बड़ी आँत की सूजन , वृहदांत्र शोथ [ Ulcerative Colitis ]
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| x- ray image of Ulcerative Colitis, by - Hellerhoff |
पर्याय -
प्रणीय वृहदन्त्र शोथ । सामान्य भाषा में इसे रक्तातिसार ' कहते हैं ।
परिचय -
एक ऐसी अवस्था जिसके अन्तर्गत वृहदांत्र में व्रण( छाला ) एवं शोथ हो जाता है । इसमें ' कोलन ' या बड़ी आँत का प्रदाह( इंफ्लामेशन ) होता है । इसे एण्टेरोकोलाइटिस से भी जाना जाता है ।
It is a disease characterised by inflammation and ulceration of the colon with Bloody Diarrhoea and occasional remisson and exocerbation due to some unknown causes .
रोग के प्रधान कारण - रोग के कारण का कोई निश्चित समाधान नहीं हो पाया है । फिर भी अनुमानतः -
●यह रोग 20 से 40 वर्ष की आयु में स्त्री पुरुष दोनों में समान रूप से पायी जाती है । साथ ही 60 वर्ष की आयु के बाद बहुत कम ।
●मानसिक तनाव तथा रोग क्षमता सम्बन्धी अनेक अवस्थाओं का इससे सम्बन्धित होने पर विचार हुआ है , परन्तु कोई निश्चित सहमति नहीं ।
●यह समझा जाता है कि चिंता , क्रोध , शोक , और मानस भावों में शीघ्र अभिभूत हो जाने से यह रोग हो जाता है । मानसिक विकृति को इस रोग का प्रधान कारण कहा जाता है ।
●कुछ लोग इसका कारण ' आउटो इम्यूनिटी ' बताते हैं , तो कुछ लोग जेनेटिक फेक्टर को ।
●कष्टदायक कब्ज, टाइफाइड बुखार , स्वास्थ्य खराबी , आतशक( उपदंश, गर्मी ) एवं पेचिश आदि से हो सकता
●25-30 वर्ष की आयु में स्त्री - पुरुष जो बैठकर कार्य करते हैं , उनमें यह पाया जाने वाला ' पुरानारोग है ।
●यह विकृति विशेष रूप से स्त्रियों में मिलती है ।
●अधिकतर यह रोग अपने आप हो जाता है ।
प्रधान लक्षण -
●रोग का प्रारम्भ प्रच्छन्न ( Insidious ) रूप से होता है ।
●कुछ समय के उपरान्त रक्त एवं श्लेष्मा से युक्त ' अतिसार के आक्रमण होते रहते हैं ।
●रोगी मल त्याग के कुछ ही समय पूर्व पेट में दर्द एवं बेचैनी का अनुभव करता है ।
●यदि ' मलाशय शोथ हो तो ' कुंथन ( Tenesmus ) भी होता है ।
●वाम श्रोणिघात ( Iliac Fossa ) पर स्पर्श असहिष्णुता( यानी स्पर्श करने भर से तेज दर्द होना ) पायी जाती है । यहाँ अंगुलियों द्वारा बड़ी आँत को स्पर्श द्वारा प्रतीत किया जा सकता है ।
●शरीर क्षीण हो जाता है और विटामिन की कमी के कारण त्वचा में विकार ( Follicular hyperkeratosis ) आ जाता है ।
●घटता - बढ़ता ज्वर , शरीर भार में कमी , रक्त न्यूनता एवं जिह्वाशोथ ( Glossitis ) आदि साधारणतः पाये जाने वाले लक्षण होते हैं ।
●रोगी का पेट अफारा( गैस ) रहते हुए भी पिचका सा रहता है ।
●यकृत कुछ बढ़ जाता है और उसमें दर्द भी रह सकता है ।
●आइरन की कमी से पाण्डुता( पीलिया ) के लक्षण मिलते हैं ।
विशेष लक्षण -
● कभी - कभी दस्त के साथ मिला हुआ रक्त अधिक मात्रा में आता है ।
● पहले बिना अतिसार के ही मल में रक्त या पूय( पस ) आने लगता है । यह अवस्था महीनों तक रह सकती है । इसके बाद अतिसार का लक्षण होता है । जो महीनों / वर्षों तक रहता है । कभी कम हो जाता है तो कभी बढ़ जाता है ।●' अतिसार ' इस रोग का प्रधान लक्षण है । यह अर्धद्रव ( Semi liquid ) होता है । दिन में इसके 2-3 या 5-10 तक वेग होते हैं ।
● जब दस्त अधिक होते हैं , तब रात को भी 1-2 बार जाना पड़ता है ।
रोग की तीव्रता के अनुसार -
◆ हल्के होने पर → 1. मल में रक्त , श्लेष्मा अनुपस्थित ।
