पित्ताशय शोथ / कोलीसिस्टाइटिस [ Cholecystitis ] की समस्या क्या होती है? कैसे पहचाना जा सकता है? यह कितने प्रकार की होती है? इसके कारण एवमं चिकित्सा विधि क्या है। What is the problem of cholecystitis [Cholecystitis]? How can I identify? What are the types? Due to this, what is the medical method.

 पित्ताशय शोथ / कोलीसिस्टाइटिस [ Cholecystitis ] 

पित्ताशय शोथ / कोलीसिस्टाइटिस [ Cholecystitis ]


पर्याय - 

पित्ताशय प्रदाह , पित्त की थैली की सूजन , पित्ते की सूजन । 

परिचय - 

पित्ताशय में सूजन जिससे आकर उसका आकार बढ़ जाता है । इस रोग के प्रमुख 2 भेद पाये जाते हैं ।

★ तीव्र पित्ताशय शोथ ( Acute Cholecystitis ) 

★ जीर्ण पित्ताशय शोथ ( Chronic Cholecystitis ) 

इनका क्रमशः वर्णन इस प्रकार है -

तीव्र पित्ताशय शोथ ( Acute Cholecystitis ) 

पित्ताशय में तीव्र शोथ की अवस्था को तीव्र पित्ताशय शोथ कहते हैं । यह 2 प्रकार का होता - 

◆ नान अवरोधी तीव्र पित्ताशय शोथ ( Non - obstructive acute Cholecystitis ) । 

◆ अवरोधी तीव्र पित्ताशय शोथ ( Obstructive acute Cholecystitis ) ।

रोग के कारण - 

◆ रोग अधिकतर पित्ताशय की ग्रीला अथवा पित्ताशय वाहिनी में अवरोध के परिणाम स्वरूप । साथ में संक्रमण भी उपस्थित । 

◆ अवरोध का हेतु प्रायः पित्ताश्मरी ( Gall Stone ) है । 

◆ तीव्र पित्ताशय शोथ - टाइफाइड , पैराटाइफाइड ज्वर तथा सिप्टीसीमिया में विष किसी अवरोध के भी हो सकता है । 

रोग के लक्षण - 

● भारी शरीर की गर्भवती और 40-60 वर्ष की बुजुर्ग महिलाओं में अधिक । 

अवरोध न होने पर -

● वमन( उल्टी ) की इच्छा । 

● उदर( पेट ) के ऊर्ध्व भाग में बेचैनी । एवं ज्वर । 

● रोगी के गहरा साँस लेने पर बायें अधः पशुका प्रदेश ( Hypochondrium ) में स्पर्श द्वारा परीक्षा करने पर अत्यधिक स्पर्शासहिष्णुता( छूने भर से ही तेज दर्द का एहसास ) पायी जाती है । 

अवरोध की स्थति में -

● पित्त शूल ( Biliary colic ) जो तीव्र होता है एवं बेचैनी उपस्थित रहती है । 

● कामला( पीलिया ) अनुपस्थित अथवा अल्प ।

याद रखिये - यदि कामला( पीलिया ), अश्मरी( पथरी ) अथवा सूजन के कारण होने वाले सामान्य पित्तवाहिनी के अवरोध का सूचक है ।

रोग की पहिचान - 

■ पीड़ित भाग का एक्सरे । 

■ पित्त की उपस्थिति के लिये मूत्र परीक्षण एवं सीरम बिलिरुविन के लिये रक्त परीक्षण आवश्यक । 

■ श्वेत रक्त कोशिका की अधिकता प्रायः मिलती है ।

रोग के परिणाम -

■ संरक्षी चिकित्सा ( Conservative treatment ) द्वारा कुछ दिनों में लक्षण शान्त हो जाते हैं । पर सप्ताहों , महीनों अथवा वर्षों के बाद पुनः इसके आने की आशंका रहती है । अवरोध अथवा संक्रमण के परिणामस्वरूप । 

■ रोग बढ़ जाय अथवा विद्रधि या तीव्र अग्न्याशय शोथ हो जाय । ऐसी अवस्था में - 

■ नाड़ी तीव्र , 

■ ज्वर तीव्र , 

■ रोगी की दशा गम्भीर । 

औषधि चिकित्सा -

Rx

◆ पूर्ण विश्राम ( Complete Rest ) ।  

◆ 24 घण्टे वमन( उल्टी ) , जी मिचलाना रुकने तक मुख द्वार कुछ न दें । 

◆ दर्द की शान्ति के लिये  पेथिडीन ( Pethidine ) 100 मि . ग्रा.- मांसपेशीगत प्रति 6 घण्टे पर ।

◆ संक्रमण हो तो → एण्टीबायोटिक्स - ऑक्सीटेट्रासाइक्लीन 500 मि . ग्रा . या एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर 7-10 दिन तक । 

अथवा- 

● इन्जे . ' लेरामाइसीन ' अथवा ' गैरामाइसीन ' 40 मि . ग्रा . माँसपेशीगत प्रति 8 घण्टे पर । 

