पीलिया / जॉन्डिस [ Jaundice ] क्या होता है ? इसका सही पहचान एवमं उचित चिकित्सा विधि क्या है? What is jaundice ? What is its correct identification and proper medical procedure?

 पीलिया / जॉन्डिस [ Jaundice ] 

jaundice, by - https://www.myupchar.com/en


पर्याय - 

कामला , यरकान , इकटेरस ( Ictcrus ) , पाण्डु , कमलवाई , रक्ताल्पता जन्य रोग पीलिया । सामान्य बोलचाल में - ' शरीर का पीला पड़ जाना ' । 

परिचय - 

रक्त में पित्तजनक ' या ' पित्तरंजक ( Bile Pegment ) की उपस्थिति के कारण त्वचा एवं नेत्र श्लेष्मला का पीलापन - यह हो सकता है।  इसमें नेत्र , नाखून , मूत्र एवं त्वचा में अत्यधिक पीलापन दिखायी देता है । 

कामला ( Jaundice ) वह अवस्था है जिसमें रक्तप्लाविका ( Plasma ) में ' विलिरुविन ' की मात्रा 1.5 मि . ग्रा . प्रति 100 मि . ली . प्लाज्मा से अधिक हो जाती है । यह वृद्धि सर्वप्रथम रक्त में , फिर मूत्र में , उसके बाद नेत्र श्लेष्मला ( कन्जक्टाइवा ) में और अन्त में त्वचा में दिखायी देती है ।
 वक्तव्य - जब यकृत से निकलने वाली पित्तवाहिनी नली ( Bile duct ) के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होने से अथवा यकृत एवं पित्ताशय से निकलने वाली पित्तवाहिनी नली के संगम स्थान में अवरोध ( Obstruction ) उत्पन्न होने से पित्त बजाय पक्वाशय ( ड्यूडेनम ) में जाने से ,  यह रक्त में वापस मिलने लगता है , तब रक्त में लाल रक्तकण ( R.B.C. ) की मात्रा नष्ट होने लगती है और पित्त का प्रभाव बढ़ने से शरीर का रंग पीला पड़ जाता है । इस स्थिति को पीलिया कहते हैं।

रोग के सामान्य कारण - 

◆ अम्ल , लवण का अधिक प्रयोग । 

◆ मद्य( शराब ) एवं मिट्टी का सेवन । 

◆ तीक्ष्ण पदार्थों का प्रयोग । 

◆ असन्तुलित आहार । 

◆ यकृत की गड़बड़ी । 

◆ पित्त प्रणाली में पथरी का अटक जाना । कभी - कभी किसी रोग विशेष के कारण पित्तवाहिनी का मार्ग छोटा एवं संकीर्ण हो जाता है , तो पित्त आँतों में न जाकर रक्त में ही सीधा जाने लगता है और उसमें मिलने लगता है जिसके परिणामस्वरूप शरीर पीला हो जाता है । 

◆ सामान्य पौष्टिक आहार की कमी एवं पाचन विकृति । 

◆ चिरकालीन मलेरिया ज्वर का सताते रहना ।

◆ खुली स्वच्छ , शुद्ध वायु का अभाव , स्वच्छ जल एवं पर्याप्त सूर्य के प्रकाश की कमी । 

