यकृत सिरोसिस [ Cirrhosis of the Liver ] क्या है? क्यों होता? इसके लक्षण,पहचान एवमं उत्तम चिकित्सा व्यवस्था क्या है? What is Cirrhosis of the Liver? Why would What are its symptoms, identification and best medical system?

 यकृत सिरोसिस [ Cirrhosis of the Liver ] 

Cirrhosis of the Liver ,by - https://www.myupchar.com/en


पर्याय - 

जीर्ण यकृत रोग । 

परिचय - 

Hardening of the liver due to the formation of fibrous tissue . अर्थात तन्तु - ऊतक के बन जाने के कारण यकृत का कठोर हो जाना ' यकृत सिरोसिस ' अथवा ' सिरोहसिस कहलाता है । यकृत का यह एक जीर्ण रोग है । 

★ यकृत सिरोसिस अनेक कारणों से उत्पन्न जीर्ण एवं विसरित व्याधि ( Diffuseable disease ) है । इसमें यकृत के सार ऊतक नष्ट हो जाते हैं । इसमें यकृत के आकार - प्रकार में अंतर आ जाता है और सौत्रिक ऊतकों ( Fibrous Tissues ) का निर्माण अधिक होता है । 

नोट - इसको जिगर का बढ़ना भी कहा जाता है ।

रोग के प्रमुख कारण - 

● अति मद्यपान । इसके विपरीत - पौष्टिक भोजन एवं व्यायाम बहुत कम । अर्थात मदात्य रोग ( Alcoholism ) । 

● कुपोषण ( Malnutrition ) । अर्थात भोजन में प्रोटीन की कमी । 


● सक्रिय जीर्ण यकृतशोथ । यह स्त्रियों में अधिक । 

● पित्त नलिका का अवरोध ।

● मलेरिया ज्वर का बारम्बार आक्रमण । 

हृदय रोग , स्कारलेट फीवर , डिसेण्ट्री , उपदंश , खसरा , टाइफाइड , छोटी माता आदि रोगों का लम्बे समय तक रहना । 

● संक्रमण वाले स्थानों में निवास । गठिया आदि जैसे अन्य वात रोग ।

● बच्चों का सूखा रोग । 

● नमक , गर्म मसाले आदि का अधिक सेवन । 


नोट - यह रोग इनफिल्ट्रेशन , वसा , ग्लाइकोजेन , लिपोइड अथवा पिगमेंट द्वारा हो सकता है । 

■■ यदि वमन( उल्टी ) के साथ रक्त आये , प्लीहा बढ़ी हुई हो , तो पोर्टल हाइपरटेन्शन हो सकती है जो सिरोसिस का कारण है ।

प्रमुख लक्षण - 

◆ रोग स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक । 

प्रारम्भ में कोई लक्षण नहीं । कुछ समय उपरान्त - 

◆ भूख मारी जाती है । 

◆ जी मिचलाना ।

◆ पेट का फूलना ( आध्यमान ) । 

◆ अग्निमांद्य एवं कब्ज । 

◆ मुँह में खट्टा पानी भर आना । 

◆ कभी - कभी वमन( उल्टी ) । वमन के साथ कभी कभी रक्त भी । 

◆ यकृत पीड़ा । 


◆ महिलाओं में M.C. बंद ।

◆ कई बार जिगर तथा प्लीहा वृद्धि ।

◆ छाती और उदर( पेट ) की उपास्थि( Superficial Veins ) मोटी और उभरी हुई।

◆ कभी - कभी खूनी बवासीर । 

◆ अनिद्रा । 

◆ मन्द - मन्द ज्वर । 

◆ पैरों पर सूजन । 

◆ जलोदर( पेट मे जल भरने जैसी स्तिथी ) । 

◆ मूत्र कम आना । 

◆ भार में कमी । 

◆ जिगर( liver ) के दाहिनी ओर की पसलियों से स्पर्श करने पर जिगर का तल खुरदरा या गाँठमय प्रतीत होना ।