2. केवल सूक्ष्मदर्शक की सहायता से ही मल में पूय कोशिकायें एवं सैल्स देखी जा सकती हैं ।
◆ अति तीव्र प्रकार में → दस्तों की संख्या अधिक , रक्त न्यूनता तथा विषरक्तता ( टॉक्सीमिया ) , श्रान्तता ( Exhaustion ) , हृक्षिप्रता ( Tachy cardia ) एवं ज्वर पाये जाते हैं ।
◆ रोग के जीर्ण प्रसार में → बड़ी आँत ' नल की तरह कठोर ( Rigid tube ) हो जाता है । दस्त बराबर लगे रहते हैं ।
याद रखिये - इसके लक्षणों के साथ ' डिसेण्ट्री के लक्षणों का बहुत कुछ मिलता है । इसलिये रोगी को एकाएक देखने पर या उसके रोग की अवस्था सुनने पर अधिकांश समय ही विशेषकर ' बेसिलरी डिसेण्ट्री ' का भ्रम हो जाता है । पर वास्तव में ऐसा नहीं है ।
●● कोलाइटिस ' और ' डिसेण्ट्री ' दोनों ही अलग - अलग बीमारियाँ हैं ।
कोलाइटिस लक्षण एक दृष्टि में -
■ जल्दी - जल्दी दस्त आना ।
■ आँव( सफेद बलगम जैसा ) और रक्त मिले दस्त । बहुधा केवल आँव और रक्त के दस्त ।
■ खून और आँव परिमाण में बहुत अधिक ।
■ कूथन , पेट में पीड़ा एवं बड़ी आंत के ऊपर स्पर्श सहन न होने वाला दर्द ।
एक्यूट कोलाइटिस -
■ आक्रमण एकाएक ।
■ जल्दी - जल्दी दस्त । पहले दस्त में मल निकलता है । पर जल्दी ही मल गायब हो जाता है और केवल आँव के दस्त आया करते हैं ।
■ कभी - कभी दस्तों में केवल ताजा खून अथवा कभी आँव और रक्त मिले दस्त ।
■ पेट में असाध्य दर्द एवं कूथन ।
■ एक बार पाखाना आजाने के बाद , दूसरी बार दस्त आने पर भी थोड़ा - थोड़ा दर्द रहना ।
■ वृहदांत्र के ऊपर , पेट के बायीं तरफ बहुत स्पर्शासहिष्णुता( यानी स्पर्श करने भर से तेज दर्द होना ) एवं दर्द ।
■ ज्वर सामान्य भाव से नहीं । कभी - कभी 104 ° फा . तक ।
■ ज्वर के अनुसार नाड़ी की गति तीव्र ।■ किसी भी समय वमन( उल्टी ) ।
रोग के पुराने होने पर -
■ दस्त 2-3 बार से अधिक । कभी - कभी 8-10 बार तक ।
■ कभी - कभी दो एक दिन कब्ज , 2-4 दिन पतले दस्त - इस तरह भी होते हैं ।
■ दस्त के साथ आँव और रक्त ।
■ कभी - कभी आँव और रक्त अलग - अलग निकलते हैं ।
■ रोगी कमजोर हो जाता है ।
■ मानसिक सुस्ती ।
रोग की पहिचान -
★ जल्दी - जल्दी दस्त आना , आँव और रक्त मिले दस्त , कूथन , पेट में दर्द और बड़ी आँत के ऊपर स्पर्श सहन न होना आदि लक्षणों से इसके पहिचानने में कठिनाई नहीं होती ।
★ रक्त की कमी से ल्यूकोसिटोसिस ( Leucocytosis ) मिलता है ।
★ E.S.R. बढ़ा हुआ ।
★ ' आमाशय दर्शन ' ( Proctoscopy ) या ' सिग्मोइडोस्कोपी सभी रोगियों में कर लेना चाहिये ।
★ मलाशय की जीवऊति परीक्षा ( Rectal Biopsy ) से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि रोग कितना बढ़ा है ।
★ लेबोरेटरी परीक्षण में मल में रक्त , पूय और अमीबा की सूक्ष्मदर्शक से परीक्षा का महत्व ।
★ रक्त परीक्षा से रक्तन्यूनता का पता चलता है ।
★ बेरियम का एनीमा देकर ' एक्स - रे ' लेने पर बड़ी आँत अधिक सक्रिय एवं आँत पाइप की तरह तथा कुछ अधिक संकुचित दिखायी देती है । तथा उसमें व्रणों( छालो ) के अधिकाधिक गड्ढ़े दिखायी पड़ते हैं ।
रोग के परिणाम -
● इस रोग का कोई रोगी ठीक नहीं होता ।
● अधिकतर चिररोगी ( Chronic Patient ) रहते हैं ।
● यह रोग प्रबल होकर फिर - फिर अच्छा होता रहता है ।
● यदि प्रथम वर्ष में रोगी की अवस्था सुधर जाती है तो वर्षों तक भी घातक नहीं होता है ।
● वैसे यह बीमारी आराम हो जाती है । पर कड़ी बीमारी में अधिकतर 3 दिनों में मृत्यु हो जाती है ।
