कालाजार / हड्डी तोड़ बुखार [ Kalazar ] क्या है, इसके लक्षण , कारण, एवमं चिकित्सा विधि क्या है ?What is Kala-azar / bone-breaking fever [Kalazar], its symptoms, causes, and what is the method of treatment?

 कालाजार / हड्डी तोड़ बुखार [ Kalazar ] 

कालाजार / हड्डी तोड़ बुखार [ Kalazar ],by - https://wellcomecollection.org

नाम - 

कृष्ण ज्वर , काला बुखार , काला ज्वर , विसरल लीशमे निएसिस Visceral Leishmaniasis , एक उष्ण प्रदेशीय रोग । 

परिचय - 

एक कशाभयुक्त एक कोशिकीय जन्तु लीमैनियो डोनोवैनाई जो संक्रमित बालु मिक्षका या सैण्डफ्लाई के काटने से फैलता है , के द्वारा उत्पन्न संसार के उष्ण कटिबन्ध एवं अवऊष्णकटिबन्ध प्रदेशों में फैलने वाला एक प्राणघातक संक्रामक रोग जिसमें ज्वर( बुखार ) होता है , रक्ताल्पता( खून की कमी ) एवं क्षीणता हो जाती है तथा प्लीहा एवं यकृत बढ़ जाते हैं ।

रोग के कारण - 

भारतवर्ष में इस रोग को उत्पन्न करने वाला जीवाणु लीशमेनिया डोनोबानी ( Leishmania donovani ) कहलाता है । और इसका संक्रमण मादा मसमक्षिका ( Sandflies ) द्वारा फैलता है । 

- जब संक्रमण शरीर व्यापी होता है तो ' विसरल लीशमेनिया ' कहलाता है । 

- यह बिहार , बंगाल , आसाम , उड़ीसा , यू . पी . और मद्रास में मिलता है । 

- अंतरंगीय ( Visceral ) लीशमेनिया 12 वर्ष तक के बालकों में अधिक । 

- सम्प्राप्ति काल ( Ineu . Period ) 2 सप्ताह से 18 मास तक का ।


रोग के लक्षण - 

आक्रमण प्रायः धीरे - धीरे परन्तु कुछ वमन( उल्टी ) के साथ 

- एकाएक 2 घण्टे में बुखार । ज्वर एक दिन में 2 या 3 बार तक चढ़ता है । ऐसा किसी भी ज्वर में नहीं होता । 

- ज्वर 3-6 सप्ताहों के बाद कुछ दिनों के लिये उतर जाता है फिर प्रारम्भ होता है । यह क्रम कई मास तक चलता रहता है । अन्त में ज्वर स्थिर हो जाता है । 

- प्लीहा की वृद्धि होती रहती है ।

- यकृत की दृष्टि कम ( 6 माह में 3-4 अंगुल तक ) । 

- अनेक रोगियों में मस्तक , मुख हथेलियों एवं तलवों के नीचे काले धब्बे । 

- उदर( पेट ) में वृद्धि एवं उदर की कंडरायें( टक इन ) फूल कर टेढ़ी हो जाती हैं । अन्त में जलभरने लगता है । 2-3 माह के बाद रोगी दुर्बल और शक्तिहीन दिखने लगता है। 

- पसीना अधिक ।

- लम्बी अस्थियों में भयंकर पीड़ा । भूख प्रायः ठीक रहती है । 

- रोगी भयंकर बीमार होते हुए भी अपने व्यवसाय में लगा रहता है । 

- चिकित्सा के अभाव में अरक्तता और चेहरे पर विवरणता ( Pigmentation ) ।


रोग की पहिचान - 

रोग निर्णय के लिये रक्त परीक्षा आवश्यक होती है । रक्त परीक्षा में श्वेत रक्त कणों के भीतर इस रोग के कीड़े मिलते हैं । 

- जिस रोगी का ज्वर पुनरार्वतक ( Relapsing Fever ) की तरह का हो , जिगर - तिल्ली बढ़े हुए हों एवं उसमें पीलिया के लक्षण मिल रहे हों तो उनकी रक्त परीक्षा कराकर रोग निर्णय कराना चाहिये ।


रोग का परिणाम - 

यह एक अत्यन्त ही भयानक रोग है चिकित्सा के अभाव में रोगी अवश्य मर जाता है । - इस रोग में न्यूमोनिया , पल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस , अमीबिक एवं बेसीलरी डिसेण्ट्री , सेप्टिक इन्फेक्शन , पेन्सीटोपेनिया एवं उख के निकट अलसेरटिव लीजन्स आदि उपद्रव( अन्य रोग ) मिलते हैं ।

नोट - इसमें ' सीरोलोजिकल टेस्ट भी रोग निदान में सहायक होते हैं । इसके लिये ' नेपियर्स एल्डीहाइड टेस्ट ' , ' चोपराज एण्टीमनी टेस्ट ' , ' ब्रह्मचारीज टेस्ट ' , ' कम्पलीट फिक्सेशन टेस्ट एवं अन्य सीरोलोजिकल टेस्ट किये जाते हैं ।

• काला जार की मेडिकल चिकित्सा - 

सोडियम एण्टीमनी ग्लूकोनेट 6 मि . ली . मॉसपेशीगत अथवा आई . वी . नित्य 10-15 दिन । बालकों को 3 मि . ली . और शिशुओं को 2 मि . ली . रोजाना । कोर्स को 15 दिन के अन्तराल पर दोहरायें ।