◆ जिगर के किनारे एवं जिगर कोण को स्पर्श करने पर गोलाकार प्रतीत होना । 

◆ दिन प्रतिदिन कमजोर होते जाना । 

◆ आँख और मुँह पिचक जाना ।

★ कभी - कभी स्वयं रोगी को अपना बढ़ा हुआ यकृत बड़ी गाँठ के रूप में दिखायी दे जाता है । 

★ इसका प्रारम्भ धीरे - धीरे वर्षों तक अज्ञात रूप में होता है । प्रारम्भ में होने पर रोगी को कोई कष्ट नहीं होता है । 

क्रमानुसार लक्षणों की प्रगति - 

◆ प्रारम्भ में → भूख न लगनाअरुचि आदि ।  

◆ बहुत दिनों तक भूख न लगने से → शरीर कमजोर एवं पाण्डु( पीलिया ) रूप में। 

◆ तत्पश्चात → पेट भारी रहनाअफाराअतिसार अथवा मलावरोध । अनेक बार पेट में दाहिनी ओर दर्द का लक्षण - त्वचा शुष्क । 

◆ एवं → यकृत के ऊपर के शरीर की त्वचा में फैली हुई शिराओं का जाल अथवा खुली त्वचा पर फूली हुई सूक्ष्म धमनियों का जाल दिखायी पड़ सकता है । 

◆ त्वचा तथा नखों पर पाण्डुता( पीलिया ) की झलक । तत्पश्चात - 

◆ यकृत एवं प्लीहा की वृद्धि , नाभि पर तथा उसके ऊपर की शिरायें फैली हुई → नाभि के आस - पास कभी - कभी शिरा गुच्छ का निर्माण ।

◆ रक्तवमन( खूनी उल्टी ) 10 % रोगियों में । 

◆ कभी - कभी मुँह से रक्तस्राव । 

◆ यदि रोग बढ़ता ही जाये तो जलोदर के लक्षण या छाती में पानी भर जाने पर पैरों में शोथ( सूजन ) । 

◆ जलोदर के साथ - साथ गिट्टों , पैरों तथा जाँघों पर हल्के शोथ का लक्षण । 

◆ हृदय निर्बलता , नाड़ी तीव्र एवं कम भार की ।

◆ रोग के बढ़ने के साथ 40 % रोगियों में सायंकालीन मंद ज्वर ।

◆ मूत्र मात्रा में कम , गहरे रंग वाला तथा कुछ अलब्यूमिन युक्त । 

◆ 50 % रोगियों में हल्का पीलिया ।

◆ रक्तस्राव की प्रवृत्ति । प्रायः नाक एवं मसूड़ों से रक्तस्राव । 

◆ शरीर का रंग कुछ हल्के काले रंग का । 

■■ जब यकृत अधिक बीमार हो जाता है तब वह अपना कार्य बंद कर देता है तब टॉक्सीमिया होकर तन्द्रा , कम्प , मूर्छा ( Coma ) आदि मृत्यु सूचक लक्षण होने लगते हैं । 

याद रखिये - रोग की प्रारम्भिक स्थिति में - फाइब्रोसिस होने से यकृत आकार में बढ़ा हुआ होता है , पर जब उसके फेल होने के लक्षण होने लगते हैं तब वह संकुचित आकार में हो जाता है।

रोग की पहिचान -


◆ सिरोसिस रोग अधिकतर शराब लेने वालों को होता है । 

◆ रोगी की उम्र लगभग 30 वर्ष की होती है । विशेषकर पुरुषों में । 

◆ 35 % रोगियों में सेकेण्ड्री इन्फेक्शन तथा ज्वर की उपस्थिति मिलती है । 

◆ निदान करते समय यदि रोगी से पूछा जाय कि रक्तवमन( खूनी उल्टी ) होने पर उसने एस्प्रिन तो नहीं ली है तथा उसमें अल्सर के लक्षण उपस्थित हों तो उसे सिरोसिस का रोगी समझना चाहिये । । 