● और अन्य रोग होने पर रोग असाध्य हो जाता है ।
● किसी - किसी की बीमारी बहुत धीरे - धीरे ठीक होती है और आराम होने में महीनों का समय लग जाता है ।
● कभी - कभी रोगी आराम होकर भी फिर दुबारा बीमार हो जाता है ।
● कभी - कभी बीमारी पुराना आकार धारण कर लेती है । उसमें रोगी को बहुत दिनों तक तकलीफ बनी रहती है ।
चिकित्सा विधि -
●रोग की चिकित्सा इस बात पर निर्भर करती है कि रोग की तीव्रता कितनी है और रोग कहाँ तक फैल गया है -
●पूर्ण विश्राम ( Complete Rest ) ।
●' सेडेटिव ' तथा ' ट्रान्क्यूलाइजर ' देना आवश्यक ।
●अतिसारों के कारण शरीर में जल की कमी हो जाती है । अतः रोगी को जल अधिक पिलाना चाहिये ।
●शरीर में तरल एवं इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को दूर करने के लिये शिरा मार्ग से नार्मल सैलाइन ' , ' ग्लूकोज ' , ' पोटाशियम आदि आवश्यकतानुसार दिये जाते हैं ।
●रक्तन्यूनता को दूर करने के लिये रुधिराधान ( Blood Transfusion ) हीमोग्लोबिन के स्तर को प्राकृत बनाये रखने के लिये आवश्यक हो सकता है ।
●उपद्रवों( अन्य रोगों ) की स्थिति में ' एण्टीबायोटिक्स दिये जायें । अथवा शल्य चिकित्सा में इसका प्रयोग किया जाय ।
पथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
●आहार पूर्णतया पौष्टिक एवं विटामिन से भरपूर हो ।
●दूध और मट्ठा सर्वोत्तम । किसी - किसी को दूध अनुकूल नहीं पड़ता है । एक दिन में 3 लीटर तक दूध लिया जा सकता है । दूध में प्रोटीनेक्स ' मिला कर देना लाभकारी रहता है ।
●तीव्रावस्था में - फल रस , ग्लूकोज , तथा ' साबूदाना देना चाहिये ।
●कुछ लोगों का कहना है कि 5-6 किलो सेव का गूदा यदि रोगी को नित्य दिया जाय , तो रोग शान्त हो जाता है ।
निषेध- ' डेरी प्रोडक्टस ' का पूर्ण परित्याग ।
◆◆ आरम्भ में केवल जल ही मुख से दें । बाद को दशा में सुधार होने पर अधिक ' कैलोरी एवं प्रोटीन युक्त आहार देना चाहिये । ◆◆
अल्सर कोलाइटिस की औषधि चिकित्सा -
★ तीव्र अवस्था में ( In acute stage )
Rx .
◆ कोर्टी - कोस्टेराइड्स ( Corti Costeroids ) व्या . नाम - प्रेडनीसोलोन ( Prednisolone ) 5 मि.ग्रा . टे . ~ 2 टेबलेट - दिन में 3 बार 1-3 सप्ताह तक । तत्पश्चात् 1 टेबलेट - प्रति 3-4 दिन पर । कोडीन फॉस्फेट ( Codine Phosphate ) 30 मि.ग्रा . दिन में 3-4 बार ।
अथवा-
◆ लोपरामाइड ( Loperamide ) 2 मि.ग्रा . दिन में 4 बार ।
★ सम्पूर्ण शरीर से सम्बन्धित चिकित्सा ( Systemic Treatment )
Rx .
◆ प्रेडनीसोलोन 40-60 मि.ग्रा . नित्य 3-6 सप्ताह तक ।
★ गम्भीर अवस्था में -
◆ हाइड्रोकॉर्टीजोन ( Hydrocortisone ) 100-200 मि.ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर I/V दें ।
◆ सल्फासालाजीन ( Sulphasalazine ) 2-4 ग्राम प्रति दिन ।
अथवा -
0.5 ग्राम - दिन में 4 बार 1-2 साल अथवा दीर्घकाल तक ।
★ चिरकारी रोगी में -
Rx .
◆ एजाथियोप्रीन ( Azathioprine ) 2-5 मि.ग्रा . / किलो भार पर / नित्य ।
◆ हाइड्रो . कोर्टिजोन सक्सीनेट सोडियम 100 मि.ग्राम - दिन में 2 बार , शिरा मार्ग से ड्रिप रूप में 5 दिन तक दें । बाद में प्रेडनीसोलोन मुख से ।
◆ सल्फासेलाजीन 2 ग्रा. - नित्य ।
नोट - ' सालाजोपायरिन 0.5 ग्राम की टेबलेट पहले दिन 8-12 टेबलेट 3 सप्ताह तक दें । तत्पश्चात कुछ लाभ मिलने पर दिन में 6 गोली दें ।
अल्सर कोलाइटिस की सर्वमान्य चिकित्सा ऐसे भी है -
तीव्र रोग में ( In acute stage )
Rx .
