आन्त्रावरोध [ Intestinal Obstruction ] की बीमारी गम्भीर क्यो मानी जाती है? इसकी चिकित्सा किस प्रकार सम्भव है ? Why is Intestinal Obstruction's disease considered serious? How is its treatment possible?

 आन्त्रावरोध [ Intestinal Obstruction ] 

आन्त्रावरोध [ Intestinal Obstruction ] ,by - Gospel For Asia/ https://www.gfa.org/


पर्याय - 

बद्ध गुदोदर , आँतों में बंध लग जाना । अंग्रेजी में इसे ' इंटेस्टाइनल एटोनी ' भी कहते हैं।

परिचय - 

यह वह अवस्था है जिसके अन्तर्गत आन्त्र में मल की आगे जाने की गति रुक जाती है , मल वहीं रुक कर सड़ने लगता है , उस सड़ान से गैस उत्पन्न होकर आध्यमान ( अफारा ) उत्पन्न हो जाता है , तथा सड़ान युक्त वस्तु के आँत की दीवार में लीन होने से विष के लक्षण उत्पन्न होते हैं जैसे -वमन( उल्टी ) , शरीर का ठंडा पड़ना , नाड़ी दौर्बल्य आदि । 

दूसरे शब्दों में आन्त्रावरोध वह अवस्था है जिसमें यान्त्रिक ( Mechanical ) या अन्त्रबन्ध ( Paralysis ) के कारणों से आँतों में स्थित पदार्थों की आगे बढ़ते रहने की गति रुक जाती है । 

Intestinal obstruction occur's when the normal onward passage of the intestinal contents is prevented .

वक्तव्य - आरम्भ के लक्षण रोगी को काय चिकित्सक ( Doctor of medicines ) के पास ही ले आते हैं । इसी अभिप्राय से इसका वर्णन कायिक व्याधियों ( medicines diseases ) में ही किया गया है ।

रोग के प्रमुख कारण - 

यांत्रिक कारण - 

●बंध अथवा जोड़ । आँत के एक भाग का दूसरे में घुस जाना । 

●आन्त्रवृद्धि ( हर्निया / Hernia ) ।

●वृहदांत्र का कैंसर । आँत की दीवार में गाँठ जैसा बन जाना । 

●इन्टस्ससेप्शन ( Intussusception ) ।

●आन्त्र में वाह्य वस्तुएँ ( Foreign Bodies ) ।

●वाल्वुलस ( Volvulus ) । 

●आन्त्र पक्षाघात( पायरलिस ) ।

●आन्त्र में गांठ पड़ जाना ।

●आँतों में कोई गोल ठोस वस्तु जैसे फलों की गुठली , हुक , दाँत , सिक्के आदि अटक जाना । 

●आँतों में घाव ( व्रण ) होकर उसके अच्छा होने पर आँत का सिकुड़ जाना । 

डेविडसन प्रक्टिस आफ मेडिसिन्स के अनुसार रोग के कारणों की स्पष्ट झलक ~

मेकेनिकल औब्सट्रक्शन -

★ Luminal Obstruction : -

◆Faecal impection . 

◆Gall stone ileus . 

◆Worms ( Ascaris ) . 

★ Instrinsic lesions of the Bowel wall : -

◆Tumours of large intestine . 

◆Structures . 

◆Croh'ns disease .

◆Intussusception .

★ Extrinsic Compression : -

◆Adhesions .

◆Hernias . 

◆Valvulus . 

★Strangulation Obstruction : -

◆Paralytic Ileus . 

◆Vescular .

◆Post operative . 

◆Peritonitis .