◆ यदि कोई रोगी जलोदर से पीड़ित हो और उसके पेट की शिरायें उभरी दिखायी दें और उसको पहले रक्तवमन हो चुका हो तथा वह पक्का शराबी हो तो उसे सिरोसिस का रोगी समझना चाहिये ।

रोग के परिणाम - 

◆ रोग का पूर्वानुमान अच्छा नहीं । 

◆ कामला , जलोदर , सिस्टोलिक प्रेशर का नीचा होना अच्छा नहीं । - 

◆ बढ़ा हुआ लिवर साध्य एवं ठीक होने की आशा । 

◆ यदि 1 माह की चिकित्सा से लाभ न मिले तो भविष्य अच्छा नहीं । 

◆ रोग की प्रारम्भिक अवस्था में मद्य पान एवं तीव्र आहारों का सेवन बंद करने से ठीक होने की आशा । - 

◆ मूर्छा एवं रक्तवमन के रोगी की आशा नहीं । 

नोट - रोग का निदान कठिन है । प्रारम्भ में विशेषज्ञ भी इसका निदान नहीं कर पाते हैं ।

चिकित्सा विधि -

● रोग की चिकित्सा रोग की अवस्था पर  निर्भर करती है । 

● लिवर एक्स्ट्रेक्ट के इन्जेक्शन का प्रयोग व्यर्थ । 

● यदि मुँह से खून की उल्टी आ चुकी है तो रोगी को तुरन्त अस्पताल भेज दें जहाँ आपात कालीन आपरेशन तथा रक्त रोगी को देना आवश्यक है ।

● लिवर सिरोसिस की कोई औषधि नहीं है जो लिवर के फाइब्रोसिस को दूर कर सके । 

● रोगी में यदि शोथ , जलोदर , रक्तस्राव और दूसरे अन्य रोग मिलें तो उसे एक से दो माह तक शैया पर विश्राम कराना चाहिये ।

सहायक चिकित्सा - 

● सिरोसिस के रोगी को अधिकतम प्रोटीन वाला , पौष्टिक आहार वाला ( विटामिन ' बी ' कम्पलेक्स प्रचुर मात्रा में ) भोजन दें । 

● किसी भी शराब का पूर्ण निषेध । 

● भोजन सुपाच्य , प्रोटीन या विटामिन्स युक्त हो । 100 ग्राम प्रोटीन नित्य आवश्यक , दूध पर्याप्त मात्रा में ।

● नित्य 2-3 रसगुल्ले ( छेने से बने ) एवं मांस , मछली का सेवन । 

● 120 ग्राम ग्लूकोज , 200 से 250 मि. ली. फल रस , नर्म बनी सब्जी , एवं मक्खन पर्याप्त मात्रा में । 

● नमक का उपयोग थोड़ी मात्रा में ।

याद रखिये - 

★ ' लिवर एक्स्ट्रेक्ट अथवा ' लिवर टॉनिक अथवा अन्य ऐसी ही औषधियाँ जिनका बड़ा प्रचार किया जा रहा है , वे इस रोग में शत - प्रतिशत नाकाम । 

★ विटामिन ' बी ' कम्पलेक्स से आंशिक लाभ । 

भोजन व्यवस्था के सम्बन्ध में - यदि रोग अधिक बढ़ा हुआ हो , यकृत अधिक क्षीण हो चुका हो तो प्रोटीन भोजन कम मात्रा में दें । 

हेपेटिक कॉमा की स्थिति में - 

■ जल प्रतिदिन 2-3 लिटर । अथवा पेट में ट्यूब डाल कर उसके द्वारा 20 % ग्लूकोज जल में 2 लिटर तक बूंद - बूंद करके दें । - 

■ आँत की स्वच्छता के लिये सैलाइन या मिल्क आफ मैगनेसिया की एक मात्रा दें । 

■ वीकोजाइम फोर्ट ( रोश ) 6 टेबलेट नित्य । अथवा विटा.' बी ' कम्पलेक्स की समुचित मात्रा दें । 

