन शिरा मार्ग से दें । 

- मूत्राघात की स्थिति में कैथेटर( मूत्र थैली ) का प्रयोग । ज्वर की अधिकता में भीगे कपड़े से शरीर को पोंछा जा सकता है ( स्पोंजिंग ) । 

- समय - समय पर मुख , नासा एवं गले की सफाई । 

- श्यावता( नीलरोग ) की स्थिति में ऑक्सीजन का प्रयोग । 

- श्वास मार्ग अवरुद्ध होने पर ट्रेकियोटोमी । 

- कभी भी हृदय फेल हो सकता है अतः उसकी रक्षा करें । शॉक एवं घबराहट का तत्काल उपचार आवश्यक । 

- प्लाज्मा का शिरावेध प्रयोग सदैव उत्तम । 

- नेत्र की रक्षार्थ'सल्फासिटामाइड अथवा एण्टीबायोटिक आईड्राप्स का उपयोग । 

- ब्लड प्रेशर कम होने पर ' पेनिसिलीन ' 80 लाख यूनिट से 120 लाख यूनिट प्रतिदिन निरन्तर शिरामार्ग से । ज्वर दूर हो जाने के 3 दिन तक । 

- ' सल्फाडायजीन ' 4-6 ग्राम देकर फिर 1 ग्राम प्रति 4-6 घण्टे पर । ( सोडा बाई कार्ब के साथ मिलाकर ) 

- एक्रोमाइसीन / टैरामाइसीन / सेफेलेक्सिन / कोटी - मोक्साजोल ( सेप्टरान ) का प्रयोग ।

मस्तिष्क मेरूतरल ( C.S.F. ) का 24 घण्टे में 2 बार परीक्षण करते रहने से सुधार न होने की जानकारी मिले तो पेनिसिलीन का उसी अनुसार करते हैं और इसे ' अन्तर्मेरुनाल ' ( Intrathecally ) में प्रविष्ट करते हैं ।
 

अनुभूत चिकित्सा - एक झलक  - 


- ' होस्टासाइक्लीन ' / एक्रोमाइसीन / टैरामाइसीन / स्टेक्लिन / सूवामाइसिन / ओरियोमाइसीन / सैण्डोसा इक्लीन - इनमें से किसी एक का 1-1 कै .( सुबह, दोपहर, शाम ) दस दिन तक दें । 


- सामान्य रोग में ' स्ट्रेप्टोपेनिसिलीन 1/2 - 1 वायल की सुई माँस में लगावें । ' अथवा ' स्ट्रेप्टोमाइसीन ग्राम की सुई 4-5 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोलकर माँस में लगावें

- क्लोरोमाइसिटीन 1 कै . , वायसोलोन 1 टेबलेट , सीलिन 500 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट । ऐसी 1-1 मात्रा प्रति 6-6 घण्टे पर दें । 

- 3 वर्ष के बच्चे के प्रभावित होने पर - सुब्रामाइसिन पीडियाट्रिक ड्रोप्स की 5-10 बूंदें पानी के साथ दें । साथ ही - लम्बर पंक्चर करके पेनिसिलीन जी -10 हजार यूनिट की मात्रा को 10 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोलकर प्रविष्ट करें । 

नोट- ' टैरामाइसीन एस . एफ . ' ( फाइजर ) 1-1 कै . प्रति 6 घण्टे पर ज्वर उतरने तक दें ।


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