अनीमिया / अरक्तता [ Anaemia ]
| अनीमिया / अरक्तता [ Anaemia ], by - James Heilman, MD |
पर्याय -
रक्तक्षीणता , रक्ताल्पता , रक्तस्वल्पता , रक्तहीनता एवं सामान्य बोलचाल में खून की कमी ।
परिचय -
मनुष्य शरीर में रक्त कणों की संख्या में कमी या लाल रक्त कणों ( R.B.C. ) में ' हीमोग्लोबिन की मात्रा में कमी को अनीमिया कहते हैं ।
रोग के सामान्य कारण -
◆ अस्थि मज्जा में लाल रक्त कोशिकाओं का कम बनना रक्त क्षीणता का एक प्रमुख कारण है ।
◆ इन कोशिकाओं के कम बनने का कारण स्वयं अस्थि - मज्जा में गड़बड़ी या फिर पर्याप्त मात्रा में लौह , विटामिन्स एवं प्रोटीन न खाना हो सकता है ।
◆ चोट लगने पर अत्यधिक खून बह जाने से । यह अनीमिया का महत्वपूर्ण कारण है।
◆ फोड़े - फुसियों या बवासीर से खून बहना और महिलाओं में मासिक धर्म के समय अधिक रक्तस्राव हो जाना हो सकता है ।
◆ पेट में लौह और प्रोटीन को पचाने के लिये आवश्यक पाचन अम्ल ( गन्धकाम्ल ) की कमी भी रक्तक्षीणता का कारण बन सकती है।
नोट - तनाव , चिंता और भय की मनः - स्थिति में शरीर में पाचक अम्ल के बनने पर असर पड़ता है । अतः यह भी एक कारण है ।
◆ आँतों में होने वाले कीड़े जैसे- अंकुश कृमि( वर्म्स ) , पिन कृमि , केंचुआ एवं फीता कृमि रक्त और विटामिन्स को खा जाते ।
◆ अधिक मैथुन , श्वेत प्रदर , स्वास्थ्य की खराबी , यकृत एवं तिल्ली का ठीक - ठीक काम न करना , कुपोषण , भोजन में विटामिन्स की कमी , टाइफाइड ज्वर में आँतों में घाव हो जाने से , प्रसव के पहले अथवा बाद में रक्तस्राव ,पौष्टिक खाद्य - पदार्थों की कमी , संक्रामक रोग ( जैसे - मलेरिया , टाइ - फाइड , डिफ्थीरिया , न्यूमोनिया , आदि कारणों से अनीमिया का रोग ) हो जाता है ।
सामान्य लक्षण -
◆ अनीमिया से पीड़ित रोगी अक्सर कमजोरी , थकान , ऊर्जा की कमी महसूस होने की शिकायत करता है ।
अन्य लक्षण -
◆ व्यक्ति दुर्बल दिखायी देने लगता है और कम उम्र में ही झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं ।
◆ आँखों में चमक नहीं रहती है ।
◆ आँखें थकी नजर आती हैं ।
◆ स्मरण शक्ति का ह्रास ।
◆ हल्की थकान से ही हृदय की धड़कन में वृद्धि ।
◆ सिर दर्द का रहना ।
◆ चिड़चिड़ापन ।
◆ घाव धीमी रफ्तार से ठीक होते हैं ।
◆ त्वचा एवं श्लेष्मिक कला पीली दीखने लगती है ।
◆ नाखून भुरभुरे हो जाते हैं ।
◆ मुँह के किनारों पर घाव भी हो सकते हैं ।
◆ आँख धंसी हुई ।
◆ मुँह एवं जीभ सफेद ।
◆ हाथों - पैरों के नाखून सफेद एवं रक्तशून्य दिखायी देते हैं ।
◆ अजीर्ण , भूख की कमी , नींद न आना , कब्ज , थोड़े परिश्रम से हॉफना , श्वास कष्ट , हाथ - पैर फूलना , शरीर का तापक्रम औसत से कम , हाथ - पैर में जलन , किसी किसी में दौरे पड़ना आदि लक्षण भी हो सकते हैं ।