प्रमुख लक्षण - 

●रोगी को मल त्याग न होना , इसका विशिष्ट लक्षण है । 

●पीड़ा - नाभि के आस - पास लगातार रहने वाली पीड़ा । पीड़ा शूल( दर्द ) के समान प्रारम्भ में रुक - रुक कर , परन्तु आगे चल कर बराबर बनी रहती है । 

●कब्ज की स्थिति में ( Strangulation ) पीड़ा तीव्र एवं निरन्तर रहती है । 

●वमन( उल्टी ) - जिसके प्रारम्भ में अधपचा भोजन और पित्त के कण निकलते हैं । अन्न में मल मिश्रित वमन आती है । वमन में दुर्गन्ध आती है । अंत में वमन का रंग और गन्ध मल के समान हो जाते हैं और रोगी की मृत्यु के कुछ समय पूर्व मल के टुकड़े निकलते हैं । 


●डिहाइड्रेशन - वमन( उल्टी ) निरन्तर और बार बार होने से शरीर में जल की कमी हो जाती है ।

●कोष्ठबद्धता( कब्ज ) - पूर्ण कोष्ठबद्धता रहती है यहाँ तक कि वायु भी नहीं सरती है । वस्ति द्वारा दिया हुआ पानी भी बाहर नहीं आता है ।


●नाड़ी ( Pulse ) - गति तीव्र एवं खाली प्रतीत होती है । हल्के से दबाने पर दब जाती है । 

●श्वास - श्वास की गति तीव्र होती है वह वक्ष( छाती ) से ही श्वास खींचता प्रतीत होता है । 


●स्वेद - रोगी को ठंडा पसीना आता है । 


●तापक्रम - अवसाद के कारण तापक्रम कम हो जाता है ।


 
●रक्तचाप - बी.पी.प्रायः गिरा हुआ होता है।

●आध्यमान - पेट फूला हुआ मिलता है ।

याद रखिये - यह एक शल्य सम्बन्धी रोग है , जिसमें प्रायः आपरेशन की आवश्यकता पड़ती है । फिर भी प्रथम बार रोगी को देखने का अवसर प्रायः मेडिसिन के चिकित्सक को ही मिलता है । पहले रोगी अपने निकटतम् पारिवारिक चिकित्सक ही के पास आता है । अथवा बुलाने पर चिकित्सक को उसके घर जाकर रोगी को देखना पड़ता है और पूर्ण परीक्षा करके यह निर्णय करना होता है कि रोगी का तत्काल औपरेशन आवश्यक है । ऐसा निर्णय किया जाय तो भी प्रारम्भ से ही किसी सर्जन के साथ परामर्श करके उपयुक्त चिकित्सा का आयोजन उचित है ।

रोग की पहिचान ~ 

●गुदा परीक्षा - बालकों में यह परीक्षा विशेष उपयोगी है । आन्त्रावरोध का कारण मुख्य रूप से इन्टस्ससेप्शन हो सकता है । अंगुली से इन्टस्ससेप्टिड पिण्ड प्रतीत हो सकता है जिसमें अंगुली में रक्त लग सकता है । 

●एक्स - रे परीक्षा में - आँतों में गैस की उपस्थिति का पता लगता है । 


●स्टेथिस्कोप परीक्षा से - आँतों में शान्ति तथा पेट की गड़बड़ी का पता लगता है ।



●पूर्ण मलबद्धता( कब्ज ) , पीड़ा , आध्यमान( गैस ) एवं वमन( उल्टी ) रोगी की क्षीणता और नाड़ी की अति तीव्रता - इस रोग को स्पष्ट कर देती है । 

●एनीमा द्वारा दिया गया पानी ही निकलता है न कि मल । अथवा न किसी प्रकार की वायु  निकलता है । 

●निरन्तर वमन( उल्टी ) आते रहना इस रोग का स्पष्ट प्रमाण है ।

रोग के परिणाम -


●जितने विलम्ब से रोग का निदान होगा रोगी के बचने की कम आशा की जाती है । यदि दो एक दिन में निदान न हो सका और तत्काल चिकित्सा न की गई तो रोगी का बचना असम्भव है । 

●शल्य चिकित्सा जितनी देर से आरम्भ होती है , उतनी ही जीवन की आशा कम होती है । अन्न में स्तब्धता हो जाने पर आशा निराशा में बदल जाती है । 