◆ स्त्री में मासिक धर्म से अत्यधिक रक्त का ह्रास । 

◆ वायु प्रदूषण एवं आर्द्र स्थान में निरन्तर रहने आदि कारणों से ।

सामान्य लक्षण -

◆ चेहरा मुरझाया हुआ एवं सफेद होकर अंत में पीला पड़ जाता है ।

◆ नेत्र , त्वचा , मुख , नख का हल्दी जैसे रंग का पीला होना । 

◆ मल - मूत्र रक्त मिश्रित पीले रंग का होना । 

नोट - शरीर का बरसाती मेढक जैसा पीला विशिष्ट लक्षण । 

◆ जलन एवं अपचन । 

◆ अरुचि । 

◆ शरीर दुर्बलता एवं कमजोरी ।

◆ पाचन क्रिया खराब एवं मुँह का स्वाद कडुवा । 

◆ पाखाना मैला , पीला एवं दुर्गन्धित । 

◆ चर्मरोग जैसे - खुजली , फोड़े , फुंसी आदि । 

◆ नाड़ी क्षीणता । 

◆ जरा से श्रम से तत्काल थक जाना ।

◆ मल कड़ा , एवं गाँठदार । कभी पतले दस्त । 

◆ ज्वर भाव । 

◆ रोगी में सुस्ती छायी रहती है और चुस्ती चली जाती है । 

◆ शरीर में भारी थकावट एवं कमजोरी मालूम होना । 

◆ श्वास कम एवं छोटा । 

◆ मलावृत्त जिह्वा । 

◆ नाड़ी की गति 40 से 50 बार प्रति मिनट तक हो जाती है । 

◆ रोग पुराना होने पर - हाथ , पैर , मुँह आदि में सूजन ।

याद रखिये - 

■ इसमें रोगी को प्रत्येक वस्तु पीली दिखायी देती है और त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है ।

■ यकृत की क्रिया बिगड़ने पर पित्त अच्छी तरह आशोषित नहीं होता , वह पित्त खून में मिलकर खून के स्वाभाविक रंग को बदल देता है । बस इसी से ' पाण्डु रोग ' या ' पीलिया ' हो जाता है । 

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मान्यता के अनुसार - जब लिवर पर शोथ( सूजन ) हो , उसका आकार बढ़ जाये तो उस व्याधि( या रोग ) को हेपाटाइटिस ( Hepatitis ) कहते हैं जो पीलिया से मिलती - जुलती होते हुए भी एक अलग व्याधि है । पीलिया दरअसल रक्ताल्पता ( अनीमिया ) के कारण होने वाली व्याधि है , जिसे पाण्डु कहते हैं । 

रोग के कारणों के सम्बन्ध में नवीनतम विचार -

◆ अधिक मात्रा में और लम्बे समय तक तेज मिर्च , मसालेदार तले हुए भुने एवं खटायी युक्त खट्टे पदार्थों का सेवन करने से । 

◆ अण्डा - माँस और शराब का अत्यधिक मात्रा में सेवन एवं पित्त भड़काने वाले वाले पदार्थों का अति सेवन । इसके विपरीत वसायुक्त एवं पौष्टिक पदार्थों का सेवन न करने से ।

◆ अधिक उष्ण एवं तेज धूप में लगातार परिश्रम करने अथवा अधिक परिश्रम या व्यायाम करने से । 

◆ शरीर से खून जाने से व्याधि होती है । जैसे- बवासीर , पेचिश ( खूनी ) आदि में लगातार काफी समय तक खून गिरने से यह व्याधि हो सकती है । 

◆ महिलाओं में रक्त प्रदर के कारण मासिक स्राव के दिनों में अधिक रक्त स्राव होना।

◆ एवं घातक चोट लग जाने के फलस्वरूप अधिक रक्त बहने से ।

नोट - कुछ रोग ऐसे होते हैं जो रक्ताल्पता की स्थिति पैदा कर देते हैं जैसे मलेरिया , मोतीझरा , संग्रहणी , यकृत , प्लीहा ( तिल्ली ) का बढ़ जाना एवं कमजोर पड़ जाना आदि जीर्ण रोग । 

सावधान - इस रोग को उत्पन्न करने वाला मुख्य कारण है खान - पान में लापरवाही करना आदि सिर्फ जीभ के बस में होकर स्वाद के लालच में फंस कर ऐसी चीजें खाना जो खाते समय भले ही मजेदार लगती हों पर अन्ततः उनके सेवन का परिणाम रोग कारक एवं दुखदायी ही होता है।

पाण्डु / कामला के भेद : - निदान की दृष्टि से -

■ स्वतंत्र कामला ।

■ अन्य रोगों के होने के परिणाम स्वरूप होने वाला कामला । 

■ परतंत्र कामला ।

पाण्डु / कामला के लाक्षणिक भेद - 

1. हीमोलिटिक जॉन्डिस ( Haemolytic Jaundice ) - रक्त संलायी पीलिया - लाल रक्त कोशिकाओं के अत्यधिक विनाश के कारण रक्त में विलिरुबिन की मात्रा बढ़ जाने से उत्पन्न । यकृत को इसमें कोई भूमिका नहीं होती है । 