◆ हाथ - पैरों में चींटी सी चलना या सुन्न पड़ना , कभी - कभी चेहरे और पैरों पर शोथ की उपस्थिति ।
याद रखिये -
■ हमारे देश में अनीमिया का सबसे बड़ा कारण विशेषकर स्त्रियों में लौह की कमी होना है । अधिकतर स्त्रियाँ शाकाहारी होती हैं और अपने भोजन में लौहयुक्त पदार्थ जैसे - माँस , जिगर ( कलेजी ) , गुर्दे एवं अण्डे आदि नहीं ले पातीं , जबकि दूध , हरी सब्जियाँ , ताजे फल तथा मटर आदि लौहयुक्त भोजन दुर्भाग्य से निर्धन तथा मध्यम वर्ग के लोग आवश्यकतानुसार नहीं ले पाते और लौह की कमी के शिकार हो जाते हैं ।
■ भारत में निर्धन एवं मध्यम वर्ग की स्त्रियों को बच्चे अधिक होते हैं , जिससे उनमें लौह की आवश्यकता सर्वाधिक होती है और उनमें निरन्तर रक्तस्राव एवं गर्भ के कारण रक्तहीनता बनी रहती है ।
■ अधिकतर स्त्रियों को मासिक धर्म की अनीयमितता तथा रक्त के अधिक निकल जाने से भी रक्तहीनता हो जाती है ।
■ ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को 1 से 2 वर्ष की आयु तक स्तनपान कराया जाता है , और अधिक समय तक स्तनपान कराने तथा आवश्यकतानुसार लौहयुक्त भोजन न ग्रहण करने से ' लौह की कमी वाली रक्ताल्पता हो जाती है ।
कारणों के अनुसार अरक्तता -
यह मुख्य रूप से 2 प्रकार की होती है -
★ लौह की कमी से उत्पन्न अरक्तता ( Iron dificiecy anaemia ) → इस प्रकार की अरक्तता ही सबसे अधिक पायी जाती है । -
★ ' विटामिन बी-12 ' अथवा ' फोलिक एसिड ' की कमी से उत्पन्न अरक्तता → इस प्रकार की अनीमिया में - प्रणाशी अरक्तता ( Pernicious anaemia ) तथा मैगालोब्लास्टिक अरक्तता ( गर्भावस्था आदि की ) कभी - कभी देखने को मिलती है ।
अरक्तता के अन्य प्रकार -
अरक्तता मुख्यतया निम्न प्रकार की होती है -
● एक्लोरहाइड्रिक अनीमिया ( Achlorhydric Anaemia ) - आमाशयिक रस से युक्त हाइड्रोक्लोरिक एसिड के अभाव में होने वाली ऐसी रक्ताल्पता जिसमें लाल रक्त कोशिकायें छोटी होती हैं तथा उनमें हीमोग्लोबिन की मात्रा भी कम होती है ।
● एप्लास्टिक अनीमिया ( Aplastic Anaemia ) - अस्थि - मज्जा के कुछ औषधियों अथवा एक्स - रे आदि के द्वारा नष्ट हो जाने के कारण लाल रक्त कोशिकाओं के पुनर्जीवन में बाधा उत्पन्न होने से उत्पन्न रक्ताल्पता ।
● डिफिशिएन्सी या न्यूट्रीशनल अनीमिया ( Deficiency or Nutritional Anaemia ) - भोजन में पोषक तत्वों जैसे - लौह अथवा विटामिन्स की कमी या आँत द्वारा इनके अवशोषण की क्षमताहीनता के कारण उत्पन्न रक्ताल्पता ।
