लघु मसूरिका / चिकन पॉक्स ( Chickenpox ) रोग क्या है? यह क्यो होता है? इसके पहचान, लक्षण एवमं चिकित्सा विधि क्या है ? What is Chicken pox disease? Why does this happen? What is its identification, symptoms and treatment method??

 लघु मसूरिका / चिकन पॉक्स ( Chickenpox ) 

लघु मसूरिका / चिकन पॉक्स ( Chickenpox ) ,by - Jonnymccullagh

नाम - 

छोटी चेचक , वेरीसेला ( Varicella ) । 

परिचय - 

एक तीव्र विषाणुजन्य( विषाणुओ द्वारा फैलाये जाने वाला ) रोग जो बहुत संक्रामक होता है एवं जिसमें सिर में दर्द होता है और तेज बुखार हो जाता है जिसके पश्चात् शरीर पर दाने निकल आते हैं।

रोग का कारण - 

रोग को पैदा करने वाला एक वायरस है जिसका संक्रमण श्वसनतंत्र से निकले छोटे - छोटे बिन्दु कणों ( Droplets ) से फैलता है । 

- कभी - कभी पिडिकाओं( pimples ) से निकले स्राव के सम्पर्क में आने से या हर्पीज के संसर्ग ( Contact ) से । 

- 10 वर्ष तक के बच्चे में अधिक बड़ों को बहुत कम । 

- प्रायः दुबारा नहीं ।


रोग का लक्षण - 

शरीर में कमजोरी के लक्षण थोड़े समय के लिये । 

- प्रारम्भ में मृदु स्वरूप का ज्वर / अथवा सामान्य शीत लगकर ज्वर । 

- हाथ - पैरों तथा पीठ में दर्द एवं वमन( उल्टी ) । 

- अधिकतर 24 घण्टे के मध्य में बिना किसी लक्षण के शरीर पर पिडिकायें( pimple )। पिडकायें( pimples ) पहले हाथ - पैर , छाती , उदर( पेट ) , पीठ एवं मुख पर कभी कभी पहले मुख पर । शाखाओं की अपेक्षा मध्यकाय ( Trunks ) पर पिड़िकायें अधिक होती हैं । 

- आरम्भ में इन फुंसियों के निशानमात्र होते हैं जो कुछ ही घण्टों में पिङिका( pimple ) का रूप धारण कर कोष्ठ की वेसीकुलर ( Vesicular ) हो जाते हैं । साथ ही 24 घण्टों में ये पूययुक्त हो जाते हैं । 

- यह छाले इतने नरम होते हैं कि कपड़े के स्पर्शमात्र से फट जाते हैं । 

- खुजली अधिक । 

- शीघ्र ही छाले सूख जाते हैं और खुरंट( पपड़ी ) बन जाते हैं ।


रोग की पहिचान - 

प्रारम्भ में रोग निर्णय आसान , पर पिडिकायें( pimples ) निकल आने पर कठिन । 

- पिड़िकायें हाथ - पैरों पर अधिक एवं गम्भीर न होकर फफोले के समान ।


रोग का परिणाम - 

एक बार होकर फिर दुबारा भी हो सकती - श्लेष्मिक कला से रक्त स्राव , वृक्कशोथ , पक्षाघात , मस्तिष्क सुषुम्नाशोथ , चिकनोपाक्स न्यूमोनिया का भयानक रोग हो सकता है ।


चिकित्सा सिद्धान्त - 

रोगी को दूसरों से अलग रक्खें । 

- शीघ्र बिस्तर पर आराम दें । 

- लाविणक विरेचन और मूत्रकारक औषधियों का प्रयोग लाभकर । 

- सूर्य के प्रकाश को रोगी तक न पहुंचने दें । 

- हाथ - पैरों को , सम्भव हो तो सारे शरीर को रोज गर्म जल से स्पंज द्वारा साफ करते हैं ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा - 

खाने - पीने के लिये दूध , मूंग की दाल , साबूदाना आदि पतली चीजें दें । अनार , केला , परवल दे सकते हैं । 

- क्रोध , चिन्ता , हवा के झोंके और परिश्रम से रोगी को दूर रक्खें । 

- बच्चा खुजलाने न पावे । मक्खन या गर्म किया हुआ घी लगा दें । 

- आँखों को नित्य बोरिक एसिड लोशन से धोयें ।


छोटी चेचक / चिकन पॉक्स की औषधि चिकित्सा -

- रोगी को विश्राम दें एवं तब तक अलग रक्खें जब तक पपड़ी ( Crusts ) दूर न हो जायें । 

- एण्टी - हिस्टामीन - जैसे - क्लोरफेनीरामाइन ( Chlorpheniramine ) 4 - 8 मि . ग्रा . दिन में 3 बार मुख से दें । 

- खुजली के लिये स्थानीय प्रयोगार्थ - केलामीन लोशन ' । 

- द्वितीयक संक्रमण के लिये उपयुक्त एण्टीबायोटिक्स ( Appropriate Antibiotics ) । 

• स्निग्ध कारक द्रव में लिन्ट को भिगोकर पिड़िकाओं( pimples ) के ऊपर रखने से विशेष लाभ होता है । 

याद रखिये - 

अधिकतर रोगियों में चिकित्सा की आवश्यकता नहीं ।  

- उपद्रवों( अन्य रोगो ) की चिकित्सा की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता । 

- आक्सीजन ' पेनिसिलीन ' , ' कार्टिकोस्टेरायड्स का भी आवश्यकतानुसार प्रयोग। 

खुरंट( पपड़ी ) बन जाने पर रोग संक्रमण की सम्भावना कम रह जाती है ।


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