जलोदर / जलन्दर [ Ascitis ] रोग क्या है? इसका पहचान, लक्षण एवमं चिकित्सा की उचित व्यवस्था क्या है ?Ascension / Jalandar [Ascitis] What is disease? What is the proper system for its identification, symptoms and treatment?

 जलोदर / जलन्दर [ Ascitis ] 

जलोदर / जलन्दर [ Ascitis ]


पर्याय - 

जलन्दर , जलोदरी , ड्रॉप्सी , उदरी , उदर शोथ । 

सामान्य बोल -चाल में- 

उदर में पानी भर जाना । अंग्रेजी में एसाइटिस ( Ascitis ) । 

परिचय- 

यकृत की बीमारी की अन्तिम अवस्था में पेट पर सूजन आ जाती है और पेट में पानी एकत्रित हो जाता है , बस यही जलोदर है ।

◆ इस रोग में उदरावरण( वह झिल्ली जो पेट को चारों ओर से घेरे रहती है ) गुहा में तरल भर जाता है , पर यह तरल डेढ़ - दो लिटर से कम हो , तो उसकी उपस्थिति का पता नहीं चल पाता है । 

◆ जलोदर कोई स्वतंत्र रोग नहीं है , अपितु दूसरी बीमारियों का विकृत क्रियाफल मात्र है ।

रोग के कारण - 

● यकृत की बीमारी की अन्तिम अवस्था । 

● गुर्दे की बीमारी ।

● अन्त्रावरक - झिल्ली ( पेरीटेनियम ) की बीमारी । 

● प्रतिहारिणी शिरा ( Portal vein ) के अवरोध से उसके दबाव का बढ़ना । जैसा कि सिरोसिस , थ्राम्बोसिस में होता है । 

● रक्ताधिक्य जन्य हृत्पात ( कन्जेस्टिव हार्ट फेल्योर ) । 

● कुपोषण ( Malnutrition ) । 

● बेरी - बेरी , मिक्सीडीमा , डिम्बग्रन्थि के रोग ।

● अग्न्याशय एवं पित्त ( Bile ) के रोग ।

● कुछ - कुछ दिनों में होने वाला बुखार एवं कैंसर । 

● रक्तवाहिनी की बीमारियों में ।

● तिल्ली , फेफड़े एवं हृत्पिण्ड के रोग ।

रोग के लक्षण - 

■ पेट में पानी इकट्ठा हो जाता है तब पहले पेट के सामने वाला अंश ऊँचा और बड़ा दिखायी देता है । इसके बाद ज्यों - ज्यों पानी इकट्ठा होता जाता है , त्यों - त्यों यह पानी पेट के दोनों तरफ एवं नीचे फैल जाता है । इस समय पेट चिपटा दिखायी देता है । 

■ शरीर भार में वृद्धि । 

■ पेट में बेचैनी । 

■ अल्पश्रम से ही सांस लेने में कठिनाई । 

■ मूत्र कम आना । 

■ हृदय का अधिक धड़कना । 

■ कब्ज ( Constipation ) रहना । 

■ चलने - फिरने एवं काम करने में कष्ट । 

■ जिस करवट से रोगी सोता है उस ओर का उदर( पेट ) फूल जाता है । 

■ पेट को एक हाथ से धक्का लगाने पर पानी की लहर , दूसरे हाथ में प्रतीति ।

विशिष्ट लक्षण - 

● पेट के आधे हिस्सो में विशेष क्रम से सूजन । 

● पेट पर शिराओं का उभर आना । 

● अंदर के दबाव से जीभ बाहर की ओर पलट जाती है । 

याद रखिये -

◆ गुर्दे के रोग , तिल्ली , फेफड़े एवं हृदय विकार , रक्तवाहिनियों के रोग . शाररिक सूजन आदि तमाम कारणों से पेरीटोनियम में जल संचित हो जाता है । 