◆शय्या पर विश्राम ( Rest in bed )
◆उच्च प्रोटीन वाला आहार - मीट , अण्डा , ब्रेड , केला आदि ।
◆ दूध कुछ दिन बंद रक्खें और उसके Response को देखें ।◆ गम्भीर अवस्था में तरल तथा इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करने के लिये ग्लूकोज आई.वी. दें ।
यदि मलाशय में कोई स्थानीय विकृति हो तो - वेटनीसोल सपोजीटरीज प्रयोग करें ।
◆ टे . इमोडियम ( Tabs . Imodium ) 1 टे . - दिन में 3 बार ।अथवा -
◆ टे . ' लोमोटिल ( Tabs . Lomotil ) या ' लोप्रामाइड 1 टे . दिन में 3 बार ।
उदर( पेट ) पीड़ा के लिये -
◆ गर्म पानी से सिकाई ( Hot Water Bag Fommentation )
◆ मल्टी - विटामिन सीरप 2-2 चम्मच - दिन में 3 बार ।
गम्भीर अवस्था में ( In Severe Cases ) -
◆ इन्जे . हाइड्रो - कीर्टीजोन 100 मि.ग्रा . दिन में 4 बार ।
अथवा -
◆ इन्जे . प्रेडनीसोलोन फास्फेट 16 मि.ग्रा . दिन में 4 बार ।
हल्के स्वरूप के रोग में ( In Mild Cases ) -
◆ टे . प्रेडनीसोलोन 5 मि.ग्रा . ~ 2 टे . दिन में 2 बार -2 सप्ताह तक । तत्पश्चात 1 टे . प्रति चौथे दिन ।
गम्भीर स्वरूप में अथवा सफलता न मिलने पर ( In severe case or if no response )
Rx .
◆ इन्जे . एक्थ ( Inj . ACTH ) 80 मि.ग्रा . I / M नित्य ।◆ एनीमा - रात्रि के समय 6 दिन तक ।
◆ इन्जे . इफकोर्लिन ( Inj . Efcorlin ) 100 मि.ग्रा .
अथवा -
◆ वेटनीसोल 8 टेबलेट । 100 मि.ली. नार्मल सैलाइन में घोल कर गुदा मार्ग से ड्रिप रूप में धीरे - धीरे दें ।
◆ टे . सालाजोपायरिन 0.5 ग्राम 1 टे . दिन में 4 बार से देना प्रारम्भ करें और बढ़ाते हुए 2 टे . प्रति चौथे दिन । .
अथवा -
◆ टे . मेसालाजीन ( Tabs . Mesalazine ) व्या . नाम- ' टिडकोल , मेसाकोल 400 मि.ग्रा . । 3-6 टेबलेट नित्य - विभाजित मात्रा में ।
सावधान - ' एण्टीबायोटिक औषधियों का प्रयोग मुख से न करें ।
◆यदि रक्तस्राव अथवा कोलन का टॉक्सिक डायलेटेशन हो तो - ' इमरजेन्सी सर्जरी ' का निर्देश करें ।
कोलाइटिस की लक्षणों के अनुसार चिकित्सा -
1. यदि गुदा मैं ऐंठन हो तो - टे . ' कोडीन ' 1 टे . दिन में 3 बार दें ।
2. रक्ताल्पता में ( If Pyrexia ) - ' आयरन ' मुख द्वारा दें । अथवा सहन न होने पर ' आयरन ' मांसपेशीगत हफ्ते में 1 बार दें । अथवा ' इम्फेरोन 100 मि.ग्रा . मांसपेशीगत 1 दिन छोड़कर दें ।
3.ज्वर की अवस्था में - इं . मेट्रोनिडाजोल 500 मि.ग्रा . दिन में 4 बार दें ।
4. गम्भीर स्वरूप के रक्त स्राव में - ब्लड ट्रान्सफ्यूजन ( Blood Transfusion )।
अल्सर कोलाइटिस चिकित्सा ' हरीसन्स ' प्रिंसिपल आफ इन्टरनल मेडिसिन के अनुसार -
यह महिलाओं का प्रमुख रोग है ।
चिकित्सा- होस्पिटल में उचित रहती है ।
चिकित्सा का उद्देश्य ( Aim of therapy ) -
◆शोथ को कम करना ( Control of Inflammation ) ।
