काली खाँसी / व्हूपिंग कॉफ [ Whooping Cough )
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| काली खाँसी / व्हूपिंग कॉफ [ Whooping Cough ) |
अन्य नाम -
कुकर खाँसी , काली खाँसी , परटूसिस ( Pertusis ) ।
परिचय -
प्रायः बच्चों में पाया जाने वाला एक तीव्र संक्रामक रोग जो तीव्र नजले के साथ खाँसी के दौरे से युक्त होता है । खाँसी के दौरान एक विशिष्ट खोखों ( whoop ) की आवाज व लम्बे एवं ध्वनियुक्त अन्तःश्वसन के साथ होता है ।
रोग के प्रमुख कारण -
- वोर्डेटेला परटूसिस नामक जीवाणु से ।
- अत्यन्त संक्रमण रोग जो किसी भी आयु में हो सकती है परन्तु 5 वर्ष तक की आयु में ( बच्चों में ) सर्वाधिक ।
- कभी - कभी इसका महामारी ( Epidemie ) रूप भी देखने को मिलता है ।
- खसरा ( मीजल्स ) निकलने के बाद भी इसका होना सम्भव । इसका आक्रमण बाल्यावस्था में 2 से 12 वर्ष तक अधिक होता है । युवा व्यक्तियों में कभी - कभी देखा जाता है ।
- गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक होता 5 वर्ष तक के बालकों के लिये कभी कभी घातक हो जाता है ।
- रोग घातक भी होता है ।
- 90 % रोगी 5 वर्ष या इससे कम आयु के शिशु होते हैं ।
- रोग के जीवाणु रोगी के कफ , थूक और रोगी का व्यवहार किया हुआ रूमाल , वस्त्र आदि में सदा रहता हैं ।
- इसके सहायक कारण , अहित आहार विहार , गंदी वायु , गंदे स्थान और थोड़ी जगह में बहुत से व्यक्तियों का वास आदि हैं ।
रोग के प्रमुख लक्षण -
- लक्षण दिखने में 7-14 दिन का समय लग सकता है ।
सामान्यतः इसकी 3 अवस्थायें होती हैं -
1. सर्दी - जुकाम की अवस्था - जुकाम , खाँसी एवं ज्वर । पहले खाँसी कभी - कभी उठती है , पर धीरे - धीरे बढ़ती जाती है श्रवण परीक्षा( सुनने की परीक्षण ) प्रायः सामान्य ।
2. आवेगी ( Paroxysmal ) अवस्था - द्वितीय सप्ताह के अंत तक खाँसी के दौर अधिक आने लगते हैं ।
- खाँसी बाहर को साँस निकालते समय तेजी से एवं ऊँची आवाज के साथ । जिससे बालक बेचैन हो जाता है , साँस रुक जाती है और बालक नीला पड़ जाता है । ' हप की आवाज के साथ रोगी लम्बा साँस लेता है ।
- खांसी का आना कफ निकलने के बाद , वमन( उल्टी ) आ जाने पर , अथवा जब बालक गाढ़े श्लेष्मा( बलगम ) को निगल जाता है तो शान्त हो जाता है ।
- इसके बाद बालक सो जाता है अथवा फिर खेलने लगता है ।
- इसमें पसीना आता है और गले की शिरायें फूल जाती हैं ।
- भ्रम और बेहोशी एवं ऐठन होना सम्भव ।
- चेहरा फूला हुआ एवं आँखों के चारों ओर सूजन ।
3. रोग मुक्ति ( Convalescent ) अवस्था - चौथे सप्ताह खाँसी के आक्रमण की तीव्रता कम हो जाती है ।
- अब बालक खाँसते - खाँसते उल्टी भी नहीं करता , ' हप की आवाज भी नहीं आती । अन्त में खाँसी शान्त हो जाती है । भूख लगने लगती है और बच्चे सामान्य स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है ।
रोग की पहिचान -
- प्रयोगशालीय परीक्षणों में ई . एस . आर . ( E.S.R. ) सामान्यः प्राकृत होता है ।
- ऊर्ध्व श्वसन मार्ग से लिये गये श्लेष्मा( बलगम ) में ' बी परटूसिस ' की उपस्थिति रोग को comform करता है ।
- प्रथमावस्था में सामान्य सर्दी - जुकाम से पहचान करना कठिन होता है । किन्तु द्वितीयावस्था में ' रोग निर्देशक हूँ ! शब्द ( खोंखों ) के सुनाई देने पर कोई निर्णय करने में कोई भ्रम नहीं रहता है ।
रोग के परिणाम -
रोगी दुर्बल , टी . बी . से पीड़ित , अस्थि कोमला ( रिकेट्स ) के स्वभाव से युक्त और मस्तिष्क जल वृद्धि से ग्रस्त हो सकता है ।
- मस्तिष्क सम्बन्धी लक्षण होने पर रोग का परिणाम अमंगलकारी होता है ।
- श्वसनी शोथ , आक्षेप , पक्षाघात , आन्त्रवृद्धि , गुदभ्रंश , नेत्रों की श्लेष्मिक कला में रक्तस्राव आदि जैसे रोगों की आशंका ।
चिकित्सा सिद्धान्त --