◆ सिरोसिस कारण होने पर - पैरों पर सूजन , जलोदर साथ - साथ होते हैं । 

◆ रक्त विकार कारण होने पर - पैरों पर सूजन और जलोदर साथ - साथ होते हैं । 

◆ अन्य कारण होने पर - पहले पैरों पर सूजन आती है और जलोदर उसके बाद । 

रोग की पहिचान -

■ लक्षणों के आधार पर निदान में कोई कठिनाई नहीं । 

■■ निम्न परीक्षण आवश्यक - 

■ उदरावरण गुहा से निकाले गये तरल का परीक्षण । 

■ प्रतिहारिणी शिरा ( Portal vein ) की रक्तदाब वृद्धि की परीक्षा । 

■ याकृत जीव ऊति परीक्षा ( Biopsy ) । 

■ उदरावरण दर्शन ( Peritonioscopy ) ।

★ आघातन ( परक्शन ) द्वारा -

जहाँ पानी रहता है वहाँ डलनेस ( ठोस आवाज- Dulness ) और ऊपरी पेट में जहाँ आँतें और याकस्थली पानी पर तैरती रहती है वहाँ प्रतिध्वनि ( रेजोनैन्स ) मिलती है , करवट लेने पर ऊपर की तरफ रेजोनैन्स और नीचे डल साउण्ड मिलती है । 

■ ■ यदि यकृत के कारण जलोदर का रोग है तो - 

∆ यकृत खूब बड़ा हो जाता है । 

∆ पेट में यदि पानी अधिक इकट्ठा होता है तो यह बढ़ा हुआ यकृत तक डूब जाता है , इसलिये यकृत हाथों में नहीं मिलता है । यकृत के ऊपर भी थोड़ा सा पानी रहता है । इस अवस्था में अंगुली से यकृत वाली जगह को दबाकर वह पानी यदि हटा न दिया जाय तो यकृत हाथ में नहीं लगता है । इसलिये भी प्रमाणित होता है कि पेट में पानी एकत्रित हुआ है ।

याद रखिये -

● जैसे पानी से भरी ' मसक( पेट की थैली ) ' में हलचल , कम्प और ध्वनि स्पष्ट होते हैं , उसी  तरह की प्रतीति जलोदर में भी होती है । 

● रोगी जिस करवट का अंश दबा कर सोता है , उसी ओर का पेट फूल जाता है ।

रोग का परिणाम - 

■ पेट में पानी अधिक बढ़ जाने पर बेचैनी , चलने - फिरने तथा उठने - बैठने में क़ष्ट होता है । 

■ इस रोग में मुक्ति प्रायः आंशिक ही मिलती है ।

चिकित्सा विधि - 

● चिकित्सा कारणों के अनुरूप की जाती है । 

● जल की मात्रा कम करने के लिये - तीव्र विरेचन एवं मूत्रल औषधियों( मूत्र लाने वाली ओषधियाँ) का प्रयोग । 

● कब्ज का सदैव निस्तारण । 

● पूर्ण विश्राम पर ।

● यदि हृत्पात से जलोदर हो तो डिजिटेलिस का प्रयोग । यक्ष्मा( फेफड़ो का रोग ) हो तो यक्ष्माहर औषधियों का प्रयोग ।

● जब रोगी को उठने - बैठने , साँस लेने में कष्ट होने लगे तब पेट में नली ( Trocar Canula ) प्रविष्ट कर पानी निकाल देना चाहिये ।

पथ्यापथ्य चिकित्सा - 

● नमकरहित आहार की व्यवस्था 

● मद्यपान का पूर्ण निषेध । । 

● हल्की और ताकत देने वाली सभी तरह की चीजें खाने के लिये दी जा सकती हैं । 

● जौ का मांड , मूंग , सेम , करेला , शलजम , मूली , परवल , पालक , बैंगन , तीती चीजें , मट्ठा , लहसुन , पुराने और महीन चावल का भात प्रकृति पथ्य है । 

निषेध- खट्टी चीजें , रसीले पदार्थ , पानी , नमक , नया चावल , खिचड़ी , दही । 

■■ नमक से रक्त का जलीय अंश बढ़ता है।

जलोदर की औषधि चिकित्सा -

Rx - 

स्पाइरोमाइड ( Spiromide ) ' सलें 1-4 टेबलेट - नित्य । 

अथवा- 

इसीड्रेक्स ( Esidrex ) हिन्दुस्तान - सिबा गैगी 1/2 - 1/2 टेबलेट नित्य । 

अथवा- 

इन्जे . लासिक्स ( Inj . Lasix ) होचेस्ट 2 मि . ली . मांसपेशीगत अथवा शिरा में 2 मिनट के अन्तर्गत धीरे - धीरे । बालक आधी मात्रा । 

