पित्ताश्मरी / कोलीलिथिएसिस [ Cholelithiasis ] कैसे हो जाती है? इसके लक्षण,पहचान एवमं चिकित्सा विधि क्या - क्या है? How does cholelithiasis occur? What are its symptoms, identification and medical procedure?

 पित्ताश्मरी / कोलीलिथिएसिस [ Cholelithiasis ] 

पित्ताश्मरी / कोलीलिथिएसिस [ Cholelithiasis ]


पर्याय - 

गाल स्टोन , बिलयरी केलकुलस , पित्ताशय की अश्मरी( पथरी ) । 

परिचय - 

किसी कारणवश अथवा खान - पान की गड़बड़ी से पित्ताशय ( Gall Bladder ) एवं पित्त प्रणाली ( Bile duct ) में सूजन या पित्त निकलने की क्रिया में रुकावट आने के कारण यह रोग हो जाता है । 

■ पित्ताशय में अश्मरी ( Stone ) की उपस्थिति को पित्ताश्मरिता ( कोली लिथिएसिस ) कहते हैं । 

■ 5 % लोगों के पित्ताशयों में अश्मरी उपस्थित होने का अनुमान किया जाता है।

रोग के कारण - 

निम्न कारणों का अनुमान किया जाता है -

■ पित्ताशय का जीर्ण शोथ - इसका प्रधान कारण । 

■ कोलेस्ट्रॉल के अवक्षेपित ( Precipitated ) होने से । 

■ संक्रमण ( Infection ) ।

■ पित्त के मार्ग में रुकावट । 

■ पित्त में विलिरुविन की अधिकता से । 

■ गर्भवती एवं स्थूल शरीर वाली औरतों के कार्बोहाइड्रेट्स तथा चिकनाई के अधिक सेवन से । 

■ शारीरिक परिश्रम न करने से । 

■ अत्यधिक मानसिक परीश्रम करने वाले बैठे - बैठे दिन बिताने वाले , घी वाले पदार्थ अधिक खाने वालों को यह रोग अधिक होता है ।

रोग के लक्षण - 

★ जब तक अश्मरी( पथरी ) पित्ताशय में रुकी रहती है , तब तक कोई लक्षण नहीं होते हैं , केवल पेट में थोड़ा दर्द प्रतीत होता है । 

★ जब अश्मरी पित्तवाहिनी नली में आ जाती है तब - जोर सेअथवा धीरे - धीरे पेट में एक प्रकार का असह्य दर्द उत्पन्न होकर रोगी को तड़पा देता है । 

विशेषता -

◆ दर्द दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर चारों ओर विशेषकर दाहिने कन्धा एवं पीठ तक फैल जाता है । 

◆ दर्द कई घण्टों से लेकर कई सप्ताह तक चल सकता है । 

◆ दर्द के होते ही - वमन( उल्टी ) , प्यास कष्ट , कामला( पीलिया ) , शक्तिहीनता , नाड़ी कमजोर , पसीना आना , मूर्छा आदि लक्षण प्रकट । 

◆ प्रायः अध: पशुरका भाग में दबाने से दर्द । भोजन करने के कुछ समय बाद पेट में भारीपन एवं अफारा( गैस ) ।

शूल की विशेषता - 

● प्रायः शूल( दर्द ) रात्रि को अकस्मात प्रारम्भ होता है । 

● शूल उदर( पेट ) के दाहिने , यकृत के नीचे पित्ताशय के प्रान्त से प्रारम्भ । 

● शूल की लहरें उठ - उठ कर आती हैं । 

● शूल की तीव्रता के कारण रोगी छटपटाता है , बिस्तर या फर्श पर लेटता है , चिल्लाने और रोने लगता है । 

● शूल घण्टों तक रहता है और ऐसे ही अकस्मात बंद हो जाता है । जैसे प्रारम्भ हुआ था ।

रोग की पहिचान - 

● एक्स - रे करने पर पित्त - पथरी का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । इसमें हल्की गोलाकृति धुंधली सी छाया दीखती है । 

● सीरम विलिरुविन परीक्षा - सामान्य से अधिक मात्रा - कामला( पीलिया ) की सूचक। 

● पित्ताशय शूल एक महत्वपूर्ण लक्षण ।

● पित्ताशय चिन्न से पथरी का पता चलता है । 

● मूत्र परीक्षा में - विलिरूविन की उपस्थिति ।

रोग का परिणाम - 

● दर्द के आक्रमण के समय मृत्यु अत्यन्त असाधारण । 

● पेरीटोनाइटिस की उत्पत्ति । 

● ग्रहणी तथा आमाशय में संयोजन । 

● आमाशय एवं आँत में फिस्चुला( abnormal connection between organs) का निर्माण ।

याद रखिये - दाहिनी ओर पेट के ऊपरी भाग ( राइट हाइपोकोन्ड्रियम ) में दर्द होता है । जिसके साथ पेट के ऊपरी मध्य भाग एपांगेस्ट्रियम में भी दर्द हो सकता है अथवा दोनों में से किसी एक स्थान पर दर्द होता है जो दाहिने कंधे या पीठ की ओर को फैलता है । 

यदि पेट का उपरोक्त प्रकार का दर्द अचानक हो जो अधिक तीव्र हो तो पित्ताशय जनित दर्द की शंका की जा सकती है । इसके अतिरिक्त यदि इस प्रकार के पेट दर्द के साथ मितली , वमन( उल्टी ) तथा रोगी को अत्यधिक पसीना आता है तो पित्ताशय शूल की आशंका की जाती है । 