■ आरम्भ की अवस्था में “ मैथिओनीन एवं कोलीन " औषधि लाभकारी ।

चिकित्सा के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश - 

निम्न विकृति को न होने देने की ओर विशेष ध्यान की आवश्यकता होती है - 

◆ कुपोषण को रोकने । 

◆ तरल अवधारण ( Retention ) को दूर करने । 

◆ आहार पथ के रक्तस्राव को रोकने । एवं 

◆ मस्तिष्क विकृति ।

औषधि चिकित्सा - 

Rx 

★ सिओमेथिओनीन सीरप ( Siomethionine Syrup ) एलबर्ट डेविड 10 मि . ली . ( 2 चम्मच ) -दिन में 3 बार । 

अथवा - 

सिओमेथिओनीन फोर्ट सीरप 2 चम्मच - दिन में 3 बार । 

★ हेपासुलफोल ( Hepasulfol ) फैन्को इण्डियन 2 टेबलेट - भोजन से 15 मिनट पूर्व दिन में 3 बार । 

● बच्चों को 1/4 मात्रा माँ के दूध अथवा फलों के रस के साथ । 

★ बीप्लेक्स फोर्ट ( Beplex Forte ) 1-2 टेबलेट नित्य । साथ ही - विटामिन ' सी ' 500 मि . ग्रा . + ग्लूकोज 5 % आई . वी . दें ।

आपातकालीन स्थिति में विशेष व्यवस्था -


■ यदि रक्तवमन( खूनी उल्टी ) आदि से रक्त की कमी हो जाय तो ब्लड ट्रान्सफ्यूजन एक सर्वोत्तम उपाय है । 

■ यदि खून आ ही रहा हो तो वासोप्रोस्सीन 20 यूनिट्स , ग्लूकोज 100 मि . ली . का I/V मार्ग से , 10 मिनट के समय में दें । आवश्यकता होने पर प्रति 2 घण्टे बाद दिया जा सकता है । 

अथवा- 

इन्जेक्शन पिट्रेशिन ( Inj . Pitression ) 2 यूनिट्स को 5 % डेक्स्ट्रोज ( 100 मि . ली . में ) के अन्तर्गत डायलूट कर I/V ड्रिप द्वारा 10 मिनट में दें । 

अन्यथा- 

■ शल्य कर्म ( आपरेशन ) ही एकमात्र उपाय है ।

सिरोसिस आफ दी लिवर की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -

1. इण्टेस्टाइनल इन्फेक्शन की स्थिति में  → एम्पीसिलीन 250 मि.ग्रा . का 1 कै . दिन में 3 बार 5 दिन तक दें । 

अथवा- 

नियोमाइसीन 250 मि . ग्रा . का 1 कै . दिन में 3 बार 3 दिन तक दें । 

अथवा-

इन्जे . ' जेण्टामाइसीन ( गैरामाइसीन ) 50 मि . ग्रा . दिन में 3 बार मांसपेशीगत दें । इन्जे . सिप्रोफ्लोक्सासिन 200 मि . ग्रा . दिन में 2 बार I/V इनफ्यूजन 30-60 मिनट में ।

2. मस्तिष्क की विषाक्तता ( डिली - रियम एवं मूर्छा )  → प्रोटीन आहार बंद । नियोमाइसीन सल्फेट 1 कै . दिन में 3 बार 3 दिन तक दें । 

3. कै एवं मितली → ग्लूकोज सैलाइन आई . वी . ।

नोट - क्लोरप्रोमेजीन ( लारगेक्टिल ) का प्रयोग न करें । अन्यथा ' कामला( पीलिया ) ' उत्पत्ति की आशंका । 

4. अतिसार ( डायरिया ) → केओलीन + चाक का मिश्रण पर्याप्त । ( इसे मिक्सचर बनाकर लें । )

सावधान - अफीम युक्त औषधियाँ तथा लोमोफेन का प्रयोग न करें । 

5. कब्ज ( Constipation ) → डल्कोलेक्स -1 टेबलेट रात सोते समय । एवं सपोजीटरी 10 मि . ग्रा . की गुदा मार्ग से । 