अथवा- 

लासिक्स हाई डोज ( Lasix High dose ) नि . ' होचेस्ट ( Frusamide 500 mg Tab . ) 

नोट - साथ में लिटरेचर के अनुसार । 

नोट - जब तक सूजन गायब न हो जाय , इस चिकित्सा को चलने दें ।

रोग की प्रत्येक अवस्था में → ' मैगसल्फ ' 1 ग्राम कैप्सूल रूप में प्रातः नित्य दें । 

साथ ही - 

कार्डियक एसाइटिस में → ' डिजोक्सीन ( लेनोक्सिन ) .25 ग्राम की टे . दिन में 2 बार दें ।

Rx ( प्रेस्क्रिप्शन )


■ लिवोजिन के . ( Livogin Cap ) ' एलनवरीज 1-2 कै . दिन में 3 बार । 

अथवा- 

लिट्रीसिन ( रोश ) 1-2 टे . दिन में 3 बार । 

■ ' टेबलेट लासिक्स ( Tab . Lasix ) होचेस्ट 1 टे.- प्रातः । 

अथवा-

लासिक्स हाई डोज । 

■ पोट क्लोर ( Pot Clor ) ' मार्टिन हैरिस 2 चम्मच , दिन में 2 बार । 

■ डायटाइड ( Dytide ) ' एस्केएफ 1-1 टेबलेट , दिन में 3 बार । 

■ ग्रीनपुनर्नवा लिक्विड एक्स्ट्रेक्ट ( Green Punarnava Extract ) ' हर्वल 2 चम्मच दिन में 3 बार ।

■ इन्जे . होललिवर एक्स्ट्रेक्ट विद ' बी12 '  2 मि . ली . , नितम्ब के गद्दे माँस में। 

■ बाईकोलेट्स नि . ' मार्टन हैरिस 2 टे . रात सोते समय ।

कम्बीनेशन थेरापी ( Combination Therapy ) -


◆◆ डाईयूरल ( एलेम्बिक ) 1 टे . , डाइटाईड ( S.K.F ) 1 टे . , मैक्राफोलिन विद आयरन ( ग्लैक्सो ) 1 टे . । ऐसी 1 मात्रा - दिन में 3 बार जल के साथ । 

साथ ही -

डाई यूरल 2 मि . ली . का इन्जे . माँस में प्रति तीसरे दिन । 

◆◆ इन्जे . लिवोजिन 2 मि . ली . माँस में नित्य लगावें । 

साथ ही -

ग्रीन पुनर्नवा लि . एक्स्ट्रेक्ट ( हर्वल ) 2 चम्मच दिन में 3 बार । 

◆◆ लासिक्स 1 टे . , सीलिन 500.मि. ग्रा . की 1/4 टे . । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार जल से दें । 

● हृदय , गुर्दे एवं यकृत विकारों से उत्पन्न जलोदर में उपयोगी ।

◆◆ लासिक्स 2 मि . ली . , मैक्राबिन ( 500 मि . ग्रा . प्रति मि . ली . में ) 1 मि . ली . , होल लिवर एक्स्ट्रेक्ट ( रैलीज ) 1 मि . ली . । तीनों को एक साथ मिलाकर प्रति तीसरे दिन - नितम्ब के गहरे माँस में ।

याद रखिये - जलोदर के रोगी को नमक का पूर्ण निषेध है ।अतः इसके स्थान पर केसीलान ( Casilan ) ' ग्लैक्सो एवं केसीलान ' बी ' , ( Casilan B. ) ' ग्लैक्सो'- किसी एक को ( पाउडर ) खाने के रूप में ।

जलोदर की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -

1. आयरन की कमी से उत्पन्न जलोदर में  रूब्राग्रान ( स्क्विब कं . ) 1 कै . दिन में 2 या 3 बार ।

2. जलोदर में कब्ज होने पर → वाईकोलेट्स -2 टे . रात सोते समय ।

3. हृदय विकार से उत्पन्न जलोदर रोग में → लेनोक्सिन 1/2-1 टे . दिन में 2 बार जल

4. गैस के साथ जलोदर रोग में → डिस्पेप्टाल 1 टे . , बी कम्पलेक्स विद 'बी12' 1 टे . , सीलिन 100 मि . ग्रा . की 1 टे .। ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार दें ।