■ कामला के इस भेद में लक्षण तीव्र नहीं होते हैं । सीरम में विलिरुबिन की मात्रा 4 मि.ग्रा . / 100 मि . ली . से कम होती है । प्रायः प्लीहा बढ़ी हुई होती है । मूत्र का रंग भूरा या नारंगी होता है । मूत्र के रंग में कोई परिवर्तन नहीं आता है । परन्तु रखने पर काले रंग का हो जाता है । 

■ परीक्षा में यकृत कार्य सामान्य होता है । 

2. एकोलूरिक जॉन्डिस ( AccholuricJaundice ) - अपित्तमेही पीलिया - यह भी ' हीमोलाइटिक जॉन्डिस ' की तरह का ही पीलिया है । लाल रक्त कोशिकाओं की बढ़ी हुई भंगुरता इसकी चारित्रिक विशेषता है । 

3. हिपेटोसेलुलर जॉन्डिस ( Hepatocellular Jaundice ) - यकृत कोशिकीय पीलिया - संक्रमण अथवा औषधियों द्वारा यकृत कोशिकाओं को पहुँची क्षति के कारण उत्पन्न होती है । इसे विषाक्त ( Toxic ) कामला भी कहते हैं । इसमें पित्त अल्प मात्रा में आँतों तक पहुंचता रहता है । अतः पेशाब का रंग अधिक मटमैला ( Claycoloured ) नहीं होता है । यदि कामला अधिक स्पष्ट न हो तो भी यह सम्भव है कि यकृत अधिक क्षति ग्रस्त हो जाये । खुजली भी अल्प होती है पर रोग का आक्रमण तीव्र भी हो सकता है ।

4. ओब्सट्रक्टिव जॉन्डिस ( Obstructive Jaundice ) - अवरुद्ध पथ पीलिया - पित्ताशय पथरी सामान्य पित्तवाहिनी के सिकुड़न अथवा उसमें कोई वृद्धि के कारण पित्त ग्रहणी में नहीं पहुँचता एवं इस कारण पीलिया उत्पन्न होता है । इसमें विलिरुविन आन्त्र तक नहीं पहुँचता है । 

- इसमें मूत्र का रंग सलेटी अथवा मटमैला हो जाता है ।

5. फिजियोलोजिकल जॉन्डिस ( Physiological Jaundice ) - इसे इक्टेरस न्योनेटोरम ( Icterus Neonatorum ) भी कहते हैं । प्राकृत पीलिया जीवन के प्रथम कुछ दिनों में नवजात शिशु में लाल रक्त कोशिकाओं का अत्यधिक संख्या में विखंडन होने के कारण उत्पन्न होता है । 

पीलिया रोग लक्षणों के सम्बन्ध में - 

◆ आँतों में पित्त लवणों की कमी से वसा का आचूषण( suction ) भली प्रकार नहीं हो पाता है । 

◆ विटामिन ' के ' का आचूषण भी कम हो जाता है । इसके परिणामस्वरूप खून का जमने का समय ( Blood coagulation time ) बढ़ जाता है , जिससे रक्तस्राव की प्रवृत्ति पायी जाती है ।

रोग की पहिचान - 

◆ पित्त , वसा , कृमि आदि के लिये मल परीक्षा करनी चाहिये । 

◆ पित्त की उपस्थिति जानने के लिये मूत्र परीक्षा की जाती है । 

नोट - परीक्षण काल में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं पुरीष में मूत्र मिला हुआ तो नहीं है । 

पेट का एक्स - रे , छाती का एक्स - रे बेरियम मील , लिवर बायोस्पी , इण्टोस्कोपी , व्लडकाउन्ट आदि भी आवश्यकतानुसार रोग निर्णय के लिये करने होते हैं ।


रोग का परिणाम - 

◆ दीर्घकालिक ( Long Standing ) कामला में सार ऊतक यकृत कोशिकायें ( Paran Chymal Liver Cell ) अधिक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । जिससे यकृत का चयापचयिक ( Metabolic ) कार्य भी बिगड़ जाता है । रोगी अंत में ठंडा ( Drowsy ) और अर्ध चेतनावस्था में पहुँच जाता है । 

◆ यकृत और पित्ताशय बढ़े हुए हों तो कैंसर सम्भव है । 

◆ चिकित्सा में विलम्ब होने पर शारीरिक शोथ ।

याद रखिये - चिकित्सक के पास जैसे ही कोई रोगीआये ( कामला से सम्बन्धित ) तो उससे रोग के आक्रमण का विस्तृत इतिवृत्त ( History ) जानना आवश्यक होता है । 