● हीमोलाइटिक अनीमिया ( Hemolytic Anaemia ) - रक्ताल्पता जो लाल रक्त कोशिकाओं ( R.B.C. ) के टूटने अथवा उनके नष्ट होने से उत्पन्न होती है , जो आनुवंशिक हो सकती है । जैसे - संक्रमण के फलस्वरूप अथवा कुछ औषधियों के विषैले प्रभावों से उत्पन्न हो सकती है ।
नोट - इसमें लाल रक्त कोशिकायें " हँसिये के आकार " की होती हैं ।● हाइपरक्रोमिक अनीमिया ( Hyperchromic Anaemia ) - ऐसी रक्ताल्पता - जिसमें औसत कणिका हीमोग्लोबिन सान्द्रता ( एम . सी . एच . सी . ) सामान्य से अधिक होती है , जिससे लाल रक्त कोशिकायें सामान्य से अधिक गहरे रंग की होती है ।
● मैक्रोसाइटिक अनीमिया ( Macrocytic Anaemia ) - ऐसी रक्ताल्पता जिसमें लाल रक्त कोशिकायें असामान्य रूप से बढ़ जाती हैं ।
नोट - इसमें कोशिकायें सामान्य से अधिक आकार की हो जाती हैं ।
● मैगालोब्लास्टिक अनीमिया ( Megaloblastic Anaemia ) - ऐसी रक्ताल्पता जिसमें रक्त में मैगालोब्लास्ट पाये जाते हैं ।
● परनीशियस अनीमिया ( Pernicious Anaemia ) - घातक रक्ताल्पता - भोजन में से विटा.बी. के अवशोषण हेतु आवश्यक आन्तरिक अवय ( Intrinsic Factor ) का स्रावण आमाशय द्वारा न कर पाने के कारण उत्पन्न अनीमिया ।
■■■ यह 50 से 80 वर्ष की आयु के लोगों में होता है जिसमें कमजोरी हो जाती है , जीभ फटीप सी होती है । त्वचा का रंग नीबू के समान पीला पड़ जाता है । हाथ - पैरों में झनझना होती है , एवं सुनता हो जाती है । थोड़ा सा परिश्रम करने पर साँस फूलने लगता है दिल की धड़कन बढ़ जाती है । कभी - कभी हृदयपेशी में ऑक्सीजन की कमी होने दिल में दर्द उठता है और किन्हीं किन्हीं मामलों में पंजों एवं टखनों पर सूजन हो जाती है ।
● सेप्टिक अनीमिया ( Septic Anaemia ) - तीव्र संक्रमणों द्वारा उत्पन्न रक्ताल्पता ।
● सिकिल सैल अनीमिया ( Sickle cell Anaemia ) - रक्त में अत्यधिक संख्या में अर्ध चन्द्राकार अथवा हंसिये के आकार की लाल रक्त कोशिकाओं के होने से उत्पन्न रक्ताल्पता ।
● स्प्लेनिक अनीमिया ( Splenic Anaemia ) - प्रतिहार अथवा प्लीहा अति रक्त - दाब के कारण होने वाली प्लीहा की वृद्धि के साथ होने वाली रक्ताल्पता ।
एक जन्मजात पारिवारिक रोग जिसमें लाल रक्त कोशिकायें नाजुक होती हैं , एवं आसानी से टूट जाती हैं ।
रोग की पहिचान -
■ रक्तहीनता के रोगी को आसानी से पहिचाना जा सकता है । रोगी की हथेली को दबा कर देखने तथा उसकी लाली को देखने पर यह पता लगाना कठिन नहीं है , कि उक्त रोगी में रक्त की कमी है ।
■ हाथ की हथेलियों , नाखून , जीभ तथा आँख में पीलापन - इस रोग के चिन्ह हैं।
नोट - लक्षणों एवं चिन्हों के आधार पर रोग का निदान करना चाहिये । नाखूनों को आसानी से देखना चाहिये । लौह की कमी वाली रक्ताल्पता में नाखून खुरदरे तथा संकुचित होकर उनकी चमक जाती रहती है एवं चपटे होना प्रारम्भ हो जाते हैं । रोग के अधिक प्रभावी होने पर नाखून पिचक ( Concave ) जाते हैं ।