अवसादक ( Sadatives ) और उद्वेष्टरोधी ( Antispasmodic ) गुण वाली औषधियाँ काली खाँसी में लाभकर ।
- संक्रमण को रोकने के लिये टेट्रासाइक्लीन आदि एण्टीबायोटिक्स का प्रयोग ।
- अवसादन के लिये - फीनोबार्विटोन ।
- excitement को रोकने के लिये टे . बैलाडोना 10-15 बून्द दिन में 3 बार ।
- साँस लेने में कष्ट होने पर इफेड्रिन ।
- बहुत तीव्र आक्रमण में स्टेराइडेस का प्रयोग लाभकारी होता है ।
- एण्टीबॉयोटिक्स अधिक उपयोगी नहीं ।
- दुसरो से दूरी बनाये रखे ।
पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
लघु एवं तरल आधार दें । यदि वमन( उल्टी ) हो जाय तो तुरन्त ( वमन के बाद ) भोजन दें ।
- शाली और गेहूँ , बकरी का दूध , मूली का शाक , जीवन्ती , बथुआ , नीबू , मुनक्का , लहसुन , गरम जल और अदरख दें ।
- दिन में सोना हानिकर होता है । चिकने और मीठे पदार्थ , दूध , दही , भारी भोजन , खीर , पूड़ी और बीडी सिगरेट ( वयस्कों में ) न दें । यह सभी चीजें रोग को बढ़ाती हैं।
काली खाँसी के रोगी की चिकित्सा आरम्भ में ही सफल है । इस रोग का निदान यदि समय पर ही हो जाये तो काली खाँसी के दौरे या ' हूप ' आरम्भ होने से पहले ही चिकित्सा आरम्भ कर देनी चाहिये ।
काली खाँसी की औषधि चिकित्सा -
इस रोग में एण्टीबायोटिक्स में ' एम्पीसिलीन / एरिथ्रोमाइसिन ' तथा ' टेट्रासाइक्लीन औषधियों का उपयोग होता है ।
- 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिये ' टेट्रासाइक्लीन ' शर्बत के रूप में 5 मि . ली . दिन में 4 बार 10 दिन तक ।
- एरिथ्रोमायसिन ( Erythromycin ) 1 ग्राम 50 मि . ली . गर्म जल में मिलाकर घोल बनाकर दें । मात्रा 5 मि . ली . दिन में 4 बार दें ।
- टेट्रासाइक्लीन ड्राप्स ' अथवा सीरप के रूप में 1-1 चम्मच दिन में 4 बार दें ।
याद रखिये - इस खाँसी में कोडीन फाल्कोडीन या शामकों ( Sadatives ) द्वारा कफ को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये । ऐसा करना खतरनाक हो सकता है ।
- इस रोग में एट्रोपीन का प्रयोग कफ को और गाढ़ा कर देता है ।
काली खाँसी की चिकित्सा - इस प्रकार से भी -
Rx
एम्पीसिलीन अथवा एलवर्सिलिन सीरप 100 मि . ग्रा . / किलो / प्रतिदिन 4 विभाजित मात्राओं में 10 दिन तक ।
अथवा
इरीथ्रोमाइसिन ( Erythromycin ) 40 मि.ग्रा .। किलो / नित्य 4 विभाजित मात्राओं में 10 दिन तक ।
अथवा
क्लोरोमाइसिटीन ( Chloromycetin ) सीरप 100 मि.ग्रा .। किलो । नित्य 3-4 विभाजित मात्राओं में 10 दिन तक ।
- टिक्सीलिक्स ( Tixylix ) सीरप ( रोन - पुलेंक )
अथवा
फेन्सेडिल ( Phensedyl ) लिंक्टस अथवा सीरप इफीड्रेक्स 1/2 - 1/2 चम्मच दिन में 4 बार।
काली खाँसी की अनुभूत सफल चिकित्सा -
टैरामाइसीन 50 मि . ग्रा . , वेटनीलान 1/2 टेबलेट , इफेड्रीन 7 मि . ग्रा . । ऐसी 1-1 मात्रा दिन में 3-4 बार दें । यह 5 वर्ष तक के बालक की मात्रा है । आयु के अनुसार मात्रा घटा - बढ़ा सकते हैं ।
Rx -
प्रतिदिन दिन में 2 बार - क्लोरम्फेनिकॉल या टेट्रासाइक्लीन कै . 200 मि . ग्रा . दिन में 2 बार ।
दिन में 1 बार - आइसोनेक्स 1 टे . प्रेडनीसोलोन 100 मि . ग्रा . टे . ऐसी 1 मात्रा दिन में 1 बार दें । 1 सप्ताह तक ।
दिन में 2 बार - टिक्सीलिक्स ( Tixylix ) 1/2 - 2 छोटे चम्मच । इफेड्रीन हाइड्रोक्लोराइड 60 मि . ग्रा .
प्रति 4 घण्टे पर - ( सोडियम गार्डिनल 60 मि . ग्रा . )( सीलिन 500 मि.ग्रा . - 1/4 टे. ) ( ग्लूकोज 600 मि . ग्रा . )ऐसी एक मात्रा दिन में 3 बार दें ।
नोट - ' क्लोरम्फेनिकाल ' के स्थान पर एम्पीसिलीन का उपयोग किया जा सकता है।
नोट - ' इण्टेरोमाइसिटीन 1/2 - 1 मि . ली . की सुई नित्य 7 दिन तक लगावें । साथ में इसी के सस्पेन्शन की 1-2 चम्मच दवा दिन में 3 बार और सोने से पूर्व दें ।