●जैसे - जैसे समय निकलता जाता है रोगी की दशा खराब होती जाती है । यदि चिकित्सक के देखने के पूर्व ही अधिक समय निकल चुका है तो वमन( उल्टी ) आदि के कारण रोगी की दशा पहले से अधिक क्षीण हुई होती है ।

नोट- 

◆उपरोक्त लक्षणों के बिना नाड़ी की तीव्रता भी रोग को स्पष्ट कर देती है । 

◆अवरोध होने पर उदर( पेट ) का आकार घोड़े की नाल जैसा हो जाता है । 

◆छोटी आंत में अवरोध होने पर आँतों की पुरःसरण( मल को आगे धकेलने की क्रिया ) गति की क्रिया में बहुत तेजी ।

चिकित्सा विधि - 

●इसकी कोई औषधि चिकित्सा नहीं है । 

●चिकित्सा मुख्य रूप से ही अस्पताल में होनी चाहिये ।


●मेकेनिकल इन्टेस्टाइनल ऑब्स्ट्रक्शन में उदर( अमाशय ) खोलना नितान्त आवश्यक होता है । जिसकी सुविधा अस्पताल में ही सम्भव । 

●यदि घर पर ही चिकित्सा की आवश्यकता प्रतीत हो रही हो तो परामर्श आदि के लिये सर्जन को अपने पास रखना चाहिये । 

●यदि आन्त्रावरोध बन्ध अथवा हार्निया के कारण है तो तत्काल आपरेशन आवश्यक होता है । 

●' आध्यमान ' की स्थिति में आक्सीजन । 

●जीवाणुनाश के लिये ' एण्टीबायोटिक प्रयोग भरपूर मात्रा में । इसके लिये जेण्टामाइसीन / एम्पीसिलीन मांसपेशी- गत् / आई . वी . दें ।


सहायक चिकित्सा -


●यदि रोगी की दशा पहले से ही अधिक  बिगड़ चुकी है , रोगी का सामान्य स्वास्थ्य सुधार कर शीघ्र ही ऑपरेशन के लिये तैयार करना चाहिये ताकि वह ऑपरेशन को सहन कर सके । 

●इसके लिय द्रवों एवं लवणों की क्षतिपूति की जाय । इसके लिये 1 पॉइन्ट नार्मल सैलाइन I / V प्रातः सायं दें । साथ ही अवरोध युक्त आंत्र में एकत्रित स्राव अथवा द्रवों को वहाँ से हटाना । इसके लिए - 

●' नियोस्टिग्मीन ' देकर आंत्र की गति को बढ़ाना चाहिये । 

●विषैले द्रव को निकालने के लिये आन्त्र में रायल नलिका या मिलर - ऐवट की रबर नलिका को नासिका द्वारा आमाशय में होते हुए पक्वाशय( पेट का वह स्थान जहाँ अमाशय से ढीला होकर अन्न जाता है और यकृत और क्लोम ग्रन्थियों से आये हुए रस से मिलता है )  में प्रविष्ट कर पम्प द्वारा बाहर निकालें ।

नोट - विषैले द्रव को पम्प द्वारा बाहर निकालने की क्रिया 24 से 48 घण्टे तक जारी रक्खी जाती है । 

याद रखिये -

■जिस समय चूषण के द्वारा आन्त्रावरोध का द्रव बाहर निकलता है , उस समय ' नार्मल सैलाइन रक्त में शिरा द्वारा पहुँचाया जाता है । 

■ऑपरेशन के पश्चात भी आन्त्रावरोध का रोग होते देखा गया है , ऐसी स्थति में चूषण द्वारा आँत को खाली करना तथा ' नियोस्टिगमीन का प्रयोग यही दो उपाय हैं । साथ ही लवण विलयन का प्रयोग I/V द्वारा किया जाता है । 

सावधान - ऑपरेशन के बाद रोग होने पर ऑपरेशन के लिये कोई स्थान नहीं है । 

औषधि चिकित्सा -

यद्यपि आन्त्रावरोध का उपचार मुख्य रूप से शल्य कर्म ही है , तथापि अन्त्रवध आदि कारण हो तो औषधि उपचार की उपयोगिता भी है ।

Rx . 