■ रोगी की जीभ सपाट , चमकदार तथा पीली होती है ।
■ दिल का दौरा पड़ने पर - दिल के शब्दों के साथ - साथ सीने पर स्टेथिस्कोप परीक्षा में सरसराहट सुनाई देता है ।
रोग के परिणाम -
■ रोग सामान्य रूप से ठीक हो जाता है , पर रोग के बढ़ने पर ' कामला( पीलिया ) ' तथा ' जॉन्डिस एवं जलोदर( पेट मे पानी भरना ) का रोग हो जाता है ।
याद रखिये - रक्तहीनता भारत में एक गम्भीर एवं जन साधारण रोग है । विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा व्यवसाय जनरल प्रेक्टिश्नर के पास इस रोग के बहुत से रोगी आते हैं । सामान्यतः महिलायें जो गर्भवती हैं या स्तनपान करा रही हैं , या उनके अधिक बच्चे हुए हैं । अतः रक्तहीनता की चिकित्सा प्रभावशाली तथा पूर्ण विश्वास के साथ करनी चाहिये ।
चिकित्सा विधि -
◆ रक्तहीनता जन्य( रक्त कम करने वाले ) कारणों को दूर करें ।
◆ प्रथम विरेचन देने के बाद पथ्य आहार की व्यवस्था करें ।
◆ रोग विशेष के अनुसार औषधि एवं पथ्य व्यवस्था ।
◆ रक्तहीन रोगी के लिये 1-2 लौहयुक्त पेटेण्ट औषधि योगों का प्रयोग ।
◆ साधारणतया लौह के साथ फोलिक एसिड वाली औषधि की सलाह नहीं देनी चाहिये , जो केवल गर्भवती महिलाओं के लिये ही आवश्यक होती है ।
◆ जहाँ तक हो सके , लौहयुक्त औषधियाँ मुख द्वारा ही देनी चाहिये , जो रोगी की पाचन शक्ति पर निर्भर करता है ।
◆ चिकित्सा की अवधि 2-3 माह की होनी चाहिये , चाहे रोग साधारण हो , अथवा भयंकर ।
◆ लौह की उचित मात्रा रक्त में बनाये रखने के लिये चिकित्सा को 1 माह तक ( उचित चिकित्सा के उपरान्त भी ) जारी रखना चाहिये । इसके बाद अल्प मात्रा में औषधि लेते रहने की सलाह देनी चाहिये ।
◆ औषधि टेबलेट रूप में देनी चाहिये । ' सीरप औषधि से दाँत काले पड़ सकते हैं ।
सहायक चिकित्सा / पथ्य व्यवस्था -
◆ रक्त क्षीणता के उपचार में आहार में सुधार करना सबसे महत्वपूर्ण है । मैदा , पालिश किया चावल या चीनी आदि जैसे परिशोधित( रिफाइंड ) आहार शरीर के लिये बेहद जरूरी लौह से हमें वंचित कर देते हैं । लौह हमेशा खाद्य में प्राकृतिक रूप में लेना चाहिये ।
अप्राकृतिक लौह आवश्यक विटामिनों को नष्ट कर सकता है । यकृत को भी गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है । गर्भपात करा सकता है और इनसे बच्चे के जन्म में देर लग सकती है अथवा समय से पहले हो जाता है ।
◆ कच्चे फलों व सब्जियों का खाना उपयोगी ।
◆ पर्याप्त लौह वाली सब्जियाँ यथा पालक , हरी प्याज , गाजर , मूली , , चुकंदर , अरबी , टमाटर और आलू छिलका सहित लेना चाहिये ।