■ यदि किसी बुजुर्ग महिला को कामला का आक्रमण एकाएक हुआ हो - पित्ताश्मरी द्वारा अवरोध होना अधिक सम्भव है । 

नोट - अश्मरी( पथरी ) जैसे ही निकल जाती है वैसे - वैसे कामला की तीव्रता भी कम होती जाती है । 

■ ऐसा कामला जो कैंसर के दबाव स्वरूप हुआ है वह कामला धीरे - धीरे बढ़ता जाता है । 

■ कुछ सप्ताह तक बना रहने वाला कामला( पीलिया ) प्रायः किसी अवरोध के कारण होता है।

■ आयुध कारखानों( जहाँ शस्त्रो का निर्माण होता है ) में काम करने वालों में कामला प्रायः हो जाता है ।

चिकित्सा विधि - 

◆ चिकित्सा कारण के अनुरूप । 

◆ कृमि कारण प्रतीत हो रहे हों तो कृमि नाशक औषधि ।

◆ अश्मरी ( स्टोन ) की स्थिति में ऑपरेशन ।

◆ आध्यमान , अजीर्ण आदि के लिये अग्निमांद्यहर औषधि प्रयोग में लानी चाहिये । 

◆ रक्तस्राव की अधिकता में रक्ताधान( blood transfusion ) की व्यवस्था करनी होती है , एवं विटामिन ' के का उपयोग । 

सावधान - इस रोग की चिकित्सा किसी अनुभवी एवं प्रतिष्ठित डाक्टर से करानी चाहिये , क्योंकि इस रोग में सही चिकित्सा मिलने में देर हो जाये तो यह रोग बढ़ कर विकराल रूप धारण कर लेता है और कभी - कभी जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है ।

पथ्य एवं सहायक चिकित्सा - 

● वसारहित दुग्ध उत्तम पेय है । 

● जल पर्याप्त मात्रा में आवश्यक । 

● यदि यकृत कोशिकायें क्षतिग्रस्त हो गई हों तो - ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में देना चाहिये ।

● पीलिया के रोगी को पर्याप्त गन्ने का रस , नारंगी , अंगूर , मुनक्का , केला , अंजीर , सेव , फल , नीबू , मक्खन निकली छाछ , खिचड़ी , मूंग की छिलकेयुक्त दाल , चावल ( थोड़ी सी शक्कर डालकर ) खाना चाहिये । 

● पानी उबाल कर ठंडा करके पीना चाहिये । कच्चा पानी पीना उचित नहीं । 

● कच्ची मूली , परवल , आंवला , कच्चे केले की सब्जी का सेवन उत्तम । 

● पूर्ण विश्राम आवश्यक । भारी और गरिष्ठ भोजन( तला - गला ) वर्जित ।

★ पीलिया के उपचार में आहार में सुधार करना सबसे महत्वपूर्ण है । आहार में क्षारीय तत्व अधिक होने चाहिये । 

★ पर्याप्त लौह वाली सब्जियाँ , पालक , हरी प्याज , कुम्हड़ा , गाजर , मूली , चुकंदर , टमाटर , आलू आदि का सेवन ।

★ घर में बना पनीर , अण्डे और दूध का सेवन करना चाहिये ।

★ विटामिन बी-12 पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे , इसके लिये दूध , अंडे , पनीर , मूंगफली , सूजी एवं सोयाबीन उत्तम । 

★ दो नीबू नित्य आवश्यक । 

★ चुकंदर पीलिया के लिये उत्तम आहार है । इससे शरीर की रोग - प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है । 

वर्जित- तले पदार्थ , चिकने पदार्थ , घी , तेल , मिर्च , खटायी , सरसों , गुड़ , माँस , शराब , चाय , तम्बाकू आदि का सेवन नहीं करना चाहिये ।

■■ प्रारम्भ में रोगी को 5 दिन तक ताजे फलों के आहार पर रखना उत्तम रहता है । इन दिनों रोगी को प्रति 5 घण्टों पर 3 बार ताजे रसीले फलों का आहार लेना चाहिये । तत्पश्चात 15 दिन तक उसे फल और दूध इन 15 दिनों के बाद संतुलित आहार । 