प्रातः सायं → प्रोस्टिग्मीन ( Prostigmine ) नि . रोश 2 - 4 टे . दिन में 2 बार । रोग की तीव्रावस्था में इसका इन्जेक्शन 2 मि.ली. की मात्रा में मांस में एक इन्जे . लगायें ।

निषेध- आँतों की गुड़गुड़ाहट में प्रयोग न करें ।

भोजन से पूर्व 2 बार → डायोवोल ( Diovol ) नि . ' वालेस' 1 टेबलेट , दिन में 2 बार , जल के साथ / अथवा सस्पेन्शन 2-3 चम्मच , दिन में 2 बार , जल या दूध के साथ ।

भोजन के बाद 2 बार → एमीनोजाइम ( Aminozyme ) नि . ' स्टेडमेड 2-4 चम्मच , दिन में 2 बार , बराबर जल से । अथवा साइलोक्सोजीन ( Siloxogenc ) सर्ले 1-2 टेबलेट अथवा जैल 2 चम्मच भोजन के बाद ।

रात सोते समय → जैनिटिडीन ( Zanitidine ) U.S.V & P.  1 टे . ( 300 मि . ग्रा . टि . ) रात सोते समय जल । 

निषेध - 8 वर्ष से कम आयु के बच्चों में वर्जित ।

लाक्षणिक चिकित्सा -


■आन्त्र में आन्त्र फँसने में → इं . ' पोस्टीरियर पिटयूटी ( Posterior Pituitry ) 1/2 - 1 मि.ली. का एम्पुल का इन्जेक्शन मांस में । अथवा - ' पिटोसिन नि . पी.डी.

■आन्त्र . में दर्द की स्थिति में → जिमाल्जिन ( Zimalgin ) रैलिस - 1 टे . , नित्य जल से ।

■दर्द एवं आक्षेप में → बुस्कोपान ( Buscopan ) जर्मन रेमेडीज -1 एम्पुल का इन्जेक्शन मांस में ।

■आक्षेप , पेट की गड़गड़ाहट एवं उदर शूल( पेट दर्द ) → ' एट्रोपीन ' 1 मि.ग्रा . , आई.वी. ।

■शोथ एवं संक्रमण के लिये → जेण्टामाइसिन , एम्पीसिलीन एवं ओरीप्रिम का सम्मिलित प्रयोग ।

■आन्त्र की गति क्षीण होने पर → ' एसटिल कोलीन ' का प्रयोग सही होता है । एट्रोपीन का भी उपयोग किया जा सकता है । 

नोट - इस औषधि का उपयोग तब किया जाता है जब आपरेशन के लिये आपरेशन थियेटर तैयार कर लिया जाता है ।

आपरेशन चिकित्सा - 

उदर( अमाशय ) को खोलने के बाद 2 कार्य किये जाते हैं -

■कारण को हटाना ।

■एकत्रित मल को बाहर करना । 

मल को निकालने के लिये ' थौल ' की काँच की नलिका का प्रयोग किया जाता है । 

तत्पश्चात - अंत्रियों को रिक्त करने के पश्चात उदर को सींल दिया जाता है । नलिका अन्त्रियों में ही लगी रहती है । अवरोध दूर होने के पश्चात नलिका को निकाल कर अंतड़ियों को सिल कर उदर को बंद कर दिया जाता है । 

आन्त्रावरोध के ऑपरेशन के पश्चात की चिकित्सा - 

◆ऑपरेशन के बाद चेतना आने पर रोगी को फाउलर पोजीशन में रक्खा जाता है । 

◆समय - समय पर आमाशय से चूषण । इसके लिये रायल नलिका पहले से ही आमाशय में रख दी जाती है । 