5. पाचन विकार जनित जलोदर में → बीकोजाइम सी फोर्ट ( रोश ) 1 टे . दिन में 3 बार में 2-3 माह तक लगातार ।

6. यकृत विकार जनित जलोदर में → लिट्रीसन ( रोश ) 1-2 टे . भोजनोपरान्त जल से ।

7. क्षयरोग जनित जलोदर रोग में → इन्जे . स्ट्रेप्टोमाइसीन 1 ग्राम नित्य माँस में ।

जलोदर में प्रयोग आने वाले ऐलोपैथिक पेटेण्ट टेबलेट / कैप्सूल -

● कैसिलैक्टोन 50 ( Casilactone 50 ) नि.'होचेस्ट → 1-2 टेबलेट , दिन में 3 बार । 7 से 10 दिन बाद सही मात्रा में सहन शक्ति के अनुसार निर्धारित करें । 

● डायामोक्स ( Diamox ) नि . ' सायनेमिड  → 1 टे . दिन में एक या दो बात।

● नेफ्रिल ( Nephril ) नि.' फाइजर ' → 1-2 टेबलेट दिन में 1 बार- भोजन के बाद ।

● नैविड्रेक्स ( Navidrex ) नि . ' हिन्दुस्तान सिबा गैगी → 1 टे . दिन में 2 या 3 बार । 

● डेरीफाइलीन ( Deriphylline ) नि . ' जर्मन रेमेडीज → 1 टे . दिन में 2 या 3 बार ।

● डायाटाईड ( Dytide ) नि . एस्केएफ → 1 टे . दिन में 2 या 4 बार ।

● हायथैल्टॉन ( Hythalthon ) नि . ' सुहृद गैगी ' → 1/2 टे . हर तीसरे दिन।

● एल्डेक्टोन नि . ' सलें → 100 मि . ग्रा . की 1 टे . नित्य । आवश्यकतानुसार बढ़ाते हुए 4 गोली तक नित्य । बालक 25 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट दिन में 1 बार । 

◆ हृदय जन्य जलोदर में लाभकारी ।

● एक्वामाइड ( Aquamide ) नि . ' सन फार्मा → 1 टे . खाली पेट दिन में 3 बार , भोजन के 1 घंटे पूर्व ।

● फ्रूसेलाक ( Fruselac ) नि . ' लूपिन → 1-4 टे . नित्य । हृदय एवं यकृत जन्य विकारी रोग ।

● लासिक्स ( होचेस्ट ) → 1-2 टे . नित्य अथवा 1 दिन छोड़ कर ।

● लासिक्स हाई डोज 500 mg → विवरण पत्र के अनुसार ।

● स्पाइरोमाइड ( Spiromide ) ' सलें नि . → 1-4 टेबलेट , नित्य । 

◆ हृदय एवं यकृत जन्य जलोदर में ।

जलोदर में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट पेय / सीरप -

● पोट क्लोर - 2 चम्मच दिन में 2 बार ।

● मेकोसिटोल ( Mechositole ) नि . ' सिपला - 1 बड़ा चम्मच , नित्य 3 दिन तक ।

● सिरोसीन ( Cirrosine ) नि . ' सिपला - 1-3 चम्मच जल के साथ दिन में 3 बार भोजन के बाद ।

जलोदर में लगाने योग्य ऐलो. इन्जेक्शन -

■ एमीनोफाइलीन ( Aminophylline ) - 2 मि . ली . मांसपेशीगत अथवा 1 मि . ली . I/V दें ।

■ डिजीटेलीन ( Digitaline ) नि . ' कैलिको फार्मा - एक एम्पुल का इन्जेक्शन माँस में । हृदय जन्य जलोदर में ।

■ सिलेरिन ( Scillarin ) नि . सैण्डोज ' - 1 एम्पुल माँस या नस में ।

■ लासिक्स नि . ' होचेस्ट - 2-8 एम्पुल ( 20-80 मि . ग्रा . ) नित्य माँसपेशीगत या I/V 2 मिनट में ।

 

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