- पेण्टामिडीन इसीथियोनेट ( Pentamidine Isethionate ) 3-4 मि . ग्रा . / किलो नित्य अथवा 1 दिन छोड़कर 15 इन्जेक्शन । 

नोट - रक्त चाप नीचे आ सकता है इसलिये हर इन्जेक्शन देने के पूर्व ( 20-30 मिनट पहले ) एण्टीहिस्टामिनिक्स दे देना चाहिये । 

एण्टीबायोटिक्स में- एम्फोटेरीसिन बी ( Amphotericin - B ) 1 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार को शिरामार्ग से 5 % ग्लूकोज मिलाकर 1 दिन छोड़कर 3-8 सप्ताह तक देना चाहिए ।

- प्लाहोच्छेदन ( Splenectomy ) औषधियों से लाभ न होने एवं प्लीहा ( तिल्ली ) के अधिक बढ़ जाने पर करना चाहिये । 


कालाजार में लगाने योग्य सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन . -

1. एन्थियोमलीन ( Anthiomaline ) ' रोन पुलेन्क - 2 मि . ली . ( 1 एम्पुल ) माँस में लगावें ।

2. निओस्टीबोसान ( Neostibosan ) ' बेयर - 5,1,2 या 3 ग्राम के एम्पुल की सुई माँस में नित्य ।

3. पेण्टोस्टम ( Pentostam ) वरोजवेल्कम - 6 मि . ली . की सुई रोजाना नस या माँस में 6 दिन तक लगावें ।

4. पेडुनकुलीन ( Peduncoline ) ' ग्लूकोनेट कं ' - जिगर और तिल्ली बढ़ने पर 1 एम्पुल रोजाना माँस में लगावें ।

5. मायोस्टेबिन ( Myostabin ) ' ईस्ट इण्डिया कं ' - 1-5 मि . ली . तक क्रमशः बढ़ाते हुए माँस में दें । कुल 40 मि . ली . तक दें ।

- रक्त चाप ( B.P. ) यदि बहुत कम हो जाय तो ' कोरामीन ' या ' परकोर्टिन की सुई लगावें । 

- यदि रोगी का शरीर विषाक्त हो गया हो तो पेनिसिलीन की सुई रोगानुसार लगावें । 

- श्वेत रक्त कणों की बेहद कमी हो गई तो लिवर ऐक्स्ट्रेक्ट के इन्जे . लगावें । 


• कालाजार चिकित्सा अन्य चिकित्सकों की राय में -

1. ' निओ - स्टीवोसान 0.2 ग्राम शिरामार्ग से । तत्पश्चात् 0.3 ग्राम शिरामार्ग से नित्य अथवा हर तीसरे दिन 16 मात्राओं तक । 

2. ' कार्बोस्टीबामाइड ( Carbostibamide ) आई . वी . ( शिरामार्ग ) रोजाना 10 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में ( 0.05-0.1,0.15 ) तक । अथवा - लगातार 0.2 ग्राम 15 दिन तक । 

3. लोमीडाइन ( Lomidine ) आई . वी . 10 मि . ली . वाटर में 2.4 मि . ग्रा .। किलो भार पर रोजाना अथवा तीसरे दिन 15 इन्जेक्शन तक । 

4. पेण्टोस्टम , सोलूस्टीवोराम , स्टीवीनॉल 0.2 ग्राम । तत्पश्चात् 0.3 ग्राम रोजाना 5 % सोलूशन में आई . वी . / 30 किलो 6-15 दिन तक । 


• विशिष्ट चिकित्सा ' हरीसन्स प्रिसिपल ऑफ इण्टरनल मेडीसिन ' अनुसार -

-  विश्राम ( Rest ) । 

- अच्छा भोजन ( Good dite ) । 

- ट्रान्सफ्यूजन ( Transfusion ) ।

- उपद्रवों ( Complications ) की चिकित्सा । एवं संक्रमण का उचित उपचार । 

- विसरल ( Visceral ) सोडियम एण्टीमनी ग्लूकोनेट 6 मि . ली . ( 0.6 ग्राम ) रोजाना 6 दिन शिरामार्ग से अथवा मांसपेशीगत दें । 

नोट- भारत में ' यूरिया स्टीवमीन ' अधिक पापुलर है 

- 90 % रोगी एण्टीमनी से ठीक हो जाते हैं । 

- पेण्टामिडीन 4 मि . ग्रा . / प्रतिकिलो शरीर भार पर 3-4 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोलकर मांसपेशीगत 10 दिन तक दें / अथवा 5-25 सप्ताह तक । 

नोट - इसके 2 कोर्स और प्रति 10 दिन बाद लिये जा सकते हैं । 

- रसिस्टेन्ट केसिस में — ' एम्फोटेरीसिन बी ' 0.5-1 मि . ग्रा . / किलो शरीर भार पर × प्रति एक दिन पर । 

- कुटेनियश ( Cutaneous ) - उपरोक्त औषधि चिकित्सा में से 10 दिन तक को संक्षिप्त चिकित्सा ( इण्ट्रालीजनल इन्जेक्शन रूप में ) । लोकल हीट ( Local Heat ) तेजी से हीलिंग करती है । 

- मवादयुक्त त्वचागत ( Mucocutaneous ) - सोडियम एण्टीमनी ग्लूकोनेट 20 मि . ग्रा . / किलो / रोजाना 30 दिन तक । 

नोट - इस रोग में हाइड्रोक्सीस्टिलबामाइडीन ( Hydroxystilbamidine ) का ताजा सोलूशन 0.25 ग्राम रोजाना शिरामार्ग से 10 दिन तक देने से लाभ होता है ।


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