◆ केला परम लाभकारी है । सेब , अंगूर , आलूबुखारा , किशमिश , आदि लिये जा सकते हैं ।
अन्य सेवन योग्य - गन्ने का शीरा , शहद , मटर की फलियाँ , सोयाबीन , गेहूँ , बिना पालिश किया चावल , दूध , पनीर , अण्डे आदि ।
■■ चुकंदर रक्त क्षीणता के उपचार में विशेष रूप से लाभकारी भी है ।
- चुकंदर का रस लाल रक्त कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर उन्हें पुनः सक्रिय बना देता है और शरीर को ताजे आक्सीजन की आपूर्ति करता है ।
- चुकंदर का रस शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है । बच्चों व किशोरियों के लिये रक्त क्षीणता का उत्तम उपचार है ।
आहार सेवन के सम्बन्ध में विशेष निर्देशन एवं दिशामार्ग -
● रक्त क्षीणता के मरीज को उपचार की शुरूआत 5 दिन तक विशेष ताजे फलों के आहार के साथ करनी चाहिये । इन दिनों में उसे 5-5घण्टे के अंतर पर 3 बार ताजे रसीले फलों का आहार लेना चाहिये । इन 5 दिनों के बाद क्रमशः -
● अगले 15 दिन तक उसे फल और दूध का आहार लेना चाहिये । इन दिनों फलों का आहार पहले जैसा ही रहता है पर दूध लेना प्रारम्भ हो जाता है ।
● फल और दूध का आहार 15 दिन लेने के बाद , मरीज को संतुलित आहार लेना प्रारम्भ करना चाहिये । जैसे - बीज , गिरी , अनाज , सब्जियाँ एवं फल ।
याद रखिये - पर्याप्त मात्रा में लौह , विटामिन्स , प्रोटीन आदि न खाने से हम रक्त क्षीणता के शिकार हो जाते हैं । परिष्कृत खाद्य( रिफाइंड या शुद्ध किया हुआ खाद्य पदार्थ ) भी रक्त क्षीणता पैदा कर सकते हैं , जबकि संतुलित आहार और आवश्यक तत्वों से पूर्ण आहार लेना शुरू कर हम न सिर्फ इससे बच सकते हैं , बल्कि इसका उपचार भी कर सकते हैं ।
औषधि चिकित्सा -
Rx
◆ कैप्सूल एनीमिडोक्स ( Cap . Anemidox ) ' मर्क कं . ' 1 कै. - नित्य , 2 माह तक ।
अथवा-
◆ कैप्सोविट फोर्ट ( Capsovit forte ) फार्मेड 1 कै . नित्य - भोजनोपरान्त ।
अथवा-
◆ कै . डूमासूल्स ( Cap.Dumasules ) फाइजर ' 1 कै . नित्य- भोजनोपरान्त ।
साथ ही -
■ सीरप डेक्सोरेन्ज ( Syrup Dexorange ) नि . ' फ्रेन्को - इंडियन 3-6 छोटे चम्मच तक- भोजन से पूर्व अथवा बाद में ।
नोट - बच्चों को आधी मात्रा ।
निषेध - 2 वर्ष से कम आयु के बालकों में प्रयोग न करें ।
अनीमिया चिकित्सा - हरीसन्स प्रिंसिपल आफ इण्टरनल मेडिसिन्स के अनुसार -
● शैया पर पूर्ण विश्राम ( Complete Rest in Bed )
● गम्भीर अवस्था में ब्लड ट्रान्सफ्यूजन ।
● निओ - हेपाटेक्स -2 मि . ली . - महीने में एक या दो बार ।
● लिवर इक्सट्रेक्ट विद फोलिक एसिड । मात्रा - 10-20 मि . ग्रा . नित्य ।
आयरन की कमी से उत्पन्न अनीमिया की चिकित्सा इस प्रकार से भी की जा सकती है -
Rx