● वेदना( दर्द ) के स्थान की सिकाई । 

● वमन न रुकने पर - आमाशय आचूषण ( Gastric suction ) किया जाता है। 

साथ ही- 

● ग्लूकोज सैलाइन + ई . वी . कम्पलेक्स 2 मि . ली . की मात्रा में दें ।

शल्य चिकित्सा( Surgery ) - 


■■ चिकित्सा के असफल होने पर जनरल प्रेक्टिशनरों को तत्काल रोगी को आपरेशन के लिये किसी अस्पताल अथवा नर्सिंग होम के लिये निर्दिष्ट कर देना चाहिये ।

शल्य चिकित्सा के बाद - 

◆ ब्लड ट्रान्सफ्यूजन । 

◆ संक्रमण से बचाव हेतु एण्टीबायोटिक्स । 

◆ डिहाइड्रेशन से बचने के लिये - डेक्स्ट्रोज विद नार्मल सैलाइन 5 % -10 % अथवा प्लाज्मा आदि शिरा मार्ग से दिये जाते हैं । 

याद रखिये → यदि स्थानिक शोथ बढ़ता ही जाये , ज्वर बना रहे , उदर की स्पर्शासहिष्णुता( पेट को छूने भर से ही तेज दर्द का एहसास ) बनी रहे तथा ' बिलयरी शूल भी हो तो ऐसी अवस्था में ओपरेशन ही उपयुक्त साधन है । 

पित्ताशय का आपरेशन अब वीडियो स्कोप विधि से - 

■ पित्ताशय की तकलीफ वाले मरीज के लिये अब कष्टदायक शल्य चिकित्सा जरूरी नहीं रह गई है , क्योंकि इसका स्थान अब वीडियो स्कोप सर्जरी लेती जा रही है । शल्य चिकित्सा की यह विधि पश्चिम में चलन में पहले से ही है जिसमें अब चाकू या कैंची नहीं चलायी जाती है।

■ इस नई विधि में पारम्परिक शल्य क्रिया के स्थान पर डाक्टर एक लैपरोस्कोप , पतले रेशे की एक आप्टिक ट्यूब का प्रयोग करता है , जो शरीर में डाल दी जाती है । यह ट्यूब वीडियो स्कोप का काम करती है । इस विधि में चिकित्सक को टी . वी . के स्क्रीन पर पित्ताशय का सामान्य से बड़ा image दिखता है । जिससे उसे दोष मुक्त हिस्सा पहचानने में सरलता रहती है ।


जीर्ण पित्ताशय शोथ ( Chronic Cholecystitis ) 

परिचय- 

जीर्ण पित्ताशय शोथ प्रायः तीव्र पित्ताशय शोथ का उत्तर प्रभाव ( after effect ) होता है । कभी - कभी स्वयं भी उत्पन्न हो जाता है ।

रोग के कारण- 

■ 40 साल से अधिक आयु की भारी शरीर वाली स्त्रियों में । 

■ दीर्घकालिक अश्मरी( पथरी ) । 

■ संक्रमण ।


रोग के लक्षण- 

■ अग्निमांद्य एवं अजीर्ण की शिकायत । 

■ वायु से पेट का बराबर फूला रहना । 

■ पीड़ा- शाम को जाड़ा लग कर दाहिने कंधे में पीड़ा तथा उदर( पेट ) के दाहिनी ओर आमाशय के सामने तीव्र पीड़ा । 

■ निरन्तर रहने वाला कब्ज । 

■ पित्ताशय के स्थान पर दबाने से दर्द । 

■ वमन( उल्टी ) तथा हृल्लास( हिचकी ) की उपस्थिति । 

■ वेदना( दर्द ) कई घंटों तक रह कर शान्त । 

■ मूत्र में वायल की उपस्थिति से मूत्र काले रंग का । 

■ ठंड लग कर ज्वर एवं यकृत वृद्धि , दोनों भी सम्भव ।

याद रखिये - 

● रोग की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि अश्मरी( पथरी ) पित्तमार्ग में कहाँ पर रुकी है । साथ में संक्रमण उपस्थित है या नहीं । यदि अश्मरी पित्ताशय में ही है तो किसी प्रकार के लक्षण नहीं पाये जाते । 

● पित्त मूल अश्मरी से उत्पन्न जीर्ण पित्ताशय शोथ का प्रधान लक्षण है । 

औषधि चिकित्सा - 

■ शल्य कर्म द्वारा पित्ताशय और उसमें स्थित अश्मरी ( Stone ) को अलग कर देने के अतिरिक्त अन्य कोई संतोषजनक उपचार नहीं है । 

■ औषधि उपचार केवल । 

■ शूल( दर्द ) शान्ति के लिये । 

■ पित्ताशय और पित्त मार्ग में उपस्थित संक्रमण को दूर करने के लिए । तथा - 

■ अजीर्ण एवं स्थौल्य को ठीक करने के लिये किया जाता है। जैसे -

■■ शूल शान्ति के लिये - 

मार्फीन सल्फेट 15-20 मि . ग्रा . S/C इन्जेक्शन । लाभ न मिलने पर 1 घंटे बाद पुनः । 