याद रखिये - 

◆ इस रोग में कुछ चिकित्सकों की राय के अनुसार वस्ति कर्म ( एनीमा ) very usefull है । प्रतिदिन विरेचन( शाररिक गन्दगी को बाहर निकालने की प्रक्रिया आवश्यक । 

◆ छेने का सुपाच्य और मृदु भोजन दें । 

◆ दिन में 3-4 लिटर जल पिलावें । 

पीलिया रोग की औषधि चिकित्सा ~

Rx -

■ ' लिवर इक्स्ट्रेक्ट ' विदबी कम्पलेक्स 2 मि . ली . × मांस में इन्जेक्शन ।

अथवा-

निओमेथीडीन 10 मि . ली . × आई . वी . ( I.V. ) । 

सीरप रूप में - मेथिओनिन विद कोलीन फोर्ट ( Methionin with Coline forte ) 2-2 चम्मच दिन में 3 बार । 

यदि साथ में जलोदर भी हो तो - इन्जे . मर्शलिल ( Inj . Marsaly ) 1-2 मि . ली.- माँसपेशीगत । 

कष्टदायक खुजली के लिये  - ' कैल्शियम इन्जेक्शन अथवा ' इरगाटोमीन टारट्रेट 1 मि . ग्रा . - दिन में 3 बार । 

स्थानीय चिकित्सा में - एल्कलाइन लोशन । 

रक्तस्राव की स्थिति में - विटामिन ' के ' + ब्लड ट्रान्सफ्यूजन ।

Rx - प्रेस्क्रिप्शन )

● विटकोफोल ( Vitcofol ) ED.C. - 2 मि . ली.- मांसपेशीगत । 

● हिम - अप ( Haem - up ) ' कैडिला ' - 3 चम्मच ( 15 मि . ली . ) भोजन से पूर्व दिन में 3 बार । 

अथवा-

1-2 कैप्सूल भोजन से पूर्व । 

● हीमैट्रीन ( Hematrine ) सैण्डोज - 1 कैप्सूल , भोजन के , 15 मिनट बाद , दिन में 3 बार । 

● सिन्केविट ( Sinkevit ) रोश - 2 टे . दिन में 2 बार प्रातः सायं - प्रात 10 बजे एवं सायं 4 बजे ।

● क्रिमाफिन लिक्विड( Cremafin Liquid ) - 2 चम्मच - रात सोते समय ।

● अन्य लाक्षणिक चिकित्सानुसार - 

पीलिया में प्रयोग आने वाली ऐलो . पेटेण्ट टेबलेट / कै . -

◆ हिम अप ( Haem - up ) नि . ' कैडिला → 1-2 कै . भोजन से पूर्व ।

◆ आइबेरॉल ( Iberol ) नि . ' एब्बोट → 1-2 टे . नित्य - भोजन के बाद । 

◆ हीमैट्रीन ( Hematrine ) नि . ' सण्डोज ' → 1 कै . दिन में 3 बार , भोजन के बाद ।

◆ प्लैस्टूल्स बी-12 ( Plastules ) नि . वाईथ → 1 कै . दिन में 3 बार , भोजनोपरान्त ।

◆ फोलीप्लेक्स ( Foliplex ) नि .' कोपरान → 1 कै . दिन में 2 बार ।

◆ मैगूरोन ( Macgurone ) नि . ' मैक ' → 2 टेबलेट , दिन में 3 बार , बच्चों को आधी मात्रा ।

◆ जेटोसिटोल ( Jetositol ) नि .' इथनॉर → 2 टे . दिन में 2 बार भोजन के बाद ।

◆ लिवोजिन ( Livogin ) नि . ' एलेनबरीज ' → 1-2 कैप्सूल दिन में 3 बार । 

◆ फोलवोन - एफ ( Folvron ) नि .'सायनेमिर्ड → 1-2 कै . दिन में 3 बार दूध से ।

◆ वाइकोन ( Vikon ) नि . ' फिलिप्स → 1 कै . जल के साथ भोजन के बाद दिन में 2-3 बार ।