◆पोषक तत्वों की कमी को दूर करना ( Relapse Neutritional losses ) |
नोट -
◆ बहुत से रोगी शैया विश्राम से ही ठीक हो जाते हैं ।
◆ ' फ्लूड्स ' एवं ' इलेक्ट्रोलाइट्स ' की क्षतिपूर्ति ' इण्ट्रावेनस फीडिंग ' द्वारा की जानी चाहिये ।
◆ गम्भीर रक्ताल्पता ( Severe Anaemia ) की स्थिति में - ब्लड ट्रान्सफ्यूजन की व्यवस्था करें ।
◆ एक्यूट इन्फ्लेमेशन की स्थिति में अन्य - हीमेटिनिक ।
◆ गम्भीर रोगी में - ' लोमोटिल या ' लोमोफेन ।
◆ रोगी की पोषण सम्बन्धी आवश्यकता पूर्ति की प्रक्रिया शिरामार्ग से करें ( Intravenous ailmentation ) ।
◆ शरीर के वजन को कायम रखने के लिये तथा ' अल्सरेटिव प्रोसिस के Healing के लिये रोगी को सम्पूर्ण पोषक आहार -' विटामिन्स ' एवं ' मिनरल्स ' दें ।
◆ कुछ रोगियों में इण्ट्रावेनस एलीमिन्टेशन ' एवं ' Bowel Rest ' से रोग को कण्ट्रोल करने में पर्याप्त सहायता मिलती है । साथ ही surgical intervention ' से बचाया जा सकता है ।
◆ भोजन में दूध का निषेध ।
◆ तीव्र अल्सरेटिव कोलाइटिस ' में ' एण्टीबायोटिक का महत्व नहीं ।
◆◆' प्रेडनीसोलोन ' अथवा ' हाइड्रो - कार्टीजोन अथवा एक्थ ( ACTH ) का प्रयोग ।
◆◆' सल्फासालाजीन ' ( Azulfidine ) ।
नोट- ACTH 40-80 यूनिट - नित्य आई . वी . धीरे - धीरे ड्रिप रूप में । तत्पश्चात ( 7 से 10 दिन बाद ) कार्टी - कोस्टेराइड्स मुख द्वारा ।
★ यदि मुख द्वारा स्टेराइड्स देना हो तो - 40-60 मि . ग्रा . प्रेडनीसोलोन प्रति दिन दें । लाभ मिलने पर मात्रा धीरे - धीरे घटाते जायें ।
याद रखिये- चिकित्सा के 7 से 10 दिन मे ( कॉर्टी - कोस्टेराइड्स थेरापी द्वारा ) शोथ कम होकर ' डायरिया एब्डोमिनल पेन एवं फीवर कम हो जाता है । साथ ही भूख में वृद्धि हो जाती है ।
◆पर्याप्त लाभ मिलने पर - मुख द्वारा भोजन देना प्रारम्भ करें तथा ' प्रेडनीसोलोन की मात्रा घटा दें ।
◆' सल्फासालाजीन 2 ग्राम - नित्य विभाजित मात्रा में दें । साथ ही प्रेडनीसोलोन की मात्रा घटाकर 10 मि.ग्रा . - नित्य -2 से 6 माह तक ।
★ कुछ रोगियों में पुनः लक्षण बढ़ने लगते हैं ऐसी स्थिति में -
Rx .
◆' प्रेडनीसोलोन 10-15 मि.ग्रा . नित्य दें ।
◆जिन रोगियों में कार्टी - कोस्टेराइड्स अथवा एजीथियोप्रीन ' अथवा सल्फासालाजीन सहन न हो सके , उनमें ' एनाथियोप्रोन ' का प्रयोग करें । मात्रा 1.5 से 2 मि.ग्रा . / प्रति किलो शरीर भार पर ।
◆' टॉक्सिक मेगाकोलन ' एक बड़ा उपद्रव( रोग ) है - अतएव चिकित्सक को बड़ी सावधानीपूर्वक उपचार करना चाहिये ।
नोट - ' इमरजेन्सी कोलेक्टॉमी ' की आवश्यकता पड़ती है ।
★ हल्के स्वरूप के रोग में ( In mild colitis ) -
Rx .
◆सल्फासालाजीन ( Sulphasalazine ) 1-2 ग्राम - नित्य भोजन के साथ ।
◆प्रेडनीसोलोन ( Prednisolone ) 20 मि.ग्रा .