सावधान - लिक्विड पैराफिन का प्रयोग पूर्ण निषेध है ।

6. असामान्य रक्त स्राव की स्थिति → विटामिन ' के ' 10 मि . ग्रा . की 1 टेबलेट दिन में 3 बार ।

7. ओसोफिजियल एवं गैस्ट्रिक वेरीसिस → गम्भीर उपद्रव । चिकित्सा साधन सम्पन्न अस्पताल में ही सम्भव ।

8. रक्तवमन ( Hematemesis ) → ब्लड ट्रान्सफ्यूजन । गैस्ट्रिक लेवीज एवं ऑत की सफाई ( Bowel wash ) । 

मुख द्वारा - नारियल जल , ग्लूकोज जल , लेमोनेड , सब्जी का सूप । 2 घण्टे का भोजन लगभग 100 मि . ली . । 

साथ ही- 

विटा. ' के ' 10 मि . ग्रा . मांसपेशीगत । इन्जे . रेनीटिडीन ( Inj . Ranitidine ) 50 मि . ग्रा . मांसपेशीगत । इन्जे . पिटेशिन 20 यूनिट 10. मि . ली . 5 % ग्लूकोज में घोल कर I/V ड्रिप द्वारा 10 मिनट में ।

9. जलोदर की स्थति ( Ascitis condition ) → नमक तथा तरल बंद । मद्यपान पर पूर्ण निषेध । 

∆ आहार -  प्रोटीन प्रधान , मांस , मछली , दूध , दाल , मूंगफली , 

∆ एल्डेक्टोन ( Aldactone ) 100 मि . ग्रा . दिन में एक या दो बार 5 दिन तक । एवं ' पोट क्लोर लिक्विड 2 चम्मच दिन में 2 बार । 

∆∆ यदि एल्डेक्टोन ' से लाभ न मिले तो साथ में -

टे . लासिक्स 40 मि . ग्रा . अथवा टे . इसीड्रेक्स 25 मि . ग्रा . की 1/2-1 टेबलेट प्रातः नित्य दें । गम्भीर अवस्था में 2-3 टेबलेट दिन भर में । 

नोट - आधी मात्रा सुबह नास्ते के बाद , दूसरी भोजन के बाद ।

याद रखिये - यह औषधि 3-4 दिन लगातार देकर फिर एक सप्ताह में केवल एक बार से लेकर 3 दिन तक देना चाहिये ।

अथवा -

मर्शलिल इन्जे . 2 मि . ली . सप्ताह में केवल 2 बार । 

हेपेटिक इन्सेफेलाइटिस एवं कॉमा में -

★ प्रोटीन आहार बंद । 

★ 2 लीटर 20 % ग्लूकोज सोल्यूशन राइल्स ट्यूब द्वारा पेट में प्रतिदिन डालना । 

आक्षेपों तथा स्तम्भ की शान्ति के लिये - फीनोबार्बीटोन ' मुख अथवा S/C रूप में । 

पेटेण्ट औषधि चिकित्सा ( नवीनतम औषधियों से ) -

★ डेल्फीकोल ( Delphicol ) नि . साय  नेमिड लीडले  3 चम्मच ( 15 मि . ली . ) भोजन के बाद ।

★ हेपासल्फोल ( Hepasulfol ) नि . फ्रेन्को - इंडियन → 4-6 टे . नित्य । 15 मिनट हर भोजन से पूर्व । 

निषेध- ' ओब्स्ट्रक्टिव जाण्डिस में प्रयोग न करें ।

★ रिपोसोन ( Riposon ) नि . टी.टी. के फार्मा → 1-2 टे . दिन में 3 बार 4 से 6 सप्ताह तक । इसका इन्जेक्शन भी आता है । 2 - 4 मि . ली . × I.V. अथवा 2-3 मि . ली . मांसपेशीगत नित्य 4 सप्ताह तक ।

★ एसिन्टिआल ( Assentiole ) नि . ' Rhone - Poulence → 2-3 कै . दिन में 3 बार । 

■■  मद्यपान से उत्पन्न सिरोसिस रोग में ।



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