◆ बैराफोल ( Berafol ) नि . A. E. D. → 2 टे . दिन में 2 बार भोजन के बाद ।

पीलिया में प्रयोग आने वाले पेटेन्ट पेय / सीरप -

◆ हिम - अप नि . ' कैडिला सीरप → 15-30 मि . ली.- भोजन से पूर्व । वालकों को 5-10 मि . ली . ( 1-2 चम्मच ) दिन में 2 बार ।

◆ सिक्सैप्स ( Sixapp ) नि . ' फॅन्को इंडियन → 2 चम्मच दिन में 2 बार । भोजन से पूर्व ।

◆ हीमैक्ट ( Hemact ) नि . ' एनलो फ्रेंच → 1-2 चम्मच भोजन से पूर्व दिन में 2 बार ।

◆ आइबेरॉल ( Iberol ) नि . अब्बोट → 2 चम्मच भोजन के बाद दिन में 3 बार । बालकों को आधी मात्रा ।

◆ डेक्सोरेन्ज - प्लस ( Dexorange Plus ) नि . ' फ्रेन्को - इंडियन → 3 चम्मच भोजन के बाद दिन में 2 बार । बालक 1 चम्मच ।

◆ विटकोफोल विद आयरन नि . F.D.C. → 3 चम्मच - दिन में 3 बार भोजनोपरान्त । बालक आधी मात्रा ।

◆ फोलिप्लेक्स सीरप ( Foliplex Syrup ) नि.'कोपरान → 1 चम्मच दिन में 2 बार ।

◆ ट्रिसोलिव ( Trisoliv ) नि . ' मेडली ' → 2 चम्मच दिन में 2 बार । बालक 1 चम्मच । शिशु 1/2 चम्मच । दिन में 2 बार भोजन से पूर्व । 

नोट - यह औषधि पीलिया को शीघ्र दूर कर भूख की वृद्धि करती है और कब्ज को दूर कर पाचन शक्ति बढ़ाती है ।

◆ हेपाफोलिन ( Hepafolin ) नि . सिपला → 2 से 3 चम्मच भोजन के बाद दिन में 3 बार ।( तीव्र कामला में । )

◆ लिवोजिन नि . ' एलेनवरीज ' → 1-2 चम्मच भोजन के पूर्व या बाद में ।

◆ निओ - फेरीलेक्स ( Neo - Ferrilex ) नि.' रैलीज ' → 1 चम्मच बराबर जल में मिलाकर भोजन से पहले या बाद में 2-3 बार नित्य ।

◆ स्टिमुलिव ( Stimuliv ) नि . फ्रेंको इण्डियन → 2 चम्मच दिन में 2 बार । बच्चों को आधी एवं शिशुओं को 1/4 मात्रा ।

पीलिया में प्रयोग आने बाले विशिष्ट ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन -

◆ विटकोफोल ( Vitcofol ) नि . ' एफ.डी. सी . → 1-2 मि . ली . माँस में नित्य । तीव्र कामला में ।

◆ कम्पोलाँन नि . ' वायर → 1-2 मि . ली . गहरे माँस में । इसे नित्य या 1 दिन छोड़ कर दें ।

◆ बी . ए . एल . ( BAL ) नि . ' बूट्स → 2 मि . ली . मांसपेशी ( I.M ) में प्रति तीसरे दिन । यह औषधिजन्य घातक विषों से उत्पन्न कामला रोग में उपयोगी । 

◆ बैराफोल नि . ' ए . एफ . डी . ' → तीव्र अवस्था में 1 एम्पुल माँस में नित्य ।

◆ विटामिन ' बी कम्पलेक्स नि . ' T.C.F ' → 2 मि . ली . रोजाना माँस में ।

◆ हेपाफोलिन नि . ' सिपला → 1-2 मि . ली . नित्य या तीसरे दिन माँस में ।

◆ लिवोजिन नि . ' एलेनवरीज → 1-2 मि . ली .  गहरे माँस में नित्य या तीसरे दिन ।

◆ रिपासोन ( Ripason ) नि . ' टिक → 1-1 मि . ली . के 2 इन्जे . नितंब के गहरे माँस में लगाकर अति सुग्राहिता की जांच करें । तत्पश्चात 2-4 मि . ली . माँस में नित्य 4 सप्ताह तक । 

◆ बीजेक्टिल विद लिवर ( Bejectal with Liver ) नि . ' अब्बोट ' → 1 मि . ली . का इन्जे . नितम्ब के गहरे माँस में नित्य लगावें ।