अथवा -
हाइड्रोकार्टीजोन 100 मि.ग्रा . । 60 से 100 मि.ली. सैलाइन में घोल कर × गुदा मार्ग से सोते समय ।
यदि लक्षणों की शान्ति के लिये ' रेक्टल - स्टेराइड्स की बड़ी मात्रा आवश्यक हो तो मुख द्वारा ' प्रेडनीसोलोन ' 20 मि.ग्रा . प्रतिदिन के हिसाब से दें ।शल्य चिकित्सा- ' टॉक्सिक मेगाकोलन की स्थिति में “ कोलेक्टामी आपरेशन " एक मात्र चिकित्सा है । इससे कोलन कैंसर से भी बचाव हो जाता है ।
कोलाइटिस में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट्स / कैप्सूल -
1. डिसेनक्लोर ( Dysenclor ) नि . एस . जी. → 2 माइक्रो टेबलेट दिन में 3 बार । बच्चों को 1 माइक्रो टेबलेट / प्रति किलो शरीर भार पर प्रति दिन की मात्रा को 3 भागों में बांट कर दें ।
2. इल्डोपर नि . ब्राउन एण्ड बुर्क → प्रारम्भ में 2 टे . , प्रत्येक पाखाने के बाद 1 टे . अधिकतम 8 टेबलेट नित्य ।
० इसका साल्यूशन भी आता है ।
सावधान - 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों में न दें ।
3. थेलाजोल ( Thalazol ) नि . Rhone Poulenc → 0.5 मि . ग्रा . की 1-2 टे . दिन में 2-3 बार । तीव्र दर्द में ' लार्जेक्टिल 25 मि.ग्रा . की 1 टे . साथ में दें ।
4. मेक्साफार्म ( Maxaform ) नि . ' हि . सिवा - गैगी → 2 टे . दिन में 3-4 बात।
5. बेकोडेक्सामीन ( Becodexamine ) नि . ' ग्लिण्डिया → 1 कै . दिन में 1 या 2 बार जल से ।
6. बार्डेज ( Bardase ) नि . ' पी.डी .' → दर्द की स्थिति में 1 से 2 टेबलेट दिन में 3 बार दें ।
सावधान- ' ग्लोकोमा में प्रयोग न करें ।
7. गैस्टाबिड -1 ( Gastabid - 1 ) नि . ' टोरेण्ट → 1 टे . दिन में 2 बार । गम्भीर एवं तीव्र अवस्था में गैस्टाविड -2 की 1 टे . दिन में 1-2 बार दें ।
सावधान - ग्लोकोमा में प्रयोग न करें । 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों में बड़ी सतर्कता से प्रयोग करें ।
8. क्लोरमफाइसिन ( Chloramphycin ) नि . ' बी . नोल → 1-2 टे . या 1 से 2 कै . प्रति 4 घण्टे पर । रोग की अधिकता में 2-2 घण्टे बाद ।
9. इण्टेरोमाइसेटिन ( Enteromycetin ) नि . ' डेज → 1-2 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें । बच्चों के लिये इसका पामीटेट ( 1/4 से 1 चम्मच मात्रा ) आता है ।
10. एण्ट्रेनिल ड्यूप्लेक्स ( Antrenyl Duplex ) नि . ' हि.सिवा गैगी → दर्द के समय 10 मि.ग्रा . की 2 टे . दें ।
बच्चों के लिये इसका ड्राप्स 5 से 10 बूंद पिलावें ।
11. सुप्रिमॉक्स ( Suprimox ) नि . ' गूफिक → 1-2 कै . भोजन के बाद नित्य 3 बार 10 दिन तक दें ।
12. डिपेण्डाल - एम नि . एस्कायेफ → ' परजीवी ' या ' बैक्टीरिया के सम्बन्ध में - 1 टे . दिन में 3 बार दें ।
13. ब्राडिसिलीन ( Brodicilin ) नि . ' अल्केम → 1 कै . प्रति 6 घण्टे पर ।
14. इक्वाइरेक्स ( Equirex ) नि . ' जगसन पाल → 3-8 टे . नित्य - भोजन से पूर्व सोते समय । ' ग्लोकोमा में प्रयोग न करें ।
15. सालाजोपाइरिन ( Salazopyrin ) नि . ' वैलेसी → 2 - 4 टे . दिन में 3 - 4 बार । 2 से 3 सप्ताह तक ।
16. टिडोकोल ( Tidocol ) नि . ' टाइड कं .' → तीव्र रोग में 6 टे . नित्य विभाजित मात्रा में ।
सावधान - बालकों में प्रयोग वर्जित ।
17. प्रो - बेन्थीन ( Pro - Banthine ) नि . ' सलें → 1 टे . दिन में 2-3 बार ।
18. सेरी - बेन्थीन ( Sere - Banthine ) नि . ' सलें → 1 कै . दिन में 2-3 बार।
19. मेसाकोल ( Mesacol ) नि . ' सन फार्मा → 1-2 टे . दिन में 3 बार ।
कोलाइटिस में सेवन कराने योग्य अपटूडेट ऐलो . पेटेण्ट पेय -
1. क्लोरमफाइसिन नि . ' वी.नाल .' → बच्चों को 1.25 से 5 मि.ली. दिन में 2 बार।