■■ उद्वेष्ट ( Spasm ) को दूर करने के लिये -

● ग्लिसेरिल ट्रिनाइट्रेट 0.5 मि . ग्रा . टेबलेट 1 टे . जीभ के नीचे रखकर 30-60 मिनट के अंतर से चूसने को दें । 

● हल्के आक्रमण में , - ' पेथीडीन 100 मि . ग्रा . माँसपेशीगत् 12 घण्टे बाद पुनः । प्रभावित अंग की सिकाई ।

■■ संक्रमण को रोकने के लिये - 

एण्टीबायोटिक्स एवं रसायन द्रव्यों का प्रयोग ।

◆◆◆ दाँत , कंठ आदि में समस्या रहने पर उपयुक्त चिकित्सा आवश्यक । | 

यदि बिना अश्मरी के जीर्ण पित्ताशय शोथ हो तो उसके उपचार के लिये पित्त के प्रवाह को बढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिये ।

कम्बीनेशन थेरापी ( Combination Therapy ) -


■ शूल शान्ति के लिये → सिवाल्जिन 1 टे . , मेडिनाल 120 मि . ग्रा . सेरीडोन 1/2 टे . , ल्यूमिनॉल 30 मि . ग्रा . ग्लूकोज पाउडर 1200 मि . ग्रा . । 1 मात्रा ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार भोजन के बाद । 

पित्ताशय शोथ में दी जाने योग्य एलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल -

1. रिपोसोन ( Riposon ) नि . ' टी.टी.के. ' → 1-2 टे . दिन में 3 बार 4-6 सप्ताह तक ।

2. डेसिकोल ( Desicol ) ( पी . डी . ) → 2 कै . हर भोजन के बाद ।

3. ब्लूसिलीन - पी . ( Blucillin - P . ) ( ब्लूक्रॉस ) → 250-500 मि . ग्रा . के कैप्सूल दिन में 4 बार ।

4. क्लोरम्फाइसिन ( Chloramphycin ) ( बी.नॉल ) → 1 ड्रेगी या कै . प्रति 4 घण्टे पर ।

5. फेलोपेन ( Felopen ) ( प्लेथिको ) → 500 मि . ग्रा . का 1 कै . दिन में 2 या 3 बार ।

6. मर्टिडॉक्स ( Martidox ) ( मार्टेल हैमर ) → पहले 200 मि . ग्रा . । तत्पश्चात 10 . मि.ग्रा . का 1 कै . नित्य । 

सावधान - गर्भावस्था में प्रयोग न करें ।

पित्ताशय शोथ में देने योग्य ऐलो . पेटेन्ट पेय / सीरप -

1. ट्रिसोलिव ( Trisoliv ) ( मेडली ) → बालक 1 चम्मच । व्यस्क -2 चम्मच । छोटे बच्चों को 1/2 चम्मच । प्रत्येक को दिन में 2 बार , भोजन के पहले । 

2. स्टिमूलिव ( Stimuliv ) ( फेन्को- इंडियन ) → 5-10 मि . ली . दिन में 2-3 बार । बच्चों को 5 मि . ली . दिन में 3 बार । 

सावधान - मध्यपान , मिर्च , खटाई , मसाले , चटनी , आदि बन्द ।

3. टोनो - लिवर ( Tono - Liver ) ( स्टे- डमेड ) → 2-3 चम्मच दिन में 2 बार - जल से ।

4. सोर्बिलिन ( Sorbiline ) ( फ्रेंको- इंडियन ) → 2 चम्मच दिन में 2-3 बार बराबर जल से भोजन के बाद । 

सावधान - अवरोधक कामला में प्रयोग न करें । 

5. मेकॉलिन ( Mecolin ) ( स्टेडमेड ) → 2 चम्मच बरांबर जल मिलाकर भोजन से . पूर्व दिन में 3 बार । बच्चों को 1-2 चम्मच ।

पित्ताशय शोथ में देने योग्य एलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन -

रिपासोन ( Ripason ) ( टी . टी . के . ) → तीव्र रोग में 2-4 मि . ली . I / V धीरे - धीरे दें । अथवा - 2-3 मि . ली . माँस में । 

पित्ताशय शोथ विशिष्ट चिकित्सा सारांश -

◆ दर्द के लिये → इन्जे . मार्फीन या पेथीडीन , एट्रोपीन के साथ ।

◆ ज्वर के लिये → कै . एल्वर्सिलिन तथा कै . बायोसिलीन 25 मि . ग्रा . 1-1 कै . दिन में 4 बार , 4 सप्ताह तक ।

◆ वमन( उल्टी ) आदि के कारण मुख से औषधि न ले सकने पर → इन्जे .' एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . प्रातः सायं 5 से 7 दिन तक दें ।

  

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