◆ वेलामिल नि . ' साराभाई → 1-2 मि . ली . गहरे माँस में नित्य ।

◆ फोलीप्लोन 12 नि . खण्डेलवाल → 1-2 मि . ली . गहरे माँस में हफ्ते में 2-3 बार ।

◆ लिवर ऐक्स्ट्रेक्ट ( Liver Extract ) → 2 मि . ली . इन्जेक्शन रोजाना माँस में ।

कामला के लक्षणों के अनुसार चिकित्सा - 

◆ कामला की वमन की स्थिति में → एवोमिन ( Avomin ) 25 मि . ग्रा . की 1 टे . खाना खाने से पहले दें । 

◆ नवजात शिशु का कामला रोग → ' कैपीलन ' नि . ' ग्लैक्सों की 6 बूंद 1 चम्मच जल में मिलाकर 1 या 2 मात्रा दिनभर में दें ।

◆ यदि कामला में कै और मितली बहुत अधिक मात्रा में आ रही हों और भोजन उचित मात्रा में न ले सकता हो → ग्लूकोज सोल्यूशन एमाइनो एसिड मिश्रण ( 5-10 % ) तथा 500 से 1000 मि . ली . प्लाज्मा का I / V द्वारा बूंद - बूंद कर दें । बेरिन 50-100 मि . ग्रा . प्रतिदिन और निकोटिनामाइड 100 से 200 मि . ग्रा . नित्य मुख से सेवन करावें । साथ ही रक्तस्रावी प्रवृत्ति को रोकने के लिये विटामिन 'के' के योग 10 मि . ग्रा . की मात्रा में खिलायें । या 2 मि . ग्रा . की मात्रा में माँस में लगावें । रोगी को संतरे या मौसम्मी का रस तथा दूध दें । शेष भोजन बंद कर दें ।

◆ यकृत शोथ से उत्पन्न कामला → डेल्टाकार्टिल ( फाइजर ) 1 टे . + सीलिन 100 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट ।

मिश्रित औषधि चिकित्सा -


■ न्यो - कोलीन ( सिपला ) 1 टे . + सीलिन 500 मि . ग्रा . 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार जल से दें । 

नोट - न्यो कोलीन के स्थान पर ' न्यो - मेथीडिन ( नियो - फार्मा ) की 1 टे . भी ली जा सकती है । 

 लिट्रिसिन ( रोश ) 2 टे . , सार्विसिन ( ई . आई . ) 1 टे . , डेकाड्रान ( M.S.D. ) 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा जल से भोजन के बाद दिन में 2 या 3 बार । 

तीव्र पीलिया रोग की तात्कालिक चिकित्सा - मैक्राविन इन्जे . ( ग्लैक्सो ) 1 मि . ली . + कैपलिन ( ग्लैक्सो ) 1 मि . ली . , कैल्शियम सैण्डोज विद विटा . सी 5 मि . ली . सबको मिलाकर धीरे - धीरे I / V मार्ग से दें । 

ज्वर युक्त पीलिया रोग में - डेलफीकोल सीरप ( Delficol Syrup ) 1-1 चम्मच दिन में 2 बार । रॉसलिन सीरप ( Roscillin Syrup ) 1 चम्मच दिन में 3 बार । बी कम्पलेक्स सीरप 1 चम्मच नित्य । इन्जेक्शन निओ . हेपाटेक्स ( Inj . Neo - hepatex ) 1 मि . ली . रोजाना माँसपेशीगत इन्जेक्शन रूप में एवं ग्लूकोज ओरली ।

बच्चों का कामला रोग -

Rx 

★ लिवोमिन सीरप - 1-1 चम्मच , दिन में 3 बार । 

★ ऑरहेप्टाल सीरप - 1/2 चम्मच , दिन में 2 बार । 

★ सीकोन ड्राप्स - 10 बूंद प्रातः सायं । 

★ रेस्टिक्लीन 250  - 1/3 कै . दिन में 3 बार । 

★ बी कम्पलेक्स लि. - 1-1 चम्मच , दिन में 2 बार । 

★ ग्लूकोज पाउडर- दिन में कई बार ।


 

पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -






































और भी जाने : -


























image creador - by - Sab3el3eish,, by - Rene Cortin

Post a Comment

Previous Post Next Post