चिकित्सा विधि - चिकित्सा निम्न रूपों में की जाती है -

■ शूल के आक्रमण के समय की चिकित्सा ।

■ शूल के शांत होने के बाद की चिकित्सा ।

पथ्यापथ्य चिकित्सा - 

■ पौष्टिक एवं सुपाच्य आहार । 

■ कुल्थी की दाल का पानी पीने को ।

औषधि चिकित्सा -

1. पित्ताशय शूल के आक्रमण के समय की चिकित्सा -

● पूर्ण विश्राम ( Complete Rest )  

● इन्जे . स्पाज्मो - प्रोक्सीवोन ( Spasmo - Proxyvon ) 

अथवा- 

वुशकोपान कंपोजीटम - 1 गोली दिन में 3 बार । 

अथवा- 

इन्जे . फोर्टविन ( Inj . Fortwin ) 30-60 मि . ग्रा . माँसपेशीगत् अथवा 30 मि . ग्रा . I / V ।

■■■ तीव्र स्वरूप का गम्भीर दर्द होने पर - 

● इन्जे. एट्रोपीन 0.6 मि. ग्रा. माँसपेशीगत दें । 

इसके बाद - 

● इन्जे . पेथीडीन 100 मि . ग्रा . दें । 

● ट्रिनी - ट्रिनी- 1 टेबलेट जीभ के नीचे । 

● ट्रासेन्टीन - 1 टेबलेट दिन में 3 बार । 

● गर्म पानी की थैली - उदर( पेट )

■■■ संक्रमण के लिये - ' टेट्रासाइक्लीन ' अथवा ' एम्पीसिलीन । 

■■■ वमन( उल्टी ) की अधिकता - 5 % ग्लूकोज सैलाइन I/V ड्रिप से । 

● उचित मात्रा में विटामिन 'के' । 

2. शूल के उपरान्त की चिकित्सा - 

शूल के उपरान्त आपरेशन द्वारा पित्तवाहिनी की अश्मरी( पथरी ) को निकाल देना ही एक मात्र चिकित्सा है । 

नोट - इसमें कोलीसिस्टेक्टोमी एवं कोलीडोक्सोटोमी का आपरेशन किया जाता है।

पित्ताश्मरी की कम्बीनेशन थेरापी - 

★ लिवो - अर्ब ( Livoerb ) नि . अल्केम- 30 मि . ली . + साइक्लोपाम ( Cyclopam ) ' इण्डोको 1 टे . । ऐसी एक मात्रा दिन में 2 बार । 

बच्चों को - प्रत्येक की आधी मात्रा । 

पित्ताश्मरी में दी जाने योग्य ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल -

1. डेसिकोल ( Desicol ) ( पी . डी . ) = 1-3 कै . दिन में 3 बार भोजन के मध्य या भोजन के तत्काल बाद । 

● पित्ताशय सूजन , पित्त की पथरी आदि में लाभकारी । कब्ज निवारक । 

2. बायकोलेट्स ( Biocolates ) ( मार्टिन हैरिस ) = 1-3 टे . नित्य । 

3. केनापर ( Canapar ) ( U.P.B. and P. ) = 1-2 टेबलेट दिन में 3-4 बार ।

4. बेसेरोल ( Beserol ) ( विन मेडिकेअर ) = 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार । पित्त शूल के तीब्र दर्द की अवस्था में ।

5. एवाफोर्टिन ( Avaforten ) ( खण्डेल- वाल ) = 1-2 टेबलेट दिन में 2-3 बार ।

6. निओ - कोलीन ( Neo - Choline ) ( सिपला ) = 1-2 टे . जल से दिन में 3 बार ।

7. पाइरिजेसिक ( Pyrigesic ) ( ईस्ट- इंडिया ) = 2 टेबलेट दिन में 2 बार । बालक में आधी मात्रा ।

8. स्पाज्मो fhalf out ( Spasmo- Cibalgin ) ( हिन्दुस्तान सिवा गैगी ) = 1-2 टेबलेट शूल के समय ।

9. बिलेमाइड ( Bilamide ) ( एथनॉर ) = 2 टे . दिन में 2 बार ।

10. परवॉन - स्पास ( Parvon - Spas ) ( जगसनपाल ) = 1-2 कै . दिन में 2 बार ।

पित्ताश्मरी में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट पेय / तरल -

◆ सेविलिन ( Sorbiline ) ( फ्रेन्को इण्डियन ) = 5 मि . ली . ( 1 चम्मच ) दिन में 2 बार । बालकों को आधी मात्रा ।

◆ पाइरिजेसिक सीरप ( Pyrigesic Syrup ) ( ईस्ट इंडिया ) =  2 चम्मच दिन में 2 बार । बालक - आधी मात्रा ।

पित्ताश्मरी में देने योग्य सुप्रसिद्ध ऐलो . पेटेन्ट इन्जेक्शन -

1. मॉर्फीन एण्ड एट्रोपीन ( Morphine & Atropine ) = 1 मि . ली . का 1 एम्पुल मांस में । साथ ही बुस्कोपान ( Buscopan ) की 1-2 ड्रेगी सेवन करावें ।

2. एनाफोर्टेन ( Anaforten ) ( खण्डेल- वाल ) = 3 मि . ली . शिरा या माँस में । आवश्यकतानुसार दुबारा ।

आवश्यक ज्ञातव्य सूचना -

यह एक प्रमाणित तथ्य है कि कुछ पित्ताशय की पथरियों वाले रोगी जीवनपर्यन्त स्वस्थ रहते हैं और उनकी मृत्यु का कारण कोई अन्य रोग ही बनता हे ।



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