2. एण्ट्रेनिल ड्राप्स नि . ' हि.सिवा गैगी → बच्चों को 5 से 10 बूंद दिन में 2-3 बार ।
3. डायरमाइसिन - एन ( Diarmycin - N ) नि . ' निकोलस → 2 वर्ष से कम आयु के बालक 5-10 मि.ली. । 2 वर्ष से अधिक आयु के बालक 10-20 मि.ली. । सभी को दिन में 4 बार सस्पेन्शन पिलावें ।
4. इण्टेरोस्ट्रेप सस्पेन्शन नि . डेज → 5-10 मि.ली. दिन में 3-4 बार ।
5. फुरजोल ( Furzo ) नि.'डोपसान → वयस्क → 30 मि.ली. प्रति 2 घण्टे पर ।
बालक → 15 मि.ली. प्रति 3 घण्टे पर ।
सावधान- 1 माह के शिशु को न दें । मद्यपान पूर्णतया बंद ।
6. ग्वानाइमाइसिन सस्पेन्शन फोर्ट नि . ' ग्लिण्डिया → वयस्क - 3-5 चम्मच प्रति 4 से 6 घण्टे पर ।
बच्चों को - 2-3 चम्मच प्रति 6 घण्टे पर ।
शिशु - 1 चम्मच प्रति 6 घण्टे पर ।
7. आई.सो.जेल ( I. So. gel ) नि . ' ग्लिण्डिया → वयस्क - 2 चाय चम्मच प्रातः सायं भोजन के समय ।
बच्चों को -1 चाय चम्मच दिन में 1 बार दूध या जल के साथ।
8. बार्डेज लिक्विड नि . ' पी.डी .' → बच्चों को - 1-2 चम्मच दिन में 3 बार ।
9. कालिमेक्स नि . ' वैलेसी ' → वयस्क एवं बच्चों को - 1-2 चम्मच दिन में 3 बार ।
शिशु- 1/2 - 1 मि . ली . भोजन से 15 मिनट पूर्व ।
कोलाइटिस में लगाने योग्य ऐलोपैथिक इंजेक्शन ~
1. डाईक्रिस्टीसीन ( Dicrysticin ) नि . ' साराभाई के .' → 1/2 - 1 ग्राम 2 मि.ली. डिस्टिल्डि वाटर में घोल कर मास में नित्य 10 दिन तक लगावें ।
2. ओम्नीसिलीन ( Omnicillin ) नि . ' हैक्स्ट → एक वायल दवा को डिस्टिल्ड वाटर में घोल कर मास में लगावें ।
3. सेक्लोपेन ( Seclopen ) नि . ' ग्लैक्सों → एक वायल को डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर प्रति 12 घण्टे पर मांस में लगावें ।
4. लेडरमाईसिन ( Ledermycin ) नि . ' सायनेमिड → एक वायल औषधि को ' डिस्टिल्ड वाटर ' में घोल कर एक इन्जेक्शन मांस में लगावें ।
5. कोमाइसिन - एस ( Comycin - S ) नि . ' ग्लिण्डिया → 1 ग्राम वायल में डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर गहरे मांस में प्रति दिन सुई लगावें ।
6. ' ब्राडिसिलीन नि.'अल्केम → 250 से 1 ग्राम में से कोई इन्जे . मांस में लगावें ।
नोट- कैसिलान बी ( Casilan B2 ) नि . ' ग्लण्डिया ' - पथ्य रूप में इसका आहार 4-8 चम्मच प्रातः सायं दें ।
Rx . ( मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन )
1. पूर्ण विश्राम ( Complete Rest ) ।
2. कैसिलान बी12 ,, - 4 - 8 चम्मच आहार रूप में ।
प्रा.दो.शा. - 3. प्रेडनीसोलोन 5 मि.ग्रा . टेबलेट, - 2 टे . दिन में 3 बार , 3 सप्ताह तक। तत्पश्चात् 1 टि . प्रति तीसरे दिन ।
8 बजे , 12 बजे , 6 बजे सायं - 4. लोपरामाइड या लोमोफेन, - 2 टे . दिन में 3 बार । 10 बजे , 2 बजे , भोजन से 1/2 घण्टे पूर्व एवं रात सोते समय ।
5. सेरी - बेन्थीन -1 कै . जल से । एक्वाइरेक्स ( Equirex ) - 2 टे . 15 मिनट पूर्व भोजन के एवं रात सोते समय , दिन में 3 बार ।
6. सालाजोपाइरीन ( वैलेसी ) - 2 टे . नं . 4 औषधि के साथ - साथ । तरल एवं इले . की कमी ।
7. ग्लूकोज सैलाइन - 1-2 बोतल I / V आवश्यकतानुसार ।
कोलाइटिस की मिश्रित औषधि चिकित्सा -
टे. डिपेण्डाल - एम 1 टे. , टे. सालाजोपाइरीन 2 टे . , टे. प्रोबेन्थीन 1 टे . , एन्ट्रेनिल डूप्लेक्स 1 टे . , गैस्टाविड -1 । ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार दें ।
अल्सरेटिव कोलाइटिस के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण ज्ञातव्य -
हांलाकि इसके कुछ प्रारम्भिक लक्षण अमीबा जनित तथा बैक्टीरिया जनित कोलाइटिस से मिलते - जुलते हो सकते हैं , लेकिन वास्तव में इसका कारण एवं उपचार तथा जटिलतायें उनसे बिल्कुल भिन्न होती हैं ।