◆चूसने के लिये बर्फ के टुकड़े । 

मार्फीन 5 मि . ग्रा . दी जा सकती है ।

एसरीन का प्रयोग मुख से । 

एण्टीबायोटिक्स चिकित्सा पर्याप्त मात्रा में दी जाती है ।


चिरकालीन आन्त्रावरोध ( Chronic Intestinal Obstruction ) 

परिचय - 

धीरे - धीरे होने वाला रोग जिसमें मल त्याग अकस्मात नहीं रुकता है । इसमें कब्ज धीरे - धीरे बढ़ती है । 

नोट - 

समय - समय पर प्रवाहिका( दस्त, अतिसार ) के समान आक्रमण होते रहते हैं , जिसमें मल का त्याग भी होता रहता है ।

रोग के कारण - 

●साधारण कारण अथवा गाँठ की उपस्थिति से आन्त्र का मार्ग अवरुद्ध । 

●आन्त्र पर बाहरी दबाव , अर्बुद( गाँठ ) , मल इकट्ठा होना आदि ।

●आन्त्र के डाइवर्टीकुलाइटिस में । 

●प्रवाहिका( दस्त,अतिसार ) एवं सिफिलिस के परिणामस्वरूप आन्त्र का मार्ग सँकरा हो जाता है । 

●कोलन का कैंसर मार्ग में रुकावट लाता है ।

रोग के लक्षण - 

●रोग धीरे - धीरे प्रारम्भ । 

●प्रारम्भ में साधारण कब्ज , जो जारी रहता है , पर मल त्याग होता रहता है और विरेचन( शरीर से अशुद्धि को बाहर निकानले की प्रक्रिया ) से मल साफ होता रहता है । पर आँत में स्थायी कोष्ठबद्धता आती है और मल त्याग रुक जाता है । इस समय विरेचन से भी कोई लाभ नहीं मिलता है । 

●उदरशूल - प्रारम्भ में न होकर अंत में होता है । प्रारम्भ में उदर में केवल भारीपन रहता । 

●कभी - कभी उदर में अफारा( गैस) एवं वमन( उल्टी ) ।

याद रखिये - 

●कोष्ठबद्धता( कब्ज ) प्रारम्भ से ही होती है । साथ ही धीर-धीरे बढ़ती जाती है । 

●कोष्ठबद्धता के समय उदर( पेट ) फूल जाता है और तन जाता है ।

●विरेचकों के प्रयोग से केवल मरोड़ के समान पीड़ा होती है । जी मिचलाता है कभी - कभी उसे श्लेष्मा युक्त पतले दस्त आते हैं । 

सावधान - प्रायः रोगी इनको ' अपच तथा ' अतिसार का आक्रमण समझता है किन्तु यह अवरोध( जहा मल रुका है ) से नीचे के आन्त्र भाग के शोथ( सूजन ) का परिणाम होता है । 

ऐसा भी सम्भव है - कब्ज के पश्चात अतिसार के बार - बार आक्रमण बड़ी आँत के अवरोधों का विशेष लक्षण होता है , अन्त में कब्ज पूर्ण रूप से चलने लगती है । ऐसी अवस्था में एनीमा अथवा विरचकों से कोई लाभ नहीं । 

चिकित्सा निर्देश एवं सुझाव - यह एक शल्य चिकित्सा विभागीय रोग है । अतः चिकित्सक को जहाँ तक हो सके , ऐसे रोगी को अपनी जनरल प्रेक्टिस में नहीं लेना चाहिये । केवल प्राथमिक उपचार के बाद उसे किसी साधन सम्पन्न चिकित्सालय के लिये ऑपरेशन हेतु निर्दिष्ट कर देना चाहिये ।

रोग का परिणाम - शीघ्र ऑपरेशन की व्यवस्था होने पर रोगी को बचाया जा सकता है ।

चिरकारी आन्त्रावरोध की चिकित्सा - पेट का ऑपरेशन कर कारण को दूर करना एक मात्र चिकित्सा है ।



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image credit - आँतों में बंध, by - James Heilman, MD,,, Hernia, by - https://www.myupchar.com/en

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