★ टेबलेट फैरस सल्फेट 200 मि . ग्रा . व्या. नाम - टे . फर्शोलेट ( Tab . Fersolate ) 2-4 टे . नित्य- भोजन के तत्काल बाद ।
साथ ही -
★ फोलिक एसिड 5 मि . ग्रा . की टेबलेट - दोपहर या भोजन के बाद ।
अथवा -
★ सीरप डेक्सोरेन्ज ( Syrup Dexorange )
वयस्क - 1-2 चम्मच - दिन में 2 बार - भोजन के बाद ।
बालक - 2-5 वर्ष की आयु में - 1 चम्मच दिन में 2 बार - भोजनोपरान्त ।
बालक - 5 से 12 वर्ष की आयु - 2 चम्मच दिन में 2 बार - भोजनोपरान्त ।
नोट - जिन्हें ' फैरस सल्फेट उपयुक्त नहीं रहता है , उन्हें यह सीरप अधिक उपयुक्त रहता है ।
गम्भीर स्वरूप की अनीमिया में -
Rx
● इन्जे . आयरन डेक्स्ट्रान 100 मि . ग्रा . प्रति 2 मि. ली. व्या. नाम- इन्जे . इन्फेरोन ( Inj . Inferon ) 1-2 मि . ली.- माँसपेशीगत- अवस्थानुसार ।
नोट - इन्जे . कूल्हे की गहरी माँसपेशी में लगावें ।
● कै. फैरो - रैडोक्सॉन ( Cap . Ferro - Redoxan ) 1 कै . - नित्य - भोजनोपरान्त ।
अथवा-
● इलेक्जिर रूब्राटोन ( Elixir Rubratone ) 2-2 चम्मच दिन में 3 बार ।
● अन्य कोई भी कारण हो , उनकी समुचित चिकित्सा ।
रोग प्रकार एवं लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -
1. पर्निशियस अनीमिया → हाइड्रोक्सी काबालामीन ( बिटा . बी-12 ) 100 मि . ग्रा . माँसपेशीगत - नित्य 1 सप्ताह तक । अथवा - इसी का इन्जे . महीने में 1 बार अनिश्चित काल तक ।
∆ गम्भीर अवस्था में ब्लड ट्रान्सफ्यूजन ।
याद रखिये- इस प्रकार की रक्ताल्पता में फोलिक एसिड बिल्कुल नहीं देना चाहिये।
- बी-12 का सेवन मुख द्वारा व्यर्थ रहता है ।
2. मैगालोब्लास्टिक अनीमिया की की स्थिति में → टे . फोलिक एसिड 5 मि. ग्रा. नित्य 2 माह तक अथवा अधिक । साथ ही इन्जे. बी-12 , 100 माइक्रोग्राम - माँसपेशीगत 17 दिन तक । तत्पश्चात 1 दिन छोड़कर 7 दिन तक । तत्पश्चात सप्ताह में 1 बार 7 सप्ताह तक ।
3. खून की कमी दूर करके रक्त बढ़ाने के लिये → फरसोलेट की 1 टेबलेट दिन में 3 बार दें ।
4 . अंकुश कृमि अथवा अथवा फीता कृमि से उत्पन्न रक्ताल्पता में → सी . सी . एफ . ( C.C.E ) की 1 टे . नित्य दें ।
5. प्रसूता या गर्भवती की रक्ताल्पता → ' सैंगोबियोन ( Sangobion ) नि . ई . मर्क की 2-2 टे . दिन में 3 बार- भोजन के बाद दें ।
6. गर्भावस्था की अनीमिया में → आइरन टे . मुख द्वारा नित्य भोजन के बाद दें । साथ ही फोलिक एसिड 15 मि . ग्रा . की टेबलेट प्रतिदिन दें ।
निर्देश- इसे 3-6 माह तक डिलीवरी के बाद भी देते हैं ।
■ 50 % स्त्रियाँ ( गर्भवती एवं प्रसव समय ) अनीमिया की शिकार होती हैं और अरक्तता के कारण अधिकांश प्रसव के समय मर जाती हैं ।
■ आवश्यक है कि गर्भवती होते ही पैथोलोजिस्ट से चेक अप करालें । 85 % से हीमोग्लोबिन कम हो , तत्काल उसे गर्भवती होते ही ' आयरन ' देना आरम्भ कर देना चाहिये । 10 मि . ग्रा . फोलिक एसिड प्रतिदिन देते रहने से आश्चर्यजनक लाभ होता है ।
आवश्यक सुझाव एवं निर्देश -
◆ आजकल फैरस सल्फेट 200 मि . ग्रा . की टेबलेट दिन में 3 बार भोजन के उपरान्त देना पर्याप्त लाभकारी पाया गया है ।◆ अधिक रक्तस्राव होने पर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता हो सकती है ।
◆ अर्श( बवासीर ) आदि कारण हों , तो उनका भी उपचार आवश्यक है ।
◆ न्यूट्रीशनल मेगालो ब्लास्टिक अनीमिया के उपचार में फोलिक एसिड 5-10 मि . ग्रा . प्रतिदिन और प्रोटीन तथा संतुलित आहार की व्यवस्था करनी होती है । साथ में बी12 , लौह , विटामिन्स आदि भी दिये जा सकते हैं ।
◆ गर्भावस्था में मैगालो ब्लास्टिक अनीमिया होने पर - रोग की तीव्रावस्था एवं प्रसव के समीप के समय में रुधिराधान ( Blood Transfusion ) की आवश्यकता हो सकती है । लौह के योग भी देने चाहिये ।
अनीमिया की मिश्रित औषधि चिकित्सा ( Combination Therapy ) -
● एनीमीडॉक्स ( मर्क ) 1 कै . , वीप्लेक्स फोर्ट ( ए.एफ.डी. ) 1 टे . । ऐसी एक मात्रा दिन में 2 बार - भोजन के बाद ।विशेष- यकृत , आँतों की दुर्बलता एवं पायरिया से उत्पन्न अरक्तता में ।
● मैक्राफोलीन आयरन ( ग्लैक्सो ) 1 टे . , वीप्लेक्स फोर्ट 1 टे . , सीलिन 10. मि . ग्रा . की 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा- दिन में 2 बार - भोजन के 15 मिनट बाद - जल से।
विशेष- यकृत दोषों से उत्पन्न अरक्तता में ।
- हीमोग्लोबिन की मात्रा में वृद्धि ।
- शारीरिक शक्ति में वृद्धि ।
● मैक्राबिन ( ग्लैक्सो ) की टेबलेट , पेय या इन्जेक्शन दें । साथ ही रुब्राग्रान ( Rubragran ) की 1-1 टेबलेट दिन में 3 बार दें ।
● लिवर एक्स्ट्रेक्ट विद बी12 ( रैलीज ) 1 मि . ली . , रेडॉक्सान - एच 10.मि. ग्रा . ( एम.एस.डी. ) 1 मि . ली . , बेनर्वा ( रोश ) 1 मि . ली .
तीनों को मिलाकर नितम्ब की मांसपेशी में लगायें । इसे प्रतिदिन या तीसरे दिन दे सकते हैं । कोर्स -5 से 10 इन्जेक्शन तक ।
● पोलिबियाँन सीरप ( मर्क ) 2 चम्मच , रैनफेरान -12 ( रैनवैक्सी ) 1 चम्मच , मैनाडाल ( ज्योफ्रेमैनर्स ) 3 चम्मच । ऐसी 1 मात्रा- दिन में 2 बार , भोजन के बाद।
● न्योफेरम लि . ( डूफर ) 1 चम्मच , डेप्लेक्स ( डेज ) 1 चम्मच । दोनों मिलाकर ऐसी एक मात्रा - दिन में 2 बार भोजन के बाद ।
नोट - पर्याप्त शुद्ध रक्त की उत्पत्ति कर शारीरिक दुर्बलता दूर होती है ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -







































