कारणों के सम्बन्ध में - अल्सरेटिव कोलाइटिस का कारण अभी तक निश्चित रूप से पता नहीं चल पाया है । जो तथ्य उभर कर सामने आये हैं उनके अनुसार रोगी में अपने ही शरीर के विभिन्न अंगों के विरुद्ध कुछ हानिकारक रोग उत्पन्न करने वाले पदार्थ बनते हैं जो बड़ी आँत में सूजन पैदा कर देते हैं ।
लक्षणों के सम्बन्ध में - प्रमुख लक्षण रक्त मिले पाखानों का बार - बार होना है । लेकिन टट्टी की जाँच करने पर न अमीबा मिलता है और न बैक्टीरिया । रोगी को पेट दर्द तथा बुखार भी हो सकता है । रोग जब तेज होता है तो रोगी में रक्त , प्रोटीन , जल तथा खनिज लवणों की कमी हो जाती है । पेट छूकर देखने पर बड़ी आँत के ऊपर दर्द महसूस होता है । रोगी की . यह दशा कुछ दिनों तक चलती है और फिर रोगी ठीक होकर घर चला जाता है । लेकिन उपचार के अभाव में कुछ रोगियों में यह लक्षण बार - बार हो सकते हैं । इस प्रकार की कोलाइटिस की कुछ प्रमुख जटिलतायें इस प्रकार हैं -
◆बहुत अधिक रक्त स्राव से एनीमिया ।
◆बड़ी आँत के बाहर मवाद एकत्र होना ।
◆आँत का फट जाना ।
◆आँत में रुकावट हो जाना या कैंसर बन जाना ।
◆जोड़ों में दर्द रहना या लिवर में सूजन हो जाना ।
■■ऐसे रोगी को भोजन में चोकर तथा रेशेदार पदार्थ नहीं देने चाहिये । दूध से कुछ रोगियों के लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है , । जटिलतायें होने पर औपरेशन की आवश्यकता पड़ सकती है । इस रोग के निदान में ' ऐण्डोस्कोपी जाँच विधि का विशेष महत्व है ।
टी.बी. से कोलाइटिस - यह एक संक्रामक रोग है जो दूषित जल , अन्य पेय पदार्थों जैसे कच्चा दूध या भोजन के सेवन अथवा फेफड़ों की टी.बी. के रोगी द्वारा अपना ही बलगम निगल जाने से फैल सकती है | टी.बी. के जीवाणु मुख्यतः छोटी आंत के अंतिम सिरे तथा बड़ी आँत तक के समीपस्थ भाग को प्रभावित करते हैं जिससे रोगी में -
●पेट दर्द ,
●भूख न लगना ,
●वजन कम होते जाना ,
●बुखार रहना ,
●उल्टियाँ होना ,
●पेट में वायु गोला सा बनना ,
●पतले दस्त या कब्ज रहना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं लेकिन कुछ रोगियों में बड़ी आँत का कोलन भी प्रभावित हो जाता है जिसमें रोगी की टट्टी में आँव तथा खून भी आने लगता है ।
उपचार के लिये - अधिक कैलोरी वाला , प्रोटीन युक्त भोजन तथा आराम आवश्यक है ।
कैंसर से रक्त तथा आँव( सफेद बलगम जैसा ) - कई रोगियों में बड़ी आँत के कैंसर का प्रमुख लक्षण टट्टी के सस्ते रक्त तथा आँव आना होता है । जिसको रोगी डिसेण्ट्री समझकर मेट्रोजिल , फ्लेजिल या ऐन्टामिजोल या टेट्रासाइक्लीन जैसी दवायें लेते रहते हैं लेकिन इनसे कोई विशेष लाभ नहीं मिलता जब तक जाँच करके निदान तथा अनुरूप उपचार न लिया जाय ।
म्यूकस कोलाइटिस - इस प्रकार की कोलाइटिस का निश्चित कारण अभी तक ज्ञात नहीं है ।
अधिकांश रोगी टट्टी के साथ प्रायः बहुत अधिक मात्रा में आँव आने की शिकायत करते हैं । बहुत से रोगी पतले दस्तों की शिकायत करते हैं तो कुछ अन्य कब्ज की तो कुछ रोगी कभी पतले दस्त और कभी कब्ज से परेशान रहते हैं । अन्य लक्षण पेट दर्द , पेट में भारीपन , छाती में जलन , कमर दर्द , कमजोरी , घबराहट या उलझन , अत्यधिक गैस बनना , पेट फूलना इत्यादि लक्षण होते हैं । जब एण्डोस्कोप गुदा के रास्ते डालकर बड़ी आंत का निरीक्षण करते हैं तो आँत में ऐंठन नजर आती है और म्यूकस बहुत अधिक मात्रा में दिखायी देता है ।
★ उपचार के लिये लक्षण के अनुसार दवायें प्रयुक्त करते हैं ।
